निज सीमा में रहते प्रभु तुम, वस्तु सीमा दर्शाते हो।
हे सीमन्धर ! निज सीमा में, थिरता का भाव जगाते हो ॥
‘आत्मा हूँ’ संवेदन करते, पर परमात्मा कहलाते हो।
परमातम पद आधारभूत, आतम स्वरूप दर्शाते हो ॥
निज आत्मबोध पाकर स्वामी, निज आत्मा में ही रम जाऊँ।
आंशिक शुद्धि जिससे प्रगटी, अब पूर्ण शुद्धि उससे पाऊँ ॥
मैं ज्ञानानन्द स्वभावी हूँ, आनन्दित जीवन प्रगटाऊँ।
मैं करूँ वन्दना हे भगवन् ! तुमसम शाश्वत निजप्रभु ध्याऊँ ॥
Artist: आ. बा. ब्र.रवींद्र जी आत्मन्