श्रीजिनेन्द्र-स्तुति | Shrijinendra-stuti

(१६-१४ मात्रा)
धन्य घड़ी आयी है जिनवर!
आज सकल मम पुण्य फले।
हुए दर्श तव शान्ति-प्रदायी,
विघ्न-चक्र अतिशीघ्र टले।
अनुपम समता पायी मैंने,
शान्त-रूप लख गुणग्रामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।१।।

अगणित सूर्यों से जो उजले,
शरच्चन्द्रमा से निर्मल।
ऐसे तव गुणगण का चिन्तन,
करता भव्यों का मंगल।
राग-द्वेष की छटा न कोई,
वीतराग-छवि सुखधामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।२।।

विषयाशा-वश से विहीन हो,
नहीं परिग्रह का बन्धन।
प्रति-प्रदेश से पल-पल होती,
ज्ञान-सौख्य-वर्षा गुणधन।
लोकालोक-विलोकी हो पर,
निजस्वभाव में विश्रामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।३।।

सहज शोभती है ज्ञायकता,
यहाँ ज्ञेय का काम नहीं।
जहाँ चैतन्य-परिणति महके,
करते आप निवास वहीं।
योग-भोग से परे हुए हो,
निश्चल निश्छल निष्कामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।४।।

तप्त-कनक-सा तनु अति विलसे,
नयन-युगल शुभ-कमल अहो।
निर्निमेष नासाग्र रहे स्थिर,
परचिन्ता का लेश न हो।
शशि-शोभा को हरने वाला,
मुख-मण्डल वर-अभिरामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।५।।

हर पदार्थ निज का कर्ता है,
यह कहते कर पर कर धार।
जिसने निज को तुम सम जाना,
वह पाता भव-जलधि-पार।
मैं भी तुमसा होऊँगा जिन!
बनकर सत्-शिवपथगामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।६।।

सहजतया निजपद देते हो,
पहुँचा देते मुक्ति-नगर।
किन्तु निस्पृह अकर्ता रहते,
ज्ञानसुधा के शुभ-निर्झर।
चन्द्र-किरण सा धवल-सुयश है,
तीन-भुवन में हो नामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।७।।

मोह-गरल को हर लेती है,
प्रभु की सुधा-समा वाणी।
अजर-अमर पद को पाते हैं,
रसपान करें जो भी ज्ञानी।
समयसार भवपार प्राप्त कर,
लहें सिद्धि-सुख अविरामी।
सदा बसो मम हृदय जिनेश्वर,
यही प्रार्थना है स्वामी।।८।।

(दोहा)
‘अभि’-मन-मन्दिर जिन बसें, निर्मल ज्ञान प्रकाश।
हो तुरंत भवभ्रम निहत, प्रकटे पद अविनाश।।

रचनाकार: अभिषेक जैन (Abhishek Jain), देहरादून
YouTube: https://www.youtube.com/watch?v=I_P-oOrPAXM&list=PLXcBKWNnm5zU&index=2