श्री स्वर्णपुरी सोनगढ़ पूजन | Shri Swarnapuri Songarh Pujan

श्री स्वर्णपुरी सोनगढ़ पूजन

(तर्ज – कुण्डलपुर की धूल सर लगाने आया हूँ…)
सोनगढ़ की साधना भूमि में आया हूँ ।
अपने आतम देव को जगाने आया हूँ ।।
सीमंधर भगवान की मुद्रा बड़ी प्यारी है ।
वैदेही भगवान की आभा ही न्यारी है ।।
मानस्तंभ देखते ही मान गलता है ।
परमागम मंदिर से प्रभु ज्ञान मिलता है ।।
पंचमेरु दर्शन से निज दर्शन होते हैं ।
नंदीश्वर के अर्चन से आनंद झरते हैं ।।
समवशरण मंदिर में मन शान्त होता है ।
कुन्दकुन्द के दर्शन कर मन नाच उठता है ।
आत्म के आराधकों की भूमि न्यारी है ।
गूंजती गुरुदेव की जहाँ वाणी प्यारी है ।।
ऐसी पावन भूमि के दर्शन को आया हूँ ।
सोनगढ़ की साधना भूमि में आया हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित सीमंधर महावीर स्वामी आदि समस्त जिनबिम्ब समूह !
जिनागम अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्ब समूह ! जिनागम अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
ॐ हीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्ब समूह ! जिनागम अत्र मम सन्निहितो भव
भव वषट् । पुष्पांजलिं क्षिपामि ।
(मानव छंद)
भगवान आत्मा हूँ मैं, समझे बिन मोह न जाता ।
गुरुदेव गर्जना सुनकर, आतम का गौरव आता ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, जल से हे अर्न्तयामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।

पर्याय-दृष्टि से जिनवर, पग-पग पर कष्ट उठाये ।
दी द्रव्य-दृष्टि गुरुवर ने, दिन मंगलमय अब आये ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिनतीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, चंदन चरचूँ अभिरामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
चारों गतियों में रहकर, ज्ञायक प्रभु रहता न्यारा ।
ज्यों कमल कीच अस्पर्शित, चेतन त्यों जाननहारा ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, अक्षत अर्पित अभिरामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
चैतन्य ब्रह्म की चर्चा, में मन इतना रम जाता ।
विषयों की बातें छोड़ो, जहाँ दिवस याद न आता ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, सुमनों से अन्तर्यामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
शुभ-अशुभ अखाद्य बताके, ज्ञानामृत भोज बताये ।
आनंद-रसामृत पीने, समरस के स्रोत झराये ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, नेवज अर्पित जगनामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा
प्रभु तत्त्व ज्ञान-दीपक से, शुद्धात्म भान कराया ।
क्रमबद्ध नियत सब परिणति, से यहीं मोक्ष दिखलाया ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, ले दीप जजूँ अभिरामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
जड़कर्म न सुख-दुख देते, पर परिणति असर न डाले ।
ध्यानाग्नि जलाये अमंगल, निज ध्येय के धर्म निराले ।।
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, ले धूप जजूँ अभिरामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
(110)

नवतत्त्वों में भी रहकर, नव तत्व रूप न होता ।
चैतन्य तत्त्व आराधन, शाश्वत मुक्ती फल देता ॥
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, शिवफल पाऊँ जगनामी ॥
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्व॑पामीति स्वाहा ।
हूँ समयसार परमातम, परमागम से पहचानूँ ।
कभी शुद्ध पक्ष नहिं आया, पक्षातिक्रांत अब जानूँ ॥
चिन्मात्र परम ज्योतिर्मय, हूँ शाश्वत देव निरंजन ।
निज गुण का अर्घ्य बनाऊँ, शोभे अनर्घ जीवनधन ॥
परमागम मंदिर वन्दूँ, सीमंधर महावीर स्वामी ।
जिन तीर्थ सोनगढ़ वन्दूँ, पाऊँ अनर्घ अभिरामी ॥
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्व॑पामीति स्वाहा ।

जयमाला
(तर्ज - भावना रथ पर चढ़ जाऊँ)
सोनगढ़ जिनमंदिर आऊँ, सोनगढ़ तीरथ कर आऊँ ।
सीमंधर प्रभु दर्शन करके, निज दर्शन पाऊँ ॥
हे वैदेहीनाथ आपसे, दिव्य ध्वनि सुनकर ।
कुंदकुंद ने परमागम में, रचे छंद मनहर ॥
सभी जीव भगवान आत्मा, गुण अनन्त धारी ।
अन्तरमुख अनुभव से होती, अनुभूति प्यारी ॥
आत्म बल अपना अपनाऊँ ॥ सीमंधर प्रभु …॥
प्रथम श्री सीमंधर मंदिर, अति सुंदर भगवान ।
लगते हैं विदेह से सीधे, आये दया-निधान ॥
प्रतिमा सुंदर महामनोहर, भावमयी शोभे ।
अन्तर्मुख होने को प्रेरित, करती मनमोहे ।
आत्म दर्शन मैं भी पाऊँ ॥ सीमंधर प्रभु …॥
मानस्तंभ दर्श करते ही, मानी मान गले ।
स्वाभिमान अपना आ जाये, मिथ्या मोह टले ॥

(111)

इन्द्रभूति जैसे जीवों ने, प्रभु दर्शन पाकर ।
शिष्य पाँच सौ संग दीक्षा ली, गणधर पद धरकर ।।
तीर्थ मैं भी तो हो आऊँ ।। सीमंधर प्रभु …।।
स्वाध्याय मंदिर में आके, सुनो समय का सार ।
गूंज रही गुरूदेव गर्जना, धन्य कुंद अवतार ।।
भारत के कोने-कोने से, साधर्मी आते ।
दिव्य देशना सुनते आत्मार्थी बनके जाते ।।
ध्यान-अध्ययन चित में लाऊँ ।। सीमंधर प्रभु …।।
चलो चलें परमागम मंदिर, नेत्र करें हम धन्य ।
यहाँ बोलती है दीवारें, परमागम के छंद ।।
यहीं विराजे महावीर प्रभु, वर्धमान भगवान ।
समयसार पाँचों परमागम, भरत क्षेत्र की शान ।।
ज्ञान सम्यक मैं उपजाऊँ ।। सीमंधर प्रभु …।।
ढ़ाई द्वीप में पंचमेरू हैं, यहीं दर्श कर लो ।
नंदीश्वर कब जा पाओगे, यहीं भक्ति भर लो ।।
दिव्य ध्वनि वचनामृत, पढ़ लो, टंकोत्कीर्ण हुये ।
आदिनाथ के दर्शन कर लो, प्रथम जिनेश हुये ।।
आत्म धुन में प्रभु खो जाऊँ ।। सीमंधर प्रभु …।।
जम्बूद्वीप अकृत्रिम रचना यहीं रची सुंदर ।
भव्य जनों के मनमंदिर में ज्योति जले अंदर ।।
गोम्मटेश बाहुबलि भगवन यहीं विराजे हैं ।
अति सुंदर जिन प्रतिमा लखकर भव खिर जाते हैं ।।
आत्मदर्शन पाने आऊँ - सीमंधर प्रभु …।।
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ़ स्थित समस्त जिनबिम्ब जिनागमाय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
निज स्वभाव की साधना, साधो साधक आय ।
गूँज रही गुरू गर्जना, अब भी नित सुखदाय ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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