श्री उत्तमक्षमा धर्मांग पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Uttam Kshama Dharmang Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री उत्तमक्षमा धर्मांग पूजन

रचयिता: कवि राजमल पवैया

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स्थापना
( छन्द-रोला )

उत्तम क्षमा महान भाव, सहित पूजन करूँ।
क्रोध कषाय विनष्ट करूँ स्वयं की शक्ति से॥
निर्मल सहज स्वभाव प्राप्त करूँ मैं हे प्रभो।
क्रोध न हो उत्पन्न ऐसा ही श्रम नित करूँ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग!
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग!
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग!
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अष्टक

( छन्द-मानव )

प्रभु उत्तम शान्ति प्रदाता जल लाऊँ क्षीरोदधि सम।
अभिषेक रचा निज होऊँ त्रय रोग नाश में सक्षम॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म का शीतल चंदन उर लाऊँ।
भव-ताप निवारण करके आनंद अतीन्द्रिय पाऊँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय क्रोधकषायविनाशनाय
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के अनियारे अक्षत लाऊँ।
निज अक्षय पद पाने को निज शुद्धात्मा ही ध्याऊँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय मानकषायविनाशनाय
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के नव कुसुम शीलमय लाऊँ।
कामाग्नि नाश करने को अपना स्वरूप ही ध्याऊँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय मायाकषायविनाशनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के नैवेद्य भावमय लाऊँ।
परिपूर्ण तृप्ति पाने को अपना स्वभाव ही ध्याऊँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय लोभकषायविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के दीपक उर में उजियारूँ।
मोहान्धकार के क्षय हित मिथ्यात्व तिमिर निरवारूँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय मोहान्धकारविनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म की निज ध्यान धूप उर लाऊँ।
आठों ही कर्म विनाशूँ परिपूर्ण ध्रौव्य सुख पाऊँ॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय विभावपरिणतिविनाशनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म का फल पाऊँ महा मोक्षमय।
संसार भाव क्षय करके पाऊँ निर्वाण सौख्यमय॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय महामोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु उत्तम क्षमा धर्म के गुण अर्घ्य बनाऊँ अनुपम।
पदवी अनर्घ्य पाने में हो जाऊँ स्वामी सक्षम॥
यह उत्तम क्षमा धर्म ही है क्रोध कषाय निवारक।
सबसे पहले इसको ही धारण करना आवश्यक॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्यावलि

( वीरछन्द )

घोर अशुभ से पाप प्रकृतियों का करता है प्राणी बंध।
थावर नामक कर्म बँधता है उदय समय होता दुख द्वंद्व॥
पृथ्वीकायिक जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

एकेन्द्रिय जलकायिक प्राणी पापोदय में दुख पाते।
महामोह मिथ्यात्व ग्रसित हो कभी न पलभर सुख पाते॥
जलकायिक जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अग्निकाय एकेन्द्रिय प्राणी बहु दुख से जलते रहते।
महापाप से पीड़ित होकर भवदधि में बहते रहते॥
अग्निकाय जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री अग्निकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पवनकाय के जीव पाप के कारण बहु संकट पाते।
ये भी एकेन्द्रिय प्राणी हैं अघ का घट भरते जाते॥
वायुकाय जीवों की रक्षा का भाव जगे उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री वायुकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

हरित वनस्पतिकायिक प्राणी एकेन्द्रिय बहु दुख पाते।
छेदन भेदन कष्ट प्राप्त कर पाप उदय मरते जाते॥
हरित वनस्पति के जीवों की रक्षा करना है उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर पाऊँ निज सुख सर्वोत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पापोदय से थावर प्राणी पाँच भेद के होते हैं।
दो हैं भेद सूक्ष्म अरु बादर जो पाँचों में होते हैं॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मस्थूलपंचस्थावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दो इन्द्रिय लट इल्ली शंख गिंडोला जोंक व कौड़ी जीव।
करुणा का सागर उर जागे रक्षा इनकी करूँ सदीव॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

बिच्छू कुंथा चिंटी खटमल पई घुन सब तेइन्द्रिय जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी रक्षा करूँ सदीव॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मकड़ी मच्छर मक्खी भँवरा बर्र आदि चतुरेन्द्रिय जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी रक्षा करूँ सदीव॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥
ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मन बिन पाँचों इन्द्रिय धारी सकल असैनी प्राणी जीव।
करुणा का सागर उर जागे इनकी रक्षा करूँ सदीव॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री असंज्ञीपंचेन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पापोदय से जीव नारकी ऊष्ण शीत बहु दुख पाते।
करुणा का सागर उर में पर क्या हम रक्षा कर पाते॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री नारकीजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पापोदय से जीव असंख्यों पशुगति पाते दुखदायी।
छेदन भेदन भार वहन की पीड़ा ही सदैव पायी॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री तिर्यंचगतिजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रोध मान माया लोभादिक वश में मनुज महा दुखिया।
राग-द्वेष-मोह के कारण कभी न हो पाया सुखिया॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री मनुष्यजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

चउ निकाय के देवों में जा जीव नहीं सुख पाता है।
मरण समय यह झूर-झूर कर रोता है बिल्लाता है॥
इन सबका दुख जान दया का भाव धरूँ उर में उत्तम।
उत्तम क्षमा धर्म धारण कर शिव सुख पाऊँ सर्वोत्तम॥

ॐ ह्रीं श्री चतुर्विधदेवजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सारे ही थावर त्रस प्राणी कर्मों के वश भ्रमते हैं।
चारों गति का भ्रमण बढ़ाते कभी न निज में जमते हैं॥
करुणा का सागर लहराता श्री मुनियों के हृदय महान।
उत्तम क्षमा धर्म उर धारूँ करूँ आत्मा का कल्याण॥

ॐ ह्रीं श्री त्रसस्थावर-समस्तजीवपरिरक्षणरूपोत्तम-
क्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

( दोहा )

उत्तम क्षमा महान ही परमोत्तम निज धर्म।
क्रोध रहित यदि हो हृदय क्षय हो सर्व अधर्म॥

( ताटंक )

वस्तु स्वयं की सदा स्वयं में मिलती आत्मध्यान द्वारा।
श्री गुरुकृपा आत्म-अनुभव से मिलती शुद्ध ज्ञान धारा॥
तत्त्वों के अभ्यास पूर्वक करो यथार्थ तत्त्व निर्णय।
फिर संकल्प-विकल्प तोड़कर निजस्वभाव का लो आश्रय॥

अब जोड़ो उपयोग आत्मा के स्वरूप से ले निज बल।
शुद्ध स्वानुभव निर्विकल्प हो साधक बन जाओ निर्मल॥
पहले की अशुद्धता जो अब टल कर हुई शुद्ध पर्याय।
अन्तर्मुख होना ही शुद्ध स्वभाव प्राप्ति का एक उपाय॥

उत्तम आर्किंचन्य

शुद्ध स्वानुभव में आनन्द अतीन्द्रिय का आता है स्वाद।
शुद्ध स्वानुभव में विकल्प का अणु भर रहता नहीं विवाद॥
हृदय कमल में सुस्थित ज्ञानानंद स्वभावी शुद्धात्मा।
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित होता है चेतन परमात्मा॥

सम्यग्दृष्टि जीव की होती सिद्ध वधू से पावन लग्न।
सुख समृद्ध रूपी ज्ञानामृत सागर में हो जाता मग्न॥
उत्तम क्षमा धर्म का पावन फल पाता है ध्रुव निर्वाण।
दश धर्मों का पालन करके हो जाता है वह भगवान॥

( दोहा )

पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ विनय सहित भगवान।
बाह्यान्तर प्रगटित करूँ उत्तम क्षमा महान॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय जयमालापूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

आशीर्वाद
( दोहा )
हो प्रभु मेरे हृदय में क्षमा धर्म का भान।
निश्चय से पालन करूँ पाऊँ पद निर्वाण॥
इत्याशीर्वादः

-: जाप्य मंत्र :-

॥ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय नमः॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51122।