सिद्धचक्र विधान
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श्री सिद्धचक्र विधान
सिद्धचक्र विधान के छन्दों की तर्ज/धुन
मंगलाचरण
- अखिल – सरव पख में बड़ो …
- अर्द्ध रोला – रोला के समान
- इन्द्रवज्रा – नसे धारिया कर्म …
- उपेन्द्रवज्रा – नित्याश्रमा …
- उल्लाला – दोहा के समान
- कामिनी मोहन – नीर नभ अज्ञान …
- गीता – कुन्दकुन्द शाक …
- सुणिये जिन अरज हमारी …
- चाल – नन्दीश्वर श्री जिन धाम …
- रे मन भज ले आतमराम …
- जगिरेमला – असम को हित है सुख …
- चंचला – पार्श्वनाथ देव सेव …
- ध्रकार – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- भुजंगीका – दोहा के समान
- चौपाई – दश विशुद्धि धरे जे कोई …
- चौबोला – आतम को हित है सुख …
- डुलना – माहे तोई सेवते सुतत्वता …
- छप्पय – शिव चैतन्य कुमार सदा …
- झालर – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- तोमर – तू जाग रे चेतन प्राणी …
- त्रोटक – केवल रवि किरणों से …
- जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …
- दोधक – चौपाई के समान
- दोहा – दृढ़ विधि ताही होय के …
- धत्ता – वसु इव्व हँवारी …
- नागरूपिणी – पार्श्वनाथ देव सेव …
- नाराच – पार्श्वनाथ देव सेव …
- पद्धरि – ऐसे क्रिया दुग्ग-ज्ञान-चरण …
- पायत्ता – चाल के समान
- बड़ी चौपाई – चौपाई के समान
- बारहमासा – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- भुजंगप्रयात – नसे धारिया कर्म …
- मरहटा – वीर/धत्ता के समान
- माला – केशरिया चावल रंगवा लो …
- मालिनी – अति कषायि मूला …
- मेरीयादाम – अहो पीतम् आनन्दस्य …
- तिहारे ध्यान की मूरत …
- मोदक – चौपाई
- रेखता – तिहारे ध्यान की मूरत …
- रोला – सम्यक साधे ज्ञान होय पै …
- लम्बीछंद – पार्श्वनाथ देव सेव …
- लावणी – हे सीमंधर भगवान अरज ली तेरी …
- लोलारती – चौपाई के समान
- वसन्ततिलका – भक्तामर …
- षट्पदरी – नरेन्द्र फलेन्द्र सुरेन्द्र …
- सुन्दरी – पंचकल्याणक अगम्या …
श्री सिद्धचक्र विधान
कविवर सन्तलालजी विरचित
श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान
कविवर सन्तलालजी के स्वनगर नकुड़ (उत्तरप्रदेश) से प्राप्त
प्राचीन शुद्ध हस्तलिखित प्रति के आधार से संशोधित
प्रेरक :
बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारी शास्त्री, देवालयी
सम्पादक :
डॉ. राकेश जैन शास्त्री, नागपुर
इंजी. संयम जैन शास्त्री, नागपुर
प्रकाशक :
अजितप्रसाद वैभवकुमार जैन
श्री दिगम्बर जैन दिव्य देशना ट्रस्ट
२२, ए/९, राजपुर रोड, सिविल लाइन, दिल्ली - ११००५४
प्रकाशकीय
जैन
श्री सिद्धचक्र विधान
सम्पादकीय
जैन शास्त्रों में वर्णित अनेक पूजन-विधानों में ‘सिद्धचक्र विधान’ का विधान महत्त्व है; क्योंकि इस विधान में हमारे चरम लक्ष्य ‘सिद्धत्व की प्राप्ति’ का ही विस्तृत गुणानुवाद किया गया है।
जो संसार के बन्धनों से छूट गए हैं; जो द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं; जिनमें क्षायिक अनन्तदर्शन-क्षायिक अनन्तज्ञान-क्षायिक सम्यक्त्व (क्षायिक अनन्तचतुष्टय) - क्षायिक अनन्तवीर्य के अलावा अव्याबाधत्व, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व और अगुरुलघुत्व भी प्राप्त हो गए हैं, उन्हें ‘सिद्ध’ कहते हैं - ऐसे अनन्त सिद्ध परमात्मा, लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं।
सिद्धों का समूह ही ‘सिद्धचक्र’ कहलाता है और इस ‘सिद्धचक्र विधान’ में सभी सिद्धों का नामस्मरण-वन्दन-पूजन आदि के माध्यम से उनका गुणानुवाद करते हुए ‘सिद्ध दशा प्राप्त करने का विधान अर्थात् उपाय’ भी बतलाया है।
ज्ञानी जीवों का चरम लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है, अतः उसके हृदय में पूर्ण सुखी अनन्त-सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य-उपाध्याय-साधु परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख का मार्ग बतलानेवाली जिनवाणी के प्रति भक्तिभाव होना स्वाभाविक है। ज्ञानी जीव, विषय-कषाय रूप अशुभों में तो रहना ही नहीं चाहते, परन्तु सिद्धों के समान पूर्ण सुख प्राप्त करने को उनको वर्तमान में सामर्थ्य नहीं है, अतः सिद्ध भगवन्तों के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति रहते हैं एवं संलग्न रहते हुए वे अशुभभावों से तो सहज ही बच जाते हैं।
यह प्रकाशन, मुख्यरूप से जिस हस्तलिखित प्राचीन प्रति को आधार बना कर किया जा रहा है, उसका संक्षिप्त इतिहास जानना अत्यन्त आवश्यक है -
‘सिद्धचक्र विधान’ के रचयिता कविवर सन्तलालजी के जीवनकाल में लिखित अत्यन्त प्राचीन प्रति का संक्षिप्त इतिहास एवं उसकी विशेषताएँ :
‘सिद्धचक्र विधान’ का यह विधि-वर्णन संकलित प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री की निजी वृत्ति का परिणाम है, जब वे आज से लगभग ३० वर्ष पूर्व सन् १९९० में सिद्धचक्र विधान के रचयिता कविवर
सन्तलालजी के जन्म-स्थान में गये थे, यह भारत के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले के निकट स्थित नकुड़ गाँव है, वे दरअसल महाप्रज्ञ में प्रवचनार्थ नहीं गये थे, तब समाज ने आपके ही विधानवाचन में ‘सिद्धचक्र विधान’ भी रचाया था।
उससमय वहाँ उन्हें समाज के स्थानीय पण्डित श्री विरेन्द्रजी जैन, नकुड़ ने मन्दिरजी के हस्तलिखित ग्रन्थ भण्डार में विराजमान इस शुद्ध प्रति के दर्शन / अवलोकन कराए थे, वे विरेन्द्रजी आज भी हमारे बीच में विद्यमान हैं। जब उनसे इस प्रति की फोटोकॉपी देने के लिए निवेदन किया तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए; फिर उन्हें इसकी एक प्रति फोटोकॉपी अवलोकनाथ प्राप्त भी की। बाद में और अनेक महानुभावों को उन्होंने इस प्रति की फोटोकॉपी उपलब्ध कराई है।
यह प्रति वर्तमान विक्रम संवत् २०७७ से लगभग १३५ वर्ष पूर्व प्रति संवत् १९४२ में लिखी गई थी, उससमय कविवर सन्तलालजी भी जीवित थे।
इस हस्तलिखित प्रति के अन्त में निम्न प्रशस्ति एवं लिपिकर्ता का नाम प्राप्त होता है - इति सिद्धचक्र सम्पूर्णम्। शुभम् सुखदायकम्। लिखतं पण्डित किशनदत्त नकुड़ ग्राम-स्थिति (निवासी)।
(दोहा)
माघ शुक्ल तिथि सप्तमी, दिन है बेपतवार।
पुत्तला लिखी पूरी करी, सबको हो सुखकार ।।
संवत् विक्रम के कहे, नख-नख-बार अरु होय।
सज्जनपूजा पूर्ण करे, भव-भव आनन्द होय ।।
[अर्थात् यह पुस्तक विक्रम संवत् १९४२, माघ शुक्ल सप्तमी तिथि, दिन बेपतवार अर्थात् बृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन लिखकर पूरा किया गया है, जो सबको सुखदायक हो, तथा जो सज्जनजन, इसके माध्यम से पूजन (सिद्धचक्र मण्डल विधान पूजन) करेंगे, उन्हें भव-भव में आनन्द की प्राप्ति होगी अर्थात् शीघ्र मुक्ति की प्राप्ति होगी।]
यह नकुड़ प्रति का पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियों के पाठ से अधिक शुद्ध, उचित एवं प्रामाणिक होता है; तथा नकुड़ निवासियों ने बतलाया कि यह प्रति कविवर सन्तलालजी के जीवनकाल में ही लिखी गई थी तथा
श्री सिद्धचक्र विधान
इसे कविवर ने देख भी लिया था और इसे शुद्ध भी कर लिया था; संवत् १९४२ ही कविवर की मृत्यु का भी संवत् है, तथा अनेक स्थानों पर हाशिये पर की गई शुद्धियाँ भी इसकी प्रमाण हैं; कि किसी विद्वान् व्यक्ति ने इस प्रति का शुद्धिकरण अवश्य किया है। अथवा यह भी सम्भव है कि स्वयं कविवर ने अपनी मूल प्रति को ही व्यावसायिक लेखक से अच्छीतरह साफ-सुथरी लिखाया हो। इस कारण हम देख रहे हैं कि इस प्रति की लेखनी भी अत्यन्त स्पष्ट एवं सुन्दर है। इसके कुछ पृष्ठों की फोटो इस संस्करण के अन्तर्गत प्रकाशित भी किये गये हैं।
एक त्रुटि यह भी ज्ञात होती है कि जो भी मूल रचनाकार होते हैं, वे सामान्य साक्षर उपयोग में आनेवाले मन्त्रादि आदि को अपनी हस्तलिखित प्रति में नहीं लिखते हैं, वे प्रतिलिपिकारों को यह निर्देश दे देते हैं कि इन स्थानों पर इन सामान्य बारम्बार उपयोग में आनेवाले मन्त्रों आदि को लिख देवें। तथा यह पण्डितजी की स्वयं के उपयोग में आनेवाली प्रति थी, अतः इसमें सर्वत्र समान रहनेवाले स्थापक-अष्टक-मन्त्रमाला आदि के मन्त्रों को लिखा नहीं गया है, वहाँ मात्र ‘अमुक स्थापन’ तथा अष्टकों के पूर्व ‘अष्टक’ या ‘अथ पूजा’ लिख दिया है, तथा जलादि के मन्त्र भी पूरे न लिखकर मात्र ‘जल’ ‘चन्दन’ ‘अक्षत’ आदि लिख दिया है। ‘जयमाला के बाद के अर्घ्य एवं’ ‘पुष्पांजलि क्षिपेत्’ आदि मन्त्रों को भी नहीं लिखा गया है, क्योंकि इन सबका सर्वत्र समान प्रयोग होता है। हाँ, जब पूजन के अन्तर्गत ८-१६-३२ आदि विशेष अर्घ्य आते हैं तो उनके मन्त्र भी नहीं हस्तलिखित प्रति में अवश्य विस्तार से मिलते हैं।
इसप्रकार हम साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि यह कविवर की मूल प्रति की ही प्रथम प्रतिलिपि होना चाहिए, जिसे कविवर ने अपनी प्रति को ही शुद्ध साफ प्रति अन्य प्रशिक्षित प्रतिलिपिकार से लिखवायी होगी। लेकिन इतना होने पर भी हमें ऐसे कोई स्पष्ट साक्ष्य प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह संकेत मिलता कि यह प्रति कविवर ने स्वयं शुद्ध कर ली थी, अतः हमने प्रस्तुत प्रकाशन में अनेक हस्तलिखित और प्रकाशित प्रतियों को सामने रखकर भी पाठ मिलाये हैं; यद्यपि हमें यह कहने में बिलकुल भी संकोच नहीं है कि अन्य हस्तलिखित प्रतियों के सामने यह अत्यन्त शुद्ध प्रति है, अतः इस प्रकाशन में मुख्यरूप से तो इसी नकुड़ प्रति के पाठ को ही सर्वत्र रखा गया है, तथापि जहाँ इस प्रति के पाठ
सम्पादकीय
में सन्तोष नहीं हुआ, अथवा अर्थ समझने में कठिनाई प्रतीत हुई, वहाँ अन्य हस्त-लिखित प्रतियों तथा प्रकाशित प्रतियों के पाठों को सामने रखकर अन्तिम निर्णय लिया गया है। इसप्रकार इस प्रकाशित पाठ को अन्तिम रूप दिया गया है।
प्रस्तुत प्रकाशन के प्रमुख सम्पादन बिन्दु
१. प्रस्तुत हस्तलिखित प्रति के लेखन में उसके लेखक की बुद्धि के अनुसार अनेक शब्दों को वर्तमान वर्तनी के प्रकारों से भिन्न लिखा मिलता है, जिसे वर्तमान शैली के अनुसार इस संस्करण में सुधारा गया है। जैसे, ‘सरूप’ को ‘स्वरूप’, ‘सभाव’ को ‘स्वभाव’, ‘अचन या अिचन’ को ‘अर्चन’, ‘नमु’ को ‘नमो’ आदि।
२. इस संस्करण में जगह-जगह प्राकृतगाथाएँ श्लोक-उद्धरण भी दिये गये हैं, जिससे विषय समझने में सरलता हो। जैसे, सप्तम पूजन में पंच परमेष्ठी के अर्घ्य में प्रत्येक सी-सी छन्दों के बाद अष्टक परमेष्ठी के अर्घ्य, सिद्ध परमेष्ठी के अर्घ्य आदि। इसीप्रकार छठे पूजन में १५८ कर्म-प्रकृतियों के भेदों में शीर्षक-उपशीर्षक लगाये हैं। इसीप्रकार अन्यत्र भी संशोधन चाहिए।
३. प्रस्तुत प्रकाशन में अनेक स्थानों पर संस्कृत विधान के आधार पर अर्घ्यावलियों के मन्त्रों का मिलान तथा संशोधन भी किया गया है। इस प्रति में कहीं-कहीं लिपिकार मन्त्र भी नहीं लिख पाये हैं, वहाँ संस्कृत विधान का सहारा लेकर उसको पूर्ति कर ली गई है।
४. मूल प्रति में मन्त्रों में ‘के ही’ के बाद ‘अहं’ शब्द कहीं मिलता है, कहीं नहीं मिलता है; तो उसे प्रकरणार्थ को दृष्टि से सर्वत्र जोड़ा गया है।
५. ‘जयमाला’ के लिए ‘आरती’ शब्द का भी प्रयोग मिलता है, अतः एक जगह उसका संकेत किया गया है।
६. अनेक स्थानों पर कठिन शब्दों के अर्थ भी नीचे पाद-टिप्पण में दिये हैं; जैसे, सप्तम पूजन में मन्त्र ४३८ के छन्द में ‘अष्टला - ढेर, राशि या अंबार’ और ‘अष्टोला = आभरण, बाधा या आठ रहित’ इत्यादि पाद-टिप्पण में दिये हैं।
इस सम्पादन-कार्य को सम्पन्न करने में आदरणीय प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री, खानियाबधा/झालरापाटन का आग्रह तो था ही, उन्होंने स्वयं हमारे साथ नागपुर आकर, अनेकों बार में महीनों परिश्रम किया
श्री सिद्धचक्र विधान
है; वे हस्तलिखित प्रति से पढ़े थे और इस प्रकाशित में संशोधन करते थे; अतः मैं भाईसाहब श्री अभिनन्दनजी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
साथ ही मन्त्रों का मिलान करने में संस्कृत प्रकाशन - ‘बृहद् श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान’, मुनिश्री सहिष्णु सदन, दिल्ली, सन् १९८९ को आधार बनाकर संशोधन कार्य किया गया है। यद्यपि इस प्रकाशन में कहीं भी इस ग्रन्थ के मूल रचयिता के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है, परन्तु इन्दौर से सन् १९४४ में प्रकाशित प्राचीन प्रति में इसके रचयिता का नाम श्री शुभचन्द्राचार्य का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस प्रति को श्री अरुण जैन कमेटी से प्राप्त पी०डी०एफ० में भारतीय श्रुति-दर्शन केन्द्र, जयपुर की सौजन्य प्राप्त होती है।
संस्कृत मन्त्रों का मिलान करने में तथा भाईसाहब ब्र. अभिनन्दनजी की अनुपस्थिति में हस्तलिखित प्रति से भी पाठों का मिलान करने में हमारे सुपुत्र इंजी. पण्डित संयम जैन शास्त्री एवं धर्मपत्नी श्रीमती डॉ. स्वर्णलता जैन भी बहुत सहयोग प्रदान किया है, अतः हम इनके भी विशेष आभारी हैं।
संस्कृत सिद्धचक्र विधानों के प्रकाशन का संक्षिप्त इतिहास
इस प्रकाशन इन्दौर-निवासी श्रीमान् सेठ सर हुकमचन्दजी के पुत्र एवं श्रीमान् सेठ जैसरन राजकुमार सिंह के सुपुत्र श्री चन्द्रकुमार सिंह की पवित्र स्मृति (जन्मतिथि ३०.७.१९४३ एवं देहावसान २६.६.१९९१; कुल आयु लगभग सात वर्ष) में किया गया था।
इस विधान का प्रकाशन, इन्दौर के दिगम्बर जैन उदासीनश्रम में स्थित अमर ग्रन्थालय से प्राप्त हस्तलिखित प्रति के आधार से पर्याप्त संशोधन करके किया गया है। इसके प्रकाशन में पण्डित खुशालचन्द जैन ने लिखा है -
'यद्यपि कुछ वर्षों पहले मुंशी स्व. श्री चंवरमल सन्तलालजी कृत एक सिद्धचक्र मण्डल विधान छप प्रकाशित हो चुका है, परन्तु वह संस्कृत में नहीं, हिन्दी में है। संस्कृत का यह विधान वहाँ तक हम समझते हैं, वह अभी तक कहीं से प्रकाशित नहीं हुआ है। … पाठक महाशय, विधान को पढ़कर स्वयं समझ सकेंगे कि यह कितना एक विद्वान् की सम्पूर्ण कृति न होकर एक संग्रहीत पाठ है, जिसके कर्ता ब्रह्मकुश श्री शुभचन्दजी हैं।
प्रस्तुत पाठ में एक ही जयमाला दो पूजनों में पाई जाती थी, परन्तु हमने
वैसा न करके दूसरे स्थान पर श्री १०८ आचार्यप्रवर पूज्यपादस्वामी कृत सिद्ध-स्तोत्र को जयमाला की जगह रख दिया है।’
इस प्रकार आचार्य पूज्य के १०४ मन्त्रों की रचना के आधारभूत आगम के सम्बन्ध में वे लिखते हैं -
'आठों पूजों के जितने मन्त्र हैं, वे सब महापण्डित आशाधरजी कृत सद्यमरण के आधार पर ही हैं - उन नामों का अर्थ समझने में प्रायः विद्वानों को भी कठिनता प्रतीत होती थी, आचार्य वयों के श्री १०८, एकैक फलालात दिगम्बर जैन सरस्वती भक्त से प्राप्त श्री ब्रह्मसार मुनि कृत प्राचीन संस्कृत टीका के आधार पर हमने ऐसे शब्दों को निर्णीत और अर्थ दे दिया है।
कुछ महानुभावों की इच्छा भी थी कि आठों पूजों के मन्त्रों को भावतु जिनसेनाचार्य कृत सद्यमरण के द्वारा परिवर्तित कर देना चाहिए, अतः उनके सन्तोष के लिए भावतु जिनसेनाचार्य के सद्यमरण गन्ध मन्त्र भी अन्त में (पृष्ठ ११२-१२७) दे दिए गए हैं। आशाधरा इस पाठ में आठवी पूजा का मन्त्र भाग अधूरा ही रहा है। पूजन करनेवाले सज्जनों को इनमें से यथारुचि किसी भी एक पाठ का उपयोग कर लेना चाहिए।’
अध्ययन करने पर दोनों संस्कृत विधानों में कुछ समानता एवं कुछ विशेषता भी ज्ञात होती है -
१. प्रत्येक में जयमालाओं के हिन्दी अर्थ भी दिये गये हैं, इससे प्रतीत होता है कि सिद्धचक्र विधानों के आयोजन के समय जयमालाओं का विशेषतया अर्थ करने की परम्परा भी बहुत प्राचीन समय से ही चली आ रही है।
२. सभी पूजनों में … आदि एवं निरवकाशसम्बन्धी … आदि स्थापना के दो छन्द, सभी पूजनों में एक ही हैं; जबकि अष्टक के छन्द अलग-अलग हैं।
३. प्रत्येक पूजन में अष्टक के अन्तर्गत जल के छन्द के बाद उस पूजन के ८-१६-३२ आदि अर्घ्यों के मन्त्रों को एकसाथ लिखा गया है, मानो वे उन-उन मन्त्रों में उल्लिखित गुणों के द्वारा अष्टद्रव्य सिद्ध भगवन्तों का पृथक्-पृथक् पूजन भी कर रहे हों। इसप्रकार प्रत्येक मन्त्र को पाठ करके उन गुणों के धारक सिद्ध भगवन्तों को पृथक्-पृथक् अष्टक एवं अर्घ्य समर्पित किया गया है। या तो हम सबको ज्ञात है कि अष्टकों के बाद में अर्घ्य में भी आठ द्रव्यों
श्री सिद्धचक्र विधान
का समावेश किया जाता है। हम यह भी कह सकते हैं कि अर्हत् के माध्यम से मानो संक्षिप्त पूजन ही की जाती है तथा संस्कृत विधानों में प्रथम पूजन के जल के छंद के बाद सामान्यीकरण से ८३-९२ आदि मंत्रों को लिखने के बाद नहीं पर नोट भी लिखा मिलता है कि - 'प्रत्येक मंत्र को क्रमशः नौ बार बोलना चाहिए तथा क्रमशः अर्हत्-अनाद्यनंतरोगाया के साथ (मंत्रों में जल के स्थान पर यथायोग्य चंदन-अक्षत आदि परिकल्पित करके) जल-चंदन-अक्षत-पुष्प-नैवेद्य-दीप-धूप-फल-अर्घ्य समर्पित करना चाहिए; इससे इस विधान का अत्यंत विस्तार के साथ भी करने की सूचना मिलती है।
४. दिल्ली में प्रकाशित प्रति में तो अष्टकों के बाद उक्त मंत्रों को आवली के अन्तर्गत श्लोक/छंद के साथ लिखकर अलग से अर्घ्य भी समर्पित किये गये हैं, परन्तु इन्दौर से प्रकाशित प्रति में नहीं। इसप्रकार इन्दौर से प्रकाशित प्रति में तो मंत्र एक बार ही लिखे गये हैं, जबकि दिल्ली से प्रकाशित प्रति में ८-१६-३२ आदि मंत्रों का उल्लेख प्रत्येक पूजन में दो-दो बार आया है।
५. इसप्रकार हिन्दी छंद/पद्य के साथ मंत्र लिखने का प्रयोग, हिन्दी ‘सिद्धचक्र विधान’ में भी कविवर श्री सन्तोलाल ने ही किया है। हाँ, इसमें मंत्रों को पृथक् सामूहिकरूप से कहीं भी उल्लिखित नहीं किया गया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विधानों को अपनी परिस्थिति के अनुसार संक्षिप्तरूप परिवर्तन के साथ भी किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी है कि बिल्कुल नहीं करने की अपेक्षा, समयानुसार अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण अवश्य करना चाहिए।
६. यद्यपि अधिकांश स्थानों पर तो दोनों संस्कृत पाठों में मंत्र समान ही है, परन्तु अनेक जगह मंत्रों और उनके क्रम में अन्तर भी दृष्टिगोचर होता है।
७. इन्दौर से प्रकाशित प्रति में अनेक स्थानों पर मंत्रों के निमित्त से नीचे पाद-टिप्पण भी मिलते हैं, जहाँ उनके सम्बन्ध में कुछ विशेष विवरण मिलता है। जैसे, अष्टम पूजन में क्रमांक ९९ पर एक मंत्र ‘के हीं अनन्तनिरोगाय नमः स्वाहा’ आया है; इसमें पाठकों को भ्रम हो सकता है, इसके निराकरणार्थ पाद-टिप्पण में शंका उत्पन्न करके नियमानुसार समाधान किया गया है -
परमप्रकाशिकत्वाद्वाच्यतः कथं निर्दोषत्वमिति चेत् ?
परिहृते - अतिरागो विनष्टोऽतो विनाशो यस्येत्यनः, निश्चितया दया
(सगुणनिर्गुणप्राणिवर्गसंरक्षण-लक्षणो करुणा) यस्येति निर्दोष्य अनन्तविनाशो निर्दोष्यत्वेऽनन्तत्वनिर्दोषः।
अथवा अति-अतिरावेन अतो अनन्ते यमे निर्दोषः, यदा अतिरावेन अनन्तविनाश-प्राप्ता निर्दोष्या समाप्ता।
अथवा अतिरावेन अतो मोक्षगमने निश्चितया दया वन्य।
अर्थात् उक्त संस्कृत पाद-टिप्पण का हिन्दी में अर्थ इसप्रकार है -
शंका - परम कार्पणिक होने से भावनाओं को निर्दोषपना कैसे सम्भव है?
समाधान - इसका परिहार करते हैं - अति को प्राप्त हुआ है अन्त या विनाश जिसका - ऐसा ‘अनन्त’ शब्द का अर्थ है तथा जिसकी निश्चित दया (अर्थात् करुणा एवं निर्मोह परिणाम का रक्षण करनेरूप है लक्षण जिसका - ऐसी करुणा) है - ऐसा निर्दोष का अर्थ है; इसप्रकार अति-अनन्तता को प्राप्त निश्चित स्वस्वभाववाली दया - ऐसे अनन्त निर्दोष (सिद्ध भगवन्तों) को हमारा नमस्कार है।
अथवा अति - अतिरावेन से, अन्त - अन्त करनेवाले, निर्दोष - यम; अर्थात् जिनके अतिशयभावपूर्वक अन्त या विनाश को प्राप्त हो गये वे निर्दोष यम - ऐसे अनन्त-निर्दोष (सिद्ध भगवन्तों) को हमारा नमस्कार है।
अथवा जिन्होंने अतिरावेन से अमोक्ष-गमन करनेके निश्चितरूप से दया प्राप्त कर ली है - ऐसे सिद्ध भगवन्तों को हमारा नमस्कार है।
इसप्रकार पाद-टिप्पणों में श्री श्रुतसागर कृत प्राचीन संस्कृत टीका के आधार पर शब्दों के विशेषपूर्वक अर्थ दिये गये हैं।
८. दोनों में प्रत्येक पूजन के अष्टकों के बाद और जयमाला के पूर्व के हीं असिआऊसा नमः - इस मंत्र को १०८ बार जाप देने का उल्लेख किया गया है।
इसप्रकार प्रस्तुत प्रकाशन को अनेक हस्तलिखित प्रतियों के अलावा अनेक प्रकाशित संस्कृत-हिन्दी के सिद्धचक्र विधानों के संस्करणों का अवलोकन करके/सहयोग लेकर प्रकाशित किया गया है, अतः हम इन सभी के प्रकाशन संस्थाओं के भी अत्यन्त आभारी हैं। इन सभी का संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है -
श्री सिद्धचक्र विधान
प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोगी हस्तलिखित एवं प्रकाशित प्रतियाँ
हस्तलिखित तीन प्रतियों का परिचय
१. हस्तलिखित प्रतियों में नकुड़ से प्राप्त प्रति (फोटोकॉपी) के लिए तो यह प्रकाशन समर्पित ही है, क्योंकि उसे भी आधार बनाकर इस संस्करण को प्रकाशित करने का भाव भी बना है - यह प्रति श्रीमान् पण्डित किशनलाल नकुड़ के द्वारा कविवर सन्तोलाल जी के मृत्यु संवत् १९४१ अर्थात् आज से १३० वर्ष पूर्व सन् १८८५ में ही लिखी गई थी।
२. यह श्री विक्रान्तजी झालरापाटन से प्राप्त हुई, महल्का (खास, श्रेष्ठ) की प्रति है, इस प्रति को भी श्रीमान् ताराचन्द जैन ने मिति कार्तिक शुक्ल १०, वि.सं. १९८८ में ही (आज से ८९ वर्ष पूर्व) लिखकर पूरा किया था।
३. यह भी श्री विक्रान्तजी झालरापाटन से प्राप्त हुई, महल्का (खास, श्रेष्ठ) की ही प्रति है, इसे भी श्रीमान् ताराचन्द जैन ने पूर्व प्रति से लगभग दो माह बाद मिति पौष सुदी ७, दिन शुक्रवार, विक्रम संवत् १९८८ (आज से ८९ वर्ष पूर्व) लिखकर पूरा किया था।
प्रकाशित चार संस्करणों का विवरण
१. श्री अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, जयपुर से प्रकाशित पंचम/अष्टम संस्करण, ई. सन् १९९६; नीलाक्षर राशि - मात्र ९९/१८ रुपये।
२. श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनागढ़ से प्रकाशित तृतीय रंगीन आवृत्ति, ई. सन् २००९; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
३. श्री वीर पुस्तक भण्डार, जयपुर से प्रकाशित नवीन संस्करण, ई. सन् २००९; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
४. श्री दिगम्बर जैन पुस्तकालय, सूरत से प्रकाशित संस्करण, प्रकाशन तिथि का प्रकाशन नहीं; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
प्रकाशित दो असंपादित (अनूदित) संस्करणों का विवरण
१. पण्डित सत्कुमार सिद्धचक्र नवोल्लास द्वारा अनूदित एवं सम्पादित संस्करण, प्रकाशक - श्री देवेन्द्रकुमार अभिषेककुमार जैन, शाहदरा, दिल्ली; ई. सन् २००५; नीलाक्षर राशि - मात्र १०० रुपये।
१. पं. कल्याणसेन द्वारा अनूदित एवं सम्पादित संस्करण, प्रकाशक - श्री अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, न्यू उस्मानपुर, दिल्ली; ई. सन् २०१०; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
नोट - एक बार हमारा भी ‘श्री सिद्धचