विधान पीठिका
(वीरछन्द)
देश मालवा नगर उज्जयिनि कवि धनन्जय थे प्रख्यात ।
स्तुति है चालीस काव्यमय, विषअपहार नाम विख्यात ।।
सदी आठवीं काल धर्ममय, मग मुक्ति में गमन निरन्तर ।
भक्ति उर में आदि प्रभु की धरी दृष्टि निज आतम अंतर ।।
चित पागा था आदिनाथ में करते थे जिनवर गुणगान ।
सर्पदंश से पीड़ित सुत था किन्तु न विचलित उनका ध्यान ।।
उपजाति के छंद मनोहर प्रभुवर का करते गुणगान ।
काव्य चतुर्दश पूर्ण हुआ तब सहज हुआ क्रमबद्ध परिणाम ।।
सहज विलय विष का प्रभाव सुत स्वस्थ हो गया था उस क्षण ।
सहज परिणमित वस्तु व्यवस्था है स्वाधीन जगत कण-कण ।।
तब आरोप किया भक्ति पर किन्तु हुआ स्वकाल में जान ।
जब उर में उलसित हो भक्ति, होता सहज प्रभु गुणगान ।।
आओ आओ आदिनाथ के चरणों में अर्पित निज भाव ।
करें अर्चना ऋषभ देव की सहज दिखे निजरूप स्वभाव ।।
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)
(दोहा)
शब्द अल्प असमर्थ हैं, जिनवर रूप विशाल ।
उर भक्ति बहुमान में, अर्पित है गुणमाल ।॥
श्री आदिनाथ जिन पूजन
(छन्द-मत्त सवैया)
आद्य पुरुष हे आदि जिनेश्वर प्रथम तीर्थ नायक हो महान ।
अल्प शक्ति तदपि उद्यत हूँ करने प्रभुवर का गुणगान ॥
आओ पधारो हृदय हमारे निकट आप हम आयें हैं ।
उर उलसित है मुदित हुआ मन भाव भक्ति भर लाये हैं ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
अष्टक
(छन्द- लावणी)
यह जल प्रतीक निरमलता का, अर्पण करने हैं आये ।
हो परिणति मेरी भी निर्मल, यही भावना ले आये ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा
चंदन विख्यात है शीतलता, प्रभुवर अर्पण ये चंदन है।
काम अनल हो शांत प्रभु अब, यही विनय है वंदन है ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा
अक्षत अखण्ड निज आतम है, प्रभुवर तुमने बतलाया ।
विनशी बुध्दि क्षत परजय की, आस पूर्णता ले आया ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा
फूल मनोहर रंग बिरंगे, सूचक इच्छा अभिलाषा ।
है शुद्धातम राग शून्य ही, कहती यह जिनवर भाषा ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय कामवाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
ज्ञानमयी नैवेद्य अनुपम, आस्वादन आनंद अहो ।
अन आहारी है निज आतम, हो प्रतीति व लीन रहो ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा
ज्ञानदीप का हुआ उजाला, निज पर भेद ज्योत जागी ।
यही बढेगी केवल रवि तक, अंतर उर लगनी लागी ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा
शेष रही है बहुत मलिनता, धूप धूम्र वत् जायेगी ।
जब होगी निज रूप में थिरता, कैसे वह टिक पायेगी ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मलिनभावविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा
अनुभव में निज चेतन आया, फल मुक्ति का पायेंगे ।
रमण चरण हो निज स्वरूप में, दशा पूर्ण उपजायेंगे ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे।।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा
शक्ति अनंती निज वैभव की, प्रगटेंगी जो गर्भित हैं ।
इसी आस का अर्घ्य बनाया, चरणों में प्रभु अर्पित है ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
पंच-कल्याणक अर्घ्य
छन्द-जोगीरासा
तिथि आषाढ़ वदी द्वितीया को मरुदेवी उर आये ।
सरवारथ सिध्दि को तजकर मध्यलोक उमगाये ।।
पंद्रह मास रतन की वर्षा सुरपति अति हर्षाये ।
है आदीश गर्भ कल्याणक पथ मुक्ति हम पायें ।।
ॐ ह्रीं आषाढ़ कृष्ण द्वितीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय
श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
चेत वदी नवमी का दिन था नाभिराय हर्षाये ।
जन्म हुआ जब आदि प्रभु का सुर अभिषेक रचाये ।।
मुदित हुये सब जीव जगत के सुख तिहुँलोक में छाया ।
है आदीश जन्म कल्याणक वन्दन त्रिभुवन राया ।।
ॐ ह्रीं चैत्र कृष्ण नवम्यां जन्ममंगलप्राप्ताय
श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
चेत वदी नवमी के दिन ही उर वैराग है छाया ।
लौकांतिक सुर इन्द्रादिक ने तप कल्याण मनाया ।।
सिद्ध प्रभु को किया नमन फिर ध्यान है उग्र जगाया ।
अनुमोदन कर मार्ग विरागी पूजैं त्रिभुवन राया ।।
ॐ ह्रीं चैत्र कृष्ण नवम्यां तपोमंगलप्राप्ताय
श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
फागुन कृष्ण तिथि एकादशी केवलज्ञान उपाया ।
दर्षन ज्ञान अरु सुख वीरज भाव अनंता पाया ।।
दिव्य ध्वनि के द्वारा प्रभु ने मार्ग मुक्ति दिखलाया ।
जिज्ञासु जो जिय भूतल के वन्दै त्रिभुवनराया ।।
ॐ ह्रीं फाल्गुन कृष्ण एकादशां ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
गिरि कैलाश शिखर से प्रभु ने पाया पद निर्वाणा ।
वदी चौदस जो माघ मास की ख्याती पर्व महाना ।।
पूर्ण लाभ जो आत्म तत्त्व का प्रभु ने सहज उपाया ।
मुक्त भाव के अभिलाषी हम पूजैं त्रिभुवन राया ।।
ॐ ह्रीं माघ कृष्ण चतुर्दशां मोक्षमंगलप्राप्ताय
श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
जयमाला
(दोहा)
धर्म तीर्थ के नायक हो वन्दूँ श्री आदीश ।
जयमाला अर्पित प्रभो नमन तुम्हें जगदीश ।।
(छन्द-रेखता)
भरत की भूमि नगर साकेत, हुआ जो धन्य आप अवतार ।
नृप श्री नाभिराय प्रासाद, मनाया सुरपति ने त्यौहार ।।
प्रभु श्री आदिनाथ भगवान, दिखाया तत्त्व अनादि सत्त्व ।
जगत के जीव हैं ज्ञानानंद, हुआ उद्घाटित चेतन तत्त्व ।।
ज्ञान में झलके लोकालोक, आप हैं निजसुख में तल्लीन ।
भविकजन पाते हैं उपदेश, लहैं निज अनुभव जीव प्रवीण ।।
प्रभु वाणी का है यह सार, जिय सब गर्दै निजातम भान ।
अरे विधि बतलाई प्रभु आप, ज्ञानमय का हो कैसे ज्ञान ।।
द्रव्य षट् और तत्त्व हैं सात, करो निर्णय उनका अभिराम ।
निर्णय प्रथम विकल्प प्रमाण, अरे जड़ चेतन भिन्न पिछान ।।
प्रभु अविनाशी आतम देव, वही है गुण अनंत की खान ।
दिखे परयय में राग विकार, उसे तू चिद् विकार ही जान ॥
तदपि नहीं स्वभाव ये मूल, उपजता जब स्वभाव की भूल ।
निजातम है शुचिता भण्डार, राग है अशुचि भिन्न फजूल ।।
ज्ञान अरु राग भिन्नता बोध, यही है धर्म प्राप्ति आधार ।
और द्रव्य परयय हैं दो भाव, भिन्न हैं एक वस्तु निर्धार ।।
तजो भवि तुम निमित्त का लक्ष, लक्ष यह राग व पर्यय त्याग।
उदित होगा ध्रुव आतमदेव, अतीन्द्रिय सुख का हो आस्वाद ।।
हुआ समकित दर्शन उत्पाद, यही आतम अनुभूति प्रमाण ।
धरे थिरता निज आतम देव, वही है पन्थ लहै निर्वाण ।।
प्रभु उपदेश में गर्भित भाव, प्रभु का है असीम उपकार ।
गहैं जो द्वादशांग का सार, अनेको जीव तजें संसार ।।
नहीं शब्दों से शक्य बखान, उछलता उर में जो बहुमान ।
शीघ्र ही पाऊँ सिद्ध समाज, प्रभु मेरे स्वामी भगवान ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य नि. स्वाहा।
(दोहा)
चिदानंद चिद्रूप चित, चिद्विलास विश्राम ।
छवि निहारूँ आपकी, लखूँ निजातम राम।।
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)
समुच्चय पूजन
(छन्द-चौपाई)
विष अपहार काव्य भक्ति का, लक्ष धरें कवि निज शक्ति का ।
गुण वर्णन श्री आदिनाथ का, दृष्टि में निज भाव साथ था ।।
आदि प्रभु उपदेश महाना, निज ज्ञायक बस एक ठिकाना ।
आओ प्रभु मम हदय पधारें, भाव भक्ति हम सुगम उचारें ।।
(दोहा)
ऋषभ देव जिनवर प्रभु, काव्य है विष अपहार ।
आज रची भक्ति प्रभु ले स्तोत्र आधार ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !
अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
(छन्द-मत्तसवैया)
शुद्धात्म प्रीति जल ले आये, प्रभु चरणों में करने अर्पण ।
जल सम होवे परिणति निर्मल, है यही आस मेरे भगवन ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म भावना का मलयज, जो राग आग मेटनहारा ।
हो शांत अनल संसार भ्रमण, विकसे प्रज्ञा का उजियारा ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म भावना अक्षत ले, बुध्दि क्षत परजय विनशाई ।
अक्षय अखण्ड निज आतम का, आलम्बन ही है सुखदाई ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म साम्य सुरभित हैं कुसुम, दुर्गंध रागमय दूर करें ।
परिणति में शेष मलिनता को, निजरुप रमणता शीघ्र हरे ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
कामवाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म भावना सुरस चरु, सुखमय तृप्ति के ही दाता ।
नैवैद्य जगत के जड़मय हैं, न देह क्षुधा भी हर पाता ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म दीप प्रज्ज्वलित उर में, उजियारा स्व पर भावों का ।
तम नाश भाव-श्रुत धारा में, संशय शंका दुर्भावों का ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म ध्यान की धूप उग्र, सब भाव मलिन विनशायेगी ।
यह ध्यान अनल तो सहज रूप, परिपूर्ण शुद्धि प्रगटायेगी ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
मलिनभावविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म भाव के फल अनुपम निर्व्याकुल सुख प्रगटायेंगे ।
सुखसागर बेहद अंतर में अविचल पद में बस जायेंगे ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धात्म भाव के अर्घ्य सजा, परिणति पात्र में ले आये ।
परिपूर्ण अमोलक पद अंतर, अब व्यक्त भाव में प्रगटायें ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दोहा
उत्तम भाव सजाय के, उर अतिशय बहुमान ।
काव्यों की अर्ध्यावली, करते प्रभु गुणगान ।।
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)
अर्ध्यावलि
काव्य-1
छन्द-उपजाति
स्वात्मस्थितः सर्वगतः समस्त-
व्यापारवेदी विनिवृत्तसङ्गः ।
प्रवृध्दकालोऽप्यजरो वरेण्यः,
पायादपायात्पुरुषः पुराणः ॥
अर्थः-आत्मस्वरूप में स्थित होकर भी सर्वव्यापक; सब व्यापारों के
जानकार होकर भी परिग्रह से रहित; दीर्घ आयु वाले होकर भी
बुढ़ापे से रहित तथा श्रेष्ठ प्राचीन पुरूष भगवान वृषभनाथ हम
सबको विनाश से बचायें-रक्षित करें ।
(छन्द - मानव)
हे ऋषभ देव जिनवर तुम, प्राचीन पुरुष कहलाते ।
तीर्थेश प्रथम इस युग के, संज्ञा सार्थकता पाते ।।
ऋषियों में तुम ऋषिवर हो, जो पद परमातम पाये ।
अतएव श्री भगवन तुम, प्रभु ऋषभ देव कहलाये ।।
निजरूप अनादि ध्याकर, तुम आदिनाथ प्रख्याता ।
थिर लीन निजानंद रस में, सर्वगत हो जग के ज्ञाता ।।
सब संग के त्यागी जिनवर, जानो सब जग व्यापारा ।
आयु विशाल थी किन्तु, न किंचित जरा विकारा ।।
निज सुख में शयन करे जो, वह नाम पुरुष का पाये ।
तुम ही जिनवर पुरुषोत्तम, विपदा से हमें बचायें ।।
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-2
परैरचिन्त्यः युगभारमेकः,
स्तोतुं वहन्योगिभिरप्यशक्यः ।
स्तुत्योऽद्य मेऽसौ वृषभो न भानोः,
किमप्रवेशे विशति प्रदीपः ॥
अर्थः- दूसरों के द्वारा चिंतवन करने के अयोग्य कर्मयुग के भार को
अकेले ही धारण किये हुये तथा मुनियों के द्वारा भी जिनकी स्तुति
नहीं की जा सकती – ऐसे वे भगवान वृषभनाथ आज मैं उनकी
स्तुति कर रहा हूँ, सो ठीक है। जहाँ सूर्य का प्रवेश नहीं होता तो
क्या वहाँ दीपक प्रवेश नहीं करता ? अर्थात् करता है।
(छन्द-मानव)
ज्यों शुद्धातम का अनुभव, नहीं शक्य विकल्पों द्वारा ।
कथनीय नहीं वह अनुभव, अनुपम आनंद अपारा ॥
न शक्य विकल्प वचन से, प्रभुवर सामर्थ्य तुम्हारा ।
युगभार निर्वहन कीना, गुण वर्णन को जग हारा ॥
नहीं कर पाये मुनिवर भी, प्रभु विरद आपका स्वामी ।
तदपि मैं उलसित होकर, गुणगान करूँ जगनामी ॥
ज्यों सूरज नहीं पहुँचता, नहीं विलय गुफा अंधियारा ।
किन्तु प्रदीप जा पहुँचे, हो गुफा मांहि उजियारा ॥
मति अल्प मैं करने तत्पर, स्तुति अर्पित है जिनवर ।
निज दृष्टि सहित निहारूँ, हे वृषभ नाथ जी प्रभुवर ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-3
तत्याज शक्रः शकनाभिमानं,
नाहं त्यजामि स्तवनानुबन्धम् ।
स्वल्पेन बोधेन ततोऽधिकार्थं,
वातायनेनेव निरुपयामि ॥
अर्थः-जिस तरह छोटे से झरोखे से झांककर उससे कई गुणी बड़ी
वस्तुओं का वर्णन किया जाता है; उसी तरह मैं भी अपने अल्पज्ञान
से जानकर आपके गुणों का वर्णन कर रहा हूँ। मुझे अपनी इस
अनोखी सूझ पर हर्ष और विश्वास दोनों हैं, इसलिये मैं इन्द्र की
तरह अपनी शक्ति को नहीं छिपाता ।
(छन्द-मानव)
लघु देश ज्ञान अवगाहन, सम्पूर्ण विश्व का ज्ञाता ।
प्रासाद झरोखा छोटा, नगरी विशाल दिखलाता ॥
मति अल्प ही विकसित मेरी, गुण वर्णन करूँ तुम्हारे ।
प्रभुवर के गुण कहने में, अरे ! इंद्रादिक भी हारे ॥
न त्यागूँ निज साहस को, है हर्ष पूर्ण विश्वासा ।
सम इन्द्र मैं नहीं छिपाऊँ, मेरी हिम्मत उल्लासा ॥
प्रभु भी निज आतम भजकर, पद पूर्ण है तुमने पाया ।
निज आत्म भजूँगा मैं भी, अतएव शरण तुम आया ॥
निज भाव पूर्ण अविकारी, प्रभुवर मैं भी पाऊँगा ।
मैं नहीं हटूंगा पीछे, तुम निकट अचिर आऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-4
त्वं विश्वदृश्वा सकलैरदृश्यो,
विद्वानशेषं निखिलैरवैद्यः ।
वक्तुं कियान्कीदृश इत्यशक्यः,
स्तुतिस्ततोऽशक्तिकथा तवास्तु ॥
अर्थ :- आप सबको देखने वाले है, किन्तु सबके द्वारा देखे नही जाते ।
आप सबको जानते है, पर सबके द्वारा नहीं जाने जाते ।
आप कितने और कैसे है ? यह भी नहीं कहा जा सकता. इसलिये ।
आपकी स्तुति मेरी सामर्थ्य नहीं है, यही कहा जा सकता है।
(छन्द-मानव)
तुम सर्वदर्शी हो किन्तु, सब तुमको देख न पायें ।
तुम ज्ञाता सर्व जगत के, सब तुमको जान न पायें ॥
कैसे कितने हो प्रभुवर, परिमाण न हम कर सकते ।
ज्ञानादि चतुष्टय जिनवर, तुव भाव असीमित प्रगटे ॥
यद्यपि मैं हुआ था उद्यत, हिम्मत भी बहुत जुटाई ।
प्रभु तुम गुण वर्णन करने, अक्षमता हाथ ही आई ॥
मैं हूँ अशक्त कह पाऊँ, स्तुति यह मेरी जानो ।
साहस इन्द्रादिक हारे, यह बात सत्य ही मानो ॥
तुव गुण की पूर्ण प्रगटता, लख निज स्वभाव जो भायें ।
बेहद सामर्थ्य तुम्हारी, अनुमान सत्य वे पायें ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-5
व्यापीडितं बालमिवात्मदोषै,
रुल्लाघतां लोकमवापिपस्त्वम् ।
हिताहितान्वेषणमान्द्यभाजः,
सर्वस्यजन्तोरसि बालवैद्यः ॥
अर्थः-आपने बालक के समान संसारी मनुष्यों को उनके द्वारा किये
गये अपराधों से अत्यन्त पीड़ित जन को निरोगता प्राप्त कराई है।
निश्चय से आप भले-बुरे के विचार करने में मूर्खता (मंदता) को
प्राप्त हुये सब प्राणियों के बालवैद्य हैं।
(छन्द-मानव)
हैं बाल समान अबोधा, संसार में भ्रमते प्राणी ।
हित-अहित विचार बिना के, दृष्टि मिथ्या अज्ञानी ॥
भव-ताप से पीड़ित जन को, आरोग्य दान हो देते ।
ध्रुव स्वस्थ निजातम का ही, आलम्बन लेने कहते ॥
शुभ राग लाभ कारी है, भ्रांति ये अनादि पाली ।
प्रभुवर तुमने बतलाया, निज ज्ञायक है हितकारी ॥
भव रोग की पीड़ा भोगें, बालक अबोध संसारी ।
तुम बाल वैद्य हो प्रभुवर, तुम ही हो पीड़ाहारी ॥
निज ज्ञायक की महिमा को, जो चित में है उपजाये ।
कारण निरोग को पाकर, आरोग्य हर्ष को पाये ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-6
दाता न हर्ता दिवसं विवस्वा-,
नद्य व इत्यच्युत ! दर्शिताशः ।
सव्याजमेवं गमयत्यशक्तः,
क्षणेन दत्सेऽभिमतं नताय ॥
अर्थः-हे उदारता आदि गुणों से सहित जिनेन्द्रदेव! सूर्य तो न कुछ
देता है और न कुछ लेता है, सिर्फ आज.. कल.. इस तरह करके
आशा दिखाता हुआ असमर्थ होकर बिना कुछ लिये दिये ही कपट
सहित दिन को बिता देता है, किन्तु हे प्रभु ! आप नम्र मनुष्य के लिये
क्षण भर में इच्छित वस्तु दे देते हैं।
(छन्द-मानव)
यह सूर्य उदित हो प्रतिदिन, संध्या को अस्त है होता ।
नित नवल किसी आशा में, यह मूर्ख समय को खोता ॥
नहीं किंचित लेता देता,बस बाह्य दिशा दिखलाये ।
प्रभु उत्तम ज्ञान प्रकाशी, चेतनमय रवि बतलाये ॥
प्रभु तुम उपदेश किरण से, निज चेतन का उजियारा ।
लख रूप आप सम अपना, नाशे अनादि अंधियारा ॥
हो नाथ आप ही अच्युत, नित जग के दृष्टा ज्ञाता ।
जो नमता है प्रभु तुमको, नम निज में चिर सुख पाता ॥
जड़ रवि असमर्थ सदा ही, अतिशय सामर्थ्य तुम्हारा ।
जग जिय सामर्थ्य जगाते, स्वीकृत हो नमन हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य -7
उपैति भक्त्या सुमुखः सुखानि,
त्वयि स्वभावाद्विमुखश्च दुःखम् ।
सदावदात
द्युति रेकरुप,
स्तयोस्त्वमादर्श इवावभासि ॥
अर्थः- आपके अनुकूल चलने वाला पुरुष भक्ति से सुखों को प्राप्त
होता है और प्रतिकूल चलने वाला पुरूष स्वभाव से ही दुःख पाता
है, किन्तु आप उन दोनों के आगे दर्पण की तरह हमेशा उज्जवल
कांतियुक्त तथा एक सदृश शोभायमान रहते हैं।
(छन्द-मानव)
स्वयमेव ही उजला दर्पण, प्रतिबिम्बित जग को करता ।
उस ओर धरे मुख जो भी, निजरूप सहज ही लखता ॥
किंतु जो विमुख आरसी, निज रूप देख न पाये ।
हो दुखी स्वयं में प्राणी, चित्त में क्लेश उपजाये ॥
प्रभु आप सदैव मुकुरवत, सब जीव स्वरूप दिखाते ।
अनुसरण आपका करते, जिय सुख अनंत प्रगटाते ॥
किन्तु प्रभु आप विमुख जो, विपरीत लखे अज्ञानी ।
भव दुख जल में डूबा है, सुख कणिका लहे न प्राणी ॥
परिपूर्ण प्रगट परिजय में, परमात्म रुप प्रतिभासे ।
तुम सम निज को जो देखे, पाये पद निज अभिलाषे ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-8
अगाधताब्धेः स यत पयोधिः,
मेरोश्च, तुङ्गा प्रकृतिः स यत्र ।
द्यावापृथिव्योः पृथुता तथैव,
व्याप त्वदीया भुवनान्तराणि ॥
अर्थः-समुद्र की गहराई वहाँ है, जहाँ वह समुद्र है। सुमेरू पर्वत की
उन्नत प्रकृति वहाँ है जहाँ वह सुमेरू पर्वत है और आकाश-पृथ्वी
की विशालता भी उस ही प्रकार है अर्थात जहाँ आकाश-पृथ्वी हैं,
वहीं उनकी विशालता है परन्तु हे प्रभु ! आपकी गहराई,उन्नत
प्रकृति और हृदय की विशालता ने तीनों लोकों के मध्यभाग को
व्याप्त कर लिया है।
(छन्द-मानव)
सागर अगाध गहरा है, गहराई उदधि बराबर ।
गिरि मेरु बहुत है ऊँचा, ऊँचाई मेरु बराबर ॥
नभ थल भी अति विस्तारा, वह भी उनके सम जानो।
ये सब ही मर्यादित हैं, परिमित ही उनको मानो ॥
प्रभुवर विशाल उन्नतता, गहराई अरु विस्तारा ।
अपरिमित बिन मर्यादा, तिहुँलोक न पावे पारा ॥
मेरू आकाश उदधि की, नहीं थल की उपमा कोई ।
अनुपम की उपमा देकर, त्रुटि भारी बहुत संजोई ॥
चैतन्य महाप्रभु जिनवर, परजय भी पूर्ण स्वरुपी ।
मैं भी हूँ चेतन राजा, शक्ति है पूर्ण स्वरुपी ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-9
तवानवस्था परमार्थतत्त्वम्,
त्वया न गीतः पुनरागमश्च ।
दृष्टं विहाय त्वमदृष्टमैषीः,
विरुध्दवत्तोऽपि समञ्जसस्त्वम् ॥
अर्थः-भ्रमणशीलता, परिवर्तनशीलता आपका वास्तविक सिद्धांत है
और आपके द्वारा मोक्ष से वापिस आने का उपदेश नहीं दिया गया है
तथा आप प्रत्यक्ष इस लोक संबंधी सुख छोड़कर परलोक संबंधी सुख
को चाहते हैं, इस तरह आप विरुद्ध प्रवृत्तियुक्त होने पर भी उचितता
से युक्त हैं।
(छन्द-मानव)
जग के पदार्थ जो सारे, परिणमनशील बतलाये ।
तदपि जिय सिद्ध हुयें हैं, नहीं लौट पुनः वे आयें ॥
संयोग प्रगट जो सुख के, उन सबको प्रभुवर त्यागा ।
ध्रुव कायम सुख अंतर में, वह पाने चित अनुरागा ॥
जब थूल बुद्धि से देखें, दिखता यह कार्य विरोधी ।
धर तात्त्विक दृष्टि देखें, है भाव यही अविरोधी ॥
प्रभु दशा उत्पाद आपकी, व्यय रहित सदा ही जानो ।
संसार नाश है ऐसा, तिन उपज पुनः न मानो ॥
हैं सुखाभास सुख जग के, प्रभुवर उनको तुम त्यागे ।
सुख पूर्ण सदैव रहे जो, हम भी उसको अनुरागे ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
काव्य-10
स्मरः सुदग्धो भवतैव तस्मिन्,
उघ्दूलितात्मा यदि नाम शम्भुः ।
अशेत वृन्दोपहतोऽपि विष्णुः,
किं गृह्यते येन भवानजागः ॥
अर्थः-हे प्रभु ! आपके द्वारा ही काम अच्छी तरह भस्म किया गया है।यदि
कहें तो महादेव ने भी तो भस्म किया था तो वह कहना ठीक
नहीं क्योंकि बाद में वह उस काम के विषय में कलंकित हो गया था और
विष्णु ने भी वृन्दा-लक्ष्मी नामक स्त्री से प्रेरित होकर उसके साथ शयन किया
लेकिन आप जागृत रहे हो अर्थात कामनिद्रा में अचेत नहीं हुये, इसलिये
कामदेव के द्वारा आपकी कौन सी वस्तु ग्रहण की जाती है अर्थात् कोई भी नहीं।
(छन्द - मानव)
सब काम भोग इच्छायें, कर भस्म आप विनशाये ।
निज आत्म तृप्ति के द्वारा, सुख अचल पूर्ण को पाये ॥
ये काम नाश कर शिव ने, भस्मी शरीर पर धारी ।
कीचड़ फिर स्वयं लपेटा, धर आसक्ति प्रति नारी ॥
विष्णु ने शयन किया था, परिग्रह आसक्ति भोगी ।
जग विजयी काम से पीड़ित, वे रहे काम के रोगी ॥
कामुकता नष्ट किये थे, है कथा झूठ जग जानी ।
निज आत्म शून्य इच्छा से, वस्तु यह सत्य वखानी ॥
न अचेत काम निद्रा में, आनंन्द शयन तुम करते ।
निज आतम रति तुम्हारी, सुख पूर्ण के झरने झरते ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।