श्री सुमतिनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Sumatinath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री सुमतिनाथ जिन पूजन

जय जय सुमतिनाथ पंचम तीर्थंकर प्रभु मंगलदाता ।
कुमतिविनाशक सुमतिप्रकाशक परमशांत जगविख्यात ।।
सहज स्वरूपी सर्वशरण सर्वार्थ सिद्ध संकट हर्ता ।
सत्य तीर्थंकर सर्वगुणाश्रित सूर्य कोटि प्रभु सुख कर्ता ।।
मैं अनादि से दुखिया व्याकुल शरण आपकी आया हूँ ।
सत्य मार्ग सत्यार्थ प्राप्ति हित भाव सुमन प्रभु लाया हूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्र अत्र अवतर अवतरसवौषट्, ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्र अत्रतिष्ठ तिष्ठ ठ ठ, ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्र अत्रमम् सन्निहितों भव भव वषट् ।

जल की निर्मलता नाथ मुझको भाई है ।
शुद्धातम को महिमा नहीं कर पाई है ।।
हे सुमतिनाथ जिनदेव सुमति प्रदान करो ।
संसार भ्रमण का मूल भ्रम अज्ञान हरो ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि

चंदन की शीतलता सदा ही भाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति. ।।२।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।

तंदुल की उज्ज्वलता हृदय को भाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति. ।।३।।

द्रव्य पर अणुमात्र भी तेरा नहीं इसलिए पर द्रव्य से मत राग कर ।
द्रव्य तेरा शुद्ध चेतन आत्म है इसलिए निज आत्म से अनुराग राग कर ।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं नि. ।

पुष्पों की सरस सुवास मन को भायी है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति. ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि ।

नित खाकर भी नैवेद्य तृप्ति न पाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति ।।५।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि ।

रत्नों की दीपक ज्योति तो दिखलाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति ।।६।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।

मन महा सुगन्धित धूप सुरभि सुहाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति ।।७।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।

अनुकूल पुण्य फल राग की रुचि भाई है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति. ।।८।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय महामोक्ष फल प्राप्ताये फल नि ।

जग के द्रव्यों को चाह, नित ही भायी है ।
शुद्धातम की महिमा नहीं कर पाई है । ।हे सुमति ।।९।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

श्री पंचकल्याणक

स्वर्ग जयन्त विमान त्यागकर मात मंगला उर आए ।
नगर अयोध्या धन्य हो गया रत्न सुरों ने बरसाए । ।
सोलह स्वप्न लखे माता ने श्रावण शुक्ल दूज भाए ।
जय जय सुमतिनाथ तीर्थंकर इन्द्रादिक सुर मुस्काए ।।१।।

ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लद्वितीया गर्भ कल्याण प्राप्ताय श्री सुमतिनाथजिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।

तीव्र राग को दुखमय समझा मंदराग को सुखमय जाना ।
पाप पुण्य दोनों बंधन हैं वीतराग का कथन न माना । ।
चैत्र शुक्ल एकादशी को प्रभु भारत भू पर आए ।
नृपति मेघ के आंगन में देवी ने मंगल गाए । ।
ऐरावत पर सुरपति तुमको गोदी में ले हर्षाए ।
जय जय सुमतिनाथ जन्मोत्सव पर जग ने बहुसुख पाए ।।२।।

ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लएकादश्या जन्मकल्याण प्राप्ताय श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय अर्घ्यं नि. ।

शुभ बैशाख शुक्ल नवमी को जगा हृदय वैराग्य महान् ।
लौकांतिक ब्रम्हर्षि सुरों ने किया स्वर्ग से आ गुणगान । ।
दीक्षित हुए सहेतुक वन में तरु प्रियंगु के नीचे आन ।
जय जय सुमतिनाथ तीर्थंकर हुआ आपका तप कल्याण ।।३।।

ॐ ह्रीं बैशाखशुक्लनवम्या तपकल्याण प्राप्ताय श्री सुमतिनाथ जिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।

बीसवर्ष छदमस्थ रहे प्रभु धारा प्रतिमा योग प्रधान ।
चैत सुदी ग्यारस को पाया शुक्ल ध्यान धर केवलज्ञान ।।
समवशरण की अनुपम रचना हुई हुआ उपदेश महान् ।
जय जय सुमतिनाथ तीर्थंकर अद्भुत हुआ ज्ञानकल्याण ।।४।।

ॐ ह्रीं चैत्रसुदीएकादश्या ज्ञान कल्याण प्राप्ताय श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।

चैत्र शुक्ल एकादशी को अष्ट कर्म का कर अवसान ।
अविचल कूट शिखर सम्मेदाचल से पाया पद निर्वाण ।।
मुक्ति धरा तक गूँज उठे देवों के सुन्दर मंजुल गान ।
जय जय सुमतिनाथ परमेश्वर अनुपम हुआ मोक्षकल्याण ।।५।।

ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लएकादश्या मोक्ष कल्याण प्राप्ताय श्री सुमतिनाथजिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

सुमतिनाथ प्रभु मुझे सुमति दो उर में निर्मल भाव जगे ।
धर्म भाव से ही मेरी नैया भव सागर पार लगे ।।१।।

निज में निज पुरुषार्थ करु तो भव बंधन सब कट जायेंगे ।
निज स्वभाव में लीन रहूं तो कर्मों के दुख मिट जायेंगे । ।
एक शतक सोलह गणधर थे मुख्य वज्र गणधर स्वामी ।
प्रमुख आर्यिका अनंतमति थी द्वादश सभा विश्वनामी ।।२।।

अहिंसादि पाँचों व्रत की पच्चीस भावनाएं भाऊँ ।
पंच पाप के पूर्ण त्याग की पाँच भावनाऐं ध्याऊँ ।।३।।

ध्याऊँ मैत्री आदि चार, प्रशमादि भावना चार प्रवीण ।
शल्य त्याग की तीन भावना, भवतनभोग त्याग की तीन ।।४।।

दर्शन विशुद्धि भावना सोलह अंतर मन से मैं ध्याऊँ ।
क्षमा आदि दशलक्षण की दश धर्म भावनाएं भाऊँ ।।५।।

अनशन आदि तपों की बारह दिव्य भावनाएं ध्याऊँ ।
अनित्य अशरण आदि भावना द्वादश नित ही मैं भाऊँ ।।६।।

ध्यान भावना सोलह ध्याऊँतत्त्व भावना भाऊँसात ।
रत्नत्रय की तीन भावना अनेकांत की एक विख्यात ।।७।।

श्रुत भावना एक नित ध्याऊँ अरु शुद्धात्म भावना एक ।
कब निर्ग्रन्थ बनूँ यह भाऊँ द्रव्य आदि भावना अनेक ।।८।।

एक शतक पच्चीस भावनाएं मैं नित प्रति प्रभु भाऊँ ।
मनवचकाय त्रियोग सँवारूँ शुद्ध भावना प्रगटाऊँ ।।९।।

इस प्रकार हो मोक्षमार्ग मेरा प्रशस्त निज ध्यान करूँ । ।
देव आपकी भाँति धार संयम निज का कल्याण करूँ ।।१०।।

चार औदयिक औपशमिक क्षायोपशमिक क्षायिक परभाव ।
इन चारों के आश्रय से ही होती है अशुद्ध पर्याय ।।११।।

इन चारों से रहित जीव का एक पारिणामिक निजभाव ।
पंचमभाव आश्रय से ही होती प्रकट सिद्ध पर्याय ।।१२।।

पंच महाव्रत पंच समिति त्रयगुप्ति त्रयोदश विधिचारित्र ।
अष्टकर्म विषवृक्ष मूल को नष्ट करूँ धर ध्यान पवित्र ।।१३।।

पंचाचारयुक्त, परके प्रपंच से रहित ध्यान ध्याऊँ ।
निरुपराग निर्दोषनिरंजन निज परमात्म तत्त्व पाऊँ ।।१४।।

पचम परम पारिणामिक से पंचमगति शिवमय पाऊँ ।
द्रव्य कर्म अरु भाव कर्म से हो विमुक्त निजगुण गाऊँ ।।१५।।

सुमतिनाथ पंचम तीर्थंकर के पद पंकज नित ध्याऊँ ।
पंच परावर्तन अभावकर सुखमय सिद्ध स्वगति पाऊँ ।।१६।।

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि ।

चकवा शोभित प्रभु चरण सुमतिनाथ उर धार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार ।।

इत्याशीर्वादः

जाप्यमंत्र" ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय नम


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १८७ से १९१