श्री उत्तम तप धर्म पूजन
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स्थापना
(छंद-कुण्डलिया).
उत्तम तप ही सार है इस संसार मझार।
परम तपस्वी सुमुनि ही पाते भव का पार॥
पाते भव का पार आत्मा को ध्याते हैं।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर ही वे सुख पाते हैं॥
ज्ञान-ध्यान-वैराग्य भावना भाते कर श्रम।
परम मोक्ष सुख पाते हैं वे ही तो उत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्ग अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्ग अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्ग अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टक
(छंद-सार/जोगीरासा)
शुद्धभाव तप की शोभा से मैं शोभित हो जाऊँ।
जन्म जरा मरणादि नाश कर पूर्ण सुखी हो जाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
शुद्धभाव तप चंदन लाऊँ भव-ज्वर पीर मिटाऊँ।
शीतल शान्त निराकुल बनकर निज की महिमा गाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय क्रोधकषाय विनाशनाय चंदनं नि.।
शुद्धभाव के अक्षत लाऊँ अक्षयपद प्रगटाऊँ।
जो बाधक कारण शिवपथ के उनको दूर हटाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय मानकषाय विनाशनाय अक्षतं नि.।
शुद्धभाव के पुष्प मनोहर कामबाण दुख नाशक।
महाशील गुण ही उत्तम है पद निष्काम प्रकाशक॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय मायाकषाय विनाशनाय पुष्पं नि.।
शुद्धभाव रस सुचरु चढाऊँ पूर्ण तृप्त हो जाऊँ।
अनाहार पद शाश्वत पाऊँ रागरहित सुख पाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि.।
शुद्धभाव के ज्ञानदीप ले आत्मस्वभाव जगाऊँ।
महामोह मिथ्यात्व तिमिर को पल में पूर्ण भगाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि.।
शुद्धभाव की धूप चढाऊँ शुक्लध्यान के द्वारा।
अष्टकर्म विध्वंस करूँ मैं काटूँ भवदुख कारा॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय विभावपरिणति विनाशनाय धूपं नि.।
शुद्धभाव के तरु फल लेकर महामोक्षफल पाऊँ।
भाव-द्रव्य-नोकर्म नाशकर शाश्वत निजपद पाऊँ॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्ताय फलं नि.।
शुद्धभाव के अर्घ्य चढाऊँ भव भावों को क्षय कर।
पद अनर्घ्य पाऊँ मैं अपना राग-द्वेष को जय कर॥
उत्तम तप धारण कर मैं भी द्वादश तप उर धारूँ।
पूर्ण अनिच्छुक बनकर मैं भी केवलज्ञान उजारूँ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं नि.।
अर्घ्यावलि
(छंद-मानव)
भवसागर तरना है तो द्वादश तप उर में धारो।
ले भावलिंग अंतर में निज तरणी पार उतारो॥
दृढ अपरिग्रही बनो तुम बन पूर्ण अनिच्छुक जिनमुनि।
जब तक न मोक्षसुख पाओ तब तक श्रम करना है मुनि॥
उत्तम तप धर्म श्रेष्ठ है निज का ही आश्रय करना।
द्वादश तप के द्वारा फिर संसार ताप सब हरना॥१॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जिनगुण सम्पत्ति तप धारो त्रेसठ उपवास करो तुम।
अरु भिन्न-भिन्न तिथियों में अनशन तप हृदय धरो तुम॥
उत्तम तप धर्म मनोहर श्री मुनि धारण करते हैं।
कर्मों के सकल भार को तप द्वारा वे हरते हैं॥२॥
ॐ ह्रीं श्री जिनगुणसम्पत्तितपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तप कर्मक्षपण उपवास इक शत अड़तालिस जानो।
अरु भिन्न-भिन्न तिथियों में अनशन तप करना मानो॥
उत्तम तप धर्म मनोहर श्री मुनि धारण करते हैं।
कर्मों के सकल भार को तप द्वारा वे हरते हैं॥३॥
ॐ ह्रीं श्री कर्मक्षपणतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तप सिंह निष्क्रीड़ित इक शत सतहत्तर दिन का होता।
इनमें इक शत पैतालिस उपवास सदा ही होता ॥
बाकी बत्तीस दिवस हैं पारणा सुविधि के उत्तम।
यह अनशन तप कहलाता मुनिवर करते हैं बिन श्रम ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री सिंहनिष्क्रीड़िततपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
सर्वतोभद्र तप इक शत दिन का होता है पावन।
उपवास पचत्तर होते पच्चीस पारणा के दिन ॥
इसकी विधि सहज ज्ञानमय जिन-आगम ने बतलाई।
यह अनशन तप कहलाता जो है पवित्र सुखदाई ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्रतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तप महासर्वतोभद्र दो सौ पैंतालिस दिन के।
उपवास इक शत छयानवे पारणा उनन्चास दिन के॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥६॥
ॐ ह्रीं श्री महासर्वतोभद्रतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
लघु निष्क्रीड़ित तप अस्सी दिन के महान होते हैं।
पारणा बीस होती हैं उपवास साठ होते हैं॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥७॥
ॐ ह्रीं श्री लघुनिष्क्रीड़िततपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
चौंतीस दिवस का मुक्तावलि तप है बहु सुखकारी।
उपवास पच्चीस पारणा नौ होते हैं दुखहारी॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री मुक्तावलितपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तप कनकावली वर्ष इक उपवास बहत्तर जानो।
प्रति मास करो छह उत्तम निज का स्वरूप पहिचानो॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री कनकावलितपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
विधि से तप करो सुदर्शन दिन अड़तालीस प्रमाणो।
चौबीस पारणा चौबीस उपवास श्रेष्ठ हैं जानो॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
यह तप उत्कृष्ट सुपावन उपवास इक वर्ष जानो॥
इसके हैं भेद अनेकों आगम पढ़ कर पहिचानो॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥११॥
ॐ ह्रीं श्री उत्कृष्टतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
आचाम्ल सुतप अतिपावन इक शत-उन्नीस दिनों के।
उपवास बताये इक शत पारणा उन्नीस दिनों के॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अनशन तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री आचाम्लतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जितनी हो भूख उदर में उससे कम ही लो भोजन।
तप अवमौदर्य यही है धारण करते हैं मुनिजन॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह दूजा तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री अवमौदर्यतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तप वृत्तिपरिसंख्यान इस विधि से भोजन लेंगे।
विधि नहीं मिली तो इस दिन भोजन हम कभी न लेंगे॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह तीजा तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री वृत्तिपरिसंख्यानतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
रसपरित्याग तप सुन्दर जिह्वा इन्द्रिय वश करता।
क्रम-क्रम पाँचों रस तजने वाला मुनि भवदुख हरता॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह चौथा तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री रसपरित्यागतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
यह विविक्त शैय्यासन तप उर को बहु सुदृढ़ बनाता।
भू शोध भिन्न आसन कर मुनि तप से बहुसुख पाता॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह पंचम तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री विविक्तशैय्यासनतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. ।
तप कायक्लेश अति उत्तम आनंद प्रदाता मानो।
तन को कृश करते मुनिवर होता है खेद न मानो॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह षष्टम तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री कायक्लेशतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. ।
दूषण प्रमादवश जो हो श्रीगुरु को बतलाते हैं।
प्रायश्चित्त दंड सुगुरु दे तो पाकर हर्षाते हैं॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह सप्तम तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री प्रायश्चित्ततपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जो देव धर्म गुरु थानक विनयित वंदन करते हैं।
अतिशय या सिद्धक्षेत्र प्रति उर विनय भाव धरते हैं॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह अष्टम तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री विनयतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जो मुनि थक जाते अथवा वे रोगी हो जाते हैं।
तप वैय्यावृत्ति पाल मुनि बहु साता पहुँचाते हैं॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह नवमा तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री वैय्यावृत्तितपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जिनध्वनि सुन हर्षित होना तप स्वाध्याय नित करना।
आम्नाय पाल कर अपनी अज्ञान सर्वथा हरना॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह दशवाँ तप है पावन यह करके भवदुख हरना॥२१॥
ॐ ह्रीं श्री स्वाध्यायतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
तन से ममत्व के त्यागी व्युत्सर्ग सुतप के धारी।
निज आत्मा में स्थिर रहते हो जाते मुनि अविकारी॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह तप ग्यारहवाँ पावन यह करके भवदुख हरना॥२२॥
ॐ ह्रीं श्री व्युत्सर्गतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
मन-वच-काया को थिर कर एकाग्रचित्त होते हैं।
परभाव तज देते हैं तप ध्यानरूप होते हैं॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
यह तप बारहवाँ पावन यह करके भवदुख हरना॥२३॥
ॐ ह्रीं श्री ध्यानतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
द्वादश तप धारण करके सम्यक् प्रकार से पालो।
तप से कर्मों को क्षय कर निज सिद्ध स्वपद ध्रुव पा लो॥
जिन-आगम में जो विधि है उस ही विधि से तप करना।
ये पावन हैं तप द्वादश इनको कर भवदुख हरना॥२४॥
ॐ ह्रीं श्री द्वादशउत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जयमाला
(छंद-गीत)
ज्ञान की पवन चली पाया भेद ज्ञान।
समकित पाया किया निज श्रद्धान॥
पाया है स्वरूपाचरण पावन पवित्र, ।
किया क्षय तीनों ही कषाय का वितान॥
संयम की आभा पायी उर में विशाल।
निर्ग्रंथ पद पाया हर्ष है महान॥
हुआ मैं अनिच्छुक सदैव के लिए।
चौबीसों परिग्रह त्यागे तप ले प्रधान॥
छठे सातवें का मिला झूला तत्काल।
धर्मध्यान करके लिया फिर शुक्लध्यान॥
ध्यान द्वारा पाया यथाख्यात चारित्र।
घातिया विनाश पाया मैंने पूर्ण ज्ञान॥
योग क्षीण करते ही पाया सिद्ध पद।
मैंने आज पा ही लिया पद निर्वाण॥
भाव तप मैंने धारा तत्त्व ज्ञान कर।
तप फल निर्जरा का पा लिया विहान॥
(दोहा)
पूर्ण अनिच्छुक तपस्या का फल है निर्वाण।
यही भावना है प्रभो करूँ आत्मकल्याण॥
आशीर्वाद
(छंद-सोरठा)
निश्चय तप का भाव उर में जागा हे प्रभो।
परम सुख के हेतु सम्यक् तप ही मैं करूँ॥
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपधर्माङ्गाय नमः।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Uttam_Tap_Dharm_Pujan.pdf (23.1 MB, 20 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51123।