श्री सिद्धक्षेत्र द्रोणागिर पूजन | Shri Siddhkshetra Dronagir Pujan

श्री सिद्धक्षेत्र द्रोणागिर पूजन

(दोहा)
द्रोणागिरि शुभ तीर्थ से, गुरुदत्तादि मुनीश ।
पाई पंचमगति प्रभो, जयवंतो जगदीश ।।
(अडिल्ल)
धन्य तीर्थ द्रोणागिरि पावन धाम है ।
लघु सम्मेद शिखर जी जिसका नाम है ।।
गुरुदत्तादि मुनीश इसी भू पर भये ।
निज स्वभाव साधन से शिवपद पा गये ॥
धन्य-धन्य उपसर्गजयी मुनि साधना ।
देह तजी पर तजी नहीं आराधना ।।
अचल रहे प्रभु आतम बल की ढाल से ।
हृदय पधारो नाथ जजूँ हर्षाय के ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणगिरि सिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणगिरि सिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणगिरि सिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(अवतार )
मिथ्यामल धोने नाथ, समकित जल लाऊँ।
प्रभु जन्म-मरण का रोग, तुम सम विनशाऊँ ॥
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिरसिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चंदन-सम शीतल शांत, परणति सुखकारी ।
अज्ञान जनित संताप, क्षय हो दुखहारी ।।
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिरसिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा ।

अक्षत पद के दातार, तुमसा प्रभु पाया ।
समझा संसार असार अक्षत मन भाया ।।
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु शील स्वभाव महान, अब्रम्ह भाव नशे ।
मन मेरु समान अडोल, होय अकंप लशे ॥
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो कामबाण विनाशनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु क्षुधा-वेदनी व्याधि, कैसे विनसायी ।
परिपूर्ण तृप्ति हे नाथ, निज में ही पायी ।।
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु महामहिम निज भाव, ज्ञायक दर्शाया।
चैतन्य-प्रदीप प्रकाश, पाने हूँ आया ।।
द्रोणागिरि तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥

कर्मों को दया न नाथ, उदय सदा आवे ।
बस ज्ञान ध्यान वैराग्य, भव-भय विनसावे ॥
द्रोणागिर तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु पाप-पुण्य फल मांहि, हर्ष विषाद तजूं ।
शाश्वत शिवफल सुखदाय, आतम देव भजूँ।।
द्रोणागिर तीर्थ महान, वन्दूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
पदवी अनर्घ जिननाथ, पाने आया हूँ ।
भक्ति भावों के पुंज, लेहर्षाया हूँ ।।
सब सिद्धों का सम्मान, भावी सिद्ध करे ।
जयवन्ते धर्म महान, शाश्वत हृदय बसे ।।
द्रोणागिर तीर्थ महान, वंदूँ हर्षाऊँ ।
गुरुदत्त हुये भगवान, समता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(हरिगीतिका)
समता सुधा का पान करके, जो सदा निःसंग है ।
शोकार्त न करता जिन्हें प्रतिकूल कोई प्रसंग है ॥
कृषक ने उपसर्ग ढाया था, सताने के लिये ।
गुरुदत्त मुनि साधन बना वह मोक्ष पाने के लिये ।।

(तर्ज - चलो सम्मेद शिखर चालो…)
तीर्थ द्रोणागिरि तो चालो, तीर्थ द्रोणागिरि तोचालो ।
तीरथ कर लो, भाव जगा लो, कल्मष धो डालो ॥ टेक ॥
यही भूमि गौरवशाली, गुरुदत्त ऋषि आये ।
जय उपसर्गजयी समताधर सिद्ध सुपद पाये ।।
लघु सम्मेद शिखर तीरथ भी यही कहाता है ।
सिद्धों की श्रेणी में मिलने मन ललचाता है ।।
भावना प्रभुता की भा लो ॥ तीरथ कर लो … ।।
धन्य - धन्य मुनि दशा शांति का झरना झरता है।
पंचमहाव्रत समिति गुप्ति चारित्र दमकता है ।।
कंचन कांच बराबर जिनके, महल मशान समान ।
शत्रु-मित्र की बात कहाँ सब दिखते हैं भगवान ।।
दिगम्बर मुद्रा तो ध्या लो ।। तीरथ करलो … ।।
जिन्हें कंकड़ों जैसा भासे, मणि-मुक्ता का ढेर ।
जिनका समता धन खरीदने, को असमर्थ कुबेर ॥
जिन्हें मिला चैतन्य-खजाना, सहज शांति का धाम ।
जैन धर्म के हीरे मोती, लुटा रहे अविराम ।।
दिगम्बर मुद्रा तो ध्यालो ।। तीरथ करलो … ।।
ज्ञान विराग शक्ति से शोभित, मुनिवर धर्म महान ।
आत्मधर्म अपनाते भविजन, कर लेते कल्याण ॥
नग्न दिगम्बर मुद्रा जिनकी, निर्विकार अभिराम ।
अनियतवासी आत्मनिवासी, महासुखी ऋषिधाम ॥
पूर्व भवों का बैरी आया, किया घोर उपसर्ग ।
केवलज्ञान आपने पाया, लिया वहीं अपवर्ग ॥
बैर भावों को धो डालो ॥ ॥ तीरथ करलो … ॥

फलहोड़ी बड़गाम अनूपम, द्रोणागिरिजी क्षेत्र ।
गुरूदत्तादि मुनीश्वर दर्श, धन्य हुये मम नेत्र ।।
यहीं मुनीश्वर हुये जिनेश्वर, पाया केवलज्ञान ।
दिव्य ध्वनि भी यहीं खिरी थी, यहीं लिया निर्वाण ।।
साधना सम्यक अपना लो ।। तीरथ कर लो … ।।
चौबीसी जिन मंदिर सुंदर, भव्य मूर्ति जिन धन्य ।
दर्शन महा भाग्य से पाये, जागा है अति पुण्य ।।
व्रती आश्रम में जिन मंदिर, महा मनोहारी ।
जय उपसर्गजयी मुनि वन्दूँ, दर्शन अविकारी ।।
आत्मदर्शन भविजन पा लो ।। तीरथ करलो … ।।
सिद्ध प्रभू की करूँ वंदना, सिद्ध दशा ही सार ।
समयसार ही साध्य जगत में, रत्नत्रय दातार ।।
सिद्धायतन जिन मंदिर सुंदर, प्रतिमा अति मनहार ।
यहीं आराधन करने आओ, द्रोणागिरि दरबार ।।
आत्म अनुभव भविजन पा लो ।। तीरथ करलो … ।।
ॐ ह्रीं श्री द्रोणागिर सिद्धक्षेत्रेभ्यो गुरुदत्तादि मुनीश्वरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये जयमाला
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
सिद्ध क्षेत्र की वंदना, भाव सहित जो होय ।
मिट जावे भव-भव भ्रमण, पंचमगति सुख होय ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन