श्री उत्तम संयम धर्म पूजन
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स्थापना
(छंद-रोला)
भाव द्रव्य संयम की शोभा से हो सज्जित।
राग-द्वेष मोहादि भाव से होकर लज्जित॥
करूँ शुद्ध आत्मा से ही प्रभु अपना परिचय।
उत्तम संयम व्रत धारूँ मैं है दृढ़ निश्चय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्ग अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्ग अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्ग अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टक
(छंद-चौपाई)
पूर्ण देश संयम जल धारा। क्षय करती है भव दुखकारा॥
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
पूर्ण देश संयम का चंदन। भव ज्वर नाशक ताप निकंदन।
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय क्रोधकषाय विनाशनाय चंदनं नि.।
पूर्ण देश संयम के अक्षत। दाता है अक्षयपद शाश्वत।
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मानकषाय विनाशनाय अक्षतं नि.।
पूर्ण देश संयम स्व-ध्यानमय। शुद्ध भाव की धूप धर्ममय।
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय विभावपरिणति विनाशनाय धूपं नि.।
पूर्ण देश संयम फल पाऊँ। महामोक्ष फल ध्रुव प्रगटाऊँ।
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्ताय फलं नि.।
पूर्ण देश संयम के पावन। अर्घ्य बनाऊँ मैं मन-भावन।
उत्तम संयम भवदुखहारी। सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं नि.।
पूर्णदेश संयम कुसुमांजलि । कामबाण नाशक भावांजलि ।
उत्तम संयम भवदुखहारी । सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मायाकषाय विनाशनाय पुष्पं नि. ।
पूर्ण देश संयम उर लाऊँ । निज अनुभव रस सुचरु बनाऊँ ।
उत्तम संयम भवदुखहारी । सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय लोभकषाय विनाशनाय नैवेद्यं नि. ।
पूर्णदेश संयम ज्योतिर्मय । मोह विनाशक दीप स्वसुखमय ।
उत्तम संयम भवदुखहारी । सिद्ध स्वपद दाता सुखकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि. ।
अर्घ्यावलि
(छंद-सार/जोगीरासा)
भूमि काय की दया पालने के उर भाव जगाऊँ।
कुआ ताल खाई न खुदाऊँ निर्मलता उर लाऊँ॥
पृथ्वीकायिक की रक्षा हो पंचेन्द्रिय मन कर वश ।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
बिन छना जल कभी न वरतूँ छना हुआ वरतूँ जल।
नदी ताल आदिक न बनाऊँ व्यर्थ न ढोलूँ मैं जल॥
जलकायिक की रक्षा हो पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री जलकायिकजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
अग्नि कभी भी नहीं जलाऊँ करुणा उर में धारूँ।
नहीं बुझाऊँ अग्नि कभी भी जीव-दया उर धारूँ॥
अग्निकाय की रक्षा हो प्रभु पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥३॥
ॐ ह्रीं श्री अग्निकायिकजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
पंखा आदिक नहीं करूँ मैं जीव दया उर धारूँ।
महा ग्रीष्म हो तो भी स्वामी शीतलता उर धारूँ॥
वायुकाय की रक्षा के हित पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री वायुकायिकजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
बाग-बगीचा नहीं लगाऊँ फूल-पात नहिं तोडूँ।
हरितकाय की दया विचारूँ निज से नाता जोडूँ॥
काय वनस्पति रक्षा हो प्रभु पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
इल्ली जोंक गिंडोला आदिक सबको निजसम जानूँ।
दया-भाव इनके प्रति रखकर दया-धर्म पहिचानूँ॥
दो इन्द्रिय की रक्षा हो प्रभु पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
कुन्थु लीक खटमल चिंटी आदिक की दया विचारूँ।
दयाभाव हो इनके प्रति प्रभु दया धर्म उर धारूँ॥
त्रय इन्द्रिय की रक्षा हो प्रभु पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री त्रीन्द्रियजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
मक्खी भौंरा टिड्डी मच्छर जीव सभी हैं जानूँ।
पूर्ण-दया इनके प्रति रक्खूँ सबको प्राणी मानूँ॥
चउ इन्द्रिय की रक्षा हो प्रभु पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जीव असैनी विविध जगत में जलचर सर्पादिक हैं।
दयाभाव इनके प्रति हो प्रभु ये भी बहुत अधिक हैं॥
रक्षा असैनी पंचेन्द्रिय की पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री असंज्ञीपंचेन्द्रियजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
सुर नर नारक पशु संज्ञी सब जीव अनंतों जग में।
इनके प्रति भी दया हृदय हो जाऊँ नहीं भव-मग में॥
संज्ञी जीवों की रक्षा कर पंचेन्द्रिय मन वश कर।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री संज्ञीपंचेन्द्रियजीवरक्षणरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
स्पर्शन इन्द्रिय को जीतूँ विषय भाव निरवारूँ।
शीत ऊष्ण की चाह न जागे निज की ओर निहारूँ॥
काय छहों प्रतिपालक होऊँ पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस॥११॥
ॐ ह्रीं श्री स्पर्शनेन्द्रियविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
रसना इन्द्रिय के सुत पांचों के वश होऊँ न स्वामी।
पाँचों अधोगति के कारण तुम जानत अन्तर्यामी॥
रसना इन्द्रिय जीतूँ प्रभुजी पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री रसनेन्द्रियविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
घ्राणेन्द्रिय के सुत दो ही हैं महादुष्ट दुखदायी।
इनको जय करने की सुध-बुध जागी है सुखदायी॥
