श्री सीमंधर जिन मंदिर, पार्ला (मुम्बई) की पूजन | Shri Simandhar Jin Mandir Parla Mumbai Pujan

श्री सीमंधर जिन मंदिर, पार्ला (मुम्बई) की पूजन

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स्थापना
(‘वीर’ छन्द)
शुद्ध आत्मा के अनुभव से, शुद्ध दशा को पाया है।
निज सर्वज्ञ शक्ति को लखकर, केवल रवि प्रकटाया है॥
जग हितकर उपदेश दिया प्रभु, बार-बार मैं करूँ नमन।
मम उर में प्रभु आप पधारो, सादर सविनय है वंदन॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-सर्व
जिनेन्द्राः अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्, अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः, अत्र मम
सन्निहितो भवत भवत वषट् पुष्पांजलिं क्षिपामि।
जल
भाव शुभाशुभ होते रहते, पर आतम तन्मय ना हो।
ना प्रमत्त अप्रमत्त है आतम, ज्ञायक भाव ही रहे अहो॥
ज्ञायक भाव सदा मैं मानूँ, परभावों से भिन्न रहूँ।
निर्मल जल करता चरणार्पित, जन्म-मरण का नाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदन
गुण अनंतमय है शुद्धातम, पर गुण भेदों से भी पार।
गुण विकल्प भी आकुलतामय, मिलता है इनसे संसार॥
भेद रहित निज को अभेद लख, भवाताप का नाश करूँ।
शीतल चंदन अर्पित कर निज, शीतल नित्य स्वभाव वरूँ॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षत
है अबद्ध-अस्पृष्ट नियत अरु, निज स्वभाव से सदा अनन्य।
ज्ञायक भाव विशेष रहित अरु, है संयोग रहित चैतन्य॥
निज ज्ञायक को जो जब देखे, देखे वह जिनशासन सर्व।
अक्षत कर चरणार्पित हो चैतन्य निलय उद्घाटन पर्व॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
मोह-राग भावक भावों से, भिन्न त्रिकाली ज्ञायक भाव।
धन-परिजन- पुरजन आदि का, ज्ञायक में है सदा अभाव॥
भावक और ज्ञेयभावों से, भिन्न सदा है आतमराम।
पुष्प चढ़ाऊँ काम नशाऊँ, ज्ञायक भाव लखूँ अभिराम॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य
मैं निर्मल दृग-ज्ञानमयी हूँ, भाव क्रमाक्रम से हूँ भिन्न।
अन्य बाह्य परमाणु ना मेरा, गुण अनंत से सदा अभिन्न॥
रंग-राग से भिन्न अरूपी, निज आतम का ध्यान करूँ।
रस पूरित नैवेद्य समर्पित, क्षुधा रोग का नाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीप
अरस अरूप गंध विरहित अरु, है चेतन गुण से संयुक्त।
ना निश्चित आकार जीव का, शब्द रहित अरु है अव्यक्त॥

बाह्य चिह्न से ज्ञात ना होता, ऐसा जानो ज्ञायक भाव।
रत्नमयी दीपक अर्पित मम, मोह तिमिर का होय अभाव॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
अशुचि दुःखमय दुख कारण हैं, सभी शुभाशुभ आस्रव भाव।
शुचि अरु सुखमय सुख कारण है, एकमात्र निज ज्ञायक भाव॥
आस्रव से अपनत्व तोड़कर, निज आतम को ही ध्याऊँ।
धूप चढ़ा कर प्रभु चरणों में, कर्म रहित निज पद पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
जीव कर्म से बंधा बंधा ना, हैं नय पक्ष विविध बहुरूप।
जो पक्षातिक्रांत हो जाता, पाता समयसार सुखरूप॥
समयसारमय मैं हो जाऊँ, कर विकल्प की सत्ता नाश।
सरस सुवासित फल अर्पित है, गुण अनंत का होय प्रकाश॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्घ्य
मुक्ति की यदि अभिलाषा है, ज्ञान से जानो ज्ञायक भाव।
ज्ञान बिना ज्ञायक ना मिलता, क्रिया करो या हो शुभभाव॥
ज्ञान भाव में रति करने से, सुक्ख मिले अरु हो संतुष्ट ।
अर्घ्य चढ़ाकर करूँ अर्चना, होऊँ निजगुण बल संपुष्ट॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
सर्व-जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री सीमंधर भगवान के लिए अर्घ्य
(‘गीतिका’ छन्द)
देह में रहकर विदेही आत्म का अनुभव करें।
सर्वज्ञ हो निज रत रहें, अरु भविक को शिव पथ कहें॥
वस्तु निज सीमा तजे ना, नित्य सीमंधर कहें।
है अर्घ्य अर्पित भाव से, निज सीम में ही हम रहें॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
श्रीसीमंधरनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री शान्तिनाथ भगवान के लिए अर्घ्य
(‘चौपई’ छन्द)
हे प्रभु शान्तिनाथ जिन राय, वंदन करें भविक गुण गाय।
तुमको लख निज महिमा आय, निज दर्शन से मोह पलाय॥
आतम अनुपम महिमावान, गुण अनंतमय वैभववान।
प्रभु कहते सब जीव समान, अर्घ्य चढ़ा पद पाऊँ महान॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान श्री
शान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री महावीर भगवान के लिए अर्घ्य
(‘दोहा’ छन्द)
कुण्डग्राम में जन्म अरु, पावापुर निर्वाण।
वस्तुस्वरूप दिखाय कर, किया जगत कल्याण॥
जीवादि नवतत्त्व भी, बहिर्तत्व अरु हेय।
सब भावों से भिन्न जिय, उपादेय अरु श्रेय॥
तुम सम निज में ही रमूँ जानूँ ज्ञायक भाव।
अर्घ्य समर्पित हे प्रभो, महावीर जिनराव॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान श्री
महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री बाहुबली भगवान के लिए अर्घ्य
(‘रोला’ छंद)
बाहुबली ने आतमबल से मोह हराया।
निज वैभव निज जान परिग्रह सब ठुकराया॥
एकमात्र निज ज्ञायक सुखमय यह बतलाया।
निज का ही हो परिग्रहण यह अर्घ्य चढ़ाया॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान-
श्रीबाहुबलिजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भावी तीर्थंकर को अर्घ्य
(‘वीर’ छन्द)
भावों से ही भव बढ़ते हैं, भावों से होता भव नाश।
ज्ञायक भाव के अवलंबन से, होता है कैवल्य प्रकाश॥
भावी तीर्थंकर प्रभुवर को, भावी सिद्ध करें वंदन।
अर्घ्य समर्पित श्री चरणों में, मिट जाये भव का क्रन्दन॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमान श्री
भावितीर्थंकर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सुवर्णपुरी को अर्घ्य
(‘वीर’ छन्द)
भरि स्वर्णथाल वसु द्रव्य अर्चूं कर जोरि।
प्रभु सुनियो विनती नाथ, कहूं मैं भाव धरि॥
अनुभूति तीर्थ महान, सुवर्णपुरी सोहे।
यह कहान गुरु वरदान, मंगल मुक्ति मिले॥
ॐ ह्रीं श्री सुवर्णपुरीतीर्थे सर्वजिनायतनेषु विराजमान-जिनबिंबेभ्यः
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
(‘रोला’ छन्द)
श्री सीमंधर-शान्ति-वीर प्रभु, जहाँ विराजे।
भावी जिनवर, बाहुबली भी जहाँ विराजे॥
स्वर्णपुरी की अद्भुत रचना, मन को भावे।
भाव सहित वंदन प्रभुवर को भव नश जावे॥
(‘मौक्तिकदाम’ छन्द )
भरत में भारत देश महान, महापुरुषों की जो है खान।
इसी भू पर होते भगवान, यहीं से पाते पद निर्वाण॥
है मुम्बई नगर एक सुज्ञात, पार्ला उपनगरी प्रख्यात।
है सीमंधर जिन मंदिर भव्य, बना अद्भुत अनुपम अरु नव्य॥
विराजे सीमंधर भगवान, कराते ज्ञायक की पहचान।
शान्तिमय शोभें शान्ति जिनेश, दिखावें निज अनादि परमेश॥
जयति जय महावीर भगवान, बताते आतम वैभववान।
नमन हे बाहुबली जिनराज, तपस्वी में हो ज्यों गिरिराज॥
शोभते भावी तीरथनाथ, मुक्तिपथ मिले आपके साथ।
है रचना स्वर्णपुरी अनुपम, तत्त्व रसधार बहे हरदम॥
बना स्वाध्याय भवन सुखकार, बहे जिनवाणी की रसधार।
भव्य है स्वरूप साधना भवन, लखें निज तत्त्व परम पावन॥
देव-गुरु-ज्ञानी का उपकार, बहे यहाँ नित अमृतमय धार।
हैं सबके प्रेरक गुरु कहान, बताया आतम धर्म महान॥
सत्य शाश्वत है दिगम्बर धर्म, बताया जिन वचनों का मर्म।
कहा ज्ञायक है आतमराम, जानना केवल उसका काम॥
सभी तीर्थंकर हैं वीतराग, बताया सबने मुक्ति मार्ग।

