श्री विद्यमान बीस तीर्थंकर पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Vidyaman Bees Tirthankar Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री विद्यमान बीस तीर्थंकर पूजन

सीमंधर, युगमंधर, बाहु, सुबाहु, सुजात स्वयंप्रभु देव ।
ऋषभानन, अनन्तवीर्य, सौरीप्रभु विशाल कीर्ति सुदेव ।।
श्री वज्रधर, चन्द्रानन प्रभु चन्द्रबाहु, भुजंगम ईश ।
जयति ईश्वर जयतिनेम प्रभु वीरसेन महाभद्र महीश ।।

पूज्य देवयश अजितवीर्य जिन बीस जिनेश्वर परम महान् ।
विचरण करते हैं विदेह में शाश्वत् तीर्थंकर भगवान् ।।
नहीं शक्ति जाने की स्वामी यहीं वन्दना करूँ प्रभो ।
स्तुति पूजन अर्चन करके शुद्ध भाव उर भरूँ प्रभो ।।

ॐ ह्रीं श्री विदेहक्षेत्रस्थित विद्यमान बीसतीर्थंकर जिन समूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री विदेहक्षेत्रस्थित विद्यमान बीसतीर्थंकर जिन समूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री विदेहक्षेत्रस्थित विद्यमान बीसतीर्थंकर जिन समूह अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

निर्मल सरिता का प्रासुक जल लेकर चरणों में आऊँ ।
जन्म जरादिक क्षय करने को श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।
सीमंधर, युगमंधर, आदिक, अजितवीर्य को नित ध्याऊँ ।
विद्यमान बीसों तीर्थंकर की पूजन कर हर्षाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

शीतल चंदन दाह निकन्दन लेकर चरणों में आऊँ ।
भव सन्ताप दाह हरने को श्री ज़िनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय भवताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

स्वच्छ अखण्डित उज्ज्वल तंदुल लेकर चरणों में आऊँ ।
अनुपम अक्षय पद पाने को श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय अक्षय पद प्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुभ्र शील के पुष्प मनोहर लेकर चरणों में आऊँ ।
काम शत्रु का दर्प नशाने श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।
सीमंधर, युगमंधर आदिक, अजितवीर्य को नित ध्याऊँ ।
विद्यमान बीसों तीर्थंकर की पूजन कर हर्षाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

परम शुद्ध नैवेद्य भाव उर लेकर चरणों में आऊँ ।
क्षुधा रोग का मूल मिटाने श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जगमग अंतर दीप प्रज्ज्वलित लेकर चरणों में आऊँ ।
मोह तिमिर अज्ञान हटाने श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

कर्म प्रकृतियों का ईंधन अब लेकर चरणों में आऊँ ।
ध्यान अग्नि में इसे जलाने श्री जिनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

निर्मल सरस विशुद्ध भाव फल लेकर चरणों में आऊँ ।
परम मोक्ष फल शिव सुख पाने श्रीजिनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अर्घ पुंज वैराग्य भाव का लेकर चरणों में आऊँ ।
निज अनर्घ पदवी पाने को श्री ज़िनवर के गुण गाऊँ ।।सीमं.।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकराय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

मध्य लोक में असंख्यात सागर अरु असंख्यात है द्वीप ।
जम्बूद्वीप धातकीखण्ड अरु पुष्करार्ध यह ढ़ाई द्वीप ।।
ढ़ाई द्वीप में पंचमेरु हैं तीनों लोकों में अति ख्यात् ।
मेरु सुदर्शन, विजय, अचल, मंदर विद्युन्माली विख्यात ।।

एक एक में है बत्तीस विदेह क्षेत्र अतिशय सुन्दर ।
एक शतक अरु साठ क्षेत्र हैं, चौथा काल जहाँ सुखकर ।।
पाँच भरत अरु पंच ऐरावत कर्म भूमियाँ दस गिनकर ।
एक साथ हो सकते हैं तीर्थंकर एक शतक सत्तर ।।

किन्तु न्यूनतम बीस तीर्थंकर विदेह में होते हैं ।
सदा शाश्वत विद्यमान सर्वज्ञ जिनेश्वर होते हैं ।।
एक मेरु के चार विदेहों में रहते तीर्थंकर चार ।
बीस विदेहों में तीर्थंकर बीस सदा ही मंगलकार ।।

कोटि पूर्व की आयु पूर्ण कर होते पूर्ण सिद्ध भगवान् ।
तभी दूसरे इसी नाम के होते हैं अरहन्त महान् ।।
श्री जिनदेव महा मंगलमय वीतराग सर्वज्ञ प्रधान ।
भक्ति भाव से पूजन करके मैं चाहूँ अपना कल्याण ।।

विरहमान श्री बीस जिनेश्वर भाव सहित गुणगान करूँ ।
जो विदेह में विद्यमान हैं उनका जय जय गान करूँ ।।
सीमन्धर को वन्दन करके मैं अनादि मिथ्यात्व हरूँ ।
जुगमन्दर की पूजन करके समकित अंगीकार करूँ ।।

श्री बाहु का सुमिरण करके अविरत हर व्रत ग्रहण करूँ ।
श्री सुबाहु पद अर्चन करके तेरह विधि चारित्र धरूँ ।।
प्रभु सुजात के चरण पूजकर पंच प्रमाद अभाव करूँ ।
देव स्वयंप्रभ को प्रणाम कर दुखमय सर्व विभाव हरूँ ।।

ऋषभानन की स्तुति करके योग कषाय निवृत्ति करूँ ।
पूज्य अनन्तवीर्य पद वन्दूँ पथ निर्ग्रन्थ प्रवृत्ति करूँ ।।
देव सौरप्रभ चरणाम्बुज दर्शन कर पाँचों बन्ध हरूँ ।
परम विशालकीर्ति की जय हो निज को पूर्ण अबन्ध करूँ ।।

श्री वज्रधर सर्व दोष हर सब संकल्प विकल्प हरूँ ।
चन्द्रानन के चरण चित्त धर निर्विकल्पता प्राप्त करूँ ।।
चन्द्रबाहु को नमस्कार कर पाप-पुण्य सब नाश करूँ ।
श्री भुजंग पद मस्तक धर कर निज चिद्रुप प्रकाश करूँ ।।

ईश्वर प्रभु की महिमा गाऊँ आत्म द्रव्य का भान करूँ ।
श्री नेमिप्रभु के चरणों में चिदानन्द का ध्यान धरूँ ।।
वीरसेन के पद कमलों में उर चंचलता दूर करूँ ।
महाभद्र की भव्य सुछवि लख कर्मघातिया चूर करूँ ।।

श्री देवयश सुयश गान कर शुद्ध भावना हृदय धरूँ ।
अजितवीर्य का ध्यान लगाकर गुण अनन्त निज प्रगट करूँ ।।
बीस जिनेश्वर समवसरण लख मोहमयी संसार हरूँ ।
निज स्वभाव साधन के द्वारा शीघ्र भवार्णव पार करूँ ।।

स्वगुण अनन्त चतुष्टयधारी वीतराग को नमन करूँ ।
सकल सिद्ध मंगल के दाता पूर्ण अर्घ के सुमन धरूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान बीसतीर्थंकरेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जो विदेह के बीस जिनेश्वर की महिमा उर में धरते ।
भाव सहित प्रभु पूजन करते मोक्ष लक्ष्मी को वरते ।।

इत्याशीर्वादः ।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ७७ से ८०

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