ॐ
श्री सिद्धपरमेष्ठी विधान
(श्री कर्मदहन विधान)
मंगलाचरण
(अनुष्टुप्)
मंगलं सिद्धपरमेष्ठी मंगलं तीर्थंकरम् ।
मंगलं शुद्धचैतन्यं आत्मधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
मंगलं शुद्धज्ञानाय तत्त्वनिर्णय मंगलम् ।
मंगलं सर्वसर्वज्ञ आत्मनिर्णय मंगलम् ॥
(दोहा)
जयति पंचपरमेष्ठी, जिनप्रतिमा जिनधाम ।
जय जगदम्बे दिव्यध्वनि, श्री जिनधर्म प्रणाम ॥
माँ जिनवाणी की कृपा, मुझे मिले दिन-रात ।
भेदज्ञान बल प्राप्त कर, पाऊँ समकित प्राप्त ॥
(चामर)
वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलम् ।
गणधरादि सर्व साधु ध्यानरूप मंगलम् ॥
आत्मधर्म विश्वधर्म सार्वधर्म मंगलम् ।
वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम् ॥
कर्म नाश की सुविधि कर्म वसु क्षयकरम् ।
सर्व श्री सिद्ध भगवन्त प्रभु मंगलम् ॥
पीठिका
(हरिगीतिका)
कर्मक्षय की सुविधिदर्शक सिद्धपरमेष्ठी विधान।
सुविधि होते ही क्रियान्वित कर्म का मिटता निशान॥
कर्म जड़ पुद्गल अचेतन भवदुःखों के मूल हैं।
शुद्ध निज चैतन्य के तो ये महा-प्रतिकूल हैं॥
इन्हीं के क्षय हेतु मैं अब शरण में आया प्रभो।
प्रकृति इनकी नाश करने को तुम्हें ध्याया विभो॥
मनुज भव उत्तम मिला है मिली जिनवर भक्ति भी।
मिला समकित का सुअवसर तथा संयम शक्ति भी॥
ध्यान ज्वाला में करूँगा दहन आठों कर्म को।
सिद्ध पद निष्कर्म लूँगा प्राप्त कर सद्धर्म को॥
दो मुझे आशीष पावन पूज्य सिद्ध महा-महान्।
सिद्धपरमेष्ठी विधान करूँ सु पाऊँ आत्मभान॥
(हरिगीत)
नाश ज्ञानावरण ज्ञान अनन्त निज प्रकटाऊँगा।
नाश दर्शन-आवरण सुअनन्त दर्शन पाऊँगा॥
वेदनीय विनाश अव्याबाध सुख मैं पाऊँगा।
मोहनीय विनाश कर मैं वीर्यगुण प्रकटाऊँगा॥
आयुकर्म विनाश गुण अवगाहनत्व सुपाऊँगा।
नामकर्म विनाश गुण अगुरुलघुत्व सुपाऊँगा॥
गोत्रकर्म विनाश गुण सूक्ष्मत्व हे प्रभु पाऊँगा।
अंतराय विनाश गुण सम्यक्त्व क्षायिक पाऊँगा॥
अष्टकर्म विनाश हे प्रभु गुण अनंत प्रकट करूँ।
आत्मज्ञान प्रकाश पा संसार सर्व विघट करूँ॥
(सोरठा)
कर्म सर्व दुःखरूप, मूल प्रकृतियाँ आठ हैं।
इक शत अड़तालीस, उत्तर प्रकृति प्रसिद्ध हैं॥
कर्म घातिया, चार, आतम के गुण घातते ।
हैं अघातिया चार, मुक्ति-सौख्य-बाधक सदा ।।
कर्म घातिया चार, पहला ज्ञानावरण है।
इसका ही तो भ्रात, द्वितिय दर्शनावरण है॥
भव-विभ्रम का मूल, मोहनीय है तीसरा ।
शिवसुख-बाधक पूर्ण, अन्तराय चौथा गिनो ॥
अरु अघातिया चार, पहला आयु प्रसिद्ध है।
द्विविध कर्म है नाम, तृतीय गोत्र पहचानिए ॥
भवमय दुःख-सुखरूप, वेदनीय चौथा सुनो।
ये ही आठों कर्म, त्वरित दहन के योग्य हैं।।
(छंद - ताटंक)
घातिकर्म की सैंतालीस प्रकृति करतीं घातक-उत्पात ।
अघातिया की इकशत एक प्रकृति से रुकता मुक्ति-प्रभात ॥
पहले घातिकर्म क्षय करना फिर अघातिया क्षय करना।
दोनों को क्षय करके ही तुम मुक्तिप्रभात प्राप्त करना ॥
(वीरछन्द)
कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति को अब तुम जानो भलीप्रकार।
ऐसी स्थिति नहीं बँधे फिर इसका ही तुम करो विचार ॥
ज्ञानावरण कर्म की उत्कृष्ट कोड़ाकोड़ी सांगर तीस ।
कर्म दर्शनावरण की है कोड़ाकोड़ी सागर तीस ।।
वेदनीय कर्म की स्थिति कोड़ाकोड़ी सागर तीस ।
अन्तराय की उत्कृष्ट स्थिति कोड़ाकोड़ी सागर तीस ।।
नामकर्म की उत्कृष्ट स्थिति कोड़ाकोड़ी सागर बीस ।
गोत्रकर्म की उत्कृष्ट स्थिति कोड़ाकोड़ी सागर बीस ।।
आयुकर्म की उत्कृष्ट स्थिति तुम तैंतिस सागर लो जान।
मोहनीय की सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर स्थिति मान ।।
अब कर्मों की जघन्य स्थिति भी जानो तुम भलीप्रकार ।
उन्हें नहीं बँधती है जो कर देते हैं इनका संहार ।।
जैसे नामकर्म का होता वैसा ही बँधता अनुभाग ।
स्थिति तदनुसार बँधती है जैसा भी होता है राग ।।
(छंद - रोला)
है अन्र्मुहूर्त कर्म ज्ञानावरणी की।
है अन्तर्मुहूर्त कर्म दर्शनावरणी की ।।
मोहनीय की है अन्तर्मुहूर्त यह जानो ।
वेदनीय की है बारह मुहूर्त पहचानो ।।
आयुकर्म की भी अन्तर्मुहूर्त पहचानो ।
अंतराय की भी अन्तर्मुहूर्त तुम जानो ।।
नामकर्म की केवल आठ मुहूरत जानो ।
गोत्रकर्म की केवल आठ मुहूरत जानो ।।
जैसा हो परिणाम बंध वैसा होता है।
जघन्य या उत्कृष्ट मध्य बंधन होता है ।।
कौन-कौन सी प्रकृति बँधी वह प्रकृति-बंध है।
आत्मप्रदेशों में बँधना वह प्रदेश-बंध है ॥
कितनी स्थिति बँधी वही स्थिति-बंध है।
कितना रस बल बँधा वही अनुभाग-बंध है।।
नाना करम उदय को ही विपाक कहते हैं।
इस विपाक को ही अनुभाग-बंध कहते हैं।।
स्थिति पूरी होते ही सविपाक-निर्जरा ।
स्थिति के पहले होती अविपाक-निर्जरा ।।
कर्मों के नामानुसार अनुभाग-बंध है।
भाव-द्रव्य आस्रव से ही यह कर्म-बंध है ।।
शुभपरिणामों से शुभ-प्रकृति अधिक बँधती है।
उसके संग में अशुभ-प्रकृति आकर बँधती है ।।
अशुभभाव से अशुभप्रकृति अधिक बँधती है।
उसके संग में शुभप्रकृति अल्प बँधती है ॥
(दोहा)
ज्ञानावरणी ढक रहा, है अनादि से ज्ञान।
पाँच प्रकृति इस कर्म की, नाशक ज्ञान महान् ॥
कर्म दर्शनावरणी को, दर्शन बाधक मान।
इसकी कुल नौ प्रकृतियाँ, क्षय करते भगवान् ॥
वेदनीय इस कर्म की, निज सुख बाधक मान ।
इसकी दोनों प्रकृतियाँ, क्षय करते गुणवान ॥
मोहनीय सम्यक्त्व में, पूरा बाधक मान।
नाश योग्य हैं प्रकृतियाँ, अट्ठाईस प्रधान ।।
आयुकर्म से बंध है, चहुँगति की पहचान ।
प्रकृति चार के नाश से, हो जाते भगवान् ॥
नामकर्म जड़ देहप्रद, सर्व दुःखों की खान।
हैं तिरानवे प्रकृतियाँ, नाश योग्य लो जान ॥
गोत्रकर्म को जानिए, ऊँच-नीच है काज ।
इसकी भी दो प्रकृतियाँ, क्षय करते मुनिराज ॥
दान-लाभ-भोगादि में, बाधक है अंतराय ।
प्रकृति पाँच इस कर्म की, क्षय करते मुनिराय ।।
कर्म-प्रकृतियाँ मूल वसु, ये ही भवतरु मूल ।
इक शत अड़तालीस हैं, उत्तर प्रकृति जु शूल ॥
चार घातिया नाशते, हो जाते अरहंत ।
चार अघाति विनाशते, होते सिद्ध महन्त ।।
अष्टकर्म को नाश कर, हुए सिद्ध भगवन्त ।
त्रिलोकाग्र के शीर्ष पर, सदा सतत जयवन्त ।।
(वीरछन्द)
मूल वृक्ष का कर्म वृक्ष है जिसमें चार घाति दृढ़ मूल ।
संग बंध करता अघातिया भी जो है निज के प्रतिकूल ॥
इन्हें नष्ट करने का श्रम ही सर्वोत्तम श्रम कहलाता ।
केवल निश्चय श्रमण साधु ही इन्हें नष्ट है कर पाता ॥
पहले घातिकर्म क्षय करता सर्व कषाय भाव क्षय कर।
फिर अघातिया क्षय करता है सकल योग पूर्ण जय कर ॥
हो जाती निष्कर्म अवस्था कर्मजयी बन जाता है।
द्रव्य-भाव-नो कर्म नाशकर कर्मरहित हो जाता है ।।
जो अघातिया क्षय करने का पहले करते व्यर्थ उपाय।
वही घातिया कर्मों के बंधन पाते हैं बहु दुःखदाय ।।
उलटी ही गिनती गिनता है करता है सब औंधे काम।
कर्म नहीं क्षय कर पाता है पाता है सदैव दुःखधाम ।।
सीधी गिनती गिने अगर तो घातिकर्म क्षय हो जाता।
फिर अघातिया भी क्षय होते फिर न लौट वापस आता ॥
पहले दर्शन मोह जीतना सम्यग्दर्शन प्रकटाना ।
फिर चारित्र मोह जीतना निज अरहंत दशा पाना ।।
यही सुविधि है मोक्षमार्ग की इसका ही पालन करना।
मत बहकावे में तुम आना पहले घाति नाश करना ।।
नहीं समझना यह मिथ्यात्व अकिंचित्कर तुम पलभर भी।
जैसे भी हो यह मिथ्यात्व तिमिर क्षय करना मरकर भी ॥
इसे अकिंचित्कर कहनेवाले तो निश्चित भोले प्राणी।
इसे अकिंचित्कर नहीं मानना कभी भूलकर हे प्राणी ॥
व्रत लेने का अगर भाव हो तो पहले समकित लेना।
फिर व्रत लेना बड़े भाव से कर्मों को क्षय कर देना ॥
बिन सम्यग्दर्शन के यदि व्रत लोगे तो यह तुम जानो।
त्रस पर्याय व्यर्थ जाएगी आगम का कहना मानो ।।
(गीतिका)
दो मुझे आशीष जिनवर करूँ मैं निज आत्मज्ञान ।
विनय से पूजन करूँ मैं सिद्ध परमेष्ठी महान् ॥
कर्म आठों ध्वस्त कर दूँ नाथ ऐसी शक्ति दो।
धर्म रत्नत्रय परम की सतत पावन भक्ति दो ।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्
܀ ܀ ܀
ऊँचे ऊँचे शिखरों वाला रे, यह तीरथ हमारा।
तीरथ हमारा हमें लागे है प्यारा ॥टेक॥
श्री जिनवर से भेंट करावे, जग को मुक्तिमार्ग दिखावे ।।
मोह का नाश करावे रे, यह तीरथ हमारा ॥१॥
शुद्धातम से प्रीति लगावे, जड़-चेतन को भिन्न बतावे ।।
भेद-विज्ञान करावे रे, यह तीरथ हमारा ।।२।।
पूजन क्र. १
श्री सिद्ध पूजन
स्थापना
(छंद - ताटंक)
हे सिद्ध तुम्हारे वन्दन से उर में निर्मलता आती है।
भव-भव के पातक कटते हैं पुण्यावलि शीश झुकाती है॥
तुम गुण चिन्तन से सहज देव होता स्वभाव का भान मुझे ।
है सिद्ध समान स्वपद मेरा हो जाता निर्मल ज्ञान मुझे ॥
इसलिए नाथ पूजन करता कब तुम समान मैं बन जाऊँ।
जिस पथ पर चल तुम सिद्ध हुए मैं भी चल सिद्ध स्वपद पाऊँ ॥
ज्ञानावरणादिक अष्टकर्म को नष्ट करूँ ऐसा बल दो।
निज अष्ट स्वगुण प्रकटै मुझमें सम्यक् पूजन का यह फल हो ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(वीरछन्द)
कर्म मलिन हूँ जन्म-जरा-मृतु को कैसे कर पाऊँ क्षय।
निर्मल आत्मज्ञान जल दो प्रभु जन्म-मृत्यु पर पाऊँ जय ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
शीतल चंदन ताप मिटाता किन्तु नहीं मिटता भवताप ।
निज स्वभाव का चन्दन दो प्रभु मिटे राग का सब संताप ॥
अजर-अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ।।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चंदनं नि.।
उलझा हूँ संसारचक्र में कैसे हो इससे उद्धार ।
अक्षय तंदुल रत्नत्रय दो मैं हो जाऊँ भवसागर पार ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
कामव्यथा से घायल हूँ मैं कैसे करूँ काममद नाश।
विमल दृष्टि दो ज्ञानपुष्प दो कामभाव हो पूर्ण विनाश ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने कामबाणविनाशनाय पुष्पं नि.।
क्षुधारोग के कारण मेरा तृप्त नहीं हो पाया मन।
शुद्ध भाव नैवैद्य मुझे दो सफल करूँ प्रभु यह जीवन ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मोहरूप मिथ्यात्व महातम अन्तर में छाया घनघोर ।
ज्ञानदीप प्रज्वलित करो प्रभु प्रकटे समकित रवि का भोर ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. ।
कर्म शत्रु निज सुख के घाता इनको कैसे नष्ट करूँ ।
शुद्ध धूप दो ध्यान अग्नि में इन्हें जला भव कष्ट हरू ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मविनाशनाय धूपं नि. ।
निज चैतन्य स्वरूप न जाना कैसे निज में आऊँगा।
भेदज्ञान फल दो हे स्वामी ! स्वयं मोक्षफल पाऊँगा ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञान्. स्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल प्राप्तये फलं नि.।
अष्ट द्रव्य का अर्घ्य चढ़ाऊँ अष्टकर्म का हो संहार ।
निज अनर्घ्यपद पाऊँ भगवन सादि अनन्त परम सुखकार ॥
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी अनन्त गुणधाम ।
नित्य निरंजन भवदुःख भंजन ज्ञानस्वभावी सिद्ध प्रणाम ॥
ॐह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्रांप्तये अर्घ्य नि. ।
जयमाला
(वीरछन्द)
मुक्तिकन्त भगवन्त सिद्ध को मन-वच-काय सहित सु प्रणाम ।
अर्ध चन्द्रसम सिद्धशिला पर आप विराजे आठों याम ॥
ज्ञानावरण दर्शनावरणी मोहनीय अन्तराय मिटा ।
चार घातिया नष्ट हुए तो फिर अरहंत रूप प्रकटा ।।
वेदनीय अरु आयु नाम अरु गोत्र कर्म का नाश किया।
चउ अघातिया नाश किये तो स्वयं स्वरूप प्रकाश लिया ॥
अष्टकर्म पर विजय प्राप्त कर अष्ट स्वगुण तुमने पाये।
जन्म-मृत्यु का नाश किया निज सिद्ध स्वरूप स्वगुण भाये ॥
निज स्वभाव में लीन विमल चैतन्य स्वरूप अरूपी हो।
पूर्ण ज्ञान हो पूर्ण सुखी हो पूर्ण बली चिद्रूपी हो ।।
वीतराग हो सर्व हितैषी राग-द्वेष का नाम नहीं।
चिदानन्द चैतन्य स्वभावी कृतकृत्य कुछ काम नहीं ।।
स्वयं सिद्ध हो स्वयं बुद्ध हो स्वयं श्रेष्ठ समकित आगार ।
गुण अनन्त दर्शन के स्वामी तुम अनंत गुण के भण्डार ॥
तुम अनन्त बल के हो धारी ज्ञान अनन्तानन्त अपार ।
बाधा रहित सूक्ष्म हो भगवन् अगुरुलघु अवगाह उदार ॥
सिद्ध स्वगुण के वर्णन तक की मुझमें प्रभुवर शक्ति नहीं।
चलूँ तुम्हारे पथ पर स्वामी ऐसी भी तो भक्ति नहीं ॥
देव तुम्हारा पूजन करके हृदयकमल मुसकाया है।
भक्ति भाव उर में जागा है मेरा मन हर्षाया है ।।
तुम गुण का चिन्तवन करे जो स्वयं सिद्ध बन जाता है।
हो निजात्म में लीन दुखों से छुटकारा पा जाता है ।।
अविनश्वर अविकारी सुखमय सिद्ध स्वरूप विमल मेरा।
मुझमें है मुझसे ही प्रकटेगा स्वरूप अविकल मेरा ।।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिने जयमालापूर्णार्घ्यं नि. ।
आशीर्वाद
(दोहा)
शुद्ध स्वभावी आत्मा, निश्चय सिद्ध स्वरूप।
गुण अनन्तयुत ज्ञानमय, है त्रिकाल शिवभूप ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्
जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं श्री अनन्तानन्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः ।
܀܀܀
पूजन क्र. २
श्री सिद्ध परमेष्ठी विधान
समुच्चय पूजन
स्थापना
(छंद - ताटंक)
अष्ट गुणों से भूषित परम सिद्ध परमेष्ठी को वन्दन ।
ज्ञानावरणादिक कर्मों को हर कर पाया मुक्ति सदन ।।
गुण अनंत की महिमा पायी मुख्य अष्ट गुण प्रकटाए।
सिद्धपुरी सिंहासन पाकर सिद्ध शिला पति कहलाए ॥
विनयपूर्वक अष्टगुणों की पूजन का जागा उर भाव ।
अष्ट-स्वगुण मैं भी पाऊँ प्रभु अष्टकर्म का करूँ अभाव ॥
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूहं ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठः।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छंद - मानव)
निज शुद्धभाव जल लाऊँ सिद्धों के गुण ही गाऊँ।
जन्मादि रोगत्रय क्षयहित शिवपथ पर चरण बढ़ाऊँ ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ॥
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
निज शुद्धभाव का चंदन शीतल निज उर में लाऊँ।
भवज्वर संपूर्ण मिटाऊँ तुम सम शीतलता पाऊँ ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नि.।
निज शुद्धभाव अक्षत ही क्षत भावों को क्षय करता।
अक्षय पद का दाता है उर में अखण्ड सुख भरता ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ॥
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
निज शुद्धभाव पुष्पांजलि गुणशील महान् प्रदाता।
कामाग्नि बुझाती है यह निष्काम भाव की दाता ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।
निज शुद्धभाव रस चरु ही पद निराहार के दाता।
हैं क्षुधारोग विध्वंसक परिपूर्ण सौख्य के दाता ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. ।
निज शुद्धभाव के दीपक उर में प्रकाश भरते हैं।
मिथ्यात्व मोहतम सारा कुछ क्षण में ही हरते हैं।।
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. ।
निज शुद्धभाव की पावन प्रिय धूप परम हितकारी।
वसुकर्म नष्ट करती है देती पद शिवसुखकारी ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ.हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि. ।
निज शुद्धभाव फल उत्तम है महामोक्ष फलदाता ।
जो निज स्वभाव को भजता वह शीघ्र परम पद पाता ।।
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महामोक्षफलप्राप्तये फलं नि. ।
निज शुद्धभाव के निर्मल निज अर्घ्य बनाऊँ अनुपम ।
पदवी अनर्घ्य पाने में हो जाऊँ हे प्रभु सक्षम ॥
हैं श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु गुण अनंत से भूषित ।
मैं मुख्य अष्टगुण पूजूँ हो जाऊँ भवदुख विरहित ।।
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. ।
अर्ध्यावलि
(छंद - ताटंक)
ज्ञान अनंत महा महिमामय परम श्रेष्ठ है परम विशाल ।
युगपत् लोकालोक जानता एक समय में तीनों काल ॥
सकल द्रव्य गुण पर्यायों को दर्पणवत् लेता है जान ।
रहित ज्ञान आवरण ज्ञान गुण अर्घ्य चढ़ाऊँ हे भगवान् ॥
ॐ ह्रीं अनंतज्ञानगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गुण अनंत दर्शन की महिमा से शोभित हैं सिद्ध महंत ।
लोकालोक तीन काल का दृष्टा दर्शन गुण भगवंत ॥
मैं अनंत दर्शन गुण को ही अर्घ्य चढ़ाऊँ हे भगवान् ।
रहित दर्शनावरणी केवल दर्शन पाऊँ महामहान् ।।
ॐ ह्रीं अनंतदर्शनगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गुण अनंत सुख महिमा मंडित अव्याबाधी सुख का स्रोत ।
सादि अनंतानंत काल तक निज शिवसुख से ओतप्रोत ॥
यह सम्पूर्ण सुखों से निर्मित वेदनीय का कहीं न नाम।
जितने सिद्ध महाप्रभु हैं उनमें यह करता है विश्राम ।।
ॐ ह्रीं अनंतगुणसमन्वितश्रीसिंद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुण क्षायिक सम्यक्त्व श्रेष्ठ है तीनों लोकों में विख्यात ।
इसके होने पर ही होता महामोक्ष का विमल प्रभात ।।
महामोहतम का नाशक है दृढ़ श्रद्धा का है आधार ।
अर्घ्य चढ़ाऊँ विनय भाव से पाऊँ ध्रुव श्रद्धान अपार ॥
ॐ ह्रीं क्षायिकसम्यक्त्त्वगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुण अवगाहनत्व सिद्ध परमेष्ठी का पावन श्रृंगार ।
चार आयु का क्षयकर्ता है शिवसुख देता अपरंपार ।।
परमानंद समुद्र यही है चारों गति से सदा विहीन ।
भक्तिभाव से अर्घ्य समर्पित करके होऊँ परम प्रवीण ॥
ॐ ह्रीं अवगाहनत्वगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुण सूक्ष्मत्व परम महिमामय नाम कर्म से रहित सदा।
तेरानवे प्रकृति से विरहित सादि अनंत काल सुखदा ॥
सूक्ष्मत्व गुण को मैं अर्घ्य चढ़ाऊँ शुद्ध भावनामय ।
बनूँ सिद्ध परमेष्ठी इक दिन साधक रहूँ साधनामय ।।
ॐ ह्रीं सूक्ष्मत्वगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अगुरुलघुत्व स्वगुण की गरिमा सिद्धस्वपदधारी पाते।
गोत्र कर्म से विरहित होकर सिद्धशिलापति हो जाते ॥
अर्घ्य चढ़ाऊँ अगुरुलघुत्व सुगुण को हे अन्तर्यामी ।
समभावी हो साम्यभाव रस पियूँ सदा ही हे स्वामी ॥
ॐ ह्रीं अगुरुलघुत्वगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्ण अनंतवीर्य गुण पावन शाश्वत बल का दाता है।
पंचलब्धियों का दाता है आगम में विख्याता है ।।
अंतराय से रहित सर्वथा शाश्वत सुख का है सागर।
भावसहित मैं अर्घ्य चढ़ाऊँ भर लूँ अनुभव रस गागर ॥
ॐ ह्रीं अनंतवीर्यगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
महार्घ्य
(छंद - ताटंक)
ज्ञानावरणी के अभाव से पूर्ण ज्ञान गुण आता है।
दर्शन आवरणी के क्षय से दर्शन गुण निज आता है ।।
वेदनीय के अभाव से अव्याबाधी गुण आता है।
मोहनीय के अभाव से ही क्षायिक समकित आता है।।
आयुकर्म के अभाव से ही अवगाहनत्व आता है।
नामकर्म के अभाव से सूक्ष्मत्व सुगुण हर्षाता है ।।
गोत्रकर्म के अभाव से गुण अगुरुलघु उर आता है।
अंतराय के अभाव से गुण अनंतवीर्य सज आता है ।।
ये आठों ही गुण आठों कर्मों के क्षय से आते हैं।
जो आठों ही गुण पा लेते वही सिद्ध हो जाते हैं ।॥
मैं भी ऐसा यत्न करूँ प्रभु सम्यग्दर्शन प्रकटाऊँ ।
फिर संयम ले श्रेणी चढ़कर अष्टकर्म घन विघटाऊँ ।।
निश्चित अष्ट स्वगुण मेरे भीतर प्रकटेंगे हे स्वामी।
गुण अनंत से शोभित हो पाऊँगा ध्रुवं सुखनामी ।।
(छंद - मानव)
रागादि भाव का बंधन भव-भव तक दुख देता है।
अज्ञानभाव के कारण सुख सभी छीन लेता है।।
विपरीत विनय संशय अरु एकान्त महादुख देता।
पाँचों मिथ्यात्व भाव ही प्रतिपल अनंत दुख देता ॥
पहले मिथ्यात्व विनाशो फिर व्रत का भाव धरो उर।
बिन समकित जप तप संयम चहुँगति दुख ही देता है ।।
समकित ले अविरति नाशो जीतो प्रमाद को तत्क्षण।
संयम हो जाता है तो सारे ही सुख देता है ।।
(दोहा)
महा-अर्घ्य अर्पण करूँ, मुख्य अष्टगुंण हेतु ।
इस जीवन में प्राप्त हो, गुण अनंत का सेतु ॥
ॐ ह्रीं अष्टगुणसमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(छंद - दिग्वधू)
प्रभु जन्म जरा का दुख, मुझसे न सहा जाता।
हर बार मरण का दुख, पीड़ा बहु पहुँचाता ।।
भवज्वर की पीड़ा से, मैं आकुल-व्याकुल हूँ।
गुण शीतल शान्त न हो, तो सदा अनाकुल हूँ।।
क्षत भावों के कारण, अक्षत गुण घात किए।
अक्षय पद नहीं मिला, ध्रुव सुख नाहीं प्राप्त किए ॥
चिर कामबाण का दुख, पीड़ा बहु पहुँचाता।
गुण शील पुष्प के बिन निष्काम न सुख आता ।।
यह क्षुधारोग मुझको, देता अनादि से दुख ।
निज अनाहार पद बिन मिलता न रंच भी सुख ॥
भ्रमतम का अँधियारा होने न ज्ञान देतां ।
जगती है बुद्धि कभी तो उसको हर लेता ।।
बिन ध्यानधूप के प्रभु सम्यक् न ध्यान होता ।
पद नित्य निरंजन बिन क्या सुख महान् होता ॥
फल मोक्ष नहीं पाया भव-भव में भटका हूँ।
परभावों में ही प्रभु अबतक मैं अटका हूँ।।
भव के ही अर्घ्य बना निज दुख ही उपजाया।
पदवी अनर्घ्य के हित निज को न कभी ध्याया ॥
हे सिद्ध परमेष्ठी प्रभु तुमको ही नित ध्याऊँ।
तुव शरण प्राप्त करके तुम-सम ही बन जाऊँ ॥
इसलिए करूँ पूजन वन्दन अर्चन स्वामी ।
शाश्वत शिव-सुख दे दो अब तो अन्तर्यामी ।।
भव भाव अभाव करूँ शाश्वत स्वभाव पाऊँ।
आनंद अतीन्द्रिय की धारा उर में लाऊँ ॥
ॐ ह्रीं अष्टगुणसंमन्वितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जयमालापूर्णार्घ्य नि. ।
आशीर्वाद
(वीरछन्द)
श्री सिद्धपरमेष्ठी प्रभु के वसु गुण पूजे मैंने आज ।
निज स्वभाव की महिमा पाकर पाऊँ अपना निजपदराज ॥
श्री सिद्ध परमेष्ठी प्रभु के विधान का है यह उद्देश्य ।
भवदुख क्षय हों कर्म नाश हो जिन गुण सम्पति मिले विशेष ॥
इत्याशीर्वादः।
कर्मोदय क्षय क्षयोपशम, उपशम से निरपेक्ष ।
सहज शुद्ध निर्मल अहो ! ज्ञायकभाव अखेद ।।
पूजन क्र. ३
ज्ञानावरणीकर्म विरहित
श्री सिद्धपरमेष्ठी पूजन
स्थापना
(दोहा)
ज्ञानावरणी कर्म के, नाशक श्री अरहंत ।
केवलज्ञान महान् के, धारक श्री भगवंत ॥.
ज्ञानावरण विनाश कर, पाऊँ केवलज्ञान।
विनयसहित पूजन करूँ, करूँ आत्मकल्याण ॥
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम संन्निहितो
भव भव वषट् ।
(सार-जोगीरासा)
जन्म-जरा-मृतु क्षय करने को नाथ शरण में आया।
ज्ञान अनंतानंत प्राप्ति का दृढ़ निश्चय उर भाया ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।
भवाताप ज्वर की पीड़ा से कष्ट अनंत उठाया।
भवज्वरनाशक शीतल चंदन भावमयी मैं लाया ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञान सूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय
'चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत जीवन क्षत है मेरा अक्षय पद कब, पाऊँ।
भवसागर से तर जाने को अक्षत शालि चढ़ाऊँ ।।
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
कामबाण की पीड़ा नाशॅ पुष्प मनोज्ञ चढ़ाऊँ ।
अविकारी भावों को पाकर महाशील गुण पाऊँ ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहित श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो कामबाणविध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
क्षुधारोग विध्वंस हेतु मैं शुभ नैवेद्य चढ़ाऊँ ।
मैं तो नाथ अनाहारी हूँ अनुपम पद प्रकटाऊँ ।।
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
महामोहतम ध्वंस करूँ मैं दीप ज्ञान के लाऊँ ।
युगपत् लोकालोक सु झलके 'केवलज्ञान उपाऊँ ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टकर्म विध्वंसक पावन धूप ध्यानमय लाऊँ ।
गुण अनंत प्रकटाने को पद नित्य निरंजन पाऊँ ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्धप्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
महामोक्ष फल पाने का ही निश्चय उर में लाऊँ।
यह संसार अभाव करूँ मैं महामोक्ष फल पाऊँ ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्धप्रभु को वन्दन ।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञान सूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।
नाथ अनर्घ्य स्वपद प्रकटाऊँ यही भाव उर लाऊँ।
भव अटवी को ध्वंस करूँ मैं अर्घ्य अपूर्व बनाऊँ ॥
ज्ञानावरणी कर्म विनाशक सिद्ध प्रभु को वन्दन।
पाँच प्रकृतियों के क्षयकर्त्ता ज्ञानसूर्य अभिनन्दन ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्ध्यावलि
(छंद - चान्द्रायण)
मति ज्ञानावरणी बाधक मतिज्ञान में।
मति ज्ञानावरणी नागूंगा ध्यान में ।।
ज्ञानावरणी पाँच प्रकृतियाँ क्षय करूँ ।
ज्ञानावरणी कर्म आज मैं जय करूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं मतिज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
श्रुत ज्ञानावरणी बाधक श्रुतज्ञान में।
श्रुत ज्ञानावरणी नाशूँ ध्यान में ।।
ज्ञानावरणी पाँच प्रकृतियाँ क्षय करूँ।
ज्ञानावरणी कर्म आज मैं जय करूँ ॥२॥
ॐ ह्रीं श्रुतज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अवधिज्ञान आवरण जु बाधक ज्ञान में।
अवधिज्ञान आवरण विनाशूँ ध्यान में ।।
ज्ञानावरणी पाँच प्रकृतियाँ क्षय करूँ।
ज्ञानावरणी कर्म आज मैं जय करूँ ॥३॥
ॐ ह्रीं अवधिज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मनपर्यय आवरण प्रकृति बाधक सदा।
इसका क्षय कर पाऊँ ज्ञान महा सदा ।।
ज्ञानावरणी पाँच प्रकृतियाँ क्षय करूँ।
ज्ञानावरणी कर्म आज मैं जय करूँ ॥४॥
ॐ ह्रीं मनःपर्ययज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
केवल ज्ञानावरण ज्ञान बाधक महा।
इसे नाश दूँ पाऊँ केवल रवि महा ।।
ज्ञानावरणी पाँच प्रकृतियाँ क्षय करूँ।
ज्ञानावरणी कर्म आज मैं जय करूँ ॥५॥
ॐ ह्रीं केवलज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
पाँचों प्रकृति विनाश कर, पाऊँ केवलज्ञान।
स्वपर प्रकाशक ज्ञान पा, पाऊँ स्वपद महान् ।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्।
असंयम की भावना भी कुचल देता ज्ञान से ।
प्रमादों को नष्ट करता सावधान स्वध्यान से ।।
फिर कषायें नष्ट करता प्राप्त करता यथाख्यात ।
प्रकट कर सर्वज्ञ निज पद ज्ञान का पाता प्रभात ॥
योग क्षय का सतत उद्यम स्वतः होता है अपूर्व ।
योग क्षय कर सिद्ध होता स्वपद होता ध्रुव अपूर्व ॥
साद्यनन्तानन्त कालों स्वयं में करता निवास ।
विलसता है मोक्षसुख अरु स्वयं की पाता सुवास ॥
अभी जिनपथ को सुसम्यक् प्राप्त करना चाहिए।
ज्ञानभावी भावना उर व्याप्त करना चाहिए ।।
आत्मसुख की भावना से ओतप्रोत हृदय हुआ।
भावना भवनाशिनी का प्राप्त आज समय हुआ ॥
मोह भ्रम से रहित होकर शुद्ध जीवन जियूँगा।
शुद्ध अनुभव रससहित निज ज्ञान रस ही पियूँगा ॥
ज्ञान गुण सम्पन्न होकर रहूँगा आलोक में।
शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध होकर बहूँगा निज लोक में ।॥
ज्ञान का आवरण क्षय कर पाऊँगा कैवल्यज्ञान ।
सिद्ध प्रभु को पूजकर में बनूँगा सबसे महान् ॥
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्योअनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला
पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
आशीर्वाद
(दोहा)
ज्ञानावरण विनाश से, मिले स्वपद निर्वाण।
अपने ही बल से करूँ, मुक्ति-भवन निर्माण ॥
इत्याशीर्वादः ।
पूजन क्र. ४
दर्शनावरणीकर्म विरहित
श्री सिद्धपरमेष्ठी पूजन
स्थापना
(छंद - रोला)
श्री सिद्ध प्रभुओं को सादर सविनय वन्दूँ ।
दर्शन आवरणी के नाशक को अभिनन्दूँ ॥
ज्ञान भावना भाऊँ अपना ज्ञान जगाऊँ ।
केवल दर्शन के बाधक भव भाव भगाऊँ ।।
(दोहा)
भावसहित पूजन करूँ, करूँ आत्मकल्याण।
केवल-दर्शन प्राप्त कर, दृष्टा बनूँ महान् ।।
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव
भव वषट्।
(छंद - राधिका)
जन्मादि रोग त्रय नष्ट करूँ हे स्वामी।
क्षीरोदधि जल लाया हूँ अन्तर्यामी ॥
अरहंतदेव दर्शन अनन्त गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं नि. ।
संसार ताप क्षय करने को मैं आया।
उत्तम मलयागिरि चंदन शीतल लाया ।।
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय
चंदनं नि. ।
अक्षय पद पाने का विवेक उर भाया।
मैंशालिअखण्डितउज्ज्वलचिन्मयलाया ॥
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतान् निः+
मैं कामबाण नाशक गुण पुष्प सजाऊँ।
मैं महाशील गुण ज्ञान स्वभावी लाऊँ ।
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यः कामबाणविध्वंसनाय
पुष्पं नि.।
चिर क्षुधा रोग विध्वंस करूँ चरु लाऊँ।
पद शीघ्र अनाहारी अपना प्रकटाऊँ ॥
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं नि. ।
ध्रुव ज्ञान दीप केवल प्रकाशमय लाऊँ।
मोहान्धकार क्षय करके निज पद पाऊँ ॥
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि.।
मैं शुक्लध्यान की धूप चढ़ाऊँ स्वामी।
वसु कर्म नाशकर शिव पद पाऊँ नामी ॥
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय
धूपं नि.।
निजआत्मध्यान कर महामोक्षफल पाऊँ।
फल शुक्ल ध्यान का उर अविलंब सजाऊँ ।।
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
पदवी अनर्घ्य पाने प्रभु निज को ध्याऊँ।
निजगुण के अर्घ्य बनाऊँ शिवसुख पाऊँ ।।
अरहंत देव दर्शन अनंत गुणधारी ।
नौ प्रकृति दर्शनावरणी के क्षयकारी ॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
अर्ध्यावलि
(दोहा)
दर्शन आवरणी प्रकृति, नौ को लूँ पहचान ।
दर्शन गुण की प्राप्ति हित, करूँ शीघ्र अवसान ।।
(छंद - ताटंक)
चक्षु दर्शनावरणी विनाशें सम्यक् दृष्टा हो जाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ॥१॥
ॐ ह्रीं चक्षुदर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. ।
अचक्षु दर्शनावरण विनाशें सम्यक् दृष्टा हो जाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ॥२॥
ॐ ह्रीं अचक्षुदर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
अवधि दर्शनावरण विनाशें सम्यक् दृष्टा हो जाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ॥३॥
ॐ ह्रीं अवधिदर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
केवल दर्शन का आवरण मिटा निज दृष्टा हो जाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ।।४।।
ॐ ह्रीं केवलदर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तयेअर्घ्य नि.।
दर्शन-आवरणी की निद्रा प्रकृति विनाशें सुख पाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ।।५।।
ॐ ह्रीं निद्रादर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
निद्रा-निद्रा प्रकृति विनाशें जागृत दृष्टा हो जाऊँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ पूर्णतया प्रभु विघटाऊँ ॥६॥
ॐ ह्रीं निद्रा-निद्रा दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये
अर्घ्य नि.।
दर्शन आवरणी की प्रचला प्रकृति विनाशॅ निज बल से ।
भेद दर्शनावरणी के नौ नाशें शुद्ध आत्मबल से ॥७॥
ॐ ह्रीं प्रचला दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
प्रचला-प्रचला प्रकृति विनाशें पूर्ण जागृत रहूँ सदा।
भेद दर्शनावरणी के नौ नाशॅ बनूँ आत्मदृष्टा ।।८।।
ॐ ह्रीं प्रचला-प्रचलादर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य नि.।
दर्शन आवरणी की प्रकृति स्त्यानगृद्धि पूरी नाशूँ।
भेद दर्शनावरणी के नौ नाशूँ निज बल प्रकाशुं ॥९॥
ॐ ह्रीं स्त्यानगृद्धिदर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य नि.
(वीरछंद)
छद्मस्थों को पहले दर्शन होता फिर होता है ज्ञान ।
किंन्तु केवली प्रभु को होता युगपत ही दर्शन अरु ज्ञान ॥
ज्ञानावरणी सदा ज्ञान गुण का बाधक है पहचानो ।
दर्शन आवरणी दर्शन गुण का बाधक है यह जानो ॥
ज्ञानावरणी दर्शन आवरणी का क्षय एक संग होता।
अतः केवली को दर्शन अरु ज्ञान सदा युगपत होता ॥
क्योंकि मनःपर्यय सुज्ञान मतिज्ञान पूर्वक ही होता।
अतः मनःपर्यय दर्शन आवरण कर्म भी ना होता ।।
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
महार्घ्य
(छंद - मानव)
अपना पुरुषार्थ जगाकर विधिपूर्वक शिवपथ पाऊँ ।
रत्नत्रय की निधियाँ पा हे प्रभु पण्डित हो जाऊँ ।
रागादि विकारी भावों का नाम न रहने दूँ अब ।
अनुभव रस वर्षा रिमझिम हे प्रभु सदैव ही पाऊँ ।।
गुण नक्षत्रों तारों सम अन्तर्नभ चमके मेरा।
कैवल्यज्ञान रवि पाकर महिमामय ध्रुव द्युति पाऊँ ।।
सिद्धत्व स्वगुण की आभा मेरे मस्तक पर दमके ।
त्रैलोक्य शिखर के ऊपर शाश्वत निज वैभव पाऊँ ।।
दर्शन आवरणी क्षय कर दर्शन गुण निज प्रकटाऊँ ।
संसार भाव सारा ही हे प्रभु अब तो विघटाऊँ ।।
(दोहा)
महा-अर्घ्य अर्पण करूँ, पाऊँ स्वगुण महान् ।
क्षय दर्शन आवरण कर, करूँ आत्मकल्याण ।।
ॐ ह्रीं दर्शनावरणीकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(छंद - गीतिका)
आत्मदर्शन के बिना गुण दर्शनीय न मिलेगा।
विमल ज्ञाता विमल दृष्टा गुण सुमन न खिलेगा ॥
आत्मशक्ति अचिन्त्य महिमावंत को मेरा प्रणाम।
प्रकट जो कर चुके उन भगवंत को मेरा प्रणाम ॥
चिदानंद चिदेश का साम्राज्य है अचलित अटल ।
है अगोचर ज्ञान गोचर स्वयं में रहता अचल ।।
आत्मा ही तीर्थ है शुद्धात्मा जयवंत है।
यही तो परमात्मा है यही तो भगवंत है ।।
सुख स्वरूपी आत्मसागर में उतरना चाहिए।
आत्म-भुजबल से भवोदधि शीघ्र तरना चाहिए ॥
ज्ञान पाने की कला जिनशास्त्र से मिल जाएगी।
शान्ति पाने की कला जिनशास्त्र से झिल जाएगी ॥
आत्म की अनुभूति-विधि जिनशास्त्र में मिल जाएगी।
अनुभूति निज की शान्तिप्रद इनमें न मिलने पाएगी ॥
स्वानुभव से प्राप्त होती है सहज अनुभूति निज ।
दृष्ट होती स्वगुण-दर्शन से सहज अनुभूति निज ॥
दर्शनावरणी बिना क्षय के न होता आत्मसुख ।
रहेगा भव-जाल में ही पाएगा संसारदुःख ॥
अतः अपनी आत्मा का विनय से दर्शन करें।
प्राप्त कर सम्यक्त्व वैभव सदा ही वन्दन करें ।॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणकर्मविरहितश्रीसिद्धपरंमेष्ठिभ्यो जयमालापूर्णार्थ्यं नि. स्वाहा।
आशीर्वाद
(दोहा)
क्षय दर्शन आवरण कर, पाऊँ पद निर्वाण ।
अपने ही बल से करूँ, मुक्ति-भवन निर्माण ।।
इत्याशीर्वादः ।
पूजन क्र. ५
वेदनीयकर्म विरहित
श्री सिद्धपरमेष्ठी पूजन
स्थापना
(दोहा)
वेदनीय को नाशकर, हुए सिद्ध भगवान् ।
बार-बार वन्दन करूँ, पाऊँ पद निर्वाण ॥
भाव सहित पूजन करूँ, वन्दूँ बारम्बार ।
वेदनीय दुख नष्ट कर, पहुँचूँ भव के पार ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूहः! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छंद - ताटंक)
जन्म जरादिक रोग विनाशक सम्यक् जल प्रभु लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा ।
अव्याबाधी सुखे गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
भवाताप नाशक समकित चंदन हे प्रभु मैं लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा ।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भत्र का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नि.।
अक्षय पद पाने को हे प्रभु सम्यक् अक्षत लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
कामबाण की पीड़ा क्षयहित पुष्प शीलमय लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि.।
क्षुधारोग विध्वंसक हे प्रभु सम्यक् चरु मैं लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मोहतिमिर क्षय करने को प्रभु ज्ञान-दीप निज लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. ।
अष्टकर्म-क्षय हेतु महाप्रभु ध्यान धूप निज लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ।
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा ।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि.।
महामोक्ष फल पाने को प्रभु शुक्ल ध्यान फल लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ ॥
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा ।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
पद अनर्घ्य पाने को स्वामी अर्घ्य ज्ञानमय लाया हूँ।
वेदनीय दो प्रकृति नाश हित प्रभु चरणों में आया हूँ॥
वेदनीय के नाशक सिद्धों को सादर वन्दन मेरा ।
अव्याबाधी सुख गुण पाऊँ नाश करूँ भव का फेरा ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
अर्ध्यावलि
(दोहा)
वेदनीय दो प्रकृतियाँ, करूँ शीघ्र अवसान।—
अव्याबाधी सौख्य पा, पाऊँ स्वपद महान् ॥
(छंद - ताटंक)
वेदनीय की साता प्रकृति शुभास्रव से बंध जाती है।
कुछ दिन तक साता देती है फिर विलीन हो जाती है।।
वेदनीय की प्रकृति विनाशें अव्याबाधी सुख पाऊँ ।
सिद्ध दशा परिपूर्ण प्रकट कर परम शान्ति सुख प्रभु पाऊँ ॥१॥
ॐ ह्रीं सातावेदनीयप्रकृतिविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्यं नि.।
प्रकृति असाता वेदनीय की अशुभास्रव से बँध जाती।
भव-अटवी में अटकाती है घोर वेदना उपजाती ।।
वेदनीय की प्रकृति विनाशें अव्याबाधी सुख पाऊँ ।
सिद्ध दशा परिपूर्ण प्रकट कर परम शान्ति सुख प्रभु पाऊँ ॥२॥
ॐ ह्रीं अंसातावेदनीयप्रकृतिविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अर्घ्यं नि.।
श्री सिद्धपरमेष्ठी विधान /३४’
महार्घ्य
(छंद - सवैया)
आए हो चेतन शिवपथ पर जानो स्वद्रव्य ध्रुव निजमन से।
तुमको अब भेद-विज्ञान हुआ मिथ्यात्व तजा है इस क्षण से ॥
हे ज्ञान तरंगो तुम बोलो कब तक तुम संग दोगी मेरा।
यह जड़ पुद्गल तन दुखमय है दुर्गन्धित यह कण-कण से ॥
अब तक दुख की लहरें पायीं सुख पाया नहीं एक पल भी।
अब सुख का अवसर आया है तुमको जाना अन्तर्मन से ॥
भवदधि में सुख-दुख की लहरें आस्रव को जागृत रखती हैं।
तुमने पायी अब संवर निधि अब बहक न जाना जीवन से ॥
श्रद्धान स्वयं का दृढ़ करना तुम बहक न जाना अब पर में।
तुम दर्शन-ज्ञान स्वरूपी हो निर्णय करना निश्चय मन से ॥
(दोहा)
महा-अर्घ्य अर्पण करूँ, करूँ विभाव अभाव ।
वेदनीय को क्षय करूँ, वेदन करूँ स्वभाव ॥
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(छंद - चौपाई)
वेदनीय की सही वेदना, यह अनादि की भव विडम्बना ।
भाऊँ प्रतिपल आत्मभावना, क्षय में हो प्रभु अब विलम्ब ना ।।
मैं अपना ही ज्ञान सजाऊँ, भेदज्ञान की बीन बजाऊँ ।
ज्ञान भावना नित प्रति भाऊँ, मिथ्यादर्शन को विघटाऊँ ॥
स्वपर-विवेक हृदय में लाऊँ, सम्यग्दर्शन उर प्रकटाऊँ ।
परम शान्ति का सागर पाऊँ, महिमाशाली निज को ध्याऊँ ।।
करूँ आत्मा का अवलोकन, जो सम्पूर्णतया आनंदघन ।
पर्यायों से दृष्टि हटाऊँ, द्रव्यदृष्टि हे प्रभु बन जाऊँ ।।
आत्मोन्नति के मूल मंत्र को, मोक्ष-प्राप्ति के महामंत्र को।
नाथ कभी मैं भूल न जाऊँ, निज स्वभाव स्वामी बन जाऊँ ।।
संयम की फुलवारी महके, अन्तरात्मा निज में चहके।
अनुभव रस की महिमा गाऊँ, निज ज्ञायक का ध्यान लगाऊँ ।।
सकल ज्ञेय ज्ञायक हो जाऊँ, सिद्ध स्वपद अपना विकसाऊँ।
राग रंग से दूर रहूँ मैं, निज स्वभाव रस चूर रहूँ मैं ।।
ज्ञान गीत निज के ही गाऊँ, शुद्ध ज्ञान के वाद्य बजाऊँ।
गुण अनंतमणि माला लाऊँ, निज ज्ञायक को ही पहनाऊँ ।।
यथाख्यात श्रृंगार करूँ मैं, मोह क्षीण कर घाति हरूँ मैं।
भव बाधाएँ सब विघटाऊँ, प्रभु अरहंत दशा प्रकटाऊँ ।।
गुण सिद्धत्व प्रकट कर अपना, भव दुख सारा कर दूँ सपना।
वेदनीय का नाश करूँ मैं, अव्याबाधी सौख्य वरूँ मैं ।।
ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
आशीर्वाद
(दोहा)
वेदनीय को क्षय करूँ, पाऊँ पद निर्वाण ।
अपने ही बल से करूँ, मुक्ति भवन निर्माण ॥
इत्याशीर्वादः ।
पूजन क्र. ६
मोहनीयकर्म विरहित
श्री सिद्धपरमेष्ठी पूजन
स्थापना
(छंद - कुण्डलिया)
मोहनीय की प्रकृतियाँ अट्ठाईस विनाश ।
हुए सिद्ध भगवंत प्रभु पाया ज्ञान प्रकाश ।।
पाया ज्ञान प्रकाश घातिया चारों क्षयकर ।
निमिष मात्र में त्रेसठ कर्म प्रकृतियाँ जयकर ।।
मैं अब पूजन करता हूँ निज-वन्दनीय की।
अट्ठाईस प्रकृति नाशें इस मोहनीय की ।।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(छंद - अवतार)
जन्मादि रोग त्रय नाश, हित निज गुण गाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ।।
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. ।
भव-तप हर चंदन शुद्ध, भावमयी लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ॥
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नि.।
अक्षय पद दाता शुद्ध, निज अक्षत लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ॥
कर मोहनीय का नाशं, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. ।
मैं काम-विनाशक पुष्प, चिन्मय के लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ॥
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि.।
मैं क्षुधारोग-क्षय हेतु, शुद्ध सुचरु लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पांऊँ ।
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ।। –
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्य। क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. ।
मैं मोह तिमिर हर दीप, ज्ञान का ही लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ॥
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. ।
मैं अष्टकर्म क्षय को, ध्यान अपना ध्याऊँ ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ॥
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ।।
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि.।
फल मोक्ष प्राप्ति के हेतु, उत्तम फल लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ।।
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
पदवी अनर्घ्य हित अर्घ्य, भावमयी लाऊँ।
शुभ-अशुभ विकारी भाव, पर मैं जय पाऊँ ।
कर मोहनीय का नाश, समकित गुण पाऊँ।
क्षय अट्ठाईस प्रकृति, करूँ निज सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
अर्ध्यावलि
(दोहा)
मोहनीय की प्रकृति हैं, अट्ठाईस सुजान ।
इनको नाशे बिन नहीं, होता केवलज्ञान ।।
इनमें दर्शनमोह की, तीन प्रकृति दुखमूल ।
चरित मोह पच्चीस हैं, मुक्ति-मार्ग में शूल ॥
(वीरछन्द)
मोहनीय की है मिथ्यात्व प्रकृति भवसागर-दुख का मूल ।
जो सम्यग्दर्शन पाते हैं वे करते इसको निर्मूल ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥१॥
ॐ ह्रीं मिथ्यात्वकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की सम्यक्त्व प्रकृति यह भी है मिथ्यात्व महान् ।
सम्यग्दर्शन धारण करके कर दूँगा इसका अवसान ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।२।।
ॐ ह्रीं सम्यक्मिथ्यात्वकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. ।
अब सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति नाशूँगा नाथ सदा को ही।
इसके झाँसे में न आऊँगा मेरे नाथ कदा को ही ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥३॥
ॐ ह्रीं सम्यक्प्रकृतिकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की हास्य प्रकृति संपूर्ण विनाशूँ हे स्वामी।
हास्य भाव उपजे न कभी प्रभु यत्न करूँ अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।४।।
ॐ ह्रीं हास्यकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रकृति विनाशूँ रति नामक अब तो स्वामी।
पर में रति उपजे न कभी प्रभु करूँ यत्न अंतर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।५।।
ॐ ह्रीं रतिकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की अरति प्रकृति को क्षय कर दूँ पूरी स्वामी।
अरति भाव उपजे न कभी भी करूँ यत्न अंतर्यामी ।॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।६।।
ॐ ह्रीं अरतिकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
प्रकृति विनाशें मोहनीय की स्त्रीवेद अभी स्वामी ।
वेद भाव सम्पूर्ण मिटाऊँ करूँ यत्न अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।७।।
ॐ ह्रीं स्त्रीवेदमोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की प्रकृति विनाशूँ पुरुषवेद नामक स्वामी ।
वेद भाव सम्पूर्ण मिटाऊँ करूँ यत्न अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।८।।
ॐ ह्रीं पुरुषवेदमोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
प्रकृति नपुंसकवेद घोर दुखदायी नष्ट करूँ स्वामी ।
वेद भाव सम्पूर्ण मिटाऊँ करूँ यत्न अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।
ये कषाय के ही नव भेद विनाश करूँ अब तो भगवन ।
जीतूं प्रभु सम्पूर्ण मोह को प्राप्त करूँ अपना चिद्घन ॥९॥
ॐ ह्रीं नपुंसकवेदकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की शोक प्रकृति सम्पूर्णतया नाशूँ स्वामी ।
आर्त्त-ध्यानमय शोक न हो प्रभु यत्न करूँ अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥१०॥
ॐ ह्रीं शोककर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेत्रिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय भय प्रकृति विनाशूँ निर्भय होकर हे स्वामी।
सप्तभयों से रहित बनूँ अब करूँ यत्न अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥११॥
ॐ ह्रीं भयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
प्रकृति जुगुप्सा सर्व विनाशूं अब मैं बन निर्मल स्वामी।
कभी ग्लानि का भाव हृदय में उपजे. ना अन्तर्यामी ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।१२।।
ॐ ह्रीं जुगुप्साकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की अनन्तानुबंधी युत क्रोध प्रकृति कर नाश।
अकषायी स्वभाव है मेरा उसका ही अब करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥१३॥
ॐ ह्रीं अनन्तानुबंधीक्रोधकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की अनन्तानुबंधी युत मान प्रकृति कर नाश।
अकषायी स्वभाव है मेरा उसका ही अब करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतँगा अब अन्तर्यामी ।।१४।।
ॐ ह्रीं अनन्तानुबंधीमानकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की अनन्तानुबंधी क्षय करूँ प्रकृति माया ।
निज स्वरूप ऋजुता का सागर आज दृष्टि में दरशाया ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।१५।।
ॐ ह्रीं अनन्तानुबंधीमायाकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की अनन्तानुबंधी मय लोभ प्रकृति कर नाश।
अकषायी स्वभाव है मेरा उसका ही अब करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।१६।॥
ॐ ह्रीं अनन्तानुबंधीलोभाकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य नि.।
मोहनीय की अप्रत्याख्यानावरणी की क्रोध प्रकृति ।
इसे समूल नष्ट करने को जाग उठी है मेरी मति ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।१७।।
ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानवरणक्रोधकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद -
प्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की अप्रत्याख्यानावरणी की मान प्रकृति ।
इसे समूल नष्ट करने को जाग उठी है मेरी मति ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।१८।।
ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानावरणमानकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद-
प्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय अप्रत्याख्यानावरणी माया प्रकृति विनाश ।
निजस्वरूप उज्ज्वल ऋजुतामय का प्रभु पाऊँ दिव्यप्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥१९॥
ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानावरणमायाकर्मविरहित श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद
- प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की अप्रत्याख्यानावरणी की लोभ प्रकृति ।
इसे समूल नष्ट करने को जाग उठी है मेरी मति ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२०॥
ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानावरणलोभकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद-
प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रत्याख्यानावरणी की यह क्रोध प्रकृति ।
ज्ञान भाव से नष्ट करूँगा सावधान है मेरी मति ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२१॥
ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणक्रोधकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रत्याख्यानावरणी की यह मान प्रकृति ।
परम विनय से नष्ट करूँगा सावधान है मेरी मति ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२२॥
ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणमानकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय प्रत्याख्यानावरणी की माया प्रकृति विनाश ।
ऋजुतापूर्वक नष्ट करूँगा पाऊँगा उर विमल प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।२३।।
ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणमायाकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रत्याख्यानावरणी की यह लोभ प्रकृति ।
शौच भाव से नष्ट करूँगा सावधान है मेरी मति ।।
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।२४।।
ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणलोभकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रकृति संज्वलन क्रोध पूर्ण कर डालूँगा।
मुनि निर्ग्रन्थ स्वपद धारण कर क्षमा धर्म का करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ।।२५।।
ॐ ह्रीं संज्वलनक्रोधकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अंनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की प्रकृति संज्वलन मान पूर्ण कर डालूँ नाश।
मुनि निर्ग्रन्थ स्वपद धारण कर क्षमा धर्म का करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२६॥
ॐ ह्रीं संज्वलनमानकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मोहनीय की प्रकृति संज्वलन माया कर डालूँ नाश।
मुनि निर्ग्रन्थ स्वपद धारण कर क्षमा धर्म का करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्र मोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२७॥
ॐ ह्रीं संज्वलनमायाकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
मोहनीय की प्रकृति संज्वलन लोभ सदा को कर दूँ नाश।
मुनि निर्ग्रन्थ स्वपद धारण कर क्षमा धर्म का करूँ प्रकाश ॥
मोहनीय का नाश करूँगा निज स्वभाव बल से स्वामी।
दर्शनमोह चारित्रमोह जीतूंगा अब अन्तर्यामी ॥२८॥
ॐ ह्रीं संज्वलनलोभकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
(वीरछन्द)
भेद कषाय मोहनीय के ये हैं सोलह भवदुखरूप ।
इस सब भेदों से विरहित है शुद्ध आतमा निज चिद्रूप ॥
तीन मोह के अरु पच्चीस कषायों की मिल अट्ठाईस ।
नाश करूँ ये सकल प्रकृतियाँ हो जाऊँ मैं त्रिभुवन ईश ॥
पहले दर्शन मोह विनाशें फिर चारित्र मोह कर नाश।
क्षीण मोह फल पाकर स्वामी पाऊँ केवलज्ञान प्रकाश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
महार्घ्य
(छंद - विजात)
मिला है समकित तो याद रखना स्वयं की श्रद्धा न जाने देना।
विभावी भावों की रात काली किसी गली से न आने देना ।।
स्वभाव कंचन के सम खरा है इसे मिलावट से दूर रखना।
सुमेरु जैसे अचल ही रहना न एक पल को भी डिगने देना ॥
बने बनाए महल गिरा दो ये रागवाले सदा-सदा को।
स्वरूप का ही सतत हो चिन्तन विकार उर में न आने देना ।।
ये कलमुँही है विभावी परिणति इसे कभी भी न संग रखना।
स्वभाव परिणति है मात्र अपनी स्वगीत इसको तुम गाने देना ।।
ये मोह का घर अभी जला दो मिटा दो इसको स्वबल से अपने ।
स्वभाव अपना ही तुम सम्भालो जरा भी भय को न आने देना ।।
(दोहा)
महा-अर्घ्य अर्पण करूँ, नष्ट करूँ मिथ्यात्व ।
मुक्ति-मार्ग पर चल पडूं, पा क्षायिक सम्यक्त्व ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(छंद - विजया)
महामोह के जाल में तुम न फँसना ।
महादुष्ट तुमको भ्रमित कर रहेगा ।।
तुम्हें स्वर्ग का लोभ देगा बहुत यह ।
चलो संग मेरे ये तुम से कहेगा ।।
तुम्हें आज मुश्किल से समकित मिला है।
बहकना नहीं आत्मश्रद्धा से चेतन ॥
अगर तुमने अपनी स्वश्रद्धा को छोड़ा।
तो भव-कष्ट चेतन सदा ही रहेगा ॥
अगर देव-गुरु-धर्म पर आस्था है।
तो उपदेश उनका नहीं भूलना अब ॥
अगर भूल जाओगे तो सत्य मानो ।
तुम्हारा ही निज आत्मा दुख सहेगा ।।
सरल शान्ति धारा में अभिषेक कर लो।
सहज आत्मा का करो नित्य चिन्तन ॥
विभावों के बादल घनेरे हटेंगे ।
महल आस्रव का निमिष में ढहेगा ।।
जो हैं पूर्व कर्मों के बंधन उन्हें अब ।
हनन निर्जरा शीघ्र आकर करेगी ।।
दशा शुद्ध निर्बन्ध होगी तुम्हारी ।
सकल कर्म ईंधन स्वयं ही दहेगा ।।
महामोक्ष-तरु-फल मिलेगा शिवम् मय ।
निजानन्द आनन्द होगा सदा को ।।
महामोह मर जाएगा एक पल में।
नहीं तुमसे फिर यह कभी कुछ कहेगा ।।
अनन्तों. गुणों से हो मण्डित सदा तुम ।
महाशक्ति धारी अनाकुल स्वभावी ।।
सतत अपनी शुद्धात्मा को ही निरखो।
यही आतमा तुमको उर में गहेगा ।।
मिलेगा तुम्हें चक्र सिद्धों का अनुपम ।
तुम्हें अपने भीतर सजाएगा तत्क्षण ।।
त्रिलोकाग्र परं वास होगा तुम्हारा ।
सदा पूर्ण सुख-सिन्धु उर में बहेगा ।।
(दोहा)
दर्शन मोह विनाशकर, पाऊँ दृढ़ सम्यक्त्व ।
चरित मोह फिर नष्ट कर, प्राप्त करूँ सिद्धत्व ॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जयमालापूर्णार्थ्यं नि.।
(दोहा)
मोहनीय को क्षय करूँ, पाऊँ पद निर्वाण ।
अपने ही बल से करूँ, मुक्ति-भवन निर्माण ॥
इत्याशीर्वादः ।
܀܀܀
पूजन क्र. ७
आयुकर्म विरहित
श्री सिद्धपरमेष्ठी पूजन
स्थापना
(छंद - कुण्डलिया)
आयुकर्म का नाश कर, हुए सिद्ध भगवान्।
बार-बार पूजन करूँ, पाऊँ पद निर्वाण ॥
पाऊँ पद निर्वाण करूँ आत्मा का चिन्तन ।
चार प्रकृतियाँ नष्ट करूँ काटूं भव-बंधन ॥
ज्ञानपूर्वक आश्रय लूँ मैं आत्मधर्म का।
अब तो क्षय करना है स्वामी आयुकर्म का ।।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(छंद - चौपाई)
जन्म-जरादिक रोग मिटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशैं, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशैं।।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
भवाताप-ज्वर शीघ्र मिटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशें, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशैं।।
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नि.।
श्री सिद्धपरमेष्ठी विधान /४८.
शाश्वत अक्षय पद प्रकटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशूँ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
कामबाण की पीर मिटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशूँ ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि.।
क्षुधारोग का कष्ट मिटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशुं ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मोह-तिमिर अज्ञान हटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशुं ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि.।
अष्टकर्म सम्पूर्ण जलाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशुं ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि.।
पूर्ण मोक्षफल हे प्रभु पाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशुं ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महामोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
शाश्वत पद अनर्घ्य प्रकटाऊँ, श्री सिद्ध प्रभु को नित ध्याऊँ ।
आयुकर्म चौप्रकृति विनाशूँ, सूक्ष्मत्व गुण शीघ्र प्रकाशूँ ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
अर्ध्यावलि
(दोहा)
आयुकर्म की प्रकृतियाँ, दुखमय घोर प्रसिद्ध ।
इनके क्षय बिन तो नहीं, होता कोई सिद्ध ।।
(वीरछन्द)
नरक आयु अति दुखदायी है सातों नरक महादुखरूप ।
नरक आयु क्षय करने का ही यत्न करूँगा निज अनुरूप ॥
आयुकर्म की सर्व प्रकृतियाँ मुझको ही क्षय करना है।
सूक्ष्मत्व गुण पाने को प्रभु इन्हें शीघ्र ही हरना है । ॥१॥
ॐ ह्रीं नरकायुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
आयु तिर्यञ्च घोर दुखदायी है निगोद तक की दाता।
इसको क्षय करने का निश्चय जिन-आगम में विख्याता ॥
आयुकर्म की सर्व प्रकृतियाँ मुझको ही क्षय करना है।
सूक्ष्मत्व गुण पाने को प्रभु इन्हें शीघ्र ही हरना है ॥२॥
ॐ ह्रीं तिर्यञ्चायुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
मनुज आयु भी भव दुखमय है बोध-अबोध दशा होती।
इसके क्षय बिन कभी नहीं चेतन की सिद्ध दशा होती ॥
आयुकर्म की सर्व प्रकृतियाँ मुझको ही क्षय करना है।
सूक्ष्मत्व गुण पाने को प्रभु इन्हें शीघ्र ही हरना है ॥३॥
ॐ ह्रीं मनुष्यायुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
देव आयु भी क्षणभंगुर दुख देती आई विविध प्रकार।
इसके क्षय बिन कभी नहीं पा सकता प्राणी सौख्य अपार ॥
आयुकर्म की सर्व प्रकृतियाँ मुझको ही क्षय करना है।
सूक्ष्मत्व गुण पाने को प्रभु इन्हें शीघ्र ही हरना है ।।४।।
ॐ ह्रीं देवायुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि.।
महार्घ्य
(छंद - समानसवैया)
जड़ तन पाँचों इन्द्रिय द्वारा इस चेतन को पा न सकोगे।
वर्ण गंध रस पर्श शब्द से भी चेतन को ध्या न सकोगे ॥
जड़ काया से पूर्ण पृथक् है दर्शन ज्ञानमयी अशरीरी।
जिन स्वभाव की महिमा से है इसकी रंच न पल भर दूरी ॥
यदि चेतन को पाना है तो फिर चेतन से परिचय करना।
आयुकर्म क्षय करना है तो पहले निज का निर्णय करना ॥
भवपथ से यदि ऊबे हो तो शिवपथ पर जल्दी आ जाओ।
अनुभव सागर में अब डुबकी लगा रत्न अपने ले आओ ॥
बिन पुरुषार्थ सफल होता है नहीं अरे पुरुषार्थ कभी भी।
अभूतार्थ को तजे बिना मिलता न अरे भूतार्थ कभी भी ॥
(दोहा)
महा-अर्घ्य अर्पण करूँ, आयुकर्म कर नाश।
सूक्ष्मत्व गुण प्रकट कर, पाऊँ आत्मनिवास ॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(मानव)
मिथ्यात्व-हवा का झोंका प्रतिपल चलता रहता है।
बहु भव-बंधन कर प्राणी चारों गति में बहता है।।
कोई न बचाने पाता ऐसा है यह मिथ्याभ्रम ।
वह ही बच पाता है जो करता है ज्ञान परिश्रम ॥
इस श्रम के द्वारा प्राणी सम्यग्दर्शन पाता है।
निधि भेद-ज्ञान की अपने अन्तर्मन में लाता है।।
है संग दुष्ट अविरति का पर संयम की अभिलाषा ।
कर प्राप्त संयमासंयम पूरी करता है आशा ।।
फिर संयम पूर्ण धारता सप्तम षष्टम में जाता।
झूले पर झूला करता फिर श्रेणी पर चढ़ जाता ॥
उपशम श्रेणी पाता तो ग्यारहवें से गिर जाता।
क्षायिक श्रेणी पाता तो बारहवाँ ही प्रकटाता ।।
कर मोह क्षीण सारा ही तेरहवाँ पा लेता है।
अरहंत दशा प्रकटाकर जगती को सुख देता है।।
फिर चौदहवाँ पा लेता पश्चात् सिद्ध होता है।
सिद्धत्व स्वगुण झट पाकर संसार सर्व खोता है ॥
यों आयुकर्म को क्षय कर निज शिव पद पा लेता है।
आठों कर्म से विरहित हो शाश्वत सुख लेता है॥
ॐ ह्रीं आयुकर्मविरहितश्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जयमालापूर्णार्थ्यं निर्वपामिति स्वाहा
आशीर्वाद
(दोहा)
आयुकर्म को क्षय करूँ, चहुँगति कर अवसान।..
अपने ही बल से करूँ, मुक्ति-भवन निर्माण ॥
इत्याशीर्वादः।
प्रूफरीडिंग बाकी है