श्री सोलहकारण पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Solahkaran Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री सोलहकारण पूजन

षोडस कारण पर्व धर्म का करूँ धर्म आराधना ।
मुक्ति सुनिश्चित यदि इस व्रत की हो निजात्म में साधना ।।
दुखी जगत् के जीव मात्र का हित हो निज कल्याण हो ।
अविनश्वर लक्ष्मी से परिणय मोक्ष प्रकाश महान् हो ।।

पूर्ण ज्ञान कैवल्य अनन्तानंत गुणों का वास हो ।
तीर्थंकर पर दाता सोलहकारण धर्म विकास हो ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादि षोडशकारणेभ्यो षोडसकारणानि धर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादि षोडशकारणेभ्यो षोडसकारणानि धर्म ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादि षोडशकारणेभ्यो षोडसकारणानि धर्म! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

जल की उज्ज्वल निर्मलता से मिथ्यामैल न धो सका ।
आकुलतामय जन्म मरण से रहित न अब तक हो सका ।।

निर्विकल्प अविकल सुखदायक सोलहकारण भावना ।
जय जय तीर्थंकर पद दायक सोलहकारण भावना ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं नि. स्वाहा ।

भाव मरण प्रति समय किया है मैंने काल अनादि से ।
भव संताप बढ़ाया चलकर उल्टी चाल अनादि से ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

मुक्त नहीं हो पाया अब तक पर भावों के जाल से ।
यह संसार चक्र मिट जाये धर्म चक्र की चाल से ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

काम वेदना भव पीड़ामय पर परिणति दुखदायिनी ।
काम विनाशक निज चेतन पद निज परिणति सुखदायिनी ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

जग तृष्णा की व्याधि हजारों आकुल करती हैं मुझे ।
क्षुधा रोग की माया नागिन भव भव डसती हैं मुझे ।।
निर्विकल्प अविकल सुखदायक सोलहकारण भावना ।
जय जय तीर्थंकर पद दायक सोलहकारण भावना ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

आत्मज्ञान रवि ज्योति प्रकाशित हो अब स्वपर प्रकाशिनी ।
शुद्ध परम पद प्राप्ति भावना तम नाशक भव नाशिनी ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

एक भूल कर्मों की संगति भव वन में उलझा रही ।
अग्नि लोह की संगति करके घन की चोटें खा रही ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

निज स्वभाव बिन हुई सदा ही अष्टकर्म की जीत ही ।
महामोक्षफल पाने का पुरुषार्थ किया विपरीत ही ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल फलादि वसु द्रव्य अर्घ का अर्थ कभी आया नहीं ।
अविचल अविनश्वर अनर्घ पद इसीलिए पाया नहीं ।।निर्वि.।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

भव्य भावना षोडशकारण विमल मुक्ति निर्वाण पथ ।
तीर्थंकर पदवी पाने का द्रुत गतिवान प्रयाणरथ ।।
रागादिक मिथ्यात्व रहित समकित हो निज की प्रीतिमय ।
दोष रहित दर्शनविशुद्धि भावना मुक्ति संगीतमय ।।

मन वच काया शुद्धि पूर्वक रत्नत्रय आराध लें ।
तप का आदर परम विनय सम्पन्न भावना साधलें ।।
पंचव्रत सहित शील स्वगुण परिपूर्ण शीलमय आचरण ।
निरतिचार भावना शीलव्रत दोषहीन अशरण शरण ।।

शास्त्र पठन गुरु नमन पाठ उपदेश स्तवन ध्यानमय ।
हो अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना हृदय में ज्ञानमय ।।
मित्र भ्रात पत्नि सुत आदिक और विषय संसार के ।
इनमें पूर्ण विरक्ति रखें संवेग भावना धार के ।।

हम उत्तम मध्यम जघन्य सत् पात्रों को पहिचान लें ।
चार दान दे नित्य शक्ति तपस्त्याग भावना जान लें ।।
मुक्ति प्राप्ति हित आत्म आचरण शक्ति भक्ति अनुरूप हो ।
द्वादश विधि से तपश्चरण भावना शक्ति तप रूप हो ।।

इष्ट वियोग अनिष्ट योग उपसर्ग मरण या रोग हो ।
साधु समाधि भावना अनुपम कभी न दुखमय योग हो ।।
रोगि मुनि की भक्ति पूर्वक सेवा सुश्रुषा करें ।
भव्य भावना वैयावृत्यकरण मन मंजुषा भरें ।।

मन वच काया से विजयी हो करें भक्ति अरहंत की ।
निर्मल अर्हद भक्ति भावना शुद्ध रूप भगवन्त की ।।
गुरु निर्ग्रन्थ चरण वन्दन पूजन नित विनय प्रणाम हो ।
नमस्कार आचार्य भक्ति भावना हृदय वसु याम हो ।।

लोकालोक प्रकाशक जिन श्रुत व्याख्यान अनुरूप हो ।
बहु श्रुत भक्ति भावना मन में उपध्याय मुनि रूप हो ।।
सप्त तत्त्व पंचास्तिकाय छह द्रव्य आदि सत् जान लें ।
जिन आगम का पढ़ना प्रवचन भक्ति भावना मान लें ।।

कायोत्सर्ग प्रतिक्रमण समता स्वाध्याय वन्दन विमल ।
देव स्तुतिषट कृत्य भावना आवश्यक निर्मल सरल ।।
जिन अभिषेक नृत्य गीतों वाद्यों से पूजन अर्चना ।
श्रुत प्रवचन मार्ग प्रभावना जिनालयों की चर्चना ।।

शीलवान चारित्रवान जिन मुनियों का आदर करें ।
मृदुल भावना प्रवचनवत्सल मुनि चरणों में शिर धरें ।।
इनके बाह्य आचरण ही से स्वर्ग सम्पदा झिल मिले ।
आभ्यन्तर आचरण किया तो मोक्ष लक्ष्मी फल मिले ।।

जितना अंश शुद्धि का होगा उतनी आत्म विशुद्धि रे ।
सतत जाग्रत हो निजात्म में मुक्ति प्राप्ति की बुद्धि रे ।।
पूर्ण शुद्धि होगी निजात्म में तब होगा निर्वाण रे ।
ज्ञानानन्दी गुण अनन्तमय स्वयं सिद्ध भगवान् रे ।।

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धियादि षोडशकारणेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सोलह कारण भावना हरे जगत् दुख द्वन्द ।
तीर्थंकर पद प्राप्त कर करो सदा आनन्द ।।

इत्याशीर्वादः


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३३२ से ३३५