जय सुपार्श्व प्रभु सुप्रतिष्ठ राजा के नन्दन महाविशाल ।
माँ पृथ्वी देवी के प्रिय सुत सहज स्वरूपी सदा त्रिकाल ।।
सुखदाता सुखपुंज सर्वदर्शी सुखसागर हे सत्येश ।
सकलवस्तु विज्ञाता स्वामी सिद्धानन्द सत्य विधेश ।।
आत्म शक्ति का आश्रय लेकर केवलज्ञानी आपहुए ।
वीतराग सर्वज्ञ महाप्रभु निष्कषाय निष्पाप हुए । ।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर-अवतर संवौषट्, ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठ ठ, ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्रमम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
सिंधु गंगानीर निर्मल स्वर्ण झारी में भरूँ ।
जन्म मरण विनाश कर मैं चार गति के दुख हरूँ । ।
श्री सुपार्श्व जिनेन्द्र चरणाम्बुज हृदय धारण करूँ ।
निज आत्मा का आश्रय ले ज्ञान लक्ष्मी को वरूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रायजन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. ।
मलय चंदन दाहनाशक स्वर्ण भाजन में धरूँ ।
भव भ्रमण का ताप हर मैं चार गति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।
निज स्वभाव चेतन स्वरूप मय ।
पर विभाव अज्ञान रूपमय । ।
धवल तंदुल पुंज उज्जवल शुभ्र, चरणों में धरूँ ।
अक्षय अखंड अनंत पद पा चार गति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेंद्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि. ।
पुष्पनन्दन वन सुरभिमय देव चरणों में धरूँ ।
काम ज्वर संताप हर मैं चार गति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।
सरस पावन सोहने नैवेद्य चरणों में धरूँ ।
चिर अतृप्ति सुतृप्त कर मैं चार गति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।
ज्ञान दीपक ज्योति जगमग निज प्रकाशित मैं करूँ ।
मोहतम को सर्वथा हर चार गति के दुख हरूँ । ।श्री सुपार्श्व ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनायदीप नि ।
धर्म की दश अंग मय निज धूप अन्तर में धरूँ ।
कर्म अष्ट विनष्ट कर मैं चार मति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूप नि ।
पुण्य फल के राग की रुचि अब नहीं किंचित करूँ ।
मोक्षफल परमात्म पद पा चार मति के दुख हरूँ ।।श्री सुपार्श्व।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फल नि ।
सिद्ध प्रभु के अष्ट गुण का रात दिन सुमिरण करूँ ।
भाव अर्घ चरण चढाऊँचार गति के दुख हरूँ । ।श्री सुपार्श्व ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय नि ।
श्री पंचकल्याणक
मध्यम ग्रैवेयक विमान तज मात गर्भ अवतार लिया ।
माँ पृथ्वी देवी के सोलह स्वप्नों को साकार किया । ।
हुई नगर की सुन्दरन रचना रत्नों की बौछार हुई ।
श्री सुपार्श्व को भादव शुक्ला षष्ठी को जयकार हुई ।।१।।
निज स्वभाव शिव सुख का दाता ।
पर विभाव निज सुख का घाता ।।१।।
ॐ ह्रीं भाद्रपदशुक्लाषष्ट्यां गर्भमंगल प्राप्ताय श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि. ।
वाराणसी नगर में राज सुप्रतिष्ठ गृह जन्म हुआ ।
ऐरावत पर सुरपति प्रभु को गोदी में ले धन्य हुआ ।।
लोचन किए सहस्त्र किन्तु फिर भी लखतृप्त न हो पाया ।
ज्येष्ठशुक्ल द्वादश को जन्मोत्सव सुपार्श्व प्रभु का भाया ।।२।।
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लद्वादश्यां जन्ममंगल प्राप्ताय श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
ज्येष्ठ शुक्ल द्वादश को भाई शुद्ध भावनाएं द्वादश ।
उमड़ पड़ा वैराग्य हृदय में निज भावों में आया रस ।।
श्रीष वृक्ष के तले त्यागमय तप कल्याण हुआ भारी ।
श्री सुपार्श्व ने पंच महाव्रत धारण कर दीक्षा धारी ।।३।।
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लद्वादश्यां तपोमंगल प्राप्ताय श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि. ।
फागुन कृष्ण सप्तमी को प्रभु ज्ञान सूर्य का हुआप्रकाश ।
केवलज्ञान लक्ष्मी पाई घाति कर्म का किया विनाश ।।
पूरा लोकालोक ज्ञान में युगपत दर्पणवत झलके ।
प्रभु सुपार्श्व सर्वज्ञ हुए तुम वीतराग पथ पर चलके ।।४।।
ॐ ह्रीं फल्गुनकृष्णसप्तम्यां ज्ञान मंगलप्राप्ताय श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
फागुन कृष्णा षष्टी के दिन हुए अयोगी हे भगवान् ।
एक समय में सिद्ध शिला पर पहुँचे पा सिद्धत्व महान् ।।
गिरि सम्मेद प्रभास कूट देवों ने किया मोक्ष कल्याण ।
जयसुपार्श्व जिनराज सिद्धपद पाया स्वामीधर निजध्यान ।।५।।
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण षष्ठयां मोक्षमंगल प्राप्ताय श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
जयमाला
जय सुपार्श्व सप्तम तीर्थंकर सुगुण विभूति सर्वदर्शी ।
स्वस्तिकचिह्न विभूषित चरणाम्बुज अनुपम हृदयस्पर्शी ।।१।।
निज स्वरूप अवलंबन लेकर हुए ज्ञान भावों में लीन ।
भीषण उपसर्गों को जयकर प्रभु अरहन्त हुए स्वाधीन ।।२।।
ज्ञान ज्योति क्रीडा करती है प्रति पल केवलज्ञान से ।
ज्ञान कला विकसित होती है सहज स्वयं के भाव से । ।
पंचानवे नाथगणधर थे श्री “बलदत्त” प्रमुख गणधर ।
मुख्य आर्यिका “मीनार्या” थी श्रोतासुरनर ऋषिमुनिवर ।।३।।
केवलज्ञान प्राप्त कर तुमने आत्मतत्त्व का किया प्रचार ।
विषय कषायों के कारण जीवों का बढता है संसार ।।४।।
पंच विषय स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु कर्णेन्द्रिय के ।
इनमें लीन नहीं पा सकता सुख आनन्द अतीन्द्रिय के ।।५।।
क्रोधमान माया लोभादिक चार कषाय मूल जानो ।
तीव्र मंद के भेद जानकर इनकी गति को पहचानों ।।६।।
अनंतानुबंधी की चउ, अप्रत्यख्यानावरणी चार ।
प्रत्यख्यानावरणी चारों और संज्वलन की है चार ।।७।।
हास्य, अरति, रति, शोक, जुगुप्सा, भय, स्त्री, पुरुष, नपुं सकवेद ।
नो कषाय मिल हो जाते पच्चीस कषाय बंध के भेद ।।८।।
सम्यकदर्शन होते ही इनका अभाव होता प्रारम्भ ।
धीरे धीरे क्रमक्रम से इनका मिट जाता है सब दंभ ।।९।।
चोथै गुणस्थान में जाती अनन्तानुबन्धी की चार ।
पंचम गुणस्थान में जाती अप्रत्यखानावरणी चार ।।१०।।
षष्टम गुणस्थान में जाती प्रत्यख्यानावरणी चार ।
द्वादश गुणस्थान में जाती शेष संज्वलन की भी चार ।।११।।
नो कषाय भी इनके क्षय से हो जाती हैं स्वयं विनाश ।
सर्व कषायों के अभाव से होता निर्मल आत्म प्रकाश ।।१२।।
निष्कषाय जो हो जाता वह वीतराग जिन पद पाता ।
पूर्ण अनन्त अमूर्त्त अतीन्द्रिय अविनाशी पद प्रकटाता ।।१३।।
पूजूँचरण सुपार्श्वनाथ प्रभु नित्य आपका ध्यान करूँ ।
विषय कषाय अभाव करूँ मैं मुक्ति वधू अविराम वरूँ ।।१४।।
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
रागद्वेष कर्मों का रस है यह तो मेरा नहीं स्वरूप ।
ज्ञान मात्र शुद्धोपयोग ही एक मात्र है मेरा रूप । ।
श्री सुपार्श्व के युगल पद भाव सहित उरधार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भवपार । ।
इत्याशीर्वादः
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय नमः ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १९५ से १९९