प्रभु कहते सब को भगवान, करो निज आतम की पहचान॥
जीव से भिन्न रंग अरु राग, आत्मा रागी ना वितराग।
सभी आतम हैं स्वयं में पूर्ण, स्वयं को लखते विधि हों चूर्ण॥
जगत जन जाने निज आतम, तभी बन पावें परमातम।
जिसे प्रभु से भी सुख की आस, बना रहता वह सबका दास ॥
पुण्य से पाए श्री भगवान, करूँ पौरुष से निज पहचान।
व्यक्त पर्यायों से मैं भिन्न, अनंत गुण पर्यायों से अभिन्न॥
मोह पर्यायों का हो नष्ट, मात्र निज में तन्मय संतुष्ट।
सभी पद लगते अपद स्वरूप, प्रभो मैं हूँ चैतन्य स्वरूप॥
नहीं प्रभु अब जग की कुछ चाह, मिले बस निज गृह की अब राह।
रहूँ बस अपने आत्म प्रदेश, यही वर पाऊँ पूज्य जिनेश॥
ॐ ह्रीं श्री पार्ला-मुम्बईनगरे स्थिते श्री सीमंधरजिनमंदिरे विराजमानसमस्त-
जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(‘वीर’ छन्द )
वीतराग-सर्वज्ञ जिनेश्वर के चरणों में है वंदन।
तुम सम प्रभुता पाऊँ प्रभुवर, हो जाऊँ तव लघुनंदन॥
निज का निज में करूँ समर्पण, लौट न अब भव में आऊँ।
निज चैतन्य चन्द्र को निरखूँ, परम शान्तिमय हो जाऊँ॥
पुष्पांजलिं क्षिपामि

ज्ञानोदय में विराजमान भगवंतों की पूजन
स्थापना
(‘वीर’ छन्द)
तीर्थधाम ज्ञानोदय मनहर, मोह तिमिर का नाशनहार।
पंच बालयति यहाँ विराजे, हैं त्रिलोक के जाननहार॥
चौबिस तीर्थंकर शोभित हैं, वीतराग-सर्वज्ञ प्रभो।
समवशरण में यहाँ विराजित, हितकर शीतलनाथ विभो॥
पंचमेरु गजदंत जिनालय में, शाश्वत जिनबिंब महान।
भाव सहित आमंत्रित करता, मम उर में आओ भगवान॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्राः अत्र अवतरत अवतरत, अत्र तिष्ठत
तिष्ठत ठः ठः, अत्र मम सन्निहिताः भवत भवत। पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
मैं अनादि से भटक रहा हूँ, जन्म-मरण नित ही करता।
भूला सुख स्वभाव निज भगवन, दुखमय आकुलता सहता॥
शीतल सुरभित नीर चढ़ाकर, जन्म-मरण का नाश करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु रोग विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
विषय-कषायें झुलसाती हैं, सहा नहीं जाता संताप।
शीतल शुद्धस्वरूप सहज निज, दिखलाओ हे जिनवर! आप॥
मलयागिरि चंदन अर्पित कर, मैं भवाताप का नाश करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा।
क्षणवर्ती पर्यायों में रत हो, पद अक्षत भूल रहा।
शाश्वत अक्षत पद दिखलाओ, महामहिम चिद्‌रूप अहा॥

अर्पित अक्षत प्रभु चरणों में, अक्षयपद को प्राप्त करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति
स्वाहा।
मन्मथ से विक्षिप्त सुमन यह, भागे नित विषयों की ओर।
कामजयी तुम हो परमातम, थामे रहते निज कर डोर॥
सुमन समर्पित श्री चरणों में, मैं निष्काम स्वरूप वरूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति
स्वाहा।
क्षुधा सर्पिणी नित दुखदायी, जिय को तेजरहित करती।
आनंदमय वह परिणति होती, निज प्रिय को जो है वरती॥
मैं नैवेद्य चढ़ा चरणों में, क्षुधा व्याधि का नाश करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति
स्वाहा।
मिथ्यामति के घोर तमस से, निज-पर भेद नहीं दिखता।
ज्ञान-दीप प्रज्वलित होय तब, सुख कर शिव पथ है मिलता॥
दीप चढ़ाकर प्रभु चरणों में, मोहतिमिर का नाश करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज को भूल उदय में अटका, चतुर्गति में भटक रहा।
त्रिविध कर्म से भिन्न आत्मा, प्रभुवर तुमने शुद्ध कहा॥
धूप चढ़ाऊँ कर्म नशाऊँ, कर्म रहित पद प्राप्त करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति
स्वाहा।

पंच इंद्रिय के विष फल चखकर, उनमें ही मैं मस्त रहा।
सरस सुवासित शुद्धातम फल, हे प्रभु! चखते आप अहा॥
फल अर्पित कर श्री चरणों में, सुखद मुक्ति फल प्राप्त करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति
स्वाहा।
जग के पद हों मूल्यवान पर, निज पद सम है कोई नहीं।
अनुपम-अजर-अमर चेतन पद, लखते शिव सुख मिले यहीं॥
प्रभु गुण गाऊँ अर्घ्य चढ़ाऊँ, पद अनर्घ्य को प्राप्त करूँ।
ज्ञानोदय हो ज्ञानोदय में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश करूँ॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थितसर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।

आदिनाथ
(‘मानव’ छन्द)
श्री ऋषभनाथ स्वामी ने, सबको सन्मार्ग दिखाया।
जग के वैभव को तजकर, चिद्वैभव निज प्रकटाया॥
जड़ वैभव अब न चाहूँ, चिद्वैभव ही प्रभु पाऊँ।
यह अर्घ्य समर्पित करके, मैं निज अनर्घ्य पद ध्याऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

वासुपूज्य
(‘दोहा’ छन्द)
पंचेन्द्रिय का विषय विष, जिनको रंच न भाय।
ब्रह्मरूप में रमणकर, ब्रह्मानंद को पाय॥
शत इन्द्रों से पूज्य हो, वासुपूज्य भगवान।
अर्घ्य समर्पित है प्रभो! बनूँ मैं आप समान॥
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मल्लिनाथ
(‘वीर’ छन्द)
मोह मल्ल को किया पराजित, हे प्रभु! मल्लिनाथ भगवान।
तुम को लखकर प्रभुवर जाना, मैं अनंत गुण वैभववान॥
मल्लिनाथ को अर्घ्य समर्पित, पद अनर्घ्य मैं पा जाऊँ।
पंच परावर्तन नश जाये, लौट न अब जग में आऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

