जय जयति जय श्रेयांस नृप सुत सत्यदेवी नन्दनम् ।
चऊ घाति कर्म विनष्ट कर्ता ज्ञान सूर्य निरन्जनम् ।।
जय जय विदेहीनाथ जय जय धन्य प्रभु सीमन्धरम् ।
सर्वज्ञ केवलज्ञानधारी जयति जिन तीर्थंकरम् ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिन ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
यह जन्म मरण का रोग, हे प्रभु नाश करूँ ।
दो समरस निर्मल नीर, आत्म प्रकाश करूँ ।।
शाश्वत जिनवर भगवन्त, सीमन्धर स्वामी ।
सर्वज्ञ देव अरहंत, प्रभु अन्तरयामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चन्दन हरता तन ताप, तुम भव ताप हरो ।
निज समशीतल हे नाथ मुझको आप करो ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
इस भव समुद्र से नाथ, मुझको पार करो ।
अक्षय पद दे जिनराज, अब उद्धार करो ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
कन्दर्प दर्प हो चूर, शील स्वभाव जगे ।
भव सागर के उस पार, मेरी नाव लगे ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह क्षुधा ज्वाल विकराल, हे प्रभु शांत करूँ ।
चरु चरण चढ़ाऊँ देव मिथ्या भ्रांति हरूँ ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मद मोह कुटिल विष रूप, छाया अंधियारा ।
दो सम्यक्ज्ञान प्रकाश, फैले उजियारा ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्मों की शक्ति विनष्ट, अब प्रभुवर कर दो ।
मैं धूप चढ़ाऊँ नाथ, भव बाधा हर दो ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
फल चरण चढ़ाऊँ नाथ, फल निर्वाण मिले ।
अन्तर में केवलज्ञान, सूर्य महान् खिले ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब तक अनर्घ पद प्राप्त हो न मुझे सत्वर ।
मैं अर्घ चढ़ाऊँ नित्य चरणों में प्रभुवर ।।शाश्वत.।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री कल्याणक अर्घ्यावली
जम्बू द्वीप सुमेरु सुदर्शन पूर्व दिशा में क्षेत्र विदेह ।
देश पुष्कलावती राजधानी है पुण्डरीकिणी गेह ।।
रानी सत्यवती माता के उर में स्वर्ग त्याग आये ।
सोलह स्वप्न लखे माता ने रत्न सुरों ने वर्षाये ।।
ॐ ह्रीं गर्भमंगलमण्डिताय श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
नृप श्रेयांसराय के गृह में तुमने स्वामी जन्म लिया ।
इन्द्रसुरों ने जन्ममहोत्सव कर निज जीवन धन्य किया ।।
गिरि सुमेरु पर पांडुक वन में रत्नशिला सुविराजित कर ।
क्षीरोदधि से न्हवन किया प्रभु दशों दिशा अनुरंजित कर ।।
ॐ ह्रीं जन्ममंगलमण्डिताय श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
एक दिवस नभ में देखे बादल क्षणभर में हुए विलीन ।
बस अनित्य संसार जान वैराग्य भाव में हुए सुलीन ।।
लौकान्तिक देवर्षि सुरों ने आकर जय जयकार किया ।
अतुलित वैभव त्याग आपने वन में जा तप धार लिया ।।
ॐ ह्रीं तपोमंगलमण्डिताय श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
आत्म ध्यानमय शुक्ल ध्यान धर कर्मघातिया नाश किया ।
त्रेसठ कर्म प्रकृतियाँ नाशी केवलज्ञान प्रकाश लिया ।।
समवसरण में गंध कुटि में अंतरीक्ष प्रभु रहे विराज ।
मोक्षमार्ग सन्देश दे रहे भव्य प्राणियों को जिनराज ।।
ॐ ह्रीं केवलज्ञान मण्डिताय श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
शाश्वत विद्यमान तीर्थंकर सीमन्धर प्रभु दया निधान ।
दे उपदेश भव्य जीवों को करते सदा आप कल्याण ।।
कोटि पूर्व की आयु पाँच सौ धनुष स्वर्ण सम काया है ।
सकल ज्ञेय ज्ञाता होकर भी निज स्वरूप ही भाया है ।।
देव तुम्हारे दर्शन पाकर जागा है उर में उल्लास ।
चरण कमल में नाथ शरण दो सुनो प्रभो मेरा इतिहास ।।
मैं अनादि से था निगोद में प्रति पल जन्म मरण पाया ।
अग्नि, भूमि, जल, वायु, वनस्पति कायक थावर तन पाया ।।
दो इन्द्रिय त्रस हुआ भाग्य से पार न कष्टों का पाया ।
जन्म तीन इन्द्रिय भी धारा दुख का अन्त नहीं आया ।।
चौ इन्द्रियधारी बनकर मै विकलत्रय में भरमाया ।
पंचेन्द्रिय पशु सैनी और असैनी हो बहु दुख पाया ।।
बड़े भाग्य से प्रबल पुण्य से फिर मानव पर्याय मिली ।
मोह महामद के कारण ही नहीं ज्ञान की कली खिली ।।
अशुभ पाप आस्रव के द्वारा नर्क आयु का बन्ध गहा ।
नारकीय बन नरको में रह उष्ण शीत दुख द्वन्द सहा ।।
शुभ पुण्यास्रव के कारण मैं स्वर्गलोक तक हो आया ।
ग्रैवेयक तक गया किन्तु शाश्वत सुख चैन नहीं पाया ।।
देख दूसरों के वैभव को आर्त्त रौद्र परिणाम किया ।
देव आयु क्षय होने पर एकेन्द्रिय तक में जन्म लिया ।।
इस प्रकार धर धर अनन्त भव चारों गतियों में भटका ।
तीव्र मोह मिथ्यात्व पाप के कारण इस जग में अटका ।।
महापुण्य के शुभ संयोग से फिर यह तन मन पाया है ।
देव आपके चरणों को पाकर यह मन हर्षाया है ।।
जनम जनम तक भक्ति तुम्हारी रहे हृदय में हे जिनदेव ।
वीतराग सम्यक् पथ पर चल पाऊँ सिद्ध स्वपद स्वयंमेव ।।
भरतक्षेत्र से कुन्द कुन्द मुनि ने विदेह को किया प्रयाण ।
प्रभु तुम्हारे समवसरण में दर्शन कर हो गये महान् ।।
आठ दिवस चरणों में रह कर ओंकार ध्वनि सुनी प्रधान ।
भरत क्षेत्र में लौटे मुनिवर सुनकर वीतराग विज्ञान ।।
करुणा जागी जीवों के प्रति रचा शास्त्र श्री प्रवचनसार ।
समयसार पंचास्तिकाय श्रुत नियमसार प्राभृत सुखकार ।।
रचे देव चौरासी पाहुड़ प्रभु वाणी का ले आधार ।
निश्चयनय भूतार्थ बताया अभूतार्थ सारा व्यवहार ।।
पाप पुण्य दोनों बन्धन हैं जग में भ्रमण कराते हैं ।
राग मात्र को हेय जान ज्ञानी निज ध्यान लगाते हैं ।।
निज का ध्यान लगाया जिसने उसको प्रगटा केवलज्ञान ।
परम समाधि महासुखकारी निश्चय पाता पद निर्वाण ।।
इस प्रकार इस भरत क्षेत्र के जीवों पर अनन्त उपकार ।
हे सीमन्धरनाथ आपके करो देव मेरा उद्धार ।।
समकित ज्योति जगे अन्तर में हो जाऊँ मैं आप समान ।
पूर्ण करो मेरी अभिलाषा हे प्रभु सीमन्धर भगवान् ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सीमन्धर प्रभु के चरण भाव सहित उर धार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार ।।
।।पुष्पांजलिम् क्षिपेत्।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २३८ से २४२