श्री उत्तम त्याग धर्म पूजन
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स्थापना
(छंद-कुण्डलिया)
उत्तम त्याग महान ही है भवदुःख हर्त्तार।
ज्ञानभाव की भावना देती सौख्य अपार॥
देती सौख्य अपार ज्ञान कैवल्य प्रदाता।
स्व-पर प्रकाशक ज्ञान सदा को उर में आता॥
जो करते हैं ज्ञान प्राप्ति का सतत परिश्रम।
वे ही पाते त्याग धर्म महिमामय उत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्ग अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्ग अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्ग अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टक
(छंद-ताटंक)
क्षीरोदधि से प्रासुक जल ला प्रभु चरणाग्र चढ़ाऊँगा।
जन्म-जरा-मरणादि रोग त्रय हरकर शिवपद पाऊँगा॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
मेरु सुदर्शन पांडुक वन से चंदन लाऊँ अति शीतल।
भवज्वाला संपूर्ण बुझाऊँ हो जाऊँ मैं परमोज्ज्वल॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय क्रोधकषाय विनाशनाय चंदनं नि.।
विजयमेरु वन भद्रशाल से अक्षत लाऊँ धवलोज्ज्वल।
अक्षयपद पाऊँगा स्वामी पर विभाव सारे ही दल॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय मानकषाय विनाशनाय अक्षतं नि.।
अचलमेरु के नंदनवन से पुष्प मनोहर लाऊँ मैं।
कामबाण विध्वंस करूँ प्रभो शीलस्वभाव सजाऊँ मैं॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय मायाकषाय विनाशनाय पुष्पं नि.।
मंदर मेरु सौमनसवन जा सुचरु बनाऊँ अनुभवमय।
क्षुधारोग विध्वंस करूँ प्रभु तृप्त स्वपद पाऊँ गुणमय॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि.।
विद्युन्माली मेरु शाश्वत से मैं रत्नदीप लाऊँ।
मोह तिमिर मिथ्यात्व नष्ट कर निज कैवल्य स्वनिधि पाऊँ॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि.।
नन्दीश्वर से धर्म धूप ला शुक्लध्यान ही ध्याऊँगा।
अष्टकर्म संपूर्ण नष्ट कर शिवपद शाश्वत पाऊँगा॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय विभावपरिणति विनाशनाय धूपं नि.।
कुण्डलवर ग्यारहवाँ द्वीप मनोहर सुन्दर मनभावन।
फल लाऊँ प्रभु चरण चढ़ाऊँ महामोक्ष पाऊँ पावन॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय महामोक्षफलप्राप्ताय फलं नि.।
द्वीप रुचकवर जाऊँ अर्घ्य बनाऊँ गुणमय ज्ञानमयी।
पद अनर्घ्य पाऊँ हे स्वामी पाऊँ पद निर्वाणजयी॥
उत्तम त्याग धर्म की महिमा ऋषि मुनि गणधर गाते हैं।
जो इसको धारण करते हैं महामोक्षसुख पाते हैं॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं नि.।
अर्घ्यावलि
(छंद-चौपाई)
कामदेव सम देह मनोहर। पुण्योदय पायी बहु सुन्दर।
इस जड तन से ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥१॥
ॐ ह्रीं श्री तनममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
माता रज से जड़तन पाया। गर्भवास में बहु दुःख पाया।
माता से भी ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥२॥
ॐ ह्रीं श्री जननीममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
पिता वीर्य से जन्मे हो तुम। काल बहुत तक संग रहे तुम।
पिता ममत्व पूर्णतः त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥३॥
ॐ ह्रीं श्री पितृममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
पुण्योदय से शुभ सुत पाया। पापोदय से पुत्र विलाया।
पुत्र ममत्व शीघ्र ही त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥४॥
ॐ ह्रीं श्री पुत्रममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
राज्यपाट भाग्य से पाया। रक्षा में ही समय गंवाया।
राज्यपाट का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥५॥
ॐ ह्रीं श्री राज्यममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
रत्नस्वर्ण आदिक धन पाया। उत्तम वाहन सुख भी पाया।
धन वाहन का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो॥६॥
ॐ ह्रीं श्री धनवाहनादिममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
रंभा जैसी नारी पायी। भोगे भोग बहुत दुखदायी।
स्त्री से ममत्व सब त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री स्त्रीममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
परिजन संगी साथी सुत घर। सभी मनोरंजन हैं नश्वर।
गृह कुटुम्ब का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री गृहकुटुम्बममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
चऊ कषाय हैं बहु दुखदायी। इसकारण भव पीड़ा पायी।
चऊ कषाय का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री कषायभावत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
पुत्रादिक से राग-द्वेष बहु। उनके कारण दुख पाये बहु।
राग-द्वेष का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री राग-द्वेषत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
माता पिता सुत पत्नी आदिक। दुखदाता हैं ये सर्वाधिक ॥
सब प्रकार का ममत्व त्यागो। उत्तम त्याग धर्म अनुरागो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री समस्तममत्वत्यागधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जयमाला
(छंद-पंचचामर)
समस्त पर विकल्प त्याग शुद्ध आत्मवान बन।
समस्त रागभाव त्याग चिर-स्वरूपवान बन॥
समस्त मोह जाल छिन्न-भिन्न कर महान बन।
समस्त ज्ञान का समुद्र आत्म-धर्मवान बन॥
स्वरूप में अचल सदा स्वध्यान में प्रवीण हो।
प्रचण्ड शक्ति पुंज तू निजात्म में विलीन हो॥
राग-द्वेष मोह पुण्य-पाप से विहीन हो।
परम अनंत दर्श-ज्ञान-वीर्य-सुख अधीन हो॥
समस्त कर्म शक्तियाँ तुझे डिगा न पाएंगी।
समस्त कार्माण वर्गणा डिगा न पाएंगी॥
समस्त ऋद्धि सिद्धियाँ तुझे लुभा न पाएंगी।
समस्त मंत्र शक्तियाँ तुझे झुला न पाएंगी॥
समस्त शान्ति सौख्य शक्ति का समुद्र तू महान।
तीनों लोक तीनों काल में सदैव है प्रधान॥
तेरे अन्तरंग में है मुक्ति का महा विहान।
तू ही सिद्ध तू ही बुद्ध तू ही ज्ञानपति महान॥
(छंद सोरठा)
उत्तम त्याग महान अंगीकृत कर लो सहज।
यही शान्ति का मूल परम सौख्यदाता सदा॥
आशीर्वाद
(छंद-सोरठा)
उत्तम त्याग महान मैंने पूजा हे प्रभो।
धारूँ धर्म स्वरूप स्व-पर विवेक जगा हृदय॥
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय नमः।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Uttam_Tyag_Dharm_Pujan.pdf (13.1 MB, 9 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51109।