श्री विषापहार स्तोत्र मंडल विधान | Shri Vishapahar Stotra Mandal Vidhan

विधान पीठिका

(वीरछन्द)

देश मालवा नगर उज्जयिनि कवि धनन्जय थे प्रख्यात ।
स्तुति है चालीस काव्यमय, विषअपहार नाम विख्यात ।।
सदी आठवीं काल धर्ममय, मग मुक्ति में गमन निरन्तर ।
भक्ति उर में आदि प्रभु की धरी दृष्टि निज आतम अंतर ।।
चित पागा था आदिनाथ में करते थे जिनवर गुणगान ।
सर्पदंश से पीड़ित सुत था किन्तु न विचलित उनका ध्यान ।।
उपजाति के छंद मनोहर प्रभुवर का करते गुणगान ।
काव्य चतुर्दश पूर्ण हुआ तब सहज हुआ क्रमबद्ध परिणाम ।।
सहज विलय विष का प्रभाव सुत स्वस्थ हो गया था उस क्षण ।
सहज परिणमित वस्तु व्यवस्था है स्वाधीन जगत कण-कण ।।
तब आरोप किया भक्ति पर किन्तु हुआ स्वकाल में जान ।
जब उर में उलसित हो भक्ति, होता सहज प्रभु गुणगान ।।
आओ आओ आदिनाथ के चरणों में अर्पित निज भाव ।
करें अर्चना ऋषभ देव की सहज दिखे निजरूप स्वभाव ।।

(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

(दोहा)

शब्द अल्प असमर्थ हैं, जिनवर रूप विशाल ।
उर भक्ति बहुमान में, अर्पित है गुणमाल ।॥

श्री आदिनाथ जिन पूजन

(छन्द-मत्त सवैया)

आद्य पुरुष हे आदि जिनेश्वर प्रथम तीर्थ नायक हो महान ।
अल्प शक्ति तदपि उद्यत हूँ करने प्रभुवर का गुणगान ॥
आओ पधारो हृदय हमारे निकट आप हम आयें हैं ।
उर उलसित है मुदित हुआ मन भाव भक्ति भर लाये हैं ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।

अष्टक

(छन्द- लावणी)
यह जल प्रतीक निरमलता का, अर्पण करने हैं आये ।
हो परिणति मेरी भी निर्मल, यही भावना ले आये ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा

चंदन विख्यात है शीतलता, प्रभुवर अर्पण ये चंदन है।
काम अनल हो शांत प्रभु अब, यही विनय है वंदन है ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा

अक्षत अखण्ड निज आतम है, प्रभुवर तुमने बतलाया ।
विनशी बुध्दि क्षत परजय की, आस पूर्णता ले आया ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

फूल मनोहर रंग बिरंगे, सूचक इच्छा अभिलाषा ।
है शुद्धातम राग शून्य ही, कहती यह जिनवर भाषा ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय कामवाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

ज्ञानमयी नैवेद्य अनुपम, आस्वादन आनंद अहो ।
अन आहारी है निज आतम, हो प्रतीति व लीन रहो ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा

ज्ञानदीप का हुआ उजाला, निज पर भेद ज्योत जागी ।
यही बढेगी केवल रवि तक, अंतर उर लगनी लागी ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा

शेष रही है बहुत मलिनता, धूप धूम्र वत् जायेगी ।
जब होगी निज रूप में थिरता, कैसे वह टिक पायेगी ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मलिनभावविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा

अनुभव में निज चेतन आया, फल मुक्ति का पायेंगे ।
रमण चरण हो निज स्वरूप में, दशा पूर्ण उपजायेंगे ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे।।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा

शक्ति अनंती निज वैभव की, प्रगटेंगी जो गर्भित हैं ।
इसी आस का अर्घ्य बनाया, चरणों में प्रभु अर्पित है ।।
हे तीर्थेश प्रथम जिनवर तुव, पन्थ मेरा आदर्श रहे ।
तुम छवि लख निजरूप लखूँ मैं, थिरता ही उत्कर्ष रहे ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

पंच-कल्याणक अर्घ्य

छन्द-जोगीरासा

तिथि आषाढ़ वदी द्वितीया को मरुदेवी उर आये ।
सरवारथ सिध्दि को तजकर मध्यलोक उमगाये ।।
पंद्रह मास रतन की वर्षा सुरपति अति हर्षाये ।
है आदीश गर्भ कल्याणक पथ मुक्ति हम पायें ।।

ॐ ह्रीं आषाढ़ कृष्ण द्वितीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय

श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

चेत वदी नवमी का दिन था नाभिराय हर्षाये ।
जन्म हुआ जब आदि प्रभु का सुर अभिषेक रचाये ।।
मुदित हुये सब जीव जगत के सुख तिहुँलोक में छाया ।
है आदीश जन्म कल्याणक वन्दन त्रिभुवन राया ।।

ॐ ह्रीं चैत्र कृष्ण नवम्यां जन्ममंगलप्राप्ताय

श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

चेत वदी नवमी के दिन ही उर वैराग है छाया ।
लौकांतिक सुर इन्द्रादिक ने तप कल्याण मनाया ।।
सिद्ध प्रभु को किया नमन फिर ध्यान है उग्र जगाया ।
अनुमोदन कर मार्ग विरागी पूजैं त्रिभुवन राया ।।

ॐ ह्रीं चैत्र कृष्ण नवम्यां तपोमंगलप्राप्ताय

श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

फागुन कृष्ण तिथि एकादशी केवलज्ञान उपाया ।
दर्षन ज्ञान अरु सुख वीरज भाव अनंता पाया ।।
दिव्य ध्वनि के द्वारा प्रभु ने मार्ग मुक्ति दिखलाया ।
जिज्ञासु जो जिय भूतल के वन्दै त्रिभुवनराया ।।

ॐ ह्रीं फाल्गुन कृष्ण एकादशां ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय

श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

गिरि कैलाश शिखर से प्रभु ने पाया पद निर्वाणा ।
वदी चौदस जो माघ मास की ख्याती पर्व महाना ।।
पूर्ण लाभ जो आत्म तत्त्व का प्रभु ने सहज उपाया ।
मुक्त भाव के अभिलाषी हम पूजैं त्रिभुवन राया ।।

ॐ ह्रीं माघ कृष्ण चतुर्दशां मोक्षमंगलप्राप्ताय

श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

जयमाला

(दोहा)

धर्म तीर्थ के नायक हो वन्दूँ श्री आदीश ।
जयमाला अर्पित प्रभो नमन तुम्हें जगदीश ।।
(छन्द-रेखता)
भरत की भूमि नगर साकेत, हुआ जो धन्य आप अवतार ।
नृप श्री नाभिराय प्रासाद, मनाया सुरपति ने त्यौहार ।।
प्रभु श्री आदिनाथ भगवान, दिखाया तत्त्व अनादि सत्त्व ।
जगत के जीव हैं ज्ञानानंद, हुआ उद्घाटित चेतन तत्त्व ।।
ज्ञान में झलके लोकालोक, आप हैं निजसुख में तल्लीन ।
भविकजन पाते हैं उपदेश, लहैं निज अनुभव जीव प्रवीण ।।
प्रभु वाणी का है यह सार, जिय सब गर्दै निजातम भान ।
अरे विधि बतलाई प्रभु आप, ज्ञानमय का हो कैसे ज्ञान ।।

द्रव्य षट् और तत्त्व हैं सात, करो निर्णय उनका अभिराम ।
निर्णय प्रथम विकल्प प्रमाण, अरे जड़ चेतन भिन्न पिछान ।।
प्रभु अविनाशी आतम देव, वही है गुण अनंत की खान ।
दिखे परयय में राग विकार, उसे तू चिद् विकार ही जान ॥
तदपि नहीं स्वभाव ये मूल, उपजता जब स्वभाव की भूल ।
निजातम है शुचिता भण्डार, राग है अशुचि भिन्न फजूल ।।
ज्ञान अरु राग भिन्नता बोध, यही है धर्म प्राप्ति आधार ।
और द्रव्य परयय हैं दो भाव, भिन्न हैं एक वस्तु निर्धार ।।
तजो भवि तुम निमित्त का लक्ष, लक्ष यह राग व पर्यय त्याग।
उदित होगा ध्रुव आतमदेव, अतीन्द्रिय सुख का हो आस्वाद ।।
हुआ समकित दर्शन उत्पाद, यही आतम अनुभूति प्रमाण ।
धरे थिरता निज आतम देव, वही है पन्थ लहै निर्वाण ।।
प्रभु उपदेश में गर्भित भाव, प्रभु का है असीम उपकार ।
गहैं जो द्वादशांग का सार, अनेको जीव तजें संसार ।।
नहीं शब्दों से शक्य बखान, उछलता उर में जो बहुमान ।
शीघ्र ही पाऊँ सिद्ध समाज, प्रभु मेरे स्वामी भगवान ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य नि. स्वाहा।

(दोहा)

चिदानंद चिद्रूप चित, चिद्विलास विश्राम ।
छवि निहारूँ आपकी, लखूँ निजातम राम।।

(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

समुच्चय पूजन

(छन्द-चौपाई)

विष अपहार काव्य भक्ति का, लक्ष धरें कवि निज शक्ति का ।
गुण वर्णन श्री आदिनाथ का, दृष्टि में निज भाव साथ था ।।
आदि प्रभु उपदेश महाना, निज ज्ञायक बस एक ठिकाना ।
आओ प्रभु मम हदय पधारें, भाव भक्ति हम सुगम उचारें ।।

(दोहा)

ऋषभ देव जिनवर प्रभु, काव्य है विष अपहार ।
आज रची भक्ति प्रभु ले स्तोत्र आधार ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !

अत्र अवतर अवतर संवौषट्।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !

अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्र !

अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।

(छन्द-मत्तसवैया)

शुद्धात्म प्रीति जल ले आये, प्रभु चरणों में करने अर्पण ।
जल सम होवे परिणति निर्मल, है यही आस मेरे भगवन ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म भावना का मलयज, जो राग आग मेटनहारा ।
हो शांत अनल संसार भ्रमण, विकसे प्रज्ञा का उजियारा ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म भावना अक्षत ले, बुध्दि क्षत परजय विनशाई ।
अक्षय अखण्ड निज आतम का, आलम्बन ही है सुखदाई ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म साम्य सुरभित हैं कुसुम, दुर्गंध रागमय दूर करें ।
परिणति में शेष मलिनता को, निजरुप रमणता शीघ्र हरे ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

कामवाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म भावना सुरस चरु, सुखमय तृप्ति के ही दाता ।
नैवैद्य जगत के जड़मय हैं, न देह क्षुधा भी हर पाता ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय

क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म दीप प्रज्ज्वलित उर में, उजियारा स्व पर भावों का ।
तम नाश भाव-श्रुत धारा में, संशय शंका दुर्भावों का ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म ध्यान की धूप उग्र, सब भाव मलिन विनशायेगी ।
यह ध्यान अनल तो सहज रूप, परिपूर्ण शुद्धि प्रगटायेगी ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

मलिनभावविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म भाव के फल अनुपम निर्व्याकुल सुख प्रगटायेंगे ।
सुखसागर बेहद अंतर में अविचल पद में बस जायेंगे ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुद्धात्म भाव के अर्घ्य सजा, परिणति पात्र में ले आये ।
परिपूर्ण अमोलक पद अंतर, अब व्यक्त भाव में प्रगटायें ।।
ये काव्य रचित बहुमान भरा, जय आदि प्रभु का गुण वर्णन ।
है भक्ति भाव आपूर्ण हृदय, जय ऋषभदेव करते वन्दन ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

उत्तम भाव सजाय के, उर अतिशय बहुमान ।
काव्यों की अर्ध्यावली, करते प्रभु गुणगान ।।

(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

अर्ध्यावलि
काव्य-1

छन्द-उपजाति

स्वात्मस्थितः सर्वगतः समस्त-
व्यापारवेदी विनिवृत्तसङ्गः ।
प्रवृध्दकालोऽप्यजरो वरेण्यः,
पायादपायात्पुरुषः पुराणः ॥
अर्थः-आत्मस्वरूप में स्थित होकर भी सर्वव्यापक; सब व्यापारों के
जानकार होकर भी परिग्रह से रहित; दीर्घ आयु वाले होकर भी
बुढ़ापे से रहित तथा श्रेष्ठ प्राचीन पुरूष भगवान वृषभनाथ हम
सबको विनाश से बचायें-रक्षित करें ।

(छन्द - मानव)

हे ऋषभ देव जिनवर तुम, प्राचीन पुरुष कहलाते ।
तीर्थेश प्रथम इस युग के, संज्ञा सार्थकता पाते ।।
ऋषियों में तुम ऋषिवर हो, जो पद परमातम पाये ।
अतएव श्री भगवन तुम, प्रभु ऋषभ देव कहलाये ।।
निजरूप अनादि ध्याकर, तुम आदिनाथ प्रख्याता ।
थिर लीन निजानंद रस में, सर्वगत हो जग के ज्ञाता ।।
सब संग के त्यागी जिनवर, जानो सब जग व्यापारा ।
आयु विशाल थी किन्तु, न किंचित जरा विकारा ।।
निज सुख में शयन करे जो, वह नाम पुरुष का पाये ।
तुम ही जिनवर पुरुषोत्तम, विपदा से हमें बचायें ।।

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-2
परैरचिन्त्यः युगभारमेकः,
स्तोतुं वहन्योगिभिरप्यशक्यः ।
स्तुत्योऽद्य मेऽसौ वृषभो न भानोः,
किमप्रवेशे विशति प्रदीपः ॥

अर्थः- दूसरों के द्वारा चिंतवन करने के अयोग्य कर्मयुग के भार को
अकेले ही धारण किये हुये तथा मुनियों के द्वारा भी जिनकी स्तुति
नहीं की जा सकती – ऐसे वे भगवान वृषभनाथ आज मैं उनकी
स्तुति कर रहा हूँ, सो ठीक है। जहाँ सूर्य का प्रवेश नहीं होता तो
क्या वहाँ दीपक प्रवेश नहीं करता ? अर्थात् करता है।

(छन्द-मानव)

ज्यों शुद्धातम का अनुभव, नहीं शक्य विकल्पों द्वारा ।
कथनीय नहीं वह अनुभव, अनुपम आनंद अपारा ॥
न शक्य विकल्प वचन से, प्रभुवर सामर्थ्य तुम्हारा ।
युगभार निर्वहन कीना, गुण वर्णन को जग हारा ॥
नहीं कर पाये मुनिवर भी, प्रभु विरद आपका स्वामी ।
तदपि मैं उलसित होकर, गुणगान करूँ जगनामी ॥
ज्यों सूरज नहीं पहुँचता, नहीं विलय गुफा अंधियारा ।
किन्तु प्रदीप जा पहुँचे, हो गुफा मांहि उजियारा ॥
मति अल्प मैं करने तत्पर, स्तुति अर्पित है जिनवर ।
निज दृष्टि सहित निहारूँ, हे वृषभ नाथ जी प्रभुवर ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-3

तत्याज शक्रः शकनाभिमानं,
नाहं त्यजामि स्तवनानुबन्धम् ।
स्वल्पेन बोधेन ततोऽधिकार्थं,
वातायनेनेव निरुपयामि ॥

अर्थः-जिस तरह छोटे से झरोखे से झांककर उससे कई गुणी बड़ी
वस्तुओं का वर्णन किया जाता है; उसी तरह मैं भी अपने अल्पज्ञान
से जानकर आपके गुणों का वर्णन कर रहा हूँ। मुझे अपनी इस
अनोखी सूझ पर हर्ष और विश्वास दोनों हैं, इसलिये मैं इन्द्र की
तरह अपनी शक्ति को नहीं छिपाता ।

(छन्द-मानव)

लघु देश ज्ञान अवगाहन, सम्पूर्ण विश्व का ज्ञाता ।
प्रासाद झरोखा छोटा, नगरी विशाल दिखलाता ॥
मति अल्प ही विकसित मेरी, गुण वर्णन करूँ तुम्हारे ।
प्रभुवर के गुण कहने में, अरे ! इंद्रादिक भी हारे ॥
न त्यागूँ निज साहस को, है हर्ष पूर्ण विश्वासा ।
सम इन्द्र मैं नहीं छिपाऊँ, मेरी हिम्मत उल्लासा ॥
प्रभु भी निज आतम भजकर, पद पूर्ण है तुमने पाया ।
निज आत्म भजूँगा मैं भी, अतएव शरण तुम आया ॥
निज भाव पूर्ण अविकारी, प्रभुवर मैं भी पाऊँगा ।
मैं नहीं हटूंगा पीछे, तुम निकट अचिर आऊँगा ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-4

त्वं विश्वदृश्वा सकलैरदृश्यो,
विद्वानशेषं निखिलैरवैद्यः ।
वक्तुं कियान्कीदृश इत्यशक्यः,
स्तुतिस्ततोऽशक्तिकथा तवास्तु ॥
अर्थ :- आप सबको देखने वाले है, किन्तु सबके द्वारा देखे नही जाते ।
आप सबको जानते है, पर सबके द्वारा नहीं जाने जाते ।
आप कितने और कैसे है ? यह भी नहीं कहा जा सकता. इसलिये ।
आपकी स्तुति मेरी सामर्थ्य नहीं है, यही कहा जा सकता है।

(छन्द-मानव)

तुम सर्वदर्शी हो किन्तु, सब तुमको देख न पायें ।
तुम ज्ञाता सर्व जगत के, सब तुमको जान न पायें ॥
कैसे कितने हो प्रभुवर, परिमाण न हम कर सकते ।
ज्ञानादि चतुष्टय जिनवर, तुव भाव असीमित प्रगटे ॥
यद्यपि मैं हुआ था उद्यत, हिम्मत भी बहुत जुटाई ।
प्रभु तुम गुण वर्णन करने, अक्षमता हाथ ही आई ॥
मैं हूँ अशक्त कह पाऊँ, स्तुति यह मेरी जानो ।
साहस इन्द्रादिक हारे, यह बात सत्य ही मानो ॥
तुव गुण की पूर्ण प्रगटता, लख निज स्वभाव जो भायें ।
बेहद सामर्थ्य तुम्हारी, अनुमान सत्य वे पायें ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-5
व्यापीडितं बालमिवात्मदोषै,
रुल्लाघतां लोकमवापिपस्त्वम् ।
हिताहितान्वेषणमान्द्यभाजः,
सर्वस्यजन्तोरसि बालवैद्यः ॥

अर्थः-आपने बालक के समान संसारी मनुष्यों को उनके द्वारा किये
गये अपराधों से अत्यन्त पीड़ित जन को निरोगता प्राप्त कराई है।
निश्चय से आप भले-बुरे के विचार करने में मूर्खता (मंदता) को
प्राप्त हुये सब प्राणियों के बालवैद्य हैं।

(छन्द-मानव)

हैं बाल समान अबोधा, संसार में भ्रमते प्राणी ।
हित-अहित विचार बिना के, दृष्टि मिथ्या अज्ञानी ॥
भव-ताप से पीड़ित जन को, आरोग्य दान हो देते ।
ध्रुव स्वस्थ निजातम का ही, आलम्बन लेने कहते ॥
शुभ राग लाभ कारी है, भ्रांति ये अनादि पाली ।
प्रभुवर तुमने बतलाया, निज ज्ञायक है हितकारी ॥
भव रोग की पीड़ा भोगें, बालक अबोध संसारी ।
तुम बाल वैद्य हो प्रभुवर, तुम ही हो पीड़ाहारी ॥
निज ज्ञायक की महिमा को, जो चित में है उपजाये ।
कारण निरोग को पाकर, आरोग्य हर्ष को पाये ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-6
दाता न हर्ता दिवसं विवस्वा-,
नद्य व इत्यच्युत ! दर्शिताशः ।
सव्याजमेवं गमयत्यशक्तः,
क्षणेन दत्सेऽभिमतं नताय ॥
अर्थः-हे उदारता आदि गुणों से सहित जिनेन्द्रदेव! सूर्य तो न कुछ
देता है और न कुछ लेता है, सिर्फ आज.. कल.. इस तरह करके
आशा दिखाता हुआ असमर्थ होकर बिना कुछ लिये दिये ही कपट
सहित दिन को बिता देता है, किन्तु हे प्रभु ! आप नम्र मनुष्य के लिये
क्षण भर में इच्छित वस्तु दे देते हैं।

(छन्द-मानव)

यह सूर्य उदित हो प्रतिदिन, संध्या को अस्त है होता ।
नित नवल किसी आशा में, यह मूर्ख समय को खोता ॥
नहीं किंचित लेता देता,बस बाह्य दिशा दिखलाये ।
प्रभु उत्तम ज्ञान प्रकाशी, चेतनमय रवि बतलाये ॥
प्रभु तुम उपदेश किरण से, निज चेतन का उजियारा ।
लख रूप आप सम अपना, नाशे अनादि अंधियारा ॥
हो नाथ आप ही अच्युत, नित जग के दृष्टा ज्ञाता ।
जो नमता है प्रभु तुमको, नम निज में चिर सुख पाता ॥
जड़ रवि असमर्थ सदा ही, अतिशय सामर्थ्य तुम्हारा ।
जग जिय सामर्थ्य जगाते, स्वीकृत हो नमन हमारा ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य -7

उपैति भक्त्या सुमुखः सुखानि,
त्वयि स्वभावाद्विमुखश्च दुःखम् ।
सदावदात
द्युति रेकरुप,
स्तयोस्त्वमादर्श इवावभासि ॥

अर्थः- आपके अनुकूल चलने वाला पुरुष भक्ति से सुखों को प्राप्त
होता है और प्रतिकूल चलने वाला पुरूष स्वभाव से ही दुःख पाता
है, किन्तु आप उन दोनों के आगे दर्पण की तरह हमेशा उज्जवल
कांतियुक्त तथा एक सदृश शोभायमान रहते हैं।

(छन्द-मानव)

स्वयमेव ही उजला दर्पण, प्रतिबिम्बित जग को करता ।
उस ओर धरे मुख जो भी, निजरूप सहज ही लखता ॥
किंतु जो विमुख आरसी, निज रूप देख न पाये ।
हो दुखी स्वयं में प्राणी, चित्त में क्लेश उपजाये ॥
प्रभु आप सदैव मुकुरवत, सब जीव स्वरूप दिखाते ।
अनुसरण आपका करते, जिय सुख अनंत प्रगटाते ॥
किन्तु प्रभु आप विमुख जो, विपरीत लखे अज्ञानी ।
भव दुख जल में डूबा है, सुख कणिका लहे न प्राणी ॥
परिपूर्ण प्रगट परिजय में, परमात्म रुप प्रतिभासे ।
तुम सम निज को जो देखे, पाये पद निज अभिलाषे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-8

अगाधताब्धेः स यत पयोधिः,
मेरोश्च, तुङ्गा प्रकृतिः स यत्र ।
द्यावापृथिव्योः पृथुता तथैव,
व्याप त्वदीया भुवनान्तराणि ॥

अर्थः-समुद्र की गहराई वहाँ है, जहाँ वह समुद्र है। सुमेरू पर्वत की
उन्नत प्रकृति वहाँ है जहाँ वह सुमेरू पर्वत है और आकाश-पृथ्वी
की विशालता भी उस ही प्रकार है अर्थात जहाँ आकाश-पृथ्वी हैं,
वहीं उनकी विशालता है परन्तु हे प्रभु ! आपकी गहराई,उन्नत
प्रकृति और हृदय की विशालता ने तीनों लोकों के मध्यभाग को
व्याप्त कर लिया है।

(छन्द-मानव)

सागर अगाध गहरा है, गहराई उदधि बराबर ।
गिरि मेरु बहुत है ऊँचा, ऊँचाई मेरु बराबर ॥
नभ थल भी अति विस्तारा, वह भी उनके सम जानो।
ये सब ही मर्यादित हैं, परिमित ही उनको मानो ॥
प्रभुवर विशाल उन्नतता, गहराई अरु विस्तारा ।
अपरिमित बिन मर्यादा, तिहुँलोक न पावे पारा ॥
मेरू आकाश उदधि की, नहीं थल की उपमा कोई ।
अनुपम की उपमा देकर, त्रुटि भारी बहुत संजोई ॥
चैतन्य महाप्रभु जिनवर, परजय भी पूर्ण स्वरुपी ।
मैं भी हूँ चेतन राजा, शक्ति है पूर्ण स्वरुपी ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-9
तवानवस्था परमार्थतत्त्वम्,
त्वया न गीतः पुनरागमश्च ।
दृष्टं विहाय त्वमदृष्टमैषीः,
विरुध्दवत्तोऽपि समञ्जसस्त्वम् ॥

अर्थः-भ्रमणशीलता, परिवर्तनशीलता आपका वास्तविक सिद्धांत है
और आपके द्वारा मोक्ष से वापिस आने का उपदेश नहीं दिया गया है
तथा आप प्रत्यक्ष इस लोक संबंधी सुख छोड़कर परलोक संबंधी सुख
को चाहते हैं, इस तरह आप विरुद्ध प्रवृत्तियुक्त होने पर भी उचितता
से युक्त हैं।

(छन्द-मानव)

जग के पदार्थ जो सारे, परिणमनशील बतलाये ।
तदपि जिय सिद्ध हुयें हैं, नहीं लौट पुनः वे आयें ॥
संयोग प्रगट जो सुख के, उन सबको प्रभुवर त्यागा ।
ध्रुव कायम सुख अंतर में, वह पाने चित अनुरागा ॥
जब थूल बुद्धि से देखें, दिखता यह कार्य विरोधी ।
धर तात्त्विक दृष्टि देखें, है भाव यही अविरोधी ॥
प्रभु दशा उत्पाद आपकी, व्यय रहित सदा ही जानो ।
संसार नाश है ऐसा, तिन उपज पुनः न मानो ॥
हैं सुखाभास सुख जग के, प्रभुवर उनको तुम त्यागे ।
सुख पूर्ण सदैव रहे जो, हम भी उसको अनुरागे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-10

स्मरः सुदग्धो भवतैव तस्मिन्,
उघ्दूलितात्मा यदि नाम शम्भुः ।
अशेत वृन्दोपहतोऽपि विष्णुः,
किं गृह्यते येन भवानजागः ॥

अर्थः-हे प्रभु ! आपके द्वारा ही काम अच्छी तरह भस्म किया गया है।यदि
कहें तो महादेव ने भी तो भस्म किया था तो वह कहना ठीक
नहीं क्योंकि बाद में वह उस काम के विषय में कलंकित हो गया था और
विष्णु ने भी वृन्दा-लक्ष्मी नामक स्त्री से प्रेरित होकर उसके साथ शयन किया
लेकिन आप जागृत रहे हो अर्थात कामनिद्रा में अचेत नहीं हुये, इसलिये
कामदेव के द्वारा आपकी कौन सी वस्तु ग्रहण की जाती है अर्थात् कोई भी नहीं।

(छन्द - मानव)

सब काम भोग इच्छायें, कर भस्म आप विनशाये ।
निज आत्म तृप्ति के द्वारा, सुख अचल पूर्ण को पाये ॥
ये काम नाश कर शिव ने, भस्मी शरीर पर धारी ।
कीचड़ फिर स्वयं लपेटा, धर आसक्ति प्रति नारी ॥
विष्णु ने शयन किया था, परिग्रह आसक्ति भोगी ।
जग विजयी काम से पीड़ित, वे रहे काम के रोगी ॥
कामुकता नष्ट किये थे, है कथा झूठ जग जानी ।
निज आत्म शून्य इच्छा से, वस्तु यह सत्य वखानी ॥
न अचेत काम निद्रा में, आनंन्द शयन तुम करते ।
निज आतम रति तुम्हारी, सुख पूर्ण के झरने झरते ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय

अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-11

स नीरजाः स्यादपरोऽघवान्वा,
तद्दोषकीत्र्यैव न ते गुणित्वम् ।
स्वतोम्बुराशेर्महिमा न देव !
स्तोकापवादेन जलाशयस्य ॥

अर्थः-अथवा हे देव ! वह ब्रह्मादि देवों का समूह पापरहित हो और दूसरा देव
पापसहित हो, इस तरह उसके दोषों का वर्णन करने मात्र से ही आपका
गुणीपना नहीं है । समुद्र की महिमा स्वभाव से ही होती है, जलाशय छोटा है
इस तरह तालाब आदि की निन्दा करने से नहीं होती है ।

(छन्द - मानव)

कहना यह लघु सरोवर, छोटी है बाबड़ी होती ।
सिंधु तो स्वयं विशाला, यूँ महिमा सिंधु न होती ॥
तुम स्वयं पूर्ण हो प्रभुवर, पर्याय प्रत्येक है पूरी ।
कह दोष जो इतर जनों के, नहीं महिमा हो प्रभु तेरी ॥
निरपेक्ष आप हो प्रभुवर, निरपेक्ष प्रभु महिमा है ।
सापेक्ष कथन से जिनवर, नहीं शक्य महा गरिमा है ॥
मैं भी सम्पूर्ण स्वभावी, परिपूर्ण स्वरूप है मेरा ।
नहीं शक्य अन्य वर्णन से, महिमामय रूप है मेरा ॥
निज चेतन का आलम्बन, सुख अंश जो निर्मल जागे ।
आनंदमयी निज आतम, सुरपति सुख तुच्छ ही लागे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-12

कर्मस्थितिं जन्तुरनेकभूमिं,
नयत्यमुं सा च परस्परस्य ।
त्वं नेतृभावं हि तर्योभवाब्धौ,
जिनेन्द्र नौनाविकयोरिवाख्यः ॥

अर्थः-हे जिनेन्द्र देव ! जीव कर्मों की स्थिति को अनेक जगह ले जाता है
और वह कर्मों की स्थिति उस जीव को अनेक जगह ले जाती है लेकिन
आपने संसाररूप समुद्र में नाव और खेवटिया की तरह उन दोनों में
निश्चय से एक दूसरे का नेतृत्व कहा है।

(छन्द - मानव)

ये कर्म जगत जीवों को, गति गति में हैं ले जाते ।
अरु जीव नवल कर्मों को, बाँधे अरु संग घुमाते ॥
रीति यह निमित्त निमित्त से, संसार भ्रमण है चलता ।
कारण संसार प्रमुख यह, परजय मिथ्यात है पलता ॥
जैसे जल मारग मांहि, नाविक अरु नाव परस्पर ।
इक दूजे को ले जाते, नेतृत्व यही है परस्पर ॥
जिनवर तुम ज्ञाता जग के परिपूर्ण भाव निर्मल है ।
तुव दशा है पूर्ण अरागी, वन्दन प्रभु चरण कमल है ॥
ध्रुव कायम तत्त्व त्रिकाली, रज राग शून्य है ज्ञायक ।
नहीं बंध मुक्ति का कर्ता, बस ज्ञान भाव का नायक ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-13
सुखाय दुःखानि गुणाय दोषान्,
धर्माय पापानि समाचरन्ति ।
तैलाय बालाः सिकतासमूहं,
निपीडयन्ति स्फुटमत्वदीयाः ॥

अर्थः-हे प्रभु ! जिस प्रकार बालक, तेल के लिये बालू के समूह को पेलते
हैं, उस प्रकार आपके प्रतिकूल चलने वाले पुरुष सुख के लिये दुःखों को,
गुण के लिये दोषों को और धर्म के लिये पापों को समाचरित
करते हैं।

(छन्द - मानव)

बालू में तेल की आशा, धर व्यर्थ परिश्रम करते ।
जिन आज्ञा से बाहर जो, सुख कणिका भी न लहते ॥
नहीं भान प्रभु शुद्धातम, शुभ राग में धर्म को खोजें ।
या पाप वृत्ति में मज्जित, माने वें सुख की मौजें ॥
दुख क्लेश काय आदि से, सम्पत्ति स्वर्ग पिपासा ।
दोषों में करें प्रवृत्ति, गुण प्राप्ति की अभिलाषा ॥
किन्तु निज भान बिना ही, वे भजन मोह का करते ।
भव-भव में भ्रमण करें वे, एकान्त सदा दुख सहते ॥
तिल से ही तेल निकलता, वह कृत्य है सार्थक जानो ।
त्यों निजानंद आराधन, सुख प्राप्ति निश्चय मानो ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-14

विषापहारं मणिमौषधानि,
मन्त्रं समुद्दिश्य रसायनं च ।
भ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति स्मरन्ति,
पर्यायनामानि तवैव तानि ॥

अर्थः-हे प्रभु ! आश्चर्य है कि लोग विष को दूर करने वाले मणि को,
औषधियों को, मंत्र को और रसायन को उद्देश्य करके यहाँ-वहाँ घूमते
हैं किन्तु आप ही मणि हैं, औषधि हैं, मन्त्र हैं और रसायन हैं - ऐसा
स्मरण नहीं करते क्योंकि वे मणि आदि आपके ही पर्यायवाची शब्द हैं।

(छन्द - मानव)

मणि विषहारी प्रभु तुम हो, औषध भी परम तुम्हीं हो ।
अरे मन्त्र रसायन प्रभुवर, गुण यंत्र तंत्र भी तुम हो ॥
विस्मृत कर प्रभु तुमको ही, भ्रमता मोही जग सारा ।
वह कष्ट वृथा ही भोगे, नहीं पाये कोई सहारा ॥
मणि औषध मंत्र रसायन, या तंत्र यंत्र जो कहते ।
ये नाम सभी हैं तुम्हारे, हम शरण आपकी गहते ॥
कुछ योग पुण्य का आया, अपहार गरल सुत पाये ।
क्रमबध्द परिणमन सब ही, तब प्राण पुनः हैं पाये ॥
औषधि रस निज चेतन में, श्रध्दान भान जो पाये ।
मणि मंत्र तंत्र है सब ही, निज आत्म रमणता लाये ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-15
चित्ते न किंचित्कृतवानसि त्वम्,
देवः कृतश्चेतसि येन सर्वम् ।
हस्ते कृतं तेन जगव्दिचित्रं,
सुखेन जीवत्यपि चित्तबाह्यः ॥

अर्थः-हे देव ! आप अपने हृदय में कुछ भी धारण नहीं करते हैं किन्तु
जिसके द्वारा आप हृदय में धारण किये हैं, उसके द्वारा समस्त संसार हाथ
में कर लिया गया है अर्थात् उसने सब कुछ पा लिया है। आश्चर्य की
बात है और आप मन से रहित होते हुये भी सुख से जीवित हैं, यह
आश्चर्य है।
(छन्द-विधाता)
अहो प्रभुवर नहीं तेरे, हृदय में कोई है बसता ।
बसाये जो तुम्हें उर में, लहे निजरूप की प्रभुता ॥
अरागी रूप तुव लखकर, भवि निज पर धरे दृष्टि ।
दिखे तब पूर्ण ज्ञायक ही, लहे आनंद की वृष्टि ॥
रहित मन से अरे जिनवर, किन्तु सुख पूर्ण के भोगी ।
जगत के जीव मन वाले, सदा वे कामना रोगी ॥
अरे जो मन का आलम्बन, उठें सब जल्प दुख के ही।
प्रभु तल्लीन आतम में, सदा है धार सुख की ही ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-16

त्रिकालतत्त्वं त्वमवैस्त्रिलोकी-
स्वामीति संख्यानियतेरमीषाम् ।
बोधाधिपत्यं प्रति नाभविष्यत्,
तेऽन्येऽपि चेद्व्याप्स्यदमूनपीदम् ॥

अर्थः-हे प्रभु ! आप भूत, भविष्य और वर्तमान – इन तीनों काल के
पदार्थों को आप जानते हैं तथा आप ऊर्ध्व, मध्य और पाताल- इन
तीनों लोकों के स्वामी हैं। इस प्रकार की संख्या उन पदार्थों के निश्चित
संख्यावाले होने से ठीक हो सकती है परन्तु ज्ञान के साम्राज्य के प्रति
पूर्वोक्त प्रकार की संख्या ठीक नहीं हो सकती क्योंकि यदि ऐसे और
भी पदार्थ होते तो ज्ञान उन्हें भी व्याप्त कर लेता, जान लेता ।

(छन्द-विधाता)

जगत त्रय के प्रभु स्वामी, अहो तुम काल त्रय ज्ञाता ।
कथन ऐसा करें स्वामी, नियत हो ज्ञान मर्यादा ॥
यदि होवे अधिक इससे, जगत अरु काल की गणना ।
सभी तुम ज्ञान में व्यापे, असीमित शक्ति किम कथना ॥
ज्यों फैले बेल मंडप तक न यह शक्ति लता इतनी ।
अनेको हों ये मंडप तो, प्रसारित हो लता उतनी ॥
अहो सामर्थ्य चेतन की, असीमित है यही जानो ।
अपरिमित ज्ञान दर्शन है, भवि निज शक्ति पहचानो ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-17

नाकस्य पत्युः परिकर्म रम्यं,
नागम्यरूपस्य तवोपकारी ।
तस्यैव हेतुः स्वसुखस्य भानो-
रुद्विभ्रतछत्रमिवादरेण ॥

अर्थः-हे प्रभु ! इन्द्र द्वारा आपकी मनोहर सेवा, अज्ञेय स्वरूप आपका
उपकार करने वाली नहीं है अपितु उस इन्द्र के लिये ही स्वसुख
का कारण है किन्तु जिसका स्वरूप अप्राप्य है- ऐसे सूर्य के लिये जैसे
आदरपूर्वक छत्र धारण करनेवाले की तरह, सूर्य का कोई भी उपकार नहीं
होता, छत्र लगाने वाला धूप से बच जाता है।

(छन्द-विधाता)

छत्र सूरज के सम्मुख कर, वही आतप से बच जावे ।
अरे!रवि है अति ऊँचा, नहीं रवि लाभ कुछ पावे ॥
करें सुरपति प्रभो सेवा, अशुभ से हैं वही बचते ।
नहीं सुरपति की भक्ति से, प्रभु जिनदेव कुछ लभते ।
प्रभु सम मैं भी ध्रुव ज्ञाता, न हानि लाभ को पाता ।
सुखी पर्याय ही होती, झुके जो निज अचल ज्ञाता ॥
प्रभो महिमा अगोचर है, शब्द बौने हैं रह जाते ।
बसाये उर में जिनवर को, वही उपकृत हैं हो जाते ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-18

क्वोपेक्षकस्त्वं क्व सुखोपदेशः,
स चेत्किमिच्छाप्रतिकूलवादः ।
क्वासौ क्व वा सर्वजगत्प्रियत्वं,
तन्नो यथातथ्यमवेविचं ते ॥

अर्थः-हे प्रभु ! कहां राग-द्वेष रहित आप? और कहां सुख का उपदेश
देना ? यदि आप सुख का उपदेश देते हैं तो आपका इच्छा के विरुद्ध
बोलना ही कहां है? अर्थात् आपके इच्छा नहीं है- ऐसा कथन क्यों
किया जाता है ? कहां इच्छा के अभाव में बोलना ? और कहां सब जीवों
को प्रिय होना ? इस तरह आपकी प्रत्येक बात में विरोधाभास है; अतः
मैं आपकी वास्तविकता, आपके असलीरूप का विवेचन नहीं कर सकता।
(छन्द-विधाता)
रहित हो राग रुष प्रभु तुम, ध्वनि सुख के हो तुम दाता ।
नहीं इच्छा तुम्हे कोई, तदपि सुख भाव व्याख्याता ॥
बिना इच्छा ध्वनि प्रभुवर, जगत को प्रीति है कैसे ।
सहित इच्छा जगत जिय को, वचन सुखकर सदा ऐसे ॥
विरोधाभास है जिनवर , यथारथ तो अगोचर है ।
तजा साहस कहूँ गुण को, वचन से जो अगोचर है ॥
प्रभो उपदेश बिन इच्छा, मिटायें कामना सारी ।
शरण में आपकी जिनवर, वचन सुखरुप हितकारी ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-19

तुङगात्फलं यत्तदकिंचनाच्च,
प्राप्यं समृध्दान्न धनेश्वरादेः ।
निरम्भसोऽप्युच्चतमादिवाद्रे-
नैकापि निर्याति धुनी पयोधेः ॥

अर्थः-उदार चित्त वाले दरिद्र मनुष्य से भी जो फल प्राप्त हो सकता है,
वह सम्पत्ति वाले धनिकों से नहीं प्राप्त हो सकता है। ठीक ही तो है
पानी से शून्य होने पर भी अत्यंत ऊँचे पहाड़ के समान, समुद्र से एक भी
नदी नहीं निकलती है।

(छन्द-विधाता)

सिंधु भरपूर है जल से, नदी किन्तु न बह पायें ।
गिरि उन्नत हैं जल विरहित, प्रवाहित नीर सरितायें ॥
मिलेगा फल जो निर्धन से, नहीं धनवान दे पाते ।
हृदय उन्नत उदारी हो, वही हैं दान दे पाते ॥
सिंधु सम जो रहे नीचे, नहीं है भान आतम का ।
शक्य निज हित उन्हीं से है, धरें जो ज्ञान आतम का ॥
प्रभो तुम उच्चतम जग के, मिले उपदेश हितकारी ।
नहीं किंचित ही हित उनसे, भले हो ज्ञान अंगधारी ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-20

त्रैलोक्य-सेवानियमाय दण्डं,
दधे यदिन्द्रो विनयेन तस्य ।
तत्प्रातिहार्य भवतः कुतस्त्यं,
तत्कर्मयोगाद्यदि वा तवास्तु ॥

अर्थः-जिस कारण से इन्द्र ने विनयपूर्वक तीनलोक के जीवों की सेवा करने
के नियम के लिये अर्थात् मैं त्रिलोक के जीवों की सेवा करूँगा और उन्हें
धर्म के मार्ग में लगाऊँगा-इस उद्देश्य से दण्ड धारण किया था, उस कारण
से प्रातिहार्यपना इन्द्र के ही हो सकता है, आपके कैसे हो सकता है ?
अथवा तीर्थंकर नामकर्म का संयोग होने से या इन्द्र के उस कार्य में प्रेरक
होने से आपके भी प्रातिहार्य - प्रतिहारपना हो ।

(छन्द-विधाता)

कहें प्रतिहार्य आभूषण, सजे सुरपति को ये भूषण ।
प्रभु शोभित चतुष्टय से, रहित जो राग के दूषण ॥
तदपि उपचार कथनी में, सहज प्रतिहार्य संयोगी ।
अरे ! शोभा बिना भूषण, अरागी दिव्य तुम योगी ॥
प्रगट पर्याय सत श्रध्दा, चरण व ज्ञान हो सच्चा ।
यह शोभा द्रव्य की जानो, प्रगट जब भाव हो सच्चा ॥
द्रव्य में कुछ नहीं बदला, बदल पर्याय है पलटी ।
द्रव्य शोभित सदा गुणमय, दशा से कालिमा विघटी ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-21

श्रिया परं पश्यति साधु निःस्वः,
श्रीमान्न कश्चित्कृपणं त्वदन्यः ।
यथा प्रकाशस्थितमन्धकार
स्थायीक्षतेऽसौ न यथा तमःस्थम् ॥
,

अर्थः-निर्धन पुरुष लक्ष्मी से श्रेष्ठ अर्थात सम्पन्न पुरुष को अच्छी तरह
आदरभाव से देखता है किन्तु आपके अलावा कोई सम्पत्तिशाली पुरुष
निर्धन को अच्छे भावों से नहीं देखता । ठीक है, अंधकार में ठहरा हुआ
मनुष्य उजाले में ठहरे हुये पुरुष को देख लेता है; उसी प्रकार उजाले में
स्थित पुरुष अंधेरे में स्थित पुरुष को नहीं देख पाता ।

(छन्द-विधाता)

नहीं दिखते जो तमवासी, खड़े रहकर उजाले में ।
अंधेरे में रहे हैं जो, सहज देखें उजाले में ॥
धनिकजन तुच्छ ही देखें, निर्धन हैं जो जगती के ।
धरें जो ज्ञान की लक्ष्मी, लखें प्रभु जीव जगती के ॥
प्रभु जिनवर को हम कहते, प्रभो सब जीव प्रभु देखें ।
गजब तुव ज्ञान रीति है, शुध्द सत से हमें पेखें ॥
जगती के जीव अज्ञानी, उन्हें परिपूर्ण बतलाया ।
लखे निजरुप की प्रभुता, शरण जो आपकी पाया ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-22

स्ववृद्धिनिःश्वास-निमेषभाजि,
प्रत्यक्षमात्मानुभवेऽपि मूढः ।
किं चाखिलज्ञेयविवर्तिबोध-
स्वरुपमध्यक्षमवैति लोकः ॥

अर्थः- यह प्रकट है कि जो मनुष्य अपनी वृद्धि, श्वासोच्छ्वास और आँखों
की टिमकार को प्राप्त अपने आपको जानने में समर्थ नहीं है, वह मनुष्य
सम्पूर्ण पदार्थों की सम्पूर्ण पर्यायों को जाननेवाले सकल प्रत्यक्ष केवलज्ञान
को अर्थात हे प्रभु ! अपने आत्मस्वरुप में विराजमान आपको कैसे जान
सकता है? अर्थात् नहीं जान सकता ।

(छन्द-विधाता)

न पलकों का झपकना है, नहीं उच्छवास सांसो को ।
नहीं वह शक्य नर देखे, स्वयं तन के विकासों को ॥
अरे यह मूढ़ अज्ञानी, निजानुभूति नहीं पावे ।
प्रभो के ज्ञान कैवल्य की, नहीं महिमा वो उर लावे ॥
शुभाशुभ भाव की ज्वाला, भली शीतल जिसे लागे ।
शुचिता से सघन शीतल, निजातम कैसे उर जागे ॥
तुम्हारा ज्ञान हे स्वामी, सकल जग ज्ञेय हो जिसमें ।
अहो प्रभु ज्ञान की महिमा, जगत उत्कीर्ण है जिसमें ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-23

तस्यात्मजस्तस्य पितेति देव,
त्वां येऽवगायन्ति कुलं प्रकाश्य ।
तेऽद्यापि नन्वामनमित्यवश्यं,
पाणौ कृतं हेम पुनस्त्यजन्ति ॥

अर्थः-हे नाथ ! जो मनुष्य, आप उनके पुत्र हो और उनके पिता हो – इस
प्रकार कुल का वर्णन कर आपका अपमान करते हैं, वे अब भी हाथ में
आये हुये स्वर्ण को पत्थर है या पत्थर से पैदा हुआ है – ऐसा हेतु मानकर
पुनः अवश्य ही छोड़ देते हैं।

(छन्द-विधाता)

अहो प्राप्ति स्वर्ण दुर्लभ, तदपि गुण स्वर्ण न देखे ।
स्वर्ण पाषाण से मिलता, जान यह स्वर्ण को फेंके ॥
तुम्हारे ज्ञान श्रध्दा को, प्रभो सब ही नहीं पाते ।
भरत के तात सुत नाभि, नाथ तुव गुण नहीं गाते ॥
धरें नर कुल प्रशंसा ही, न पेखें ज्ञान सुख पूरण ।
नहीं पहचान परमातम, तजा पाकर तुझे भगवन् ॥
अरे ! कुल द्रव्य का गुणमय, इसी कुल से जनित शुचिता ।
यदि मारग मुक्ति चाहो, लखो निजरुप की प्रभुता ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-24

दत्तश्त्रिलोक्यां पटहोऽभिभूताः
सुरासुरास्तस्य महान्स लाभः ।
मोहस्य मोहस्त्वयि को विरोद्धुं
मूलस्य नाशो बलवद्विरोधः ॥

अर्थः-मोह के द्वारा तीनों लोकों में विजय का नगाड़ा बजाया गया ;
उससे जो सुर और असुर तिरस्कृत हुये, वह उस मोह का बड़ा लाभ
हुआ किन्तु आपके विषय में विरोध करने के लिये मोह को कौन सा भ्रम
हो सकता था अर्थात कोई नहीं क्योंकि बलबान के साथ विरोध
करना मूल का नाश करना है।

(छन्द-विधाता)
कहे मैं मोह जग विजयी, जगत भर को हराया है ।
सुरासुर लोक त्रय के सब, तिरस्कृत कर नचाया है ॥
अनेकों बार मुनिव्रत ले, नहीं निज भान को पाया ।
इसी भ्रांति ने जग जिय को, भवों भव में है भटकाया ॥
सबल नर या वृषभ कोई, यदि दृढ भींत सर मारे ।
स्वयं ही हो पड़े घायल, मिटे निज सींग लहू डारे ॥
सबल तुम नाथ हे जिनवर, अपरिमित बल को तुम धारे ।
निबल ये बैर क्यों करता, मोह तुमसे स्वयं हारे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य -25

मार्गस्त्वयैको ददृशे विमुक्तेः,
चतुर्गतीनां गहनं परेण ।
सर्वं मया दृष्टमिति स्मयेन
त्वं मा कदाचित् भुजमालुलोकः ॥

अर्थः-आपके द्वारा एक मोक्ष का ही मार्ग देखा गया है और दूसरों
के द्वारा चारों गतियों का सघन वन देखा गया है, मानो इसीलिये
आपने मैंने सब कुछ देखा है? इस अभिमान से कभी भी अपनी
भुजाओं को नहीं देखा ।

(छन्द-विधाता)

जगत के जीव अज्ञानी, सघन गति वन भटकते हैं ।
क्रिया तन राग शुभ बल से, अभानी मोक्ष चहते हैं ॥
किया देखा बहुत हमने, इसी अभिमान में बहते ।
गर्व से लख भुजा अपनी, न सुख कण को कभी लहते ॥
अहो जिनवर प्रभो तुमने, पंथ इक देखा दिखलाया ।
निजातम भान श्रध्दा हो, रमणता पंथ बतलाया ॥
रहो तल्लीन निज में ही, अमापी शक्ति सुख स्वामी ।
जगत सम्पूर्ण के ज्ञाता, प्रभु इस जग में निर्मानी ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-26
स्वर्भानुरर्कस्य हविर्भुजोऽम्भः,
कल्पान्तवातोऽम्बुनिधेर्विघातः ।
संसार भोगस्य वियोगभावो,
विपक्षपूर्वाभ्युदयास्त्वदन्ये ॥
अर्थः- राहु, सूर्य का ; पानी अग्नि का; प्रलयकाल की वायु समुद्र का
तथा विरह भाव संसार के भोगों का नाश करने वाला है। इस प्रकार
आपसे भिन्न सब पदार्थ विनाश के साथ ही उदय होते हैं। संसार के
सब पदार्थ अनित्य हैं, सिर्फ आप ही सामान्यस्वरूप की अपेक्षा नित्य
हैं; आप जन्ममरण रहित हैं आपकी विशुद्धता कभी नष्ट नहीं होती ।
(छन्द-विधाता)
रवि का घात राहू से, अनल पानी से बुझ जाये ।
प्रलय की हो पवन भारी, सिंधु जल को है नचवाये ॥
जगत संयोग भोगों को, वियोग स्वयमेव हर लेता ।
प्रभो तुम नित्य बस इक ही, शेष का नाश ही देखा ॥
जन्म हो जीव संसारी, मरण का पाश क्षिप्र पाये ।
नहीं जन्मे मरे चेतन, यही श्रद्धा ही उपजायें ॥
प्रभो विरहित जन्म मृत्यु, सदा पावन प्रभु तुम हो ।
धरे ध्रुवता दरब चेतन, नष्ट परजय प्रतिक्षण हो ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-27

अजानतस्त्वां नमतः फलं यत्,
तज्जानतोऽन्यं न तु देवतेति ।
हरिन्मणिं काचधिया दधानः-
तं तस्य बुद्धया वहतो न रिक्तः ॥

अर्थः-हे भगवन ! जो आपको नमस्कार करता है किन्तु आपके स्वरूप
को नहीं जानता; उसे भी जो पुण्यबंध होता है, वह किसी दूसरे देवता को
मानने वाले पुरुष को नहीं होता है। जिस तरह कोई अनजान मनुष्य
हरितमणि को पहन कर काँच समझता है तो वह भी उसकी अपेक्षा
निर्धन नहीं है जो कोई मणि को मणि समझकर पहन रहा है, वे दोनों
एक जैसी सम्पत्ति के धारक कहलाते हैं; इसलिये श्रद्धा और विवेक के
साथ प्राप्त हुआ अल्पज्ञान भी प्रशंसनीय है।
(छन्द-विधाता)
मणि मरकत काँच माने, धरे वह देह आभूषण ।
नहीं निर्धन कभी उससे, मणि माने मणि भूषण ॥
नमन तुमको करे जिनवर, नहीं प्रभु रूप पहचाने ।
भले अनुभव नहीं निज का, पुण्य का बंध तो पावे ॥
अन्य जिनवर से जो कोई, करे वन्दन देव माने ।
अरे ! वह अज्ञ जगती का, न ऐसा पुण्य भी पावे ॥
भिन्नता राग चेतन की, हुआ सतरूप श्रद्धानी ।
वही जिनवर को पहचाने, भले हो अल्प ही ज्ञानी ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-28

प्रशस्तवाचश्चतुराः कषायैः-
दग्धस्य देवव्यवहारमाहुः ।
गतस्य दीपस्य हि नन्दितत्त्वम्-
दृष्टं कपालस्य च मङ्गलत्वम् ॥

अर्थः- हे भगवन् ! लौकिक मनुष्य रागी-द्वेषी जीवों को भी 'देव’शब्द
से व्यवहार करते हैं, सो सिर्फ लोक व्यवहार से ही किसी बात की
सत्यता नहीं होती, क्योंकि लोक में कितनी ही बातों का उल्टा व्यवहार
होता है । जैसे कि जब दीपक बुझ जाता है, तब लोग कहते हैं कि
दीपक ‘बढ़ गया’ और जब घड़ा फूट जाता है तब कहने लगते हैं कि
घड़े का ‘कल्याण’ हो गया ।

(छन्द-विधाता)

अरे ! वक्ता चतुर जग में, नाम पंडित वे पा जावें ।
पुरुष पीड़ित राग रुष से, उन्हें वे देव बतलावें ॥
कथन यह ठीक लौकिक में, बुझा दीपक बढ़ा कहते ।
कुंभ के फूट जाने को, हुआ कल्याण यह कहते ॥
धराये नाम पंडित जो, धर्म हो राग से माने ।
अरागी आत्म हित साधन, व्रतादिक राग ही जानें ॥
प्रभु पथ तो अलौकिक है, मिले नहीं लोक रीति से ।
प्रविष्टि मोक्ष मग में हो, निजातम की प्रतीति से ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-29

नानार्थमेकार्थमदस्त्वदुक्तम्,
हितं वचस्ते निशम्य वक्तुः ।
निर्दोषतां के न विभावयंति,
ज्वरेण मुक्तः सुगमः स्वरेण ॥

अर्थः-अनेक अर्थों के प्रतिपादक तथा एक ही प्रयोजनयुक्त आपके कहे
हुये इन हितकारी वचनों को सुनकर कौन मनुष्य आपके जैसे वक्ता की
निर्दोषता को नहीं अनुभव करते? अर्थात सभी करते हैं । जैसे जो
ज्वर से मुक्त हो जाता है, वह स्वर से सुगम हो जाता है अर्थात स्वर से
उसकी अच्छी तरह पहचान हो जाती है।

(छन्द-विधाता)

अनेकों अर्थ तुम कहते, प्रयोजन एक ही जिनका ।
निरुपण नय प्रमाणी है, श्रवण हितरूप है उनका ॥
नहीं है राग का पोषण, प्रयोजन वीतरागी है ।
ध्वनि तुव सार जो जाने, लखे निज को अरागी है ॥
मनुज सुर आदि जग भर के, वचन निर्दोष तुव जानें ।
प्रभो गुणमाल भूषित हो, तुम्हें आदर्श हम मानें ॥
सुगम स्वर से ही पहचानें, नहीं पीड़ा रही ज्वर की ।
भक्ति अतिशय धरें उर में, महिमा अनुपम प्रभु स्वर की ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-30

न क्वापि वांछा ववृते च वाक्ते,
काले क्वचित्कोऽपि तथा नियोगः ।
न पूरयाम्यम्बुधिमित्युदंशुः,
स्वयं हि शीतद्युतिरभ्युदेति ॥

अर्थः-आपकी किसी भी वस्तु में इच्छा नहीं है और वचन प्रवृत्त होते
हैं। सचमुच में किसी काल में वैसा कोई नियोग-नियम ही होता है ।
क्योंकि चन्द्रमा, मैं समुद्र को पूर्ण कर दूँ, इसलिये उदित नहीं होता,
किन्तु स्वभाव से ही उदित होता है।

(छन्द-विधाता)
उदित हो चन्द्र इस नभ में, रहित इच्छा नहीं आशा ।
सिंधु जल पूर्ण मैं कर दूँ, कदाचित् न ये अभिलाषा ॥
रहित इच्छा वचन प्रगटें, अतुल महिमा तुम्हारी है ।
महा हितरुप है वाणी, भविकजन ने सम्हारी है ॥
उदय शशि है निमित्त ऐसा, लहर सिंधु मचलता है ।
वचन पा आपके जिनवर, जिय भवोदधि उबरता है ॥
लगन ये निज को पहचानूँ, उदित ये लालसा जब ही ।
वचन होंगे निमित्त प्रभुवर, प्रयोजन पूर्ण हो तब ही ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-31

गुणा गंभीराः परमाः प्रसन्नाः,
बहुप्रकारा बहवस्तवेति ।
दृष्टोऽयमन्तस्तवने न तेषाम् ,
गुणो गुणानां किमतः परोऽस्ति ॥

अर्थः-आपके गुण गम्भीर, उत्कृष्ट, उज्जवल, अनेक प्रकार के और
बहुत हैं, इस प्रकार स्तुति के द्वारा ही उन गुणों का अंत देखा गया है।
इसके सिवाय गुणों का क्या अंत होता है? अर्थात् नहीं होता ।

(छन्द-मत्त सवैया)

हे प्रभो आपके गुण अनंत, उत्तम उज्जवल गंभीर महा ।
उत्कृष्ट परम गुणधारी तुम, नहीं शब्दों में सामर्थ्य रहा ॥
बहुमान गुणों का शब्दों से, हे प्रभो अंत आ जाता है ।
किंतु जिनवर गुण आप धरो, गणना अनंत वह पाता है ॥
हे आदि प्रभु उपदेश आप, भवि जीवों को हितकारी है ।
जो निज स्वरुप पहचानेगा, निर्मल प्रतीति अधिकारी है ॥
परिपूर्ण शुद्ध आतम निज को, श्रद्धा में जो स्वीकारा है ।
गुण सारे मेरे व्यक्त अंश, की बहती निर्मल धारा है ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-32

स्तुत्या परं नाभिमतं हि भक्त्या,
स्मृत्या प्रणत्या च ततो भजामि ।
स्मरामि देवं ! प्रणमामि नित्यम्,
केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम् ॥

अर्थः-स्तुति के द्वारा ही इच्छित वस्तु की सिद्धि नहीं होती किंतु भक्ति,
स्मृति, और नमस्कृति से होती है; इसलिये मैं हमेशा आपकी भक्ति
करता हूँ, आपका स्मरण करता हूँ, आपको प्रणाम करता हूँ क्योंकि
इच्छित वस्तु की प्राप्तिरूप फल को किसी भी उपाय से सिद्ध कर लेना
चाहिये ।

(छन्द-मत्त सवैया)

स्तुति मात्र से प्राप्त न हो, यदि फल हित की अभिलाषा है ।
पहचाने प्रभु का सत्स्वरूप, निजरूप स्वाद का प्यासा है ॥
पर्यय में प्रगट पूर्ण प्रभुवर, निज भाव शक्ति जो पहचाने ।
है यही भक्ति जिनवर प्रभु की, निज शक्ति सुमरण नित ठाने ॥
है नमस्कार जिनपति प्रभु को, उपयोग नमन निज ज्ञायक में ।
तज आदर निमित्त विकारों का, निज ज्ञायक आदर लायक है ॥
प्रभु थुति भक्ती स्मरण रहे, प्रभु सम निज में ही नमन रहे ।
सिद्धि हो सुगम प्रयोजन की, इस बाबत सदा प्रयत्न रहे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-33

ततस्त्रिलोकी नगराधिदेवं,
नित्यं परं ज्योतिरनन्तशक्तिम् ।
अपुण्यपापं परपुण्यहेतुं,
नमाम्यहं वन्द्यमवन्दितारम् ॥

अर्थः-इसलिये मैं तीनलोकरूप नगर के अधिपति, विनाशरहित,
श्रेष्ठ, ज्ञानज्योतिस्वरूप, अनंत वीर्य से सहित, स्वयं पुण्य और पाप
से रहित होकर भी दूसरे के पुण्य में कारण तथा वन्दना करने के योग्य
होकर भी स्वयं किसी को नहीं वन्दनेवाले आपको नमस्कार करता हूँ।

(छन्द-मत्त सवैया)

स्वामी त्रिलोक नगर प्रभुवर, हैं नित्य सभी गुण प्रगटाये ।
तुम परम प्रभु हो ज्ञान ज्योति, वीरज अनंत बल उपजाये ॥
तुम रहित प्रभो सब पुण्य पाप, वंदक को पुण्य हेतु होई ।
वंदित तुम सारे जग भर से, नहीं करो वंदना आप कोई ॥
हे प्रभो आपने बतलाया, उत्कृष्ट गुणों युत जीव सभी ।
शाश्वत हैं ज्ञान दर्श आदि, सुख वीरज शक्ति धरें सभी ॥
पामर को प्रभु कहते जिनवर, यह कृपा आपकी भारी है ।
चरणों में प्रभु हम शीश धरें, वन्दना प्रभो उर धारी है ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य -34

अशब्दमस्पर्शमरूपगन्धं,
त्वां नीरसं तद्विषयावबोधम् ।
सर्वस्य मातारममेयमन्यै –
र्जिनेन्द्रमस्मार्यमनुस्मरामि ॥

अर्थः–शब्द रहित, स्पर्श रहित रूप और गंध रहित तथा रस रहित
होकर भी उनके ज्ञान से सहित सबके जाननेवाले होकर भी, दूसरों
के द्वारा नहीं जानने योग्य तथा जिनका स्मरण नहीं किया जा सकता
–ऐसे जिनेन्द्र भगवान का प्रतिक्षण स्मरण करता हूँ, ध्यान करता हूँ।

(छन्द-मत्त सवैया)

रस रूप गंध से विरहित हो, प्रभो शब्द और स्पर्श रहित ।
तदपि इन सब के ज्ञायक हो, तिन विषयों के तुम ज्ञान सहित ॥
जिनवर सब के जाननहारे, नहीं तुमको कोई जान सके ।
मन सुमरण से भी पार आप, स्मृति में कोई ला न सके ॥
तदपि बालकवत साहस से, स्मरण-ध्यान नित करता हूँ ।
नहीं गोचर राग विकल्पों से, निजरुप ध्यान मैं धरता हूँ ॥
भगवान आत्मा तुम सम प्रभु, रस रूप आदि से विरहित है ।
वीरज सुख ज्ञान दरश आदि, प्रभुता विभुता से मंडित है ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-35

अगाधमन्यैर्मनसाप्यलंघ्यं,
निष्किंचनं प्रार्थितमर्थवद्भिः ।
विश्वस्य पारं तमदृष्टपारं,
पतिं जिनानां शरणं व्रजामि ॥

अर्थः-गम्भीर, दूसरों के द्वारा मन से भी उल्लंघन करने के अयोग्य
अर्थात् अचिन्त्य, निर्धन होने पर भी धनिकों के द्वारा याचित, सबके
पारस्वरूप होने पर भी जिनका पार या अन्त कोई नहीं देख सका है-
ऐसे उन जिनेन्द्रदेव की शरण को प्राप्त होता हूँ।

(छन्द-मत्त सवैया)

प्रभु अति अगाध धीरजधारी, मन चिन्ते पार न पाये कभी ।
नहीं देते प्रभु कभी कुछ भी, तदपि याचें श्रीमान् सभी ॥
प्रभु नहीं आप में पुण्य पाप, अति पुण्यवंत भी नमे तुम्हें ।
ज्ञानादि असीम गुणों भूषित, निज आनंद मांहि आप रमें ॥
अतिशय निर्मल परजय प्रवाह, तल्लीन आप निजरूप रहें ।
रक्षक शुचिता स्वमेव आप, अपना प्रतिरक्षक तुम्हें कहैं ॥
तुम छवि देख निजरूप लखें, निज ज्ञान और आनंद लहें ।
अतएव भक्ति आपूर्ण हृदय, हम प्रभो आपकी शरण गर्दै ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-36

त्रैलोक्यदीक्षागुरवे नमस्ते,
यो वर्धमानोऽपि निजोन्नतोऽभूत् ।
प्राग्गण्डशैलः पुनरद्रिकल्पः,
पश्चान्न मेरुः कुलवर्तोऽभूत् ॥

अर्थः-त्रिभुवन के जीवों के दीक्षागुरुस्वरूप आपको नमस्कार हो, जो
आप क्रम से उन्नति को प्राप्त होकर भी स्वयमेव उन्नत थे । मेरूपर्वत
पहले गोल पत्थरों का ढेर, फिर पहाड़ और फिर कुलाचल नहीं हुआ
था किन्तु स्वभाव से ही वैसा विशाल था ।

(छन्द-मत्त सवैया)

पहले था कुछ पाषाण ढेर, फिर बढ़कर छोटा शैल हुआ ।
फिर शैल हुआ उन्नत क्रम से, क्या मेरू शैल गिरिराज भया ? ॥
अरे ! है अनादि उन्नत मेरू, जो महि प्रसिध्द विस्तृत सुजान ।
हम कहें प्रभो तुम वर्धमान, किंतु प्रभु निज उन्नत महान ॥
मैं आत्मतत्त्व त्रयकाल पूर्ण, नहीं अल्प नहीं वृद्धि पाता ।
परिपूर्ण स्वयं है जो देखे, सुख पूर्ण असीमित उपजाता ॥
सुख दरश ज्ञान प्रगटा वीरज, वह पूर्ण सदा परिपूर्ण रहे ।
है नमन तुम्हें मेरे जिनवर, उर भक्ति सदा आपूर्ण रहे ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-37

स्वयं प्रकाशस्य दिवा निशा वा,
न बाध्यता यस्य न बाधकत्वम् ।
न लाघवं गौरवमेकरुपं,
वन्दे विभुं कालकलामतीतम् ॥

अर्थः-स्वयं प्रकाशमान रहनेवाले जिसके दिन और रात की तरह न
बाध्यता है और न बाधकपना भी । इसी प्रकार जिनके न लाघव है,
न गौरव भी ; उन एकरूप रहनेवाले और काल-कला से रहित अर्थात्
अन्तरहित परमेश्वर की मैं वन्दना करता हूँ।

(छन्द-मत्त सवैया)

तुम स्वयं प्रकाशित हे जिनवर, नहीं दिवस निशा व्यवहार रहे ।
लघुता गुरुता से हो विहीन, इक रुप व्यक्तता सदा रहे ॥
नहीं बाधा कोई आप प्रभु, नहीं तुमसे कोई बाधित हो ।
तुम काल कला से विरहित हो, तुम काल अनंत अबाधित हो ॥
हूँ मैं भी शक्तिवान ऐसा, जैसे पर्यय में प्रगट आप ।
हूँ ज्ञान प्रकाशी अगुरुलघु, निर्बाधरुप बिन पुण्य पाप ॥
तुम रुप लखा निज रुप दिखा, अतिशय भक्ति उर जागी है ।
तुव कृपा अनंती हे प्रभुवर, अब लगन पूर्णता लागी है ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-38

इति स्तुतिं देव ! विधाय दैन्यात्-
वरं न याचे त्वमुपेक्षकोऽसि ।
छायातरुं संश्रयतः स्वतः स्यात्,
कश्छायया याचितयात्मलाभः ॥

अर्थः-हे देव ! इस प्रकार स्तुति करके मैं दीनभाव से वरदान नहीं
माँगता क्योंकि आप उपेक्षक हैं, राग-द्वेष से रहित हैं। अथवा वृक्ष
का आश्रय करनेवाले पुरुष को छाया स्वयं प्राप्त हो जाती है; अतः
छाया की याचना से क्या लाभ है ?

(छन्द-मत्त सवैया)

गुणगान आप करता जिनवर, हो आप प्रभो गुणखान महा ।
विरहित तुम राग द्वेष प्रभुवर, याचूँगा मैं वरदान कहाँ ? ॥
तरु तल ठहरे नर पशु कोई, वह छाँव सहज ही पाता है ।
है अर्थहीन माँगे तरु से, जो सहज छाँव का दाता है ॥
निज आत्मतत्त्व भी सुखस्वरुप, आनंद अयाची देता है ।
परजय ढलती जब अन्तरमुख, आनंद अतीन्द्रिय बहता है ॥
तुम रूप अरागी हे जिनवर, मम हृदय विराजित रूप तेरा ।
उसमें झलके निज रूप मुझे, हो वंदन प्रभु स्वीकार मेरा ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-39
अथास्ति दित्सा यदि वोपरोधः-
त्वय्येव सक्तां दिश भक्तिबुध्दिम् ।
करिष्यते देव ! तथा कृपां मे,
को वात्मपोष्ये सुमुखो न सूरिः ॥
अर्थः-यदि आपकी कुछ देने की इच्छा है अथवा वरदान माँगो ऐसा
आग्रह है तो आपमें लीन भक्तिमयी बुद्धि प्रदान करो । मेरा विश्वास
है कि हे देव ! आप मुझ पर वैसी दया करेंगे। अपने द्वारा पोषण करने
के योग्य शिष्य पर कौन पंडित पुरुष अनुकूल नहीं होता ? अर्थात्
सभी होते हैं।

(छन्द-मत्त सवैया)

तुम राग द्वेष से रहित प्रभो, तदपि इच्छा कुछ देने को ।
अथवा आग्रह मैं माँगू कुछ, तत्पर हूँ शिववद लेने को ॥
बस लीन रहूँ प्रभु आप चरण, दृष्टि थिरता शुद्धात्म मिले ।
पावन हो आप प्रगट प्रभुवर, मम दशा मलिनता शीघ्र गले ॥
प्रभु आप कृपा मैं पाऊँगा, शंकित किंचित मैं नहीं कभी ।
प्रिय सेवक मैं स्वामी तुम हो, वाँछा मम होगी पूर्ण सभी ॥
हे कृपानाथ तुम कृपा यही, ममदशा पूर्ण तुम ज्ञान लखी ।
उपदेश दिव्य हमने पाया, निधि आत्मतत्त्व निज मांहि दिखी ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

काव्य-40
(छन्द आर्या)
वितरति विहिता यथाकथंचिज्जिन,
विनताय मनीषितानी भक्तिः ।
त्वयि नुतिविषया पुनर्विशेषाद्दिशति,
सुखानि यशो धनञजयं च ॥

अर्थः-हे जिनेन्द्र ! जिस किसी तरह थोड़ी भी की गयी भक्ति नम्र
मनुष्य के लिये इच्छित वस्तु देती है, फिर आपके विषय में की गई
स्तुति विषयक भक्ति विशेषरूप से सुख, कीर्ति, धन सम्पत्ति और
विजय को प्रदान करती है।

(छन्द-मत्त सवैया)

जो विनयवान नर थोड़ी भी, भक्ति करता श्री जिनवर की ।
पाता है वाँछित वस्तु जगत, निज भान रहित हो वह नर भी ॥
यदि भक्ति यथारथ हो प्रभुवर, पहचान सहित श्री जिनवर की ।
दृष्टि निज पे प्रभु रूप लखे, होगा वह मुक्तिरमा वर ही ॥
जिनदेव आपकी भक्तिवश, कुछ शब्द रचे गुण वर्णन में ।
परिपूर्ण अचल निजरूप लखा, बहुमान भावना अर्पण है ॥
फल बिन माँगे ही पाऊँगा, इतना तो है विश्वास मुझे ।
शुचिता थिरता की वृद्धि हो, हो निबर्लता का ह्रास मुझे ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)

पार नहीं पावे कभी, जिनवर के गुण गीत ।
निज स्वरूप पहचान से हो जिनेन्द्र की प्रीत ॥
(पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)

महाऽर्घ्य

(छन्द-तांटक)
ऋषभदेव प्राचीन पुरुष तुम पुरुषोत्तम कहलाते हैं ।
कर्मभूमि युग भार संभाला, इन्द्र न गुण कह पाते हैं ॥
आप शक्ति बिन मर्यादा की, जग के दृष्टा ज्ञाता हो ।
हम अशक्त वर्णन करने में, आप जगत विख्याता हो ॥
तुम देवों के देव प्रभुवर, वचन आप हितकारी हैं ।
प्रभु अपार परमोत्तम गहरे, गुण अनंत के धारी हैं ॥
सुमरण हो आप सदा प्रभुवर, नम्र भाव से भजता हूँ ।
तुम समान गुण प्राप्ति मुझे हो, यही कामना करता हूँ ॥
वंदनीय हो प्रभु तुम जग के, नाथ त्रिलोकी कहलाते ।
तुम विरहित रस रुपादिक से, ज्ञाता सब के कहलाते ॥
भक्तिभाव से भरा हृदय ले गीत आपके गाते हैं ।
बिन माँगे ही देते सब कुछ, सुख अनुपम हम पाते हैं ॥
अल्प शक्ति पर साहस ज्यादा, किंचित् ही हम कह पाये ।
तुम स्वरूप गंभीर जो जाने, पथ मुक्ति निश्चित धाये ॥

ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्त्रोत समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
अनर्घ्यपदप्राप्तये महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

महाजयमाला

(छन्द-रेखता)

हे श्री आदिनाथ भगवान, आप हो गुण अनंत की खान ।
लिया आलम्बन प्रभुवर आप, अनादिनाथ जो निज भगवान ॥
प्रवर्तन मारग जो निज कल्याण, हुये युग के पहले तीर्थेश ।
भव्य प्राणी जन हित के हेतु, प्रभु ने दिया दिव्य उपदेश ॥
विश्व छह द्रव्यों का समुदाय, पाँच जिनमें हैं अस्तीकाय ।
भेद तिन नौ पदार्थ को जान, व्यवस्था वस्तु दी बतलाय ॥
अंग द्वादश जिनवाणी सार, किया है इनका ही विस्तार ।
एक निज शुद्धातम पहचान, वही जिनवचन श्रवण का सार ॥
अनादिकाल भ्रांति अज्ञान, नहीं थी भिन्न वस्तु पहचान ।
भटकता रहा गति जो चार, भोगता दुख स्व से अनजान ॥
हुआ जब वस्तु व्यवस्था ज्ञान, भिन्नता जानी भली प्रकार ।
दरब सब जग के हैं स्वाधीन, सभी निज-निज सत्ता भण्डार ॥
परिणमन सबका है स्वाधीन, पृथक जानो ये प्रथम उपाय ।
किसी से कोई न हानि लाभ, परस्पर नहीं प्रवेश पर्याय ॥
भिन्न्ता स्व-पर का जो भान, प्रथम हो यही भेद-विज्ञान ।
राग रुष क्षणिक उपजते जान, नहीं कर्मादिक कर्ता मान ॥
नहीं इनमें स्वभाव का अंश, नहीं उपजाता इन्हें स्वभाव ।
अरे ! पावन मैं परम स्वभाव, मोह रागादि सभी विभाव ॥
भिन्नता भाव स्वभाव विभाव, धरो भवि उर में भली प्रकार ।
अहो मैं चेतन ध्रौव्य त्रिकाल, पलटता भाव वही पर्याय ॥
क्षणिक जो विनश धरे उत्पाद, सदा ही प्रगटे विध-विध रूप ।
किन्तु मैं अविचल नित्य स्वरूप, द्रव्य सदृश्य सदा इकरूप ॥

द्रव्य पर्यय जुत एक पदार्थ, किंतु हैं भिन्न ही दोनों भाव ।
द्रव्य सामान्य कहा इकरूप, भिन्न है जो विशेष पर्याय ॥
दरब परजय को भिन्न पिछान, भाव परजय को करके गौण ।
दृष्टि से किया दरब संधान, खिला आनंद राग रुष मौन ॥
हुई परिणति मम पावन रूप, उदित रवि समकित नवल प्रभात ।
निलय मुक्ति पहला सोपान, मिटेंगे भव-भव के आघात ॥
हुआ निष्पन्न ये कार्य अपूर्व, मिला ज्ञानानन्द तत्त्व महान ।
विलय आरम्भ द्वेष अरु राग, खिला परिणति में भेदविज्ञान ॥
पुनि पुनि आश्रय आतम देव, उपज रागादि हुई अवरुद्ध ।
हुआ परिणति पावन उत्थान, खिलेगा आतम तत्त्व विशुद्ध ॥
मिटेगी सकल मलिनता राग, फलित होगा निज पूर्ण स्वरूप ।
उदित हो पूरण आतम लाभ, यही कहलाता मुक्ति भूप ॥
प्रभो उपदेश का जानो सार, रुचि ही मुक्ति मार्ग आधार ।
प्रथम हो रुचि निमित्त का त्याग, रुचि बस निज स्वरूप उर धार ॥
होय थिरता वृद्धि निज नाथ, सहज ही मिटते राग व द्वेष ।
मार्ग मुक्ति में महा प्रयाण, मिले निज गुण संपत्ति अशेष ॥
लोक त्रय में प्रभु तुम हो एक, भव्य जीवों के तारणहार ।
गायें गुण गीत आपके नाथ, आपको वन्दन बारम्बार ॥
ॐ ह्रीं श्री विषापहार स्तोत्र समन्वित श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय
जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)

पूर्ण अर्घ्य अर्पित करूँ, आदिनाथ जिनराज ।
हो आतम आराधना, पाऊँ निजपद राज ॥
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

(छन्द-विधाता)
प्रभुवर शरण आप पाई, भ्रांति सब ही पलाई है ।
शरण निज आत्म की पाकर, सुरभि आनंद छाई है ॥
प्रभु श्री आदिनाथ भगवन्, कृपा सिंधु तुम्ही जिनवर ।
अनादिनाथ दिखलाया, मिला अनुपम हमें अवसर ॥
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

महाऽर्घ्य

(छन्द-अडिल्ल)

पंच परम परमेष्ठी पूजूँ भाव से ।
श्री जिनवर की वाणी अति उत्साह से ॥
अहो धरम अति पावन रत्नत्रय जजूँ ।
दश धर्मो के भाव अति उत्तम भजूँ ॥
गिरि सम्मेद गिरनार अरु चम्पापुरी ।
शिखर महा कैलाश और पावापुरी ॥
तीन लोक में पावन जो स्थान हैं ।
कृत्रिम अकृत्रिम जिनवर प्रभु महान हैं ॥
कल्याणक भूमि हैं सब तीर्थेश की ।
अतिशय भक्ति उमगी आज विशेष ही ॥
चौबीसौं जिनप्रभु चरण वंदन करूँ ।
महि विदेह के बीस प्रभु वंदन करूँ ॥
इन सबकी पूजन करता उत्साह से ।
गुण कीर्तन करता हूँ भक्ति भाव से ॥

ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धाचार्यो पाध्यायसर्वसाधुभ्यो, द्वादशांगजिनवाणीभ्यो.
उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय, दर्शनविशुद्धियादिषोड़शकारणेभ्यो, सम्यग्दर्शनज्ञान
चारित्रेभ्यो, त्रिलोकसम्बन्धिकृत्रिमाकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो, पंचमेरौ, अशीतिचैत्यालयेभ्यो,
नन्दीश्वरद्वीपस्थद्वीपंचाशज्जिनालयेभ्यो, श्री सम्मेदशिखर, गिरनारगिरि, कैलाशगिरि,
चम्पापुर, पावापुर आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो, समस्त अतिशयक्षेत्रेभ्यो, विदेहक्षेत्रेस्थित
सीमंधरादिविधमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो, ऋषभादिचतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यो, भगवज्जिन
सहस्त्राष्टनामेभ्येश्च अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

शांति पाठ

(छन्द-मानव)

प्रभो छवि आपकी मनहर, शांति है सदा झलकती ।
आदर्श आप हम सबके, अंतर उर भक्ति उछलती ॥
हो शांति प्रभु जग भर में, सब जीव सुखी हो जायें ।
मैं स्वयं ही शांत स्वरुपी, यह विस्मृति दुःख उपजाये ॥
पर्वत मैं ज्ञान स्वरुपी, सुख शांति का मैं द्रह हूँ ।
सुख सरिता बहे निरन्तर, मैं ऐसा ध्रुव उद्गम हूँ ॥
प्रभो शरण आपकी आये, अरु मर्म आप बतलाये ।
निज सुख शांति निज में ही, हम समझ आज ये पाये ॥
रहे शरण प्रभु चरणों की, आलम्बन निज ज्ञायक का ।
हों जीव सुखी जगती के, पथ चलें मुक्ति नायक का ॥
(नौ बार णमोकार मंत्र का पाठ करें)

क्षमापना

(दोहा)

अल्प शक्ति मैं हूँ प्रभो, भक्ति भरी अपार ।
भूल चूक संभव सही, यह पूजा व्यवहार ॥
क्षमा आपसे चाहते, प्रभुवर अति उदार ।
आशा उर में है धरी, आगे होय सुधार ॥
(पुष्पान्जलिं क्षिपेत्)

श्री सीमंधर पूजन

(पं श्री राजेंद्र जी-जबलपुर)

सीमंधर स्वामी थारी तो जय जयकार-2 ॥ टेक ॥
शाश्वत जिन शासन जहँ वर्ते, महामहिम सुखकार ।
वैदेही हो रहे विदेही, धन्य विदेह मंझार ॥सीमं.॥
समयसार स्वर लहरी सुनते, धरि प्रमोद भवि सार ।
नियमसारमय परिणति होवे, तू ही तारणहार ॥सीमं.॥
कुन्दकुन्द आचार्य पधारे, तेरे ही दरबार ।
भुला गये सर्वज्ञ विरह प्रभु, रचा समय का सार ॥सीमं.॥
विनय हमारी स्वीकारो प्रभु, अशरण शरण अधार ।
भले दूर प्रभु रहो क्षेत्र से, बैठो हृदय मंझार ॥सीमं.॥

(मानव)

ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।

जीवत्व शक्ति के स्वामी, चेतन निज रूप निहारो ।
दृग ज्ञान वीर्य सुख मंडित, अपनी प्रभुता उजियारो ॥
जो नहीं जनमता मरता, शाश्वत प्रभु सत्य सनातन ।
कर्ता भोक्ता न किसी का, ज्ञाता है अपना भगवन ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, अद्भुत प्रभुता दर्शायी ।
जन्मादि व्याधि मिट जावे, हो तुम सम दशा हमारी ॥

ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

शक्ति अचिंन्त्य का धारी स्वयमेव देव शुद्धातम ।
चंदन सम शीतल चिन्मय दर्शाया प्रभु परमातम् ॥
हे नाथ सर्वदर्शी हो, सर्वज्ञ जिनेश हमारे ।
सब लोकालोक झलकते स्वच्छत्व शक्ति के द्वारे ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर अद्भुत प्रभुता दर्शायी ।
भव ताप विनाशो स्वामी, हो तुम सम दशा हमारी ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अक्षय चैतन्य निलय में, अक्षय विलसो हे स्वामी ।
पर के न कार्य कारण हो, अक्षय पद दाता नामी ॥
परिणम्य पारणामिक से, जानो सब जानन हारे ।
नहिं ग्रहण त्याग की दुविधा, भोगें आनंद महा रे ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, शाश्वत ध्रुव धाम दिखाया ।
उत्पाद ध्रौव्य व्यय शक्ति, से भ्रम का भार नशाया ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य वाटिका में ही, प्रभुवर विहार करते हो ।
सुरभित हो नाथ सुमन से, सबको सौरभ देते हो ॥
चिद्ब्रह्म विलासी जिनवर, आनंद रसामृत पीते ।
नहिं रही वासना कोई, आनंद निर्झर से झरते ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, कब शील सुगुण प्रगटाऊँ ।
प्रभु तुम समान हो जाऊँ, अपने में आप समाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय कामबाण - विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

जब आतम अनुभव आवे, तब कुछ भी नहीं सुहावे ।
यह अमृतरस का प्याला, कोई विरला ही पी पावे ॥
प्रभु शक्ति अनंतों धर्मी, से हो अनंत गुण मंडित ।
शक्ति विरुद्ध धर्मी भी, से चेतन सदा सुरक्षित ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ॥

ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु भेद ज्ञान ज्योति से, अब मंगल दीप जलाऊँ ।
मैं ममता छोडूं क्षण-क्षण, समता जीवन में लाऊँ ॥
एकत्व विभक्त सदा से, है ज्ञायक प्रभु हमारा ।
परभावों से अति न्यारा आनंद रस ज्ञान पिटारा ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ॥

ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

अनहोनी कभी न होती, होनी भी कभी न टलती ।
है शक्तिपुंज परमातम, क्यों चिंता तुम्हें सताती ॥
प्रभु भाव अभावी शक्ति, हर कार्य सहज कर लाती ।
हमको निश्चिंत बनाती, पर गंध सहज विनसाती ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ॥

ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

षट् द्रव्यों का हे प्रभुवर, नित चक्र सुदर्शन चलता ।
षट् कारकीय क्षमता से हर कार्य सहज ही होता ॥
प्रभु निज स्वभाव साधन से, सब ही सर्वज्ञ हुए हैं।
हे नाथ स्वयंभू हो तुम, आगम में कथन भरे हैं ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आए ।
निज सम्प्रदान शक्ति फल, से तुम समान हो जाये ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अखिलेश्वर हे जगदीश्वर सीमंधर नाथ जिनेश्वर ।
शक्ति अनंत दर्शायी, निज महिमा जागी जिनवर ॥
भक्ति भावों से प्रभुवर यह अर्घ्य सजाकर लाया ।
मुनि कुन्दकुन्द अमृतचंद्र, ने सोया भाग्य जगाया ।
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपना स्वरुप पहचाने, वह तुम समान हो जावे ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(दोहा)

सीमंधर भगवान के, गुण हैं अपरम्पार ।
गाऊँ जयमाला प्रभु, रोम-रोम हुलसाय ॥

(वीर)

जयवन्तो सीमंधर स्वामी, निज स्वरूप में करो विलास ।
शुद्ध स्वानुभव सरिता बहती, मुद्रा जगा रही उल्लास ॥
निज स्वभाव सीमा में रहकर, भी असीम प्रभु केवलज्ञान ।
धर्मामृत बरसाते हो प्रभु, कौन करे तेरा गुणगान ॥

सकल ज्ञेय ज्ञायक होकर भी, निज स्वरूप ही प्रभु भाया ।
निजानंद रस लीन स्वयं हो, यही बोधि पाने आया ॥
धन्य-धन्य वे जीव आपका, लाभ सदा जो लेते हैं ।
भव-भव के संचित कर्मों का, नाश स्वयं कर लेते हैं ॥
कुन्दकुन्द आचार्य श्री ने, प्रभु प्रत्यक्ष दर्शन पाया ।
दिव्यध्वनि रस पान किया प्रभु, अति अपूर्व आनंद आया ॥
आये मुनिश्री भरत क्षेत्र में, भवि जीवों को किया निहाल ।
रचे पंचपरमागम सुंदर, समयसार ने किया कमाल ॥
देव आपकी भक्ति में चित, आज सहज ललचाया है ।
काललब्धि मेरी जागी है, मन में हर्ष समाया है ॥
पंच परावर्तन में प्रभुवर, भटक-भटक अति दुख पाये ।
इस संसार महासागर में आज शरण तेरी आये ॥
भरत क्षेत्र में तीर्थंकर का विरह पड़ा है हे सर्वेश ।
इसलिए प्रभु याद आपकी आती है नित ही करूणेश ॥
पूरब पुंडरीकणी नगरी में, आप विराजे हैं अरिहंत ।
भव्य जनों के जीवन शिल्पी, मुक्ति विधाता श्री भगवंत ॥
मुनिसुव्रत तीर्थंकर युग था, तब पाया था केवलज्ञान ।
यहाँ तेरवें भगवन होंगे, तब प्रभुवर लेगें निर्वाण ॥
शक्ति अनंती विलस रही हैं, शोभित चिदानंद भगवान ।
सभी जीव भगवान आत्मा, समझाया हे दया निधान ॥
आज समझ में आया है प्रभु, वीतराग जिनधर्म महान ।
अमृत रस का पान कराता, यही बनाता है भगवान ॥

हे प्रभु साक्षात दर्शन हो, ऐसा दिन कब पाऊँगा ।
कब तुमसे सम्यक् शिक्षा ले, तुम समान बन जाऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)

देह देवालय में बसे, फिर भी सदा विदेह ।
मेरे भी मन में बसो, जय सीमंधर देव ॥
निज सीमा में संयमित, हुये सीमंधर नाथ ।
फिर भी चहुँ दिशि महकती, धर्म सुगंध सुवास ॥

(पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत)

आचार्य कुन्दकुन्ददेव द्वारा रचित ग्रन्थाधिराज समयसार की
आचार्य अमृतचन्द्र कृत आत्मख्याति टीका के परिशिष्ट अधिकार में वर्णित
आत्मा की 47 शक्तियाँ

  1. जीवत्व : जीवत्व से ही आत्मा, जीता सदा, मरता नहीं ।

  2. चिति : चितिशक्ति से चेतन रहे, यह जड़ कभी होता नहीं ।।

  3. दृशि : भेदों रहित सामान्य सत्ता, नित दिखे दृशिशक्ति से ।

  4. ज्ञान : हर वस्तु को सविशेष जाने, ज्ञानशक्ति सदैव से ।।

  5. सुख : यह आत्मा सुखशक्ति से, सुखरूप रहता सर्वदा ।

  6. वीर्य : निज द्रव्य-गुण-पर्याय को, निज वीर्य से रचता सदा ।।

  7. प्रभुत्व : इसका प्रताप न होय खंडित, अजब प्रभुता जीव की ।

  8. विभुत्व : सब गुण सभी में व्यापते, यह आत्म-शक्ति सदैव की ।।

  9. सर्वदर्शित्व : सब लोक और अलोक की, सामान्य सत्ता देखता ।

  10. सर्वज्ञत्व : हर द्रव्य-गुण-पर्याय को, प्रत्यक्ष युगपत् जानता ।।

  11. स्वच्छत्व : सब ज्ञेय झलकें ज्ञान में, ऐसी रहे नित स्वच्छता ।

  12. प्रकाश : नित स्वयं से ही स्वयं को, प्रत्यक्ष कर आस्वादता ।।

  13. असंकु-विकास : संकोच बिन पर्याय में, परिपूर्ण रीति विकास हो ।

  14. अकार्यकारण : पर से न इसमें कार्य हो, पर-कार्य का कारण न हो ॥

  15. परिणाम. परिणा: जाने स्व-पर को वा स्व-पर के जानने में आय भी ।

  16. त्यागोपा. शू. : नहिं त्यागता कुछ भी तथा, नहीं ग्रहण करता कुछ कभी ।।

  17. अगुरुलयुत्व : घटता न बढ़ता आत्मा, इकरूप रहता नित्य रे।

  18. उत्पाद व्यय धुव : हर समय उपजे, नष्ट हो, फिर भी सदा ध्रुवता धरे ।।

  19. परिणाम : उत्पाद-व्यय-ध्रुवता सहित, नित परिणमित हो आत्मा ।

  20. अमूर्तत्व : स्पर्श , रस, वर्णादि बिन , रहता अरूपी आत्मा ॥

  21. अकर्तृत्व : जडकर्म - कृत रागादि का, यह आत्मा कर्ता नहीं ।

  22. अभोक्तृत्व : रागादि भावों का कभी, यह जीव भोक्ता भी नहीं ।।

  23. निष्क्रियत्व : निष्क्रियत्व-स्वभावी आत्मा, निष्कंप रहता है सदा ।

  24. नियत प्रदेशत्व : निश्चित असंख्य प्रदेश ही, हो आत्मा के सर्वदा ॥

  25. स्व. व्याप. : चारित्र, दर्शन, ज्ञान, सुख, बल आदि में नित व्याप्त है ।

  26. सा.अ.साअ : परद्रव्य के सम, असम एवम्, समासम की शक्ति है ॥

  27. अनंतधर्मत्व : निज लक्षणों युत विविध विध, अनअंत धर्मों सहित है ।

  28. विरुद्धधर्मत्व : इसरूप नही, इसरूप भी, ऐसा विरोधीपन रहै ।।

  29. तत्व : निजरूप ही रहता सदा, यह जीव अपनी शक्ति से।

  30. अतत्व : परद्रव्यमय होता नहीं, यह मोह की उत्पत्ति से ॥

  31. एकत्व : गुण और पर्यायोंमयी, एकत्व नित रहता अहो ।

  32. अनेकत्व : लेकिन अनेकों गुण तथा, पर्याय से बहुरूप हो ।।

  33. भाव : कोई न कोई भी दशा, अनिवार्य रहती है सदा ।

  34. अभाव : जिस काल जो वरते दशा, तब अन्य नहिं होती कदा ॥

  35. भाव-अभाव : जो भी अवस्था वर्तती, उसका अवश्य विनाश हो ।

  36. अभावभाव : इस काल जो वरते नहीं, आगे वही उत्पन्न हो ॥

  37. भाव-भाव : सामान्य और विशेषमय, इकरूप रहता सर्वदा ।
    38 अभाव-अभाव : पर का सदैव अभाव है, एवम् अभाव रहे सदा ।।

  38. भाव : पर-कारकों से रहित नित, निज भावमय परिणति करे ।

  39. क्रिया : बस स्वावलम्बन से सदा, निर्मल क्रियाओं को करे ।।

  40. कर्म : निर्मल दिशाओं रूप हो; यह आत्मा का कर्म है।

  41. कर्तृत्व : निर्मल दशाओं को करे, यह आत्मा का धर्म है ॥

  42. करण : साधे स्वयं से स्वयं को, अत एव साधन है यही ।

  43. संप्रदान : निर्मल दशा उत्पन्न कर, देता स्वयं को स्वयं ही ।।

  44. अपादान : ध्रुव आत्मा में से सदा, निर्मल दशा उत्पन्न हो ।

  45. अधिकरण : रत्नत्रयी निजधर्म का, आधार भी यह स्वयं हो ।।

  46. संबंध : नहिं अन्य कोई जीव का, स्वामी स्वयं का स्वयम् है ।
    यह कथन सैतालीस का पर शक्ति तो अनअंत है ।।

‘पूजा का स्वरुप’
गुणगान एवं नमनादि करना द्रव्य पूजा है।
गुणों का चिन्तनादि भाव पूजा है ।
उनके समान निजस्वरुप की आराधना
परमार्थ पूजा है ।


Artist: प्रदीप मानोरिया, अशोकनगर (म.प्र.)
स्रोत: श्री विषापहार स्तोत्र मंडल विधान