परिणामों की विचित्रता अति देखो रे भाई।
दुखमय पर्याय दृष्टि अब तो छोड़ो रे भाई ।। टेक ।।
लेने आया था साला तब अति खिन्न था हुआ।
पत्नी बिन कैसे रह सकूँगा सोचता रहा।।
सब लोक लाज छोड़ करके साथ चल दिया।
विषयान्धता में कुछ विचार कर नहीं सका।।
कामान्ध को लज्जा नहीं भय भी नहिं रहता।
कानी कौड़ी के काज खत क्रोड़ों का लिख देता।।
इन क्षणिक सुखभासों का फल है भव-भवदुखदाई ।। दुखमय. ।।
विषयान्ध जीवों के विवेक हो जाता विलय।
विषयान्ध को रहती नहीं पूज्यों की भी विनय।।
विषयान्ध के परिणामों में नित वर्ते कुटिलता।
होती नहीं जीवन में सहजता या सरलता ।।
श्री गुरुओं का उपदेश भी अन्तर में नहीं भिदता।
संयममय जीवन में उसे लगती है विरसता।।
भोगों का त्याग आनन्दमय पर लगता दुखदाई ।। दुखमय. ।।
लौकिक जीवों का संग ही भोगी को सुहाता।
ज्ञानी गुरुओं की संगति से तो दूर ही भगता।।
आपद के जो स्थान वे लगते हैं निरापद ।
फिर कैसे जाने आराधे अपना चैतन्यपद ।।
कारागृह सम गृहवास को वह सुखमयी जाने।
बेड़ी सम स्त्री को ही वह सुख संगिनी माने।।
शोभा माने परिग्रह से जो अति आकुलता दाई ।। दुखमय. ।।
वह मित्र उनको जानता जो राग को पोषे।
नित आर्त-रौद्र ध्यान से जीवन का रस सोखे ।।
एकाकी जीवन में होती है दुःख की कल्पना।
आनन्दमय निवृत्ति की नहीं होती है भावना ।।
सम्यक् पुरुषार्थ हीन वह परिश्रम बहुत करता।
आतम हित से रहकर विमुख पर का बोझा ढोता ।।
मरता यूं ही दुर्ध्यान में गुरु सीख न सुहाई ।। दुखमय. ।।
जाता था वज्रबाहु कुँअर परिकर संग में।
सुधिबुधि नहीं कुछ मग्न था चित राग रंग में।।
आकर बसन्तगिरि पर था विश्राम कुछ किया।
छायी बसन्त ऋतु की शोभा देखन चल दिया।।
पर्वत पर गुणसागर मुनिराज देखे ध्यान में मगन।
विस्मित हो सोचने लगा वज्रबाहु मन ही मन ।।
धनि-धनि विरागी दिव्यमुद्रा शांतता छाई ।। दुखमय. ।।
अहो ! अहो !! योगीश्वर देखो कैसे सोहते।
सच्चिदानन्दमय आत्मा अन्तर में जोहते ।।
निज अनुभव रस में तृप्त हैं बाहर में निस्पृही।
अविकारी परम जितेन्द्रिय मुनिवर पूज्य हैं यही ।।
सम्पन्न निज वैभव से हैं निर्ग्रन्थ आनन्दमय।
निष्पाप हैं निर्द्वन्द्व हैं स्वाधीन हैं निर्भय ।।
कल्याण में हैं सावधान अक्षय निधि पाई ।। दुखमय. ।।
धनि-धनि हैं श्री मुनि जो नहीं विषयों से ठगाये।
परिग्रह तृष्णा रूपी नागिन से जो नहीं डसाये ।।
जो वासनाओं की छाया से भी अति दूर हैं।
निर्मोही हैं दुष्कर्म जीतने में शूर हैं।।
बंधन तो दूर बंधन की शंका जिन्हें नहीं।
दर्पण सम है निकलंक जीवन देखो तो सही ।।
जिनकी शरण से भव्य, पावे शिवपथ सुखदाई ।। दुखमय. ।।
धिक्-धिक् है मेरी परिणति दुर्मोह से बँधी।
नहीं देखती नीति-अनीति काम में सनी।।
इन्द्रिय-विषय अति क्रूर सच्चे सुख के लुटेरे।
नित तड़फ-तड़फ दुःख सहते मोही विषयों के प्रेरे ।।
होकर अचेत फँस गया था चक्कर में इनके।
होऊँ कृतार्थ मैं अभी धनि मुनिदशा धरिके।।
पावन हुआ मुनि दर्श से विरक्तता आई ।। दुखमय. ।।
साला था उदय कुमार कुछ क्षण देखता रहा।
बोला क्या देखो ! दीक्षा ले लो, हँसता-सा हुआ।।
बोले थे वज्रबाहु मन का भाव कह दिया।
मुनि दर्शन से मुनिदीक्षा का ही भाव है हुआ।।
साला बोला तुम ले लो मैं भी संग लूँ दीक्षा।
जीजाजी यूँ ही खेल नहीं है पावन मुनि दीक्षा ।।
बोले कुमार खेल ही है लब्धि जब आई ।। दुखमय. ।।
तुम अपनी जानो मैं तो देखो दीक्षा लेता हूँ।
अब तक के भोगों का निर्मल हो प्रायश्चित लेता हूँ।।
बोला साला क्या करते मैं तो हास्य में कहा।
बोले कुमार हास्य में उपकार ही हुआ।।
यदि हास्य में भी औषधी का पान जो करे।
नीरोग होता, हास्य उसमें विघ्न क्या करे ?
करना क्षमा आनन्दित होओ शुभ घड़ी आई ।। दुखमय. ।।
मुनिराज के चरणों में जाकर शीश नवाया।
आज्ञा लेकर सब परिग्रह का था त्याग कराया।।
वस्त्राभूषण फैंके थे अति निस्सार जानकर।
लौंचे थे केश पापमय विकार जानकर ।।
निर्ग्रन्थ हो शुद्धात्मा में मग्न थे हुए।
नाशीं थी तीन चौकड़ी अनुगृहीत थे हुए।।
दीक्षित हुए छब्बीस राजकुँअर सुहाई ।। दुखमय. ।।
यूँ देखा साहस मनोदया भी आनन्दित होकर।
हो गई आर्यिका साथ में जग-फन्द को तज कर।।
यह जानकर समाचार दादा सोचने लगे।
धनि-धनि जमाई पौत्र-पौत्री मुक्तिपथ बढ़े ।।
राजा विजय भी मोह पर पाने विजय चले।
निज पुत्र के संग राजभार छोड़कर चले ।।
धरकर दिगम्बर रूप अविनश्वर सिद्धि पाई ।। दुखमय. ।।
यों परिणामों की लख न्यारी गति चेतो रे भाई।
पर्यायमात्र निज पर को नहीं देखो रे भाई ।।
परिणामाश्रित अभिमान अथवा दीनता तजो।
पर्यायों से निरपेक्ष ध्रुव चिद् आत्मा भजो।।
नहिं सोचो इतने दिन का मोह कैसे छूटेगा ?
स्वलक्ष्य के पुरुषार्थ से इक क्षण में मिटेगा।।
लो पौराणिक पुरुषों से ये शिक्षा मंगलदायी ।। दुखमय. ।।
यदि जग में सार होता तो फिर वे कैसे तजते ?
आराधना में दुःख होता तो वे क्यों फिर भजते ।।
छोड़ो विपरीत कल्पना सम्यक् विचार से।
ध्याओ-ध्याओ उत्तम नहीं कुछ समयसार से ।।
ये पुण्य का वैभव नहीं है भोग्य त्याज्य रे।
निरपेक्ष हो पर से, निज में ही निज का राज्य रे।।
स्वाभाविक ज्ञानानन्दमय निजदृष्टि सुखदाई ।। दुखमय. ।।
उत्तम अवसर में कार्य उत्तम हित का ही करना।
दुर्लभ से दुर्लभ बोधि की आराधना करना ।।
फँसना प्रलोभन में नहीं भय भी नहीं लाना।
होकर निःशंक निज बल पर शिवमार्ग में आना।।
अज्ञान अन-अभ्यास से कुछ कष्ट सा दिखता।
सज्ञान अरु अभ्यास से भासेगी सहजता।।
इस मार्ग से ही ज्ञानियों ने मुक्ति है पाई ।। दुखमय. ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह