श्री वीरशासन जयन्ती पूजन | Shri Veershasan Jayanti Pujan

छन्द-रोला

वीरनाथ का दर्शन, सबको मंगलकारी।
वीरनाथ का शासन, सबको आनन्दकारी ।।
सहज वस्तु स्वातन्त्र्य, वीर ने हमें बताया।
स्वयं मुक्त हो, हमें मुक्ति का मार्ग दिखाया ।।
दोहा - श्रावण वदी सुप्रतिपदा, खिरी दिव्यध्वनि वीर।
भाव सहित पूजा करें, पहुँचें भव के तीर ॥
ॐ ह्रीं श्री सन्मति-वीर जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः
ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधिकरणम् ।

तर्ज-आज अद्भुत छवि निज निहारी…

भाव सम्यक्त्वमय नीर लावें, जन्म मरणादि का दुःख नशावें।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

लेके चन्दन क्षमाभावमय प्रभु, ईर्ष्या द्वेष मिटावें अहो विभु।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

भाव अक्षत सहज अविकारी, भक्ति प्रभु की सदा सुक्खकारी।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

बालयति हो प्रभो योगधारा, देव ऐसा ही भाव हमारा।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

तृप्ति निज में प्रभो निज से पाई, ऐसी तृप्ति हमें भी सुहाई।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

90 जिनेन्द्र आराधना संग्रह
ज्ञानमय दीप प्रभु ने जलाया, ज्ञानमय भाव हमको दिखाया।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

ध्यानमुद्रा जिनेश्वर सुहावे, देख पुरुषार्थ अन्तर जगावे ।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

देख आराधना का महाफल, लगते निस्सार सब ही करमफल।
वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

आत्म वैभव अनर्घ्य दिखाया, अर्घ्य हमने भी जिनवर चढ़ाया।

वीर शासन जयन्ती मनावें, वीर को पूज निजपद को ध्यावें ॥

ॐ ह्रीं श्री सन्मतिवीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

दोहा

विपुलाचल पर जब प्रथम, खिरी दिव्यध्वनि सार ।
भविजन अति हर्षित हुए, गूँजा जय-जयकार ॥

छन्द-त्रोटक

जय महावीर जय वर्धमान, अतिवीर वीर सन्मति महान्।
प्रभुवर को केवलज्ञान हुए, छियासठ दिन अरे व्यतीत हुए॥
नित समवशरण भर जाता था, पर योग नहीं बन पाता था।
कुछ नहीं समझ में आता था, भव्यों का मन अकुलाता था।
जब काल दिव्यध्वनि खिरने का, गौतम आदिक के तिरने का।
आया मंगलकारी जिनवर, तब इन्द्र अवधि जोड़ा सत्वर ॥
सब समझ शिष्य का वेश लिया, गौतम समीप तब गमन किया।
बोले मेरे गुरु महावीर, हैं मौन ‘काव्य’ अति ही गंभीर ॥
जिनेन्द्र आराधना संग्रह 91
भावार्थ बताओ सुखकारी, ‘त्रैकाल्यं’ काव्य पढ़ा भारी।
कुछ अर्थ समझ में नहीं आया, गौतम का माथा चकराया।
शिष्यों संग वीर समीप चला, कुछ होनहार था परम भला।
जब समवशरण दिखलाया था, विस्मित हो अति हर्षाया था।
देखत मानस्तम्भ मान गला, प्रभु दर्शन कर सम्यक्त्व मिला।
कहकर नमोस्तु दीक्षा धारी, हुए चार ज्ञान अति सुखकारी ॥
गणधर का सहज निमित्त मिला, भव्यों का भी शुभ भाग्य खिला।
प्रभु दिव्यध्वनि मंगलकारी, सब जग की अति ही हितकारी ॥
सुनकर भविजन प्रतिबुद्ध हुए, दीक्षा ले बहुजन शिष्य हुए।
प्रभु शासन तब से वर्ताया, है महाभाग्य हम भी पाया ॥
है स्वानुभूतिमय स्वयं सिद्ध, जिनशासन चिर से ही प्रसिद्ध।
जिसमें सब जीव समान कहे, स्वभाव से ही भगवान् कहे ॥
देहादिक पुद्गल बतलाये, रागादिक दुख हेतु गाये।
शिवकारण सम्यक् रत्नत्रय, परिणति निज में ही होय विलय ॥
अपना सुख-ज्ञान सु अपने में, अपनी प्रभुता है अपने में।
पहिचाने बिन भव भ्रमते हैं, आराधन कर प्रभु बनते हैं।
भोगों की नहीं कामना है, हे भगवन यही भावना है।
प्रगटावें पावन जिनशासन, फैलावें जग में प्रभु शासन ॥

ॐ ह्रीं श्रीं सन्मतिवीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

सोरठा

शासन वीर महान्, जयवन्तो जग में सदा।
पाकर आतम ज्ञान, आनंदित हों जीव सब।।
॥ पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ॥


Artist: श्रद्धेय ब्र० पं० श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह

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