श्री सिद्धक्षेत्र गिरनार पूजन | Shri Siddhakshetra Girnar Pujan

श्री सिद्धक्षेत्र गिरनार पूजन

(राधिका छंद)
हे बालयति श्री नेमि जिनेश्वर ! वंदन ।
यदुवंशपती हे मुक्तिपति ! अभिनंदन ।।
जयवंत हुई यह सिद्ध क्षेत्र गिरनारी ।
वंदन से कटते पाप महादुखकारी ।।
अनिरुद्ध कुंवर अविरुद्ध आत्मप्रभु ध्याया ।
शम्बू-कुमार ने मुक्ति-वधू परिणाया ।।
प्रद्युम्न कुमार श्रीकृष्ण पुत्र यहाँ आये ।
स्व-राष्ट्र प्रान्त से सिद्धपुरी पधराये ।।
मुनिनाथ करोड़ों चरण पड़े इस भू पर ।
कण-कण पावन हो गया तीर्थ धरती पर ।।
आह्वानन है प्रभु हृदय-कमल में आओ ।
मुझको मुक्ति की मंगल राह दिखाओ ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनारसिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनिसिद्ध समूह ! अत्र अवतर
संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनिसिद्ध समूह ! अत्र तिष्ठ
तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनिसिद्ध समूह ! अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् । पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(वीर छंद)
भक्ति भाव का निर्मल जल ले, प्रभु के चरण पखारूँगा।
जन्म जरामृत रोग मिटाने, शाश्वत प्रभू निहारूँगा ॥
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ।
कोटि-कोटि मुनिवर अभिनन्दूँ, इसी भूमि से मुक्त हुये ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु-चरणों की भक्ति भाव से, चंदन चरणों में लाया।
भव-आताप सहा नहिं जावे, विरद श्रवण सुन हूँ आया ॥
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिन चरणों की भक्ति अखंडित, अक्षय पद की दाता है।
जग के पद सारे विक्षत है, स्वांग न अब मन भाता है ।।
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु की भक्ति-भाव अर्चन से, मेंढक क्षण में देव हुआ।
पंचेन्द्रिय की विषय वासना, मिट जाये प्रभु अचरज क्या ?
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
भगवन्तों की भक्ति हृदय में, मानतुंग सम बस जावे ।
जड़ की चाह रहे ना मन में, ऐसी तृप्ति आ जावे ॥
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो सिद्धपद प्राप्तये
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

निश्चय भक्ति अभेद आपकी, मुक्ति प्राप्त कराती है।
मोह-महांध नसाती भगवन, दीपावलि ले आती है ॥
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो मोहांधकार
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

जिनमुद्रा के दर्शन करते, आतम दर्शन होता है ।
आत्म ध्यान से कर्म नष्ट हो मुक्ती लाभ मिल जाता है ।।
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ।
कोटि-कोटि मुनिवर अभिनन्दूँ, इसी भूमि से मुक्त हुये ।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो अष्टकर्म दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पाप-पुण्य की भक्ति से ही, चहुँगति दुख अब तक पाये ।
रत्नत्रय-भक्ति से शिवफल, पाने प्रभुवर ढिंग आये ॥
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्हन्त सिद्धाचार्य साधु मुनि, श्रुत की भक्ति हृदय भाये ।
रत्नत्रय निर्ग्रन्थ पंथ का, रोम-रोम प्रभु गुणगावे ॥
जलफलादि वसु द्रव्य संजोकर, भक्ति भाव से लाया हूँ।
है अनन्त उपकार आपका, भक्ति न कुछ कर पाया हूँ ।।
श्री गिरनार सिद्ध भूमि से, नेमीश्वर प्रभु सिद्ध हुये ॥ कोटि ॥
ॐ ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
गिरनारी गिरि शिखर से, कोटि-कोटि मुनिराज ।
आत्म ध्यान धर पा गये, सिद्धों का साम्राज्य ।।
(मानव)
जयवंते धर्म सनातन, जयवंते सिद्ध हमारे ।
जयवंते जिनवर मुनिवर, जय भेदज्ञान शिक्षा रे ।।
चकमक में अग्नि छिपी ज्यों, तिल में ज्यों तेल समाया ।
गौ-रस में कण-कण घृत ज्यों, तन में चैतन्य दिखाया ।।

गिरनार सिद्ध भूमि पर, श्री नेमि जिनेश्वर आये ।
मुनि कोटि-कोटि अभिनंदूँ, महाभाग जो दर्शन पाये ॥
सौराष्ट्र भूमि ने गौरव, स्व-राष्ट्र दिखाकर पाया ।
ऊर्जयन्त गिरि ने साधक, को सिद्ध शिला पहुँचाया ॥
अठरह हजार भूपति संग, दीक्षा ली नेमि जिनेश्वर ।
चालिस हजार दीक्षायें, राजुल संग हुईं वहाँ पर ॥
यहाँ धर्म ध्यान अध्ययन का, मेला ही लगा हुआ था ।
लगा समवशरण अति सुन्दर, जन-जन वहाँ उमड़ पड़ा था ॥
शांति का बिगुल बजा था, श्री नेमि जिनेश्वर द्वारा ।
श्रीकृष्ण और बलदाऊ, पीते थे अमृत धारा ॥
इक बार दिव्य ध्वनि गूँजी, देवोपुनीत यह नगरी ।
धू-धू जल राख बनेगी, बारह वर्षों की अवधि ॥
श्रीकृष्ण धर्म राजा ने, गंभीर निनाद कराया ।
जिन धर्म-शरण में आओ, प्रभु ने हमें आन जगाया ॥
कितने ही भव्यजनों ने, मुनि दीक्षा ले ली तत्क्षण ।
अणुव्रत यम नियम किसी ने, पाले समता के साधन ॥
प्रद्युमनकुमार शम्बूजी, अनिरूद्ध कुंवर अति प्यारे ।
इस ही पावन भूमि से, पायी थी सिद्ध दशा रे ॥
धरसेन दिगम्बर मुनिवर, शुद्धोपयोग के धारी ।
थे अंग पूर्व के ज्ञाता, शिक्षा-दीक्षा अधिकारी ॥
पुष्पदंत - भूतबलि मुनि को, सिद्धान्त मूल समझाया ।
करणानुयोग दीपक से, जिनशासन दीप जलाया ॥
राजुल से ब्याह रचाने, जूनागढ़ जब प्रभु आये ।
पशुओं का क्रन्दन सुनते, ही मोम भांति पिघलाये ॥
जग की स्वारथ वृत्ति लख, करूणा सागर मन आया ।
धिक-धिक संसार ये कैसा ? वैराग्य भाव उमड़ाया ॥
(144)

शेषावन में नेमीश्वर, प्रभु ने थी दीक्षाधारी ।
कैवल्य-ज्ञान को छप्पन, दिन में पाया अविकारी ।।
श्री गजकुमार मुनि ने भी, यहीं आतम ध्यान लगाया ।
पाँचों पांडव वीरों ने, धर्मामृत-बोधि जगाया ।।
यहाँ भव्य जीव ही आते, पावन दर्शन को पाते ।
जो नेमि प्रभु को भाया, उस आतम को ही ध्याते ।।
जय धर्म-धुरी के धारी, तुमको शत-शत है वंदन ।
श्री सिद्ध क्षेत्र गिरनारी, मुनि कोटि-कोटि अभिनंदन ।।
ॐ श्री ह्रीं श्री गिरनार सिद्धक्षेत्रे सप्तद्वय कोटि सप्तशतक मुनीश्वरेभ्यो जयमाला
महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
भाव सहित वंदन करूँ, ले मन हर्ष अपार ।
प्रगटे रत्नत्रय प्रभो, पाऊँ भवदधि पार ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन