श्रुतपंचमी: जैन ज्ञान परंपरा और ‘षट्खण्डागम’ की रचना का महापर्व
डॉ. नितेश शास्त्री, दुबई
1. प्रस्तावना: श्रुत पंचमी का रणनीतिक और आध्यात्मिक महत्व
जैनधर्म के गौरवशाली इतिहास में ‘श्रुत पंचमी’ वह ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जिसे ‘ज्ञान के जन्मदिन’ के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह मात्र एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से चली आ रही मौखिक परंपरा को लिपिबद्ध कर उसे विस्मृति के अंधकार से बचाने के सामूहिक संकल्प का उत्सव है। ‘श्रुत’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सुना हुआ ज्ञान’। भगवान महावीर द्वारा प्रवर्तित ‘भावश्रुत’ सदियों तक गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से प्रवाहित होता रहा, किंतु कालदोष और भीषण अकाल जैसी विषम परिस्थितियों में इस अलौकिक विरासत के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग गया था। इस विलुप्त होती मौखिक विरासत को ‘लिखित शास्त्र’ में परिवर्तित करना एक दूरदर्शी रणनीतिक निर्णय था, जिसने जैनदर्शन की आधारशिला को सुरक्षित किया। यह पर्व हमें उस संक्रमण काल की याद दिलाता है जब ज्ञान ‘कंठ’ से ‘कागज’ पर उतरा, जिससे न केवल आगमों का संरक्षण हुआ बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्म-कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मौखिक परंपरा से लिपिबद्ध ज्ञान तक का सफर
भगवान महावीर स्वामी ‘अर्वक्ता’ थे जिन्होंने ‘भावश्रुत’ का उपदेश दिया। उनके उपदेशों को गौतम गणधर ने बारह अंगों और चौदह पूर्वों के रूप में संकलित किया। महावीर के निर्वाण के बाद लगभग 683 वर्षों तक ज्ञान की यह धारा आचार्यों की स्मृति में सुरक्षित रही। किंतु आचार्य भद्रबाहु के काल में आए 12 वर्षीय भीषण अकाल और निरंतर घटती स्मृति शक्ति (स्मृति दोष) के कारण श्रुतज्ञान के विच्छेद का भय उत्पन्न हो गया। वीर निर्वाण संवत 683 के लगभग, गिरनार की चंद्रगुफा में साधनालीन आचार्य धरसेन ने अनुभव किया कि यदि इस ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं किया गया, तो यह सदा के लिए लुप्त हो जाएगा।
3. आचार्य धरसेन और शिष्यों की परीक्षा: एक दिव्य घटनाक्रम
आचार्य धरसेन ने ज्ञान के संरक्षण हेतु दक्षिण भारत (दक्षिणपथ) के आचार्यों को पत्र लिखा, जिसके उत्तर में आन्ध्र देश की ‘वेणनदी’ (वेनदी) के तट से दो परम मेधावी मुनि, पुष्पदंत और भूतबलि, गिरनार पहुंचे। आचार्य ने उनकी ‘शुद्ध पात्रता’ को परखने के लिए एक सूक्ष्म परीक्षा ली।
- मंत्र परीक्षा और दर्पण प्रभाव: आचार्य ने दोनों मुनियों को सिद्ध करने हेतु दो मंत्र दिए। उन्होंने कुशलतापूर्वक एक मंत्र में अक्षर अधिक और दूसरे में अक्षर कम कर दिए थे।
- प्रतीकात्मक त्रुटि: जब मुनियों ने मंत्र साधना की, तो उनके समक्ष दो देवियां प्रकट हुईं। एक देवी ‘कानी’ (एक आंख वाली) थी और दूसरी का ‘दांत बाहर’ निकला हुआ था। मुनियों ने तत्काल विवेक से पहचान लिया कि देवियों की शारीरिक विकृति वास्तव में मंत्रों की भाषाई और व्याकरणिक त्रुटि का प्रतिबिंब है।
- ज्ञान शुद्धि: मुनियों द्वारा मंत्रों को व्याकरण सम्मत शुद्ध करने के पश्चात अत्यंत सुंदर और सौम्य देवियां प्रकट हुईं।
- आचार्य धरसेन शिष्यों की इस सूक्ष्म दृष्टि से अत्यंत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन्हें बारहवें अंग ‘दृष्टिवाद’ के अंतर्गत आने वाले ‘अग्रायणी पूर्व’ के पांचवें अधिकार ‘महाकर्म प्रकृति प्राभृत’ का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया।
4. ‘षट्खण्डागम’ की रचना और श्रुत पंचमी का उद्भव
आचार्य धरसेन से प्राप्त ज्ञान को पुष्पदंत और भूतबलि मुनियों ने ‘अंकलेश्वर’ (गुजरात) में लिपिबद्ध किया। वह महान लेखन कार्य ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन पूर्ण हुआ, जिसे आज हम ‘श्रुत पंचमी’ के रूप में मनाते हैं।
