श्रुत को पंचम भाव में जोड़े,
तब श्रुत पंचमि पर्व मने।
मिथ्यात्व तिमिर का नाश होय,
सम्यक् श्रुतज्ञान की ज्योति जगे ।। 1 ।।
श्रुत के दो भेद द्रव्य-भाव कहे,
फिर बारह अंग बताए हैं।
उन सबका सार उन्हीं पाया,
जो निज पर दृष्टि लगाए हैं।। 2।।
है द्वादशांग का तत्त्व यही,
पर से हटकर निज में आना।
रागादि विकल्प अरु भेद रहित,
बस निज अभेद में रम जाना ।। 3।।
पहिचाना, जाना, रम जाना,
निश्चय रत्नत्रय ये ही है ।
मुक्ति का सीधा पंथ यही,
सुख का सोपान भी ये ही है ।। 4।।
अतएव आत्मज्ञानी को भाव,
श्रुत केवली ग्रन्थों में गाया।
अरु द्वादशांग के पाठी को,
श्रुत केवली द्रव्य से बतलाया।। 5।।
जो केवल निज आतम जाने,
हो लोकालोक का वह ज्ञाता।
अरु आत्मज्ञान बिन बहु आगम,
पढ़ भी भव में ही दुख पाता।। 6।।
अपने श्रुतज्ञान को रे भाई,
अब तक तो पर में ही जोड़ा।
अतएव भाव औदयिक हुये,
कर्मों से नाता नहीं तोड़ा।। 7।।
बस झड़े पुराने नये बँधे,
नहीं अन्त अभी तक आया है।
सुख की इच्छा करने पर भी,
केवल दुख ही दुःख पाया है।। 8।।
अतएव एक पुरुषार्थ यही,
पर्यायों में मध्यस्थ बने ।
सहज ज्ञान में आ जावे तो,
राग-द्वेष वहाँ नहीं करे ।। ९।।
ज्ञानादि गुणों का गुणी धनी,
निज आतम का बहुमान करे।
सम्पूर्ण समर्पण हो अभेद को,
तब ही करुणा भाव पले।। १०।।
आनन्दमयी शिवपद पावें,
शिवपद का पंथ सु प्रकटावें।
जिसको पाकर भवि प्राणी भी,
निश्चित भव-सागर तिर जावें ।। ११।।
है जिनवाणी तो निमित्त मात्र,
पुरुषार्थ स्वयं को करना है।
पढ़ जिनवाणी को वाच्य,
आत्मा पर निज दृष्टि धरना है।। १२।।
‘आत्मन्’ बहुमान आत्मा का ही,
जिनवाणी बहुमान सही।
निज में ही शाश्वत लीन रहो,
जिनवाणी करे पुकार यही ।। १३।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह