श्री सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी पूजन
(चांद्रायण)
मांगी-तुंगी सिद्ध क्षेत्र में आय के ।
सिद्ध प्रभु सम आत्मअनुभवू भाव ये ।।
रामचंद्र मुनिराज आये इस भूमि पर ।
हनूमान मुनिवर भी विचरे हैं इधर ।।
धन्य-धन्य सुग्रीव सुडील की साधना ।
गव-गवाक्ष मुनि धन्य हुई आराधना ।।
कोड़ि निन्यानवे मुनिवर ने प्रभु पद लिया।
मैं भी पाऊँ शीघ्र यही पद प्रण लिया ।।
हे प्रभु ! आह्वानन करता हूँ आइये ।
मेरे मन मंदिर में नाथ समाईये ।।
धन्य हुआ प्रभु मेरा जीवन वंद्यकर ।
अपने पास बुला लो अति ही शीघ्रवर ।।
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(ताटंक)
सब सिद्धों को नमन हमारा, सिद्ध दशा ही प्यारी है।
सिद्ध स्वभाव दिखाने वाले, प्रभु की महिमा न्यारी है ।।
सिद्ध समान सदा पद मेरा, यही समझने आया हूँ ।
सिद्धों की भक्ति भावों का, निर्मल जल प्रभु लाया हूँ ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ।
धन्य-धन्य यह मांगीतुंगी, वंदन करूँ बनूँ भगवन ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो जन्म-जरामृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शांत स्वभाव सहज शीतलमय, आत्म स्वभाव दिखाया है।
दिव्य देशना पाकर के प्रभु, रोम रोम पुलकाया है ।।
जड़ चेतन सब न्यारे-न्यारे, बात समझ में आती है ।
भेद-ज्ञान से सिद्ध अनंतों, हुये राह अब भाती है ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ।
धन्य-धन्य यह मांगीतुंगी, वंदन करूँ बनूँ भगवन ।।
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा ।
उज्जवल धवल अखंडित अक्षत, पद तुमने प्रभु पाया है।
यही धवल अक्षत पद पाने, अक्षत ले मन आया है ।।
नर नारक अवतार लिये प्रभु, शांति कहीं न पायी है।
शांति प्रदाता तुम ही प्रभुवर, शरण यही मन भायी है ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥ धन्य ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
काम बाण की पीड़ा भगवन, मुझसे सही न जाती है ।
भव मूर्ति तन-चर्म रंध्रमय, क्यों दृष्टि फँस जाती है ।।
धन्य आप चैतन्य ब्रह्म में, लीन महासुख पाते हैं ।
कामदेव भी हार मान प्रभु, सम्मुख शीश झुकाते हैं ।॥
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥धन्य॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञानानंद सुधारस आतम, फिर क्यों क्षुधा सताती है ?
षट्रस व्यंजन सेवन फिर भी, तृप्ति नहीं हो पाती है ।।
निज सीमा में सीमित हो प्रभु, अपने प्रभु में लिया मुकाम ।
अकृत दिव्य बोध परमामृत, पीते रहते आठों याम ॥
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥ धन्य ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञानभानु का उदय हुआ प्रभु, लोकालोक झलकता है।
आप मगन रहते अपने में, ज्ञेय ज्ञान तक रिश्ता है ॥
भूल गया शिवराह बता दो, शरण तुम्हारी आया हूँ।
ज्ञान-ज्योति जागे अंतर में, बोधि जगाने आया हूँ ॥
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥धन्य॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर परिणति पर भाव निरखता, अंत महा दुखदायी है।
ज्ञान-ध्यान-तप से ही तुमने, मुक्ति-वधू अपनायी है ।।
मैं भी सिद्ध-चक्र पूजन कर, आज शरण में आया हूँ।
दश धर्मों की सौरभ प्रभुवर, तुम सम पाने आया हूँ ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥धन्य ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
दुष्कर्मों के फल में भगवन, कौन सुखी हो पाया है ।
सत्कर्मों के फल में भी तो, स्वर्गादिक ही पाया है ॥
ज्ञान मात्र का आराधन कर, मुक्त हुये अन्तर्यामी ।
महामोक्ष फल पाने आया, चरण शरण में सुखधामी ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥ धन्य ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा।
अविनाशी अविकारी प्रभुवर, आप हुये कृतकृत्य महान ।
समाधान सर्वाङ्ग सहज हो, अभिरामी प्रभु तुम्हें प्रणाम ।।
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि, अनंत सिद्ध पद कब पाऊँ ?
जयवंतो भगवंत सिद्ध प्रभु, अर्घ्य चढ़ाउँ हर्षाऊँ ।।
राम हनू सुग्रीव आदि मुनि कोड़ि निन्यानवे सिद्ध नमन ॥ धन्य ॥
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनीवरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
सिद्ध प्रभु की वंदना, सर्व सौख्य दातार ।
सहज सिद्ध अनुभव करूँ, हो जाऊँ भव पार ।।
अशरीरी आनंद घन, अविनाशी अविकार ।
बसें उर्ध्व आलोक में, त्रिभुवन के सरदार ।।
(वीर)
धन्य तीर्थ यह मांगीतुंगी, महाभाग्य दर्शन पाये ।
मुनी अनन्तों सिद्ध हुये प्रभु, भाव विशुद्धी कब आवे ।।
मानतुङ्ग मुनिवर-मन जैसा, मांगीतुंगी तीर्थ महान ।
कोड़ि निन्यानवे मुनि पधारे, पाया था जिनने निर्वाण ।।
महाराष्ट्र इसलिये कहाया, महा पूज्य मुनि आये थे ।
आत्म साधना महामंत्र के, मुक्ति-मंत्र गुंजाये थे ।।
देव पुनीत द्वारका जैसी, नगरी जल जब राख हुई ।
श्रीकृष्ण नारायण अर बलदाऊ शेष थे दो जन ही ।।
इसी भूमि पर छः - छः महिने, विह्वल हो बलभद्र फिरे ।
इसी भूमि पर बलदाऊजी, दीक्षा लेकर थे विचरे ।।
रामचंद्र मुनिराज हमारे, इस पावन भू पर आये ।
राजपाट वैभव सब छोड़ा, दीक्षा ले शिवपद पाये ।।
अर्द्ध चक्री रावण को जीता, कर्मचक्र भी जीत लिया ।
यहीं हुआ उपसर्ग प्रभू पर, प्रभुवर ने कैवल्य लिया ।।
हनूमान भगवान हमारे, सिद्धशिला पर शोभ रहे ।
अहो पूछ थी भारी जग में, लोग पूंछ धर पूज रहे ।।
हनुमानजी कामदेव थे, कपि वंशी अति सुन्दर रूप ।
अरे ! इन्हें बंदर मत मानो, ये जिनेन्द्र हैं अब शिवभूप ।।
गव - गवाक्ष मुनिराज जिन्होंने, आतम ध्यान लगाया था ।
इसी भूमि पर आत्म ध्यान से, केवलज्ञान जगाया था ।।
श्री सुग्रीव सुडील भूप ने, मुनि पद का आनंद लिया ।
चेतन का भंडार निरखकर, जीवन अपना धन्य किया ।।
नील और महानील, मुनीश्वर चेतन-रस को पीते थे ।
सिद्धों से क्षण-क्षण में अन्तरमुख हो बातें करते थे ।।
जहाँ गुफायें अनुपम सुन्दर, शांत स्वभाव दिखाती हैं।
आत्म ध्यान धर लो हे प्राणी, यही सीख सिखलाती हैं ।।
भव्य जिनालय बने तलहटी, जो सबको यह समझाते ।
रत्नत्रय को पाने वाले, ही भव-सागर तिर पाते ।।
सिद्धक्षेत्र वंदन करने से, उर में निर्मलता आती ।
भव-भव के संचित पापों की, कर्मावलि सब झर जाती ।।
पुण्यावलि भी शीश झुकाती, पावन परिणति खिल जाती ।
ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ बस, एक यही धुन है आती ।।
जितने भी विभाव भाव सब, आते हैं अर जाते हैं।
जो होना है सब निश्चित है, निर्णय भव्य जगाते हैं ।॥
मैं हूँ ज्ञान-शरीरी प्रभुवर, नश्वर देह नहीं मेरा ।
स्वयं सिद्ध गुण-पुंज प्रभु हूँ, राग-ग्राम में नहीं डेरा ॥
मैं अचिन्त्य शक्ति का धारी, चिन्तामणि हूँ मन भाया ।
जब से चरण-शरण पायी है, रोम-रोम मम हर्षाया ।।
होने योग्य सदा होता अब, आकुलता नहिं आती है ।
भेदज्ञान की कला मिली प्रभु, शाश्वत शांति दिलाती है ।।
भव-भव में हो शरण आपकी, यही भावना भाता हूँ ।
जयवन्ते जिनधर्म हमारा, सविनय शीश झुकाता हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री मांगीतुंगी सिद्ध क्षेत्रेभ्यो 99 करोड़ मुनिवरेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
मांगीतुंगी शीश से, अगणित श्री मुनिराज ।
सिद्ध हुये सम श्रेणी में, ऊपर रहे विराज ॥
प्रभु चरणाम्बुज वंद्यकर, धन्य हुआ मैं आज ।
हो समाधि सल्लेखना, पाऊँ सिद्ध स्वराज ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन