श्री वारिषेण वैराग्य | Shri Varishen Vairagya

वैराग्य वारिषेण का आनन्दमय देखो।
ज्ञानी का साम्यभाव कैसा होता है देखो ।। टेक ।।

जिनधर्म भक्ता शुद्धशीला चेलना माता।
थे न्यायप्रिय श्रेणिक पिता आनन्द प्रदाता।।
बचपन से ही थे संस्कार धर्ममय जिनके।
जिनको न दुर्व्यसन तथा दुर्भाव छू सके ।।
भाते हुए जिनभावना उनका चरित देखो।। ज्ञानी. ।।
रनिवास में रहते हुए भी वे उदास थे।
तत्त्वार्थ श्रद्धानी, नहीं विषयों के दास थे।।
निर्ग्रन्थ पद की भावना भाते हुए रहते।
गृहवास को कर्मोदय कृत उपसर्ग सम सहते ।।
श्मशान में चौदश को उनको ध्यान में देखो।। ज्ञानी. ।।
प्रोषध-उपवास की क्रिया में सावधान थे।
निष्पाप, काया से विरत वे ज्ञानवान थे।।
थे लीन धर्मध्यान में मुनि के समान ही।
मुनिराज के लघु भ्राता श्रावक ध्याते ज्ञान ही।।
कैसा संयोग आ पड़ा था उस समय देखो।। ज्ञानी. ।।
बहुमूल्य हार लेकर वहाँ इक चोर था आया।
पीछे सिपाही दौड़ते अत्यन्त घबराया ।।
श्री वारिषेण के समीप हार फैंक कर।
वह छिप गया पर सैनिकों ने चोर समझकर ।।
कुछ भी कहा कुमार को विचित्रता देखो।। ज्ञानी. ।।
उपसर्ग जानकर कुमार हो गये अचल।
भाते वैराग्य भावना जाने कर्मों का फल ।।
आक्रोश का कुछ भाव भी मन में नहीं आया।
नहीं चोर पर, नहीं सैनिकों पर चित्त झुंझलाया।।
विपाक विचय धर्मध्यान का सुफल देखो।। ज्ञानी. ।।
निज तत्त्वज्ञान के बल से अति शान्त चित्त थे।
अकिंचित्कर उनके लिए सब ही निमित्त थे।।
यदि बच गये उपसर्ग से तो दीक्षा ही लेंगे।
आराधेंगे शुद्धात्मा सब कर्म हरेंगे।।
कीनी प्रतिज्ञा स्वसन्मुख चिन्तन उनका देखो ।। ज्ञानी. ।।
जब सैनिकों ने राजा को जाकर यह बताया।
नहीं क्रोध के आवेश में कुछ सोच था पाया।।
तत्क्षण कहा काटो मस्तक तलवार से जाकर।
कीनी दया कुछ भी नहीं निजपुत्र समझकर ।।
अंधा होता है क्रोध आँखें खोलकर देखो।। ज्ञानी. ।।
यह सुनकर भी तो चेलना मन में निःशंक थी।
मम पुत्र चोर है नहीं निर्भय निःशंक थी।।
जल्लाद ने भी शंकित मन तलवार चलाई।
गर्दन में माला हो गयी थी फूल की भाई ।।
तब जय-जयकार हो रही थी हर्ष से देखो ।। ज्ञानी. ।।
सारे नगर के लोग भी तो दौड़कर पहुँचे ।
संकोच पश्चाताप से श्रेणिक नृपति पहुँचे ।।
करना क्षमा बेटा बड़ा अपराध हो गया।
अब घर चलो दैवीय सत्य न्याय हो गया।।
धनि धन्य है जिनधर्म की प्रभावना देखो।। ज्ञानी. ।।
तब मौन तोड़ वारिषेण शान्त चित्त कहा।
दीक्षा धरेंगे तात हम निस्सार जग लखा।।
तुमने तो राजपद का ही निर्वाह था किया।
ममता को ताक में रखकर था दण्ड ही दिया ।।
नहीं खेद कुछ करो, यही संसार है देखो।। ज्ञानी. ।।
आज्ञा दीक्षा की दे दो ये ही श्रेयरूप है।
पितु राग का बन्धन महासंक्लेश रूप है।।
मेरे हृदय में आज तो आनन्द है महा।
निर्ग्रन्थ दीक्षा की करो अनुमोदना अहा।।
वस्तु स्वरूप सम्बन्धों के पार हो देखो।। ज्ञानी. ।।
वैराग्य का वातावरण सर्वत्र था छाया।
सुर नर मिल जय-जयकारों से आकाश गुँजाया ।।
तब चोर ने भी चरणों में गिर कर माँगी क्षमा।
समझा बुझा कर वारिषेण राग को वमा।।
तज राज, रानी, मोह, ममता मुनि हुए देखो ।। ज्ञानी. ।।
रहने लगे आराधना में उद्यमी गुरुवर।
चर्या को निकले एक दिन वे शान्तचित्त मुनिवर।।
तब पुष्पडाल ने दिया आहार सुखकारी ।
पूरब समय के नेह वश अनुराग था भारी।।
पहुँचाने साथ चल दिया फिर मुनि हुआ देखो ।। ज्ञानी. ।।
संकोचवश मुनि हो गया नहीं राग था टूटा।
थी वासना मन का नहीं सम्बन्ध था छूटा।।
करते हुए मुनि की क्रिया भी भूल नहीं पाया।
निज आत्मा का एक क्षण अनुभव नहीं आया।।
देखा-देखी का मार्ग नहीं यह अन्तर में देखो ।। ज्ञानी. ।।
है योग्यता कारण नियामक क्या निमित्त करे।
स्वतंत्र है सब परिणमन टारे नहीं टरे ।।
सुन्दर समवशरण रचा था वीरनाथ का।
इन्द्रादि करते स्तवन श्री वीरनाथ का।।
उत्कृष्ट था निमित्त निज कल्याण का देखो।। ज्ञानी. ।।
पर स्तवन सुनते हुए भी मोह हो गया।
स्त्री के पास पुष्पडाल घर को चल दिया ।।
मुनिराज वारिषेण भी तब संग चल दिये।
करने उसे थिर धर्म में निज महल चल दिये।।
लोकोत्तर करुणाभाव श्री मुनिराज का देखो।। ज्ञान.।।
देखा था चेलना उन्हें आते हुए घर में।
आसन बिछाये दो वैराग्य का निर्णय करने।।
श्री वारिषेण जी चुना था काष्ठ का आसन।
अरु पुष्पडाल बैठ गया स्वर्ण सिंहासन।।
रनिवास दर्शन को आया था क्या हुआ देखो।। ज्ञानी.।।
श्री वारिषेण ने कहा रे पुष्पडाल सुन।
रुक जा यहीं पर हो सके यदि तृप्त तेरा मन।।
स्वर्गों के भोग भी भोगे तूने अनंतबार।
साधारण स्त्री में भरमाया रे तुझे धिक्कार।।
बारह बरस खोये वृथा विचार कर देखो।। ज्ञानी.।।
तब धर्ममाता चेलना कहने लगी मुनिवर।
खोओ नहीं पाया महा-कल्याण का अवसर।।
असि धार के मधु के समान भोग हैं दुःखकर।
आनन्द से आराधना अपनी करो सुखकर।।
है स्मरण के योग्य ध्रुव शुद्धात्मा देखो।। ज्ञानी.।।
भोगों से वासना कभी भी तृप्त नहीं होती।
आनन्दमय अनुभूति निज की सर्व दुःख खोती।।
करके वमन फिर चाहना तो निंद्य ही जानो।
अभ्यास अन्तर का करो दुर्वासना हानो।।
अन्तर में तृप्त भगवन्तों को भक्ति से देखो।। ज्ञानी.।।
तब पुष्पडाल हो सचेत प्रायश्चित लिया।
श्री वारिषेण भी महान उग्र तप किया।।
वैराग्य उनका हो हमें वैराग्य प्रदाता।
वैराग्य ही है एक अभय सर्व सुखदाता ।।
निस्सार सब परभाव सार निज प्रभु देखो।। ज्ञानी. ।।
देखो नहीं बाहर मिलेगा क्लेश ही भाई।
सुखशान्ति निज में ही, नहीं पर से कभी आई ।।
छोड़ो अरे अब तो अनादि मोह को छोड़ो।
निज परिणति आनन्द से निजमाँहि ही जोड़ो ।।
अपना सर्वस्व ‘आत्मन्’ तुम अपने में देखो ।। ज्ञानी. ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह