तीर्थराज सम्मेदाचल जय शाश्वत तीर्थ क्षेत्र जय जय ।
मुनि अनंत निर्वाण गये हैं पाया सिद्ध स्वपद शिवमय ।।
अजितनाथ, संभव, अभिनन्दन, सुमति, पद्म प्रभु मंगलमय ।
श्री सुपार्श्व चन्दा प्रभु स्वामी पुष्पदन्त शीतल गुणमय ।।
जय श्रेयान्स विमल, अनंत प्रभु धर्म, शान्ति जिन कुन्थसदय ।
अरह, मल्लि, मुनिसुव्रत स्वामी नमिजिन, पार्श्वनाथ जय जय ।।
बीस जिनेश्वर मोक्ष पधारे इस पर्वत से जय जय जय ।
महिमा अपरम्पार विश्व में तीर्थराज की जय जय जय ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ट तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
अगणित सागर पी डाले पर प्यास न कभी बुझा पाया ।
अनुपम सुखमय निर्मल शीतल समता जल पीने आया ।।
तीर्थराज सम्मेदशिखर की पूजन कर उर में हर्षाया ।
बीस तीर्थंकर की यह निर्वाण भूमि लख सुख पाया ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर भावों के संतापों में उलझ उलझ अति दुःख पाया ।
ज्ञानानन्दी शुद्ध स्वभावी निज चंदन लेने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
निज चैतन्यरूप को भूला पर ममत्व में भरमाया ।
अक्षय चेतन पद पाने को चरण शरण में मैं आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर द्रव्यों से राग-हटाने का पुरुषार्थ न कर पाया ।
शील स्वभाव शान्तपाने को काम नाश करने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
तीन लोक का अन्न प्राप्तकर भूख न कभी मिटा पाया ।
क्षुधाव्याधि का रागनशाने निज स्वभाव पाने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मोह तिमिर के कारण अब तक सम्यक्ज्ञान नहीं पाया ।
आत्मदीप की ज्योति जगाने भेद ज्ञान करने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
आत्मध्यान बिन भव की भीषण ज्वाला में जल दुःख पाया ।
अष्टकर्म सम्पूर्ण जलाने ध्यान अग्नि पाने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पुण्य फलों में तीव्र राग कर सदा पाप ही उपजाया ।
पाप-पुण्य से रहित शुद्ध परमातम पद पाने आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
है अनादि भव रोग न इसकी औषधि अब तक कर पाया ।
निज अनर्घ पद पाने का अब तो अपूर्व अवसर आया ।।तीर्थराज।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
सम्मेदाचल शीश से तीर्थंकर मुनिराज ।
सिद्ध हुए सम श्रेणी में ऊपर रहे विराज ।।
प्रभु चरणाम्बुज पूज कर धन्य हुआ मैं आज ।
भाव सहित वन्दन करूँ निज शिव सुख के काज ।।
जय जय शाश्वत सम्मेदाचल तीर्थ विश्व में श्रेष्ठ प्रधान ।
भूत भविष्यत् वर्तमान के तीर्थंकर पाते निर्वाण ।।
परम तपस्या भूमि सुपावन है अनन्त मुनिराजों की ।
सुपवित्र निर्वाण धरा है यह महान् जिनराजों की ।।
लक्ष लक्ष वृक्षों की हरियाली से पर्वत शोभित हैं ।
वातावरण शान्तमय सुन्दर लखकर यह जग मोहित है ।।
शीतल अरु गन्धर्व सलिल निर्झर जल धारायें न्यारी ।
भाँति-भाँति के पक्षीगण करते हैं कलरव मनहारी ।।
पर्वत पारसनाथ मनोरम यह सम्मेदशिखर अनुपम ।
भाव सहित जो बन्दन करते उनका क्षय होता भ्रमतम ।।
बीस टोंक पर बीस तीर्थंकर के चरण चिह्न अभिराम ।
शेष टोंक पर चार जिनेश्वर श्री मुनियों के चरण ललाम ।।
प्रथम टोंक है कुन्थनाथ की प्रातः रवि बन्दन करता ।
अन्तिम पार्श्वनाथ प्रभु की है संध्या सूर्य नमन करता ।।
कूट सिद्धवर अजितनाथ का धवलकूट सुमतिजिनका ।
अभिनन्दन आनन्दकूट जय अविचलकूट सुमतिजिन का ।।
मोहनकूट पद्मप्रभु का है प्रभु सुपार्श्व का प्रभासकूट ।
ललितकूट चंदाप्रभु स्वामी पुष्पदन्त जिन सुप्रभुकूट ।।
विद्युतकूट श्री शीतलजिन श्रेयान्स का संकुलकूट ।
श्री सुवीरकुलकूट विमलप्रभुनाथ अनन्त स्वयंभूकूट ।।
जय प्रभु धर्म सुदत्तकूट जय शांति जिनेश कुन्दप्रभुकूट ।
कुटज्ञानधर कुन्थनाथ का अरहनाथ का नाटक कूट ।।
संवरकूट मल्लि जिनवर का, निर्जरकूट मुनि सुव्रतनाथ ।
कूट मित्रधर श्री नमि जिनका स्वर्णभद्र प्रभु पारसनाथ ।।
सर्व सिद्धवर कूट आदि प्रभु वासुपूज्य मन्दारगिरि ।
उर्जयन्त है कूट नेमि प्रभु सन्मति का महावीर श्री ।।
चौबीसों तीर्थंकर प्रभु के गणधर स्वामी सिद्ध भगवान् ।
गणधर कूट भाव से पूजूँ मैं भी पाऊँ पद निर्वाण ।।
बीसकूट से बीस तीर्थंकर ने पाया पद मोक्ष महान् ।
इसी क्षेत्र से तो असंख्य मुनियों ने पाया है निर्वाण ।।
भव्य गीत सम्यक्दर्शन का सहज सुनाई देता है ।
रत्नत्रय की महिमा का फल यहाँ दिखाई देता है ।।
सिद्ध क्षेत्र है तीर्थ क्षेत्र हैं पुण्य क्षेत्र है अति पावन ।
भव्य दिव्य पर्वतमालायें ऊँची नीची मन भावन ।।
मधुवन में मन्दिर अनेक हैं भव्य विशाल मनोहारी ।
वृषभादिक चौबीस जिनेश्वर की प्रतिमाएँ सुखकारी ।।
नन्दीश्वर की सुन्दर रचना श्री बाहुबली के दर्शन ।
ऊँचा मानस्तम्भ सुशोभित पार्श्वनाथ का समवसरण ।।
पुण्योदय से इस पर्वत की सफल यात्रा हो जाये ।
नरक और पशुगति का निश्चित बंध नहीं होने पाये ।।
मैं सम्यक्त्व ग्रहण कर प्रभु कब तेरह विधि चारित्र धरूँ ।
पंच महाव्रत धार साधु बन इस भू पर निर्भय विचरूँ ।।
सम्यक्दर्शन ज्ञान चारित्र तप आराधना चार चितधार ।
शुद्ध आत्मा अनुभव से नित प्रति हो स्वरूप साधना अपार ।।
नित द्वादश भावना चिन्तवन करके दृड़ वैराग्य धरूँ ।
भेद ज्ञान कर पर परणति तज निज परणति में रमण करूँ ।।
इसी क्षेत्र से महामोक्ष फल सिद्ध स्वपद को मैं पाऊँ ।
अष्टकर्म को नष्ट करूँ मैं परम शुद्ध प्रभु बन जाऊँ ।।
मन वच काया शुद्धि पूर्वक भाव सहित की है पूजन ।
ये संसार भ्रमण मिट जाए हे प्रभु! पाऊँ मुक्ति गगन ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री सम्मेदशिखर का दर्शन-पूजन जो जन करते हैं ।
मुक्तिकन्त भगवंत सिद्ध बन भव सागर से तरते हैं ।।
इत्याशीर्वादः
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २९८ से ३०१