श्री वासुपूज्य चरित्र | Shri Vasupujya Charitra -- Shri Vasupujya Bhagwan ki Gatha

जयवन्तो वासुपूज्य प्रभुवर अनुसरण करूँ।।
होकर विरक्त पर से निज का अनुभवन करूँ।।

निज आनन्द निज में ही अहो प्रत्यक्ष दिखाया।
धनि-धनि यौवन में ही अहो ब्रह्मचर्य अपनाया।।
हो पहले बालयति तीर्थंकर बारहवें स्वामी।
चम्पापुरी में पंचकल्याणक हुए नामी।।
पूरब भव में पद्मोत्तर राजा वैभववान थे।
जिनभक्त शान्तचित्त ज्ञानी नीतिवान थे।।
रहती सहज ही भावना संयम मैं कब धरूँ।। जयवन्तो.।।

जिनदेशना सुनकर अरे निस्सार लख संसार।
भव-भव दुःख मूल क्षणभंगुर दुर्भोग अति दुःखकार।।
स्वप्न के राज्य सम वैभव संयोग सब जग के।
मिथ्या इनकी प्रीति बाधक ये होते शिवमग के।।
त्रिलोक में साँचा शरण निज आत्मा ही है।
जिनवर कहें तारण तरण शुद्धात्मा ही है।।
ध्रुव आत्मा अक्षय-अनन्त सुख प्रदाता।
संयोग ही जिसमें नहीं वियोग क्यों आता?
निश्चय किया निर्ग्रन्थ हो आराधना करूँ।। जयवन्तो.।।

करके क्षमा सब जीवों से भी माँग कर क्षमा।
परिग्रह तज केशों का लुंचन कर राग को वमा।।
होती थी योग्य क्रिया, निष्क्रिय आप थे रहते।
ज्ञेयों से अति निरपेक्ष ज्ञायक आप अनुभवते।।
आनन्द-आनन्द में झूलते, समतामय विचरते।
भायीं थीं सोलह भावना, निज पद भजते-भजते।।
तीर्थंकर प्रकृति बाँधकर महाशुक्र सुर भये।
थी पद्म लेश्या इन्द्रपद विरक्त पर रहे।।
थी भावना निज साधना परिपूर्ण कब करूँ।। जयवन्तो.।।

चम्पानगरी वसुपूज्य नृप रानी जयावती।
अद्भुत शोभा हुई रत्नों की धारा वर्षती।।
प्रभु जन्म के समय इन्द्रों के आसन कम्पाये।
क्षणभर को तो नरकों में भी आनन्द थे छाये।।
आह्लादकारी अद्भुत उत्सव इन्द्रों ने किया।
मेरु शिखर पाण्डुक शिला पर था न्हवन किया।।
इन्द्राणी शोभा के लिए जो भूषण पहनाये।
प्रभु की शोभा से शोभित हो वे भूषण मुस्काये।।
करते थे सुरगण नृत्य मैं भी भक्ति चित धरूँ।। जयवन्तो.।।

वृद्धिंगत मोहता था सबको प्रभु शरीर भी।
अपने को आप अनुभवते लेकिन अशरीर ही।।
कुछ क्षण सम बीते थे अठारह लाख वर्ष भी।
था जन्मदिन का उत्सव नगरी स्वर्ग सम दिखती।।
शृंगार राग रंग प्रसंग सर्व ओर थे।
चैतन्य के चिन्तन में स्वामी विभोर थे।।
जागा था जाति स्मरण अरु उमगी विरक्ति थी।
लौकान्तिक आ अनुमोदते नगरी थी देखती।।
अन्तर्मुख मौन कह रहे प्रभु दीक्षा मैं धरूँ।। जयवन्तो.।।

आओ भवि प्राणी आओ इस आनन्दमार्ग में।
कुछ सोच या संकोच नहीं करना इस मार्ग में।।
नहिं देखो जग की ओर निज की ओर तुम देखो।
मत मिथ्या विकथाएँ सुनो निज हित अहित देखो।।
दुःख भी बाँटें नहीं मोहीजन सुख तो क्या दे सकते।
सोचो मोहांध कैसे शिवमार्ग दिखा सकते।।
जग की अपेक्षा व्यर्थ है कल्याण अब करो।
हो साहसी स्व-विवेक से शिवमार्ग में बढ़ो।।
चढ़ रत्नमाला चल दिए प्रभु मैं नमन करूँ।। जयवन्तो.।।

वह जन्मदिन था धनि-धनि दीक्षा का दिन हो गया।
दीक्षा लेते ही चौथा ज्ञान प्रगट हो गया।।
प्रगटी अनेक ऋद्धियाँ उपवास दो दिन का।
था भाग्य सुन्दर नृप का प्रथमाहार देने का।।
पंचाश्चर्य थे हुए, महिमा महान् थी।
महिमा कहूँ कैसे प्रभु के आत्मध्यान की।
क्रोधादि शत्रु जीत कर परमात्मा हुए।
सुन देशना जिनराज की प्रतिबुद्ध भवि हुए।।
प्रतिबुद्ध शुद्धबुद्ध हो मैं भी स्वपद धरूँ।। जयवन्तो.।।

सौभाग्य चौवन/चऊअन लाख वर्ष तक विहार कर।
वर्तीया धर्मतीर्थ जो तिहुँलोक में सुखकर।।
निर्मुक्त हो परिशुद्ध हो प्रभु सिद्धपद पाया।
अविकारी ब्रह्मचारी फिर भी नाम चलाया।।
गुणगान करते आपका दुर्मोह दलमले।
वैराग्यभाव पुष्ट हो उत्साह प्रभु बढ़े।।
आदर्श लेकर आपका मैं आप पद भजूँ।
निश्चइंत हो जग के प्रपंच दुःखमय तजूं।।
हो लीन ब्रह्मरूप में, मैं ब्रह्मचर्य धरूँ।। जयवन्तो.।।

आनन्दमय निजभाव की आराधना सुखमय।
आनन्दमय निज साध्य की है साधना सुखमय।।
चिन्ता नहीं उपसर्ग हों मैं शान्त रहूँगा।
निजमाहिं निज से ही सहज संतुष्ट रहूँगा।।
वैभव मिले ख्याति मिले विरक्त रहूँगा।
निरपेक्ष हो कृतकृत्य हो नित तृप्त रहूँगा।।
ध्याऊँ मैं सहजभाव से ध्रुव सहजभाव को।
निर्द्वन्द्व हो निर्ग्रन्थ हो त्यागूँ विभाव को।।
पाऊँगा परमभाव प्रभु संकल्प मैं करूँ।। जयवन्तो.।।

Artist — आ.बा. ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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