घ्राणेन्द्रिय को पूरा जीतूँ पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री घ्राणेन्द्रियविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
नेत्रेन्द्रिय के सुत पाँचों हैं घोर महादुख दाता।
इनके वश में होकर प्राणी रंच नहीं सुख पाता॥
इन्द्रिय चक्षु सदा को जीतूँ पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री चक्षुरिन्द्रियविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
कर्णेन्द्रिय के वश में होकर वचन शुभाशुभ भाते।
सप्त स्वरों के वाद्य सुहाते जो भव मध्य भ्रमाते ॥
कर्णेन्द्रिय को पूरा जीतूँ पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री कर्णेन्द्रियविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
बंदर जैसा यह मन चंचल इसकी गति है न्यारी।
तूफानों से तेज दौड़ता देता है दुख भारी ॥
मनकपि को वश में करने को पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री मनविषयवर्जनरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
सब जीवों पर समता धारूँ समभावी हो जाऊँ।
तप संयम करने की इच्छा को साकार बनाऊँ॥
आर्त्त-रौद्र भावों के क्षयहित पंचेन्द्रिय मन कर वश।
उत्तम संयम धर्म संवारूँ निज का ध्यान करूँ बस ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री सामायिकरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
यदि प्रमादवश संयम में कुछ दोष लगे तो स्वामी।
प्रायश्चित ले उन्हें निवारूँ सुन लो अन्तर्यामी॥
छेदोपस्थापन संयम हो मुनिपद सार्थक हो प्रभु।
उत्तम संयम धर्म धार कर निज को ही ध्याऊँ प्रभु ॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री छेदोपस्थापनारूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
विविध ऋद्धियाँ भी हों तो प्रभु उनको नहीं निहारूँ।
दोष रहित हो गमन करूँ नित आत्म स्वरूप सवारूँ॥
जीवों का रक्षक है यह परिहारविशुद्धि संयम।
उत्तम संयम धर्म धार कर उर नाशूँ सर्व असंयम॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री परिहारविशुद्धिरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
सर्व कषायें क्षय होतीं पर लोभ अल्प रह जाता।
क्षायिक श्रेणी है पर थोड़ा समय शेष रह जाता॥
सूक्ष्मसांपराय संयम भाऊँ भव-भावों से रीतूँ।
उत्तम संयम धर्म धार उर पंचेन्द्रिय मन जीतूँ॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मसाम्परायरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
यथाख्यात चारित्र सजा कर मोह सर्वथा नाशूँ।
केवलज्ञान लब्धि उर पाऊँ पद सर्वज्ञ प्रकाशूँ॥
यथाख्यात संयम की महिमा निज अंतर में धर लूँ।
उत्तम संयम धर्म धार उर चारों गति दुख हर लूँ॥२१॥
ॐ ह्रीं श्री यथाख्यातरूप संयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
इसप्रकार बहु विधि संयम है मुनि बन संयम धारूँ।
सर्वकषाय भाव को जीतूँ भव संकट निरवारूँ॥
मोक्ष प्राप्ति का साक्षात कारण संयम ही मैं धारूँ।
भावलिंग का वैभव पाकर निज को पार उतारूँ॥२२॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.।
जयमाला
(छंद-ताटंक)
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है।
सम्यक् दर्शन ज्ञान पूर्वक जो संवर है संयम है॥
सम्यक्दर्शन बिना मोक्ष का होता सच्चा लक्ष्य नहीं।
सम्यक् दर्शन बिना आत्मा हो सकता प्रत्यक्ष नहीं॥
सम्यक् दर्शन बिना आत्मा हो सकता है दक्ष नहीं।
सम्यक् दर्शन की भू पाए बिन व्रत रूपी वृक्ष नहीं॥
समकित बिन चारित्र व्यर्थ है व्यर्थ यम नियम संयम है।
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है॥
संयम के बिन भव का प्राणी हो सकता है मुक्त नहीं।
संयम बिन कैवल्य लक्ष्मी से हो सकता युक्त नहीं॥
संयम के बिन कर्म नाश हों ऐसी कोई युक्ति नहीं।
संयम के बिन पूर्ण शुद्धि हो ऐसी कोई शक्ति नहीं॥
सप्त प्रकृति से रहित जीव को क्षायिक अथवा उपशम है।
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है॥
षट्कायक की रक्षा करना पंचेन्द्रिय मन वश करना।
विषय शत्रु से सावधान हो निज स्वरूप में ही चरना॥
नर्क स्वर्ग पशुगति में दुर्लभ सो संयम उर में धरना।
नर तन पाकर भी यदि चूके तो भव कूप बीच गिरना॥
बिना आत्मा की प्रतीति के बाकी सभी असंयम है।
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है॥
जब संयम की बजे बांसुरी तभी धन्य यह नरतन है।
जब संयम के घुंघरू छनकें तभी धन्य यह जीवन है ॥
जब संयम की जगे रागिनी लगे आंत्मा की धुन है।
निज संयम की शहनाई की लय में ज्ञानी तन्मय है॥
दुर्लभ आत्म बोधि पाने का यही एक सच्चा क्रम है।
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है॥
चरितमोह वश लेश न संयम समकित धारी अव्रती।
एकदेश संयम का धारी कहलाता है देशव्रती॥
पूर्णदिश संयम का धारी कहलाता है महाव्रती।
यथाख्यातचारित्र पूर्ण पा होता है सर्वज्ञ यती॥
देव इन्द्र अहमिन्द्र तरसते हमें सुलभ यह हरदम है।
अन्तरंग बहिरंग आस्रव से निवृत्ति ही संयम है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय जयमाला पूर्णार्घ्यं नि.।
आशीर्वाद
(छंद-सोरठा)
संयम धर्म महान जो भी धारे भाव से।
पाएगा निर्वाण जिन प्रभु की कथनी यही॥
इत्याशीर्वादः
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय नमः।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Uttam_Sanyam_Dharm_Pujan.pdf (24.9 MB, 19 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/25848।