अनंत चतुर्दशी (25/09/2026) को भगवान् श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र का मोक्ष कल्याणक दिवस है। इस नवरचित पूजन की जयमाला में भगवान् जिनेन्द्र की भक्ति उनकी पंचमगति की विशेष आराधना के साथ की गई है। इसमें समयसार जी की प्रथम गाथा का स्वाध्याय स्वयमेव ही होगा। अवश्य लाभ लीजिए।
।। श्री वासुपूज्य नाथ जिन पूजन ।।
स्थापना
(छंद रोला)
सम्यक् रत्नत्रय धर भायी षोडश भावन ।
सर्व हितंकर पाया पद तीर्थंकर पावन ।
धर्म देशना धर्म चक्र का किया प्रवर्तन ।
हुआ अहो जयवंत जगत् में श्री जिन शासन ।
(दोहा)
वासुपूज्य हृदय बसो, निकट रहो मम देव ।
विनय सहित आव्हान है, करूँ चरण नित सेव ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् !
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् !
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् परि पुष्पांजलि क्षिपेत !
(छंद लक्ष्मीधरा)
आत्म श्रद्धान हो मोहमल नाश हो ।
भाव निर्मल रहे गति अविनाश हो ।
जन्म-मरण नाशने नीर से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
राग आग द्वेष क्लेश लेश ना शेष हो ।
चित्त नित्त शांत हो थिर अनिमेष हो ।
भवाताप नाशने मलय से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय संसार-ताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
खंड-खंड मानता आतमा अखंड है ।
क्षण-क्षण भाव से मरण का दंड है ।
पद अक्षय मिले अक्षतम् अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
विषय की वासना भववास हेत है ।
आत्म सौरभ रहित कंटकास देत है ।
पुष्पचाप नाशने पुष्प से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
तीन लोक ग्रास कर भक्ष भूख ना भगे ।
इच्छ कूप नंत है नंत द्रव्य ना लगे ।
क्षुधा नाश हेत नैवेद्य से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानदीप नित्य है नित्य निज को लखे ।
नित्य निज ज्ञान बिन तमस संशै रखे ।
मोहतम नाश हो दीप से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
आत्मभाव स्वच्छ है भावकर्म कीच है ।
भावकर्म वश जीव चार गति बीच है ।
भाव कर्म नाश हो धूप से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
जी भर पर भोग भोगफल दुःख है ।
क्षणभर आत्मबोध बोधफल सुख है ।
शिवफल प्राप्ति हित फल से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्ण की पूर्णता अन्य से कामना ।
कामना नाश हो अन्य निजधाम ना ।
पद अनर्घ्य प्राप्त हो अर्घ्य से अर्चना ।
वासुपूज्य देव के चरण की चर्चना ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेंद्राय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पंचकल्याणक अर्घ्य
(छंद धत्तानंद)
तीर्थंकर वंदें नित अभिनंदें, पद अरविंदे शीश धरें ।
पांचों कल्याणक समकित दायक, मोद बधायक भक्ति करें ।
(छंद पद्धरि)
सुपने षोडश लख माँ विजया, सुन फल पति से अति मोद भया ।
तजकर विमान महाशुक्र प्रभु, आए माँ उर में दिव्य विभु ।
नभ से रतनों की बरसातें, नर-नार सभी मंगल गाते ।
शुभ दिवस वदि षष्टम अषाढ़, सुरबाला सेवे माँ प्रगाढ़ ।
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णषष्ठ्यां गर्भमंगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
फाल्गुन वदि चौदस धन्य हुई, नगरी चंपापुर धन्य हुई ।
वे धन्य हुए सौधर्म शचि, कर प्रथम दर्श उतसाह रचि ।
वह धन्य धरा पांडुक वन की, प्रभु न्हौन सहस शुभ कलसन की ।
वे धन्य हजार सुलोचन थे, तांडव के थट नट रोचन थे ।
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण चतुर्दश्यां जन्ममंगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
फागुन वदि चौदस वैराग्य जगा, प्रभु की दीक्षा लख भाग्य जगा ।
सुर नर लौकांतिक अनुमोदे, मुनि मौन बाह्य अन्तर-मोदे ।
सब राज तजा सब काज तजा, अकषाय भजा सुख साज सजा ।
वनवास रहे गुणवास रहे, सब दूर रहे निज पास रहे ।
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यां तपोमंगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
केवल निज लख कैवल्य लिया, केवल निज लख जग ज्ञेय किया ।
थिर एकभाव हो नंत लिया, कर घात-चतु चतु-नंत किया ।
सित माघ दूज अदूज हुए, अरिहंत हुए जगपूज हुए ।
बिन राग किए करुणा सब पर, ध्वनि दिव्य दिये सुगुणा बस कर ।
ॐ ह्रीं माघशुक्लद्वितीयायां ज्ञानमंगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
संयोग तजे त्रययोग तजे, सब धर्म धरे सब कर्म तजे ।
बिन मूरत चिनमूरत सूरत, रत निज में शाश्वत नित सोहत ।
भादौ सित -चौदस- तीत- हुए, -गुण से, गुणवृंद महीत हुए ।
चंपापुर तज नभ शीश गए, जग तज जगपति जगदीश भए ।
ॐ ह्रीं भाद्रपदशुक्ल चतुर्दश्यां मोक्षमंगलमण्डिताय श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
वासुपूज्य जिनराज का, भक्ति सहित गुणगान ।
शक्ति अल्प है कथन की, धरें पूर्ण निज ध्यान ।
(छंद हरिगीत)
हे तीर्थ के नायक जिनेश्वर देव वासुपूज्य जी ।
रे रागबिन सर्वज्ञ जिन स्वयमेव वासुपूज्य जी ।।
तिहुंलोक के सब जीव को कारणबिना हितकार हो ।
अतएव प्रभुवर के चरण की वंदना शतबार हो ।।
तुम पार हो संसार से सम्यक्त्व पथ स्वीकार कर ।
पावन हुए परिणाम सब परभाव को परिहार कर ।।
पंचम परम निजभाव को निज मानकर आराध कर ।
परिपूर्ण हो परमातमा पंचमगति को साधकर ।।
पंचमगति ध्रुव अचल है अनुपम अहो पंचमगति ।
निजभाव से उत्पन्न है अतएव ध्रुव पंचमगति ।।
परिभ्रमण से विश्रांति हेतु है अचल पंचमगति ।
उपमेय जग में कोई ना अनुपम अतः पंचमगति ।।
है विलक्षण चार गति से पंचमगति ही मोक्ष है ।
धर्मार्थकाम विमुक्त अपवर्गी गति ही मोक्ष है ।।
सिद्धत्व कारण आतमा के प्रतिच्छंद प्रसिद्ध है ।
निजरुप उन सम ध्या अहो होते भविजन सिद्ध है ।।
हे देव तुमको द्रव्य-गुण-परिणाम से पहिचान कर ।
निज आतमा को जानकर निज आतमा का ध्यान कर ।।
कर मोह राग विकार क्षय गतिचार से प्रविमुक्त हो ।
निजभाव पंचम में रहूँ पंचमगति से युक्त हो ।।
(धत्तानंद)
तीर्थंकर प्रभुवर हितकर दुखहर, भवतर शिवकर सुहित विभो ।
तुमको नित ध्यावें तुम गुण गावें, शिवसुख पावें शीघ्र प्रभो ।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय-अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
पंचमगति में राजते, वासुपूज्य जिनराज ।
पंचम भाव निहारते, लहें मुक्ति साम्राज्य ।
इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत।
Artist: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
स्रोत: नवरचित पूजन