- प्रथम जैन शास्त्र: ‘षट्खण्डागम’ (छह खंडों वाला आगम) दिगंबर परंपरा का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ है।
- इसकी महत्ता इसी तथ्य से है कि इसका सीधा संबंध महावीर की द्वादशांग वाणी से है।
- रचनात्मक विवरण: इस ग्रंथ में कुल 6000 सूत्र हैं।
- आचार्य पुष्पदंत ने प्रथम 177 सूत्रों (सतप्ररूपणा) की रचना की, जबकि शेष भाग आचार्य भूतबलि द्वारा पूर्ण किया गया।
- बाद में आचार्य वीरसेन ने इस पर ‘धवला’ नामक विशाल टीका लिखी, जो स्वयं 72,000 श्लोक प्रमाण है।
- सामरिक और दार्शनिक महत्व: वह ग्रंथ जैन ‘कर्म दर्शन’ का महान शिखर है।
- जब यह ग्रंथ पूर्ण हुआ, तब अंकलेश्वर में देवों ने इसकी महापूजा की थी।
- वही देव-वंदना आज वर्तमान में ‘श्रुतपूजा’ और ‘शोभा यात्रा’ के रूप में हमारे सामाजिक उत्सवों का हिस्सा है।
5. श्रुत पंचमी: तिथि, पर्व और उत्सव की विधियां
वर्ष 2026 में श्रुत पंचमी का महापर्व 19 जून को मनाया जाएगा। यह दिन केवल पूजा का नहीं, बल्कि ‘ज्ञान की स्वच्छता’ और ‘शास्त्रों के संरक्षण’ का दिन है।
उत्सव एवं अनुष्ठान मार्गदर्शिका:
- शास्त्र शुद्धि व वेष्टन परिवर्तन: मंदिरों और ज्ञान भंडारों में रखे प्राचीन ग्रंथों की सफाई करना और उनके पुराने वस्त्रों (वेष्टन) को बदलकर नए रेशमी वस्त्रों में लपेटना।
- जिनवाणी (सरस्वती) महापूजा: सरस्वती स्वरूप जिनवाणी की विशेष अष्टद्रव्य से पूजा।
- चांदी की पालकी में शोभा यात्रा: शास्त्रों को चांदी की पालकी या रथ में विराजमान कर नगर भ्रमण कराना, जो अंकलेश्वर में देवों द्वारा की गई प्रथम पूजा का वर्तमान स्वरूप है।
- प्राकृत भाषा दिवस: चूंकि मूल आगम प्राकृत में है, अतः इस दिन को प्राकृत भाषा के संवर्धन और संगोष्ठियों के लिए समर्पित करना।
6. जैन दर्शन में सरस्वती (श्रुतदेवी) का स्वरूप
जैन ज्ञान परंपरा में ‘सरस्वती’ या ‘श्रुतदेवी’ का स्वरूप वैदिक अवधारणा से भिन्न और अद्वितीय है।
- व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण: जैन परंपरा में सरस्वती को ‘सरस्सई’ कहा गया है। यह दो शब्दों के मेल से बना है: ‘सरस’ (सरोवर/कमल) + ‘सई’ (स्मृति/चिंतन)। अर्थात, सरस्वती वह देवी है जो तीर्थंकरों की वाणी के स्मृति-सागर का मानवीकरण है। यह किसी भौगोलिक नदी का प्रतीक नहीं, बल्कि ‘जिनवाणी’ का जीवंत स्वरूप है।
- प्रतीकात्मकता: जैन सरस्वती के हाथ में ‘शास्त्र’ (पुस्तक) का होना अनिवार्य है, जो इस बात का ऐतिहासिक साक्ष्य है कि जैनधर्म ने ज्ञान के दस्तावेजीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। मथुरा के कंकाली टीला से प्राप्त कुषाण कालीन (2nd Century CE) सरस्वती प्रतिमा भारत में प्राप्त सबसे प्राचीन सरस्वती प्रतिमाओं में से एक है, जो जैनों की प्राचीन शास्त्र-संस्कृति को सिद्ध करती है।
7. निष्कर्ष: ज्ञान के संरक्षण की समकालीन प्रासंगिकता
श्रुत पंचमी केवल दो हजार वर्ष पुरानी एक घटना का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को सहेजने का एक वार्षिक आह्वान है। जिस प्रकार आचार्य धरसेन ने ज्ञान के विलुप्त होने के सूक्ष्म भय को भांपकर उसे लिपिबद्ध कराया, आज हमारा दायित्व है कि हम अपने प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों (Manuscripts) को केवल ‘ज्ञान के गोदामों’ में बंद न रखें, बल्कि उन्हें डिजिटल स्वरूप और आधुनिक शोध के माध्यम से जीवंत बनाएं। ज्ञान की इस अविच्छिन्न धारा को अक्षुण्ण रखने के लिए ‘ज्ञानदान’ और ‘शास्त्र संरक्षण’ आज भी उतने ही अनिवार्य हैं जितने प्राचीन काल में थे; अतः आइए, हम संकल्प लें कि हम अपनी पांडुलिपियों को विस्मृति के कालखंड से निकालकर आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘जीवंत प्रज्ञा’ के रूप में सुरक्षित करेंगे।
!!जय जिनेंद्र !!