श्री उत्तम आर्जव धर्मांग पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Uttam Aarjav Dharmang Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री उत्तम आर्जव धर्मांग पूजन

रचयिता: कवि राजमल पवैया

पूर्ण पाठ नीचे दिया है, मूल PDF (34 पृष्ठ) सबसे नीचे संलग्न।


स्थापना

( छन्द-कुंडलिया )

ऋजुता लाऊँ हृदय में मायाचारी छोड़।
उत्तम आर्जव धर्म से अब लूँ नाता जोड़॥
अब लूँ नाता जोड़ स्वयं से निज को ध्याऊँ।
करूँ आत्म उद्धार स्वयं की महिमा पाऊँ॥
अन्तर्मन को निर्विकार कर पाऊँ समता।
परम मोक्ष सुख पाने को उर धारूँ ऋजुता॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जवधर्मांग!
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जवधर्मांग!
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जवधर्मांग!
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अष्टक
( छन्द-गीतिका )
साम्यभावी शुद्ध जल ही परम शुचिमय सुखमयी।
त्रिविध रोग विनाश करता पूर्णतः है भवजयी॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय जन्म-जरा-मृत्यु-
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी सहज चंदन नहीं पाया आज तक।
भवातप ज्वर भी न क्षय हो सका है प्रभु आज तक॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय क्रोधकषायविनाशनाय
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध अक्षत हैं अनंतों गुणमयी।
स्वपद अक्षय आत्म-अनुभवमयी है भवदुखजयी॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय मानकषायविनाशनाय
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध पुष्प महान लाना है मुझे।
शीलगुण की महामहिमा शीघ्र पाना है मुझे॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय मायाकषायविनाशनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध रसमय ज्ञान चरु अनुभवमयी।
क्षुधारोग विनष्ट करते तृप्ति देते शिवमयी॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय लोभकषायविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध दीपक ज्योति निज जगमग मिले।
मोहतम का नाश हो प्रभु ज्ञान केवल उर झिले॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय मोहान्धकारविनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध उत्तम धूप पावन ध्यानमय।
अष्टकर्म विनाश करती सौख्यप्रद निर्वाणमय॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय विभावपरिणतिविनाशनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी भावना के फल महान प्रसिद्ध हैं।
मोक्षफल देते सदा को अरु बनाते सिद्ध हैं॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय महामोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

साम्यभावी शुद्ध अर्घ्य अपूर्व लाऊँ सजा कर।
पद अनर्घ्य महान पाऊँ ज्ञान वीणा बजा कर॥
धर्म उत्तम आर्जव ही परम श्रेष्ठ महान है।
छल कपट माया रहित है सौख्य हेतु प्रधान है॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्यावलि
( छन्द-चौपाई )
दोष अठारह रहित महंत। छयालीस गुण पति अरहंत॥
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री छियालीस गुणसहित जिनचरणनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जीवनमुक्त श्री अरहंत। कुटिल भाव मैं तजूँ तुरंत।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीवअरहन्तपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अष्टकर्म हर हुए प्रसिद्ध। त्रिलोकाग्र पर राजे सिद्ध।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पैंतालीस लाख योजन। विस्तृत सिद्धशिला पावन।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री सिद्धशिलास्थितमुक्तात्मपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

धारक गुण छत्तीस विराट। श्री आचार्य संघ सम्राट।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री आचार्य स्वगुण भंडार। पालन करते पंचाचार।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदपरोक्षनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उपाध्याय के गुण पच्चीस। ग्यारह अंग पूर्व मिल ईश।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मुनियों के शिक्षक ऋषिराज। उपाध्याय श्री हैं मुनिराज।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदपरोक्षनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अट्ठाईस मूलगुण धार। मुनिव्रत धार हुए अविकार।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री साधुपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समिति महाव्रत आवश्यक। पंचेन्द्रिय वश गुण नायक।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री जिनमुनिपरोक्षपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दिव्यध्वनि माँ जिनवाणी। स्वपर प्रकाशक कल्याणी।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री जिनवाणीनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जन्म आदि चार कल्याण। ये ही अतिशय क्षेत्र महान।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जिस थल से मुनि होते सिद्ध। सिद्ध क्षेत्र वे जगत प्रसिद्ध।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अकृत्रिम जिनबिम्ब महान। प्रातिहार्य वसु शोभावान।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जग में जो कृत्रिम जिनबिंब। उनमें निरखूँ निज प्रतिबिंब।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥

ॐ ह्रीं श्री कृत्रिमजिनचैत्यपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

इत्यादिक जिन क्षेत्र अनेक। पूज्य जान वन्दूँ प्रत्येक।
सरल भाव से करूँ नमन। आर्जव धर्म धरूँ पावन॥
ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदनमनार्जवधर्माङ्गाय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
( छन्द-ताटंक )

शुद्धभाव परिणमन न हो तो फिर व्यवहार नहीं कारण।
निश्चय बिन व्यवहार न होता शिवपथ में पलभर साधन॥
आत्मज्ञान से रह सुदुर जो मुनि पद धारण करता है।
केवल ग्रीवक तक जाता है आत्मीय सुख हरता है॥

निर्मल आत्म-भावना के बिन सम्यग्दर्शन कभी नहीं।
निरतिचार व्रत भी पालन हो तो भी शिवपथ कभी नहीं॥
इसीलिए सम्यग्दर्शन का उद्यम करना श्रेष्ठ प्रधान।
इसके बिन अज्ञान दशा का होता कभी नहीं अवसान॥

जो अनादि अज्ञान नाशकर शुद्ध ज्ञान का पाता अंश।
वही जीव पुरुषार्थ शक्ति से करता कर्मों को निर्वंश॥
शुद्ध भाव ही उपादेय है पूर्ण हेय है आस्रव भाव।
आस्रव भाव नाश कर निरखो आर्जवधर्मी शुद्ध स्वभाव॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्माङ्गाय जयमालापूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

आशीर्वाद
( छन्द-सोरठा )

आर्जव धर्म महान मैंने पूजा भाव से।
पाऊँ ऋजुता पूर्ण जुड़कर आत्मस्वभाव से॥
इत्याशीर्वादः

-: जाप्य मंत्र :-

॥ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जवधर्मांगाय नमः॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51111।

खोज: Shri Uttam Arjav Dharmang Pujan