श्री सिद्धक्षेत्र शत्रुंजयगिरि पूजन | Shri Siddhkshetra Shatrunjaygiri Pujan

श्री सिद्धक्षेत्र शत्रुंजयगिरि पूजन

(चांद्रायण)
पाँच पांडवों ने मुनि मुद्रा धारकर ।
मुक्ति वधू को पाने पकड़ी थी डगर ।।
पालीताना पावन तीरथ आय के ।
आत्म ध्यान में मग्न हुये मुनिराज वे ।।
अर्जुन भीम युधिष्ठिर शिव पद पा गये ।
आठ कोड़ि मुनि मुक्त इसी भू पर भये ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि साधना ।
हृदय-कमल में आओ पधारो वंदना ।॥
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र युधिष्ठिर अर्जुन भीम आदि आठ करोड़ मुनि सिद्ध
समूह ! अत्र अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र युधिष्ठिर अर्जुन भीम आदि आठ करोड़ मुनि सिद्ध
समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र युधिष्ठिर अर्जुन भीम आदि आठ करोड़ मुनि सिद्ध
समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । परिपुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(जोगीरासा)
जन्म-मरण नित करते-करते, काल अनंत गंवाया ।
स्वांग स्वभाव भिन्न समझे बिन, शांति कहीं न पाया ॥
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनि पद, वन्दूँ नीर चढ़ाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रेपांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो सिद्ध पद प्राप्तये
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब तक पर पदार्थ में ममता, समता कैसे आवे ?
अपनी प्रभुता अपने में है, तुम बिन कौन बतावे ।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनि पद, वंदन चंदन लाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

उज्जवल तंदुल धवल सुअक्षत, सम अक्षय निधि पायी।
अक्षय पद पाने हे भगवन, शरण तिहारी भायी ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनि पद, अक्षत तुम्हें चढ़ाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
स्पर्शन रसना इन्द्रियवश, दुखिया जग के प्राणी ।
आत्म ब्रह्म में रमूँ सदा ही, सुनूँ सदा जिनवाणी ॥
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनि पद, वन्दूँ पुष्प चढ़ाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धातम अनुभव-रस जैसा, रूचिकर जड़रस नांही।
अनुभव-रस सेवी मुनि कहते, चख लो अमृत भाई ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनी पद, वंदन नेवज लाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चिन्तामणि चैतन्य दीप ले, स्व पर विवेक जगाऊँ।
आतम में अपनापन लाऊँ, मोहमहांध नशाऊँ ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनी पद, वन्दूँ दीप चढ़ाये ।।
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
अष्टकर्म जो दुख के दाता, जहाँ आदर वहाँ जाते ।
आत्म ध्यान के धनी आपके, पास नहीं वो आ पाते ॥
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनी पद, वन्दूँ धूप चढ़ाये ॥
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
तत्त्वज्ञान से हो निःशंक, निःकांक्ष भाव पा जाऊँ।
नहीं कामना रहे मोक्ष की, फल श्रेयस अपनाऊँ ।।
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि, शत्रुंजय गिरि आये ।
पांडव आदि असंख्यमुनी पद, वंदू फल ले आये ॥
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अर्घ्य समर्पित भक्ति भाव से, लिये शरण में आया।
महा भाग्य से मिले प्रभु जी, धर्म-मर्म मन भाया ॥
अपने में अपनापन लाऊँ, ममता मोह हटाऊँ ।
हे उपसर्गजयी मुनि पांडव, तुम सम समता पाऊँ ॥
अर्जुन भीम युधिष्ठिर वन्दूँ, शत्रुंजय गिरि आये ।
मुनि असंख्ये मुक्त हुये हम, अर्घ संजोकर लाये ॥
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला
(दोहा)
जय उपसर्गजयी मुनि, जय जिन धर्म महान ।
जयवंते निर्ग्रन्थ पद, वीतराग विज्ञान ॥
भक्ति भाव से हे प्रभो ! आया तेरे द्वार ।
इस असार संसार से, करो प्रभु उद्धार ।।
(रोला)
धन्य-धन्य पाँचों पांडव मुनि तुम्हें नमन है ।
शत्रुंजय से मुक्ति पधारे अभिनंदन है ॥
धन्य-धन्य मुनि दीक्षा ली वैराग्य सम्हारा ।
शत्रु मित्र का भेद नाश समता पद धारा ॥
धन्य-धन्य कुरूवंश हंस तुम मुक्त हो गये ।
अन्तःकृत तुम हुये केवली कंत हो गये ॥
धन्य-धन्य शुद्धोपयोग के साधनहारे ।
धन्य-धन्य रत्नत्रय निधि के बाँटनहारे ॥
अहो भगवती दीक्षा, तुमने जब अपनायी ।
राजपाट परिग्रह छोड़ा, तृण सम लख भाई ॥
आप जितेन्द्रिय हुये, अतीन्द्रिय जीवन जीते ।
मोह मान माया मत्सर भावों से रीते ॥
पृथ्वी शैय्या, चादर था आकाश तुम्हारा ।
चलते-फिरते सिद्ध, आपको नमन हमारा ॥

परिग्रह चौबीस भेद, सभी के तुम थे त्यागी ।
परीषह बाईस जीत, हुये तुम ही बड़भागी ॥
केवलज्ञान तलहटी में तुम ही रहते थे ।
सिद्ध प्रभु से क्षण-क्षण में बातें करते थे ।।
तप्त लोह आभूषण, तन पर जब पहराये ।
लकड़ी जैसी देह जली, पर कोप न लाये ।।
धन्य युधिष्ठिर धर्मराज, घड़ी कैसी आई ।
उपसर्गों को जीत मुक्ति श्री लक्ष्मी पायी ।।
लक्ष भेदिया महा धर्नुधर अर्जुन मुनिवर ।
कर्मवंश का नाश किया चल दिये शिखर पर ।।
भीम महाबलवान आत्मबल जब अपनाया ।
राग-द्वेष भवचक्र नाश कर शिवफल पाया ।।
शत्रुंजय पर्वत महान को वंदन करता ।
आठ कोड़ि मुनि मुक्त हुये अभिनंदन करता ।।
तुम जैसी समता मेरे जीवन में आये ।
जयवंते जिनधर्म नियम से मुक्ति दिलाये ।।
ॐ ह्रीं श्री पालीताना सिद्धक्षेत्रे पांडव आदि आठ करोड़ मुनीश्वरेभ्यो जयमाला
अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
आत्मशांति का मूल है, वीतराग विज्ञान ।
नमूं ताहि जातें भये, अरिहंतादि महान ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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