श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र पूजन | Shri Sonagir Siddh Kshetra Pujan

श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र पूजन

(दोहा)
श्री सोनागिर शीश पर, कोटि-कोटि मुनिराज ।
सिद्ध हुये सम श्रेणी में, मस्तक रहे विराज ।।
चन्द्रप्रभ भगवान का, समवशरण द्युतिवान ।
धन्य हुये भविजन अहो, सुन ज्ञायक यशगान ॥
नंग - अनंग कुमार का, धन्य हुआ अवतार ।
साढ़े पाँच करोड़ मुनि, यहीं हुये भवपार ।।
ऋद्धिधारी शुभचंद्र मुनि, के पग रज स्पर्श ।
हुई शिला सोनागिरी, इसमें क्या आश्चर्य ?
जिन मंदिर जिनवर नमूँ, मनहर दिव्य ललाम ।
परमागम मंदिर नमूँ, शोभे अति अभिराम ।।
ॐ ह्रीं श्री सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पाँच कोटि मुनि सिद्ध समूह !
अत्र अवतर अवतर । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(भुजंगप्रपात)
महाभाग्य से जिन धरम मिल गया है तो, महा मोह मिथ्या मलिनता हरूँगा ।
परम शान्त मुद्रा हृदय भा गई है, जनम अर मरण के भरम सब तजूँगा ॥
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ।।
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो जलं निर्वपामीति
स्वाहा ।
अनादि निधन वस्तुयें भिन्न-भिन्न,
सहज परिणमनशील तुम ही बताते ।
न सुख दुख का दाता जगत में है कोई,
यही शांति का मंत्र सबको सिखाते ॥
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु इन्द्र चक्रादि पद सब विनश्वर,
हैं नश्वर सभी ढ़ेर संयोग सारे ।
न करना भरोसा विषय भोग सुख का ॥
न तजना भरोसा चिदानंद का रे ।।
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्य का हो प्रभु भाव भासन,
विषयों में मन स्वप्न में भी न जावे ।
तजूँ राग नागिन विषय वासना धुन ॥
सहज ब्रह्म चिद्रूप ही मन समावे ॥
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा
सदा शांति समता का रस पान करते,
क्षुधा-वेदना तुमसे शरमा गयी है ।
परम तृप्ति पाऊँ रहे, कुछ न वांछा,
सतत स्वानुभव हो विनय प्रभु यही है ॥
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
सहज ज्ञान को प्रभु कभी भी न जाना,
सदा ज्ञेयों में ज्ञान की धुन समाई ।
कभी भी न सोचा स्वयं ज्ञानसागर,
तुम्हें पाके सम्यक मति आज जागी ॥
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पँच कोटि मुनीश्वरेभ्यो दीपं
निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभो ध्यान की अग्नि ऐसी जलाई,
फुलिंगे उड़े वो ही हैं सूर्य तारे ।
जली कर्म वंशावलि ऐसी प्रभुवर,
खिरी धर्म की धूप सर्वाङ्ग धारे ।।
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो धूपं निर्वपामीति
स्वाहा
नहीं मोक्ष फल की रही कामना अब,
परिपूर्ण परमात्म पद मन समाया ।
किससे करूँ याचना क्या कमी है ?
समयसार का सार निज में दिखाया ।।
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा, चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ॥
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये, हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ।॥
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो फलं निर्वपामीति
स्वाहा।
सजाऊँ प्रभो अर्घ्य आठों दरब ले ।
सहज भक्ति जागी मैं पूजन करूँगा ॥
न भटकूंगा संसार में अब कभी भी ।
निर्ग्रथ पथ पर ही प्रभुवर चलूंगा ।।
श्री सोनागिरि तीर्थ हम सबको प्यारा,
चंदाप्रभू जी ने जिसको श्रृंगारा ।।
नंग अर अनंग मुनीश्वर असंख्ये,
हुये सिद्ध सबको नमन है हमारा ।।
ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
सोनारी बरसी जहाँ, दिव्य ध्वनि सुखकार ।
तीर्थ यही सोनागिरि, जयवंते मनहार ॥
(मानव छंद)

सोनागिरि तीरथ पावन, सम्मेद शिखर सम प्यारा ।
मुनि वृन्दों की पावन रज, ने श्रृङ्ग यही श्रृंगारा ॥
ऋषि मुनि साधक सन्तों की, जहाँ सतत साधना होती ।
सूरज की किरण सुनहरी, जिनके चरणों को धोती ।।
सोनागिरि स्वर्ण गगन पर, सोनारी सूरज उगता ।
जिन दिव्यध्वनि धर्मामृत, परमामृत सदा बरसता ।।
श्री चंद्रप्रभू जिनवर का, जब समवशरण शुभ आया।
तब नंग - अनंग नृपों ने, निज जीवन सफल बनाया ॥
जिन शासन जिन्हें सुहाया, भव अन्त समझ लो आया।
जिसने प्रभुता पहचानी, उसने प्रभुता को पाया ॥
“अहमिक्को खलु शुद्धो” के, माँ गारूड़ि मंत्र सुनाती ।
शुद्धात्म सम्पदा देती, भव्यों को यही सुहाती ।।
कोटि-कोटि मुनियों ने, यहीं आतम ध्यान लगाया।
भव्यों को दर्शन मिलते, मंगल अवसर यह आया ।।
खोजो उनकीं पावन रज, ऋषियों की याद जगाओ।
भगवान आत्मा कहने, वाली उस धुन को पाओ ।
यहाँ चंद्रप्रभू जिनवर की, अन्तरमुख मुद्रा पढ़ लो ।
अन्तर के कालुष धोलो, शुद्धात्म सम्पदा वर लो ।।
बाहुबलि वज्र तपस्वी, के भी दर्शन तो कर लो ।
कब गोम्मटेश जाओगे, जी भर के यहीं निरख लो ।।
इक शतक आठ जिन मंदिर, सुन्दर मनहर सुखकारी।
चौबीस तीर्थंकर जिनवर, की प्रतिमायें मनहारी ।।
चौबीसी खड़गासन भी, अति दिव्य देशना देती ।
चौबीस परिग्रह तज दो, सब करो धर्म की खेती ॥
शुभचंद्राचार्य मुनीश्वर, ज्ञानार्णव ग्रंथ बनाया ।
ऋद्धिधारी मुनियों ने, यहीं समता भाव जगाया ॥
यहीं कुंड नरियल देखो, वजनी शिला देख के आओ।
यहीं आतम ध्यान लगाके, यहीं सम्यग्दर्शन पाओ ।।
परमागम मंदिर आओ, परमागम पढ़ो पढ़ाओ ।
श्री कुंदकुंद स्वामी के, वचनामृत लाभ उठाओ ।।
यहाँ पंच पहाड़ी दर्शन, निर्वाण क्षेत्र के कर लो ।

सम्मेदाचल, गिरनारी, पावापुरी यहीं निरख लो ।।
यहाँ बना ध्यान का मंदिर, सब शान्त मौन हो जाओ।
भगवान आत्मा अपना, अपने द्वारा ही ध्याओ ।॥
यहाँ समवशरण जिनमंदिर, दर्शन कर ध्यान लगाओ।
भावी चौबीसी निरखो, वैदेही दर्शन पाओ ।।
यहाँ कुंदकुंद नगरी में, आतम हित भाव जगा लो।
निवृत्त चित्त होकर के, भगवान आत्मा ध्या लो ।।
यहाँ पंचपहाड़ी सम्मुख, श्री मानस्तंभ निहारो ।
मानादि कषायें गलाकर, निज ज्ञानस्तंभ सम्हारो ॥
कारण परमात्म त्रिकाली, यह ही श्रद्धेय हमारा ।
जय हो सोनागिर तीरथ, सम्मेदशिखर लघु प्यारा ॥

ॐ ह्रीं सोनागिर सिद्धक्षेत्रे नंग अनंग आदि साढ़े पंचकोटि मुनीश्वरेभ्यो जयमाला
अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
मंगलमय मंगलकरण, जिन शासन सुखखान ।
भक्त बनें भगवन प्रभू, पा जिनधर्म महान ।।
।। परिपुष्पांजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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