नेमिनाथ
(‘रोला’ छन्द)
नेमिनाथ भगवान आप हो भवदधि तारण।
चिद् स्वरूप दर्शाय मोह नाशन में कारण॥
राजमती का राग त्याग, शिव पंथ लिया है।
शिवपथ के ही हेतु, समर्पित अर्घ्य किया है॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पार्श्वनाथ
(‘मोतियादाम’ छन्द)
प्रभो! मैं भटक रहा संसार, बताओ मुझको मुक्ति मार्ग।
अरे सुन भव्य सिद्ध सम जीव, करो तुम राग आग का त्याग॥
लखो तुम निज वैभव अनमोल, मिलेगा तुमको मुक्ति राज।
धन्य हो प्रभुवर पारसनाथ! समर्पित करूँ अर्घ्य मैं आज॥
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महावीर
(‘वीर’ छन्द)
मिथ्यामति नाशक सन्मति हो, मोह शत्रु नाशक महावीर।
अजरामर आतम दिखलाते, भव-भय नाशक हो अतिवीर॥

नय प्रमाण के वचन अगोचर, हे प्रभु शुद्धातम ध्याऊँ।
अर्घ्य समर्पित वर्धमान को, पद अनर्घ्य मैं पा जाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सिद्ध भगवान
(‘वीर’ छन्द )
क्षायिक दर्शन-ज्ञान-अगुरुलघु, सूक्ष्मत्व अरु अव्याबाध।
समकित वीरज अवगाहन से और रही ना कोई साध॥
प्रकट अष्ट गुण हुए प्रभु को, यह कहना है बस व्यवहार।
गुण अनंतमय प्रभु शोभते, जहाँ ना कोई है उपचार॥
है अनंत गुणमयी विभूति, अनंत काल तक भोगेंगे।
बने प्रभु के हम अनुगामी, अब क्यों भव में रोवेंगे॥
कर सिद्धत्व साध्य ही अपना, सिद्धों को सादर ध्याऊँ।
गुण अनंतमय अर्घ्य समर्पित, लौट ना फिर भव में आऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।
24 तीर्थंकर
(‘अवतार’ छंद)
चौबीसों श्री जिनराज, की शरणा आया।
ध्रुव ज्ञायक ही मिल जाय, यह मन को भाया॥
नहिं धन-पद-यश की चाह, निज गुण प्रगटाऊँ।
करूँ अर्घ्य समर्पित नाथ, शिवपद ही पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।
समवशरण शीतलनाथ
(‘रोला’ छंद)
समवशरण श्री शीतल प्रभु का, भव भय नाशक।
अनेकांतमय वस्तु व्यवस्था का जो प्रकाशक॥

शीतल सम शुद्धातम लख, शीतलता पाऊँ।
निज गुण अर्घ्य चढ़ाय, मुक्ति लक्ष्मी को पाऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री समवसरणस्थित शीतलनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पंचमेरु गजदंत
(‘वीर’ छन्द)
शाश्वत पंचमेरु हैं जग में, शाश्वत हैं जिनबिम्ब महान।
शाश्वत हैं गजदंत जिनालय, ज्ञानोदय में महिमावान॥
शाश्वत निज आतम मैं जानूँ, शाश्वत शिवसुख को पाऊँ।
पद अनर्घ्य को प्राप्त करूँ मैं, लौट न फिर भव में आऊँ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरु-गजदंत-जिनालय-जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मानस्तंभ पार्श्वनाथ
(‘हरिगीतिका’ छन्द)
श्री पार्श्वनाथ जिनेश हमको, शरण अपनी लीजिए।
मैं बन सकूँ बस आप सम प्रभ, सीख हमको दीजिए॥
मैं मान के वश आज तक निर्मान हूँ जाना नहीं।
है सिद्ध सम सब जीव जग में, यह कभी माना नहीं॥
यह मानस्तंभ प्रभो मुझे, तव गुण अनंत दिखा रहा।
मैं मान तज निर्मान हो अब, अर्घ्य प्रभु को चढ़ा रहा॥
ॐ ह्रीं श्री मानस्तंभस्थित पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
(‘दोहा’ छन्द)
ज्ञानोदय में आयकर, जिनवर दर्शन पाय।
निज महिमा आई प्रभो, मोह तिमिर नश जाय॥

(‘मोतियादाम’ छन्द)
भरत में भारत देश महान, जिसे जाने है सकल जहान।
मध्य में सुन्दर मध्यप्रदेश, जहाँ ज्ञानोदय तीर्थ महान॥
विराजे पंच बालयति देव, चतुर्विंशति सर्वज्ञ जिनेश।
रचना समवसरण सुखकार, गरजते शीतलनाथ महेश॥
हैं शाश्वत पंचमेरु गजदंत, जहाँ शोभित शाश्वत जिनराज।
है मानस्तंभ मनोहर दिव्य, दर्श कर सुधरें सारे काज॥
जो जाने वीतराग अरहंत, शास्त्र अरु नग्न दिगंबर संत।
यही हैं मंगल-उत्तम-शरण, यही हैं अनुपम महिमावंत॥
दिखाया सबने वस्तु स्वरूप, अनादि अनंत अकृत्रिम रूप।
त्रिजग में जीव ही जाननहार, अनंत गुणात्मक चेतन भूप॥
सिद्ध सम निज को जब जाने, तभी ज्ञानोदय होता है।
प्रचुर स्व संवेदन होते, भाव मुनि पद भी होता है॥
महाव्रत समिति गुप्ति धार, जीव मुक्ति मग में चलता।
करे जब श्रेणी आरोहण, सकल परमातम है बनता॥
त्रिविध विधि नाश कर आतम, मुक्तश्री को है फिर वरता।
अनंतानंत कालों तक, निजानंद में मगन रहता॥
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानोदयस्थिता: सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(‘दोहा’ छन्द)
ज्ञान स्वरूपी आत्मा, भूला है निज रूप।
ज्ञानोदय हो जिस समय, प्रकटे चेतन रूप॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

पंच परमेष्ठी पूजन

स्थापना

(‘वीर’ छन्द)
वीतराग-सर्वज्ञ-हितंकर, अर्हत् प्रभु को है वंदन।
द्रव्य-भाव-नो कर्म रहित, अशरीरी प्रभु को भी वंदन॥
छत्तिस गुणयुत परम हितैषी, श्री सूरीश्वर करूँ नमन।
उपाध्याय जिन ध्वनि के दाता, मेटो भव-भव का क्रन्दन॥
निज आतम की करें साधना, सब मुनिराजों की जय हो।
पंच परम पद मम उर आओ, यही निवेदन करूँ प्रभो॥

जल
सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, हे प्रभु मैं न जान सका।
मिथ्यामति से चतुर्गति में, जन्म-मरण करता भटका॥
देव-धर्म-गुरु सप्त तत्त्व अरु, निज आतम श्रद्धान करूँ।
शुद्धभाव शीतल जल अर्पित, जन्म-मरण दुख नाश करूँ॥

चंदन
वीतराग-सर्वज्ञ देव हैं, वीतरागतामय आगम।
नग्न दिगम्बर गुरु हमारे, अनुभवते जो निज आतम॥
देवशास्त्रगुरु का स्वरूप लख, नित नव मंगलगान करूँ।
सुरभित शीतल चंदन अर्पित, भवाताप का नाश करूँ॥

अक्षत
ज्ञानानन्द स्वरूप जीव का, न अजीव में होता ज्ञान।
आस्रव-बंध दुखद पर संवर, निर्जर-मोक्ष सुखद हैं मान॥
सप्त तत्त्व में हेय-ज्ञेय अरु उपादेय का ज्ञान करूँ।
उज्ज्वल धवलाक्षत कर अर्पित, अक्षय पद को प्राप्त करूँ॥

पुष्प
ज्ञान-दर्शमय आतम स्व है, अरु पर तत्त्व है सारा लोक।
स्व-पर भेद विज्ञान बिना ही, अज्ञ पा रहा है दुःख थोक॥
निज-पर का मैं ज्ञान करूँ, अरु निज में ही विश्राम करूँ।
पुष्प सुगंधित चरण चढ़ाकर, काम भाव का नाश करूँ॥
नैवेद्य
चिदानन्द चिन्मय ध्रुव आतम, एकमात्र जग में श्रद्धेय।
नित्य त्रिकाली सुखमय मैं हूँ, अन्य तत्त्व हैं सारे हेय॥
द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित मैं, निज आतम श्रद्धान करूँ।
सरस मधुर नैवेद्य समर्पित, क्षुधा रोग का नाश करूँ॥
दीप
चारित्र निश्चय धर्म कहा है, चारित्र तो है समता भाव।
मोह-क्षोभ से रहित आत्म का, प्रगटाऊँ मैं शुद्ध स्वभाव॥
चारित्र निज आतम में रमना, हे प्रभु! इसको प्राप्त करूँ।
तिमिर विनाशक दीप समर्पित, मोह तिमिर का नाश करूँ॥
धूप
वस्तु स्वभाव धर्म कहलाता, जानूँ प्रभुवर वस्तु स्वभाव।
वस्तु स्वभाव ज्ञान बिन स्वामी, चतुर्गति का है भटकाव॥
मैं तो जाननहार हूँ स्वामी, कर्तापन का नाश करूँ।
धूप चढ़ाकर श्री चरणों में, अष्ट कर्म का नाश करूँ॥
फल
वीतरागता धर्म कही प्रभु, धर्म अहिंसा कही अहा।
राग-द्वेष होना हिंसा है, ज्ञायक रहना धर्म महा॥
धर्म धार उत्तम अविनाशी, निज आश्रित सुख प्राप्त करूँ।
सरस-सुवासित फल अर्पित कर, महामोक्ष फल प्राप्त करूँ॥

अर्घ्य
श्रावक अरु मुनिधर्म बताया, दस लक्षणमय धर्म कहा।
जिनवर कथित धर्म जो धारे, उसका जीवन सफल अहा॥
कथन धर्म के विविध कहे पर, धर्म एक निज उर धारूँ।
अर्घ्य समर्पित कर चरणों में, मैं अनर्घ्य पद प्राप्त करूँ॥

जयमाला
(‘दोहा’ छन्द)
पंच परम पद लोक में, पंचम गति दातार।
मंगल-उत्तम-शरण हैं, हे जिय उर में धार॥
(‘वीर’ छन्द)
कर्म पर्वतों के नाशक अरु, विश्व तत्त्व के हैं ज्ञाता।
मोक्ष मार्ग के नायक प्रभुवर, सारा जग उनको ध्याता॥

अष्ट कर्म को नष्ट किया अरु, अष्ट गुणों को प्रकट किया।
अष्टम वसुधा में निवास है, निजानंद को प्राप्त किया॥

गुण छत्तीस के धारक सूरि, उपाध्याय गुण हैं पच्चीस।
आत्म साधनारत साधु हैं, भविक झुकाते सविनय शीश॥
ये ही पाँचों हैं परमेष्ठी, उनका जय-जय गान करूँ।
धर्म स्वरूप बताया उनने, उसका मैं श्रद्धान करूँ॥

सुख-दुख दाता कोई न जग में, रक्षक केवल है जिनधर्म।
परद्रव्यों को सुखकर माने, तो बँधते हैं दुखकर कर्म॥

हे प्रभु! तव स्वरूप मैं जानूँ, न्याय-नीति पर रखूँ कदम।
हो नि:शंक-निरपेक्ष भाव से, प्रभु पद पूजूँ मैं हरदम॥

यत्नाचार सहित हो वर्तन, पाप भाव से नहीं लगाव।
धन-पद-यश की रहे न तृष्णा, श्रद्धा में हो ज्ञायक भाव॥
पुण्योदय से धन-पद मिलता, महा पुण्य से मिलता धर्म।
धर्म पंथ पर चलना पौरुष, धर्म पथिक पाता शिव शर्म॥
हे प्रभुवर! जब तक जीवन है, पंच प्रभु का दर्श मिले।
सुख-दुख या फिर लाभहानि हो, एकमात्र तव शरण रहे॥
पाँचों परमेष्ठी की जय हो, जय हो तीर्थंकर चौबीस।
देवशास्त्रगुरु की भी जय हो, चरणों में धरता मैं शीश॥
(‘वीर’ छन्द)
पाँचो परमेष्ठी को ध्याकर, निज आतम में रम जाऊँ।
करूँ समर्पण निज का निज में, लौट न फिर भव में आऊँ॥


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स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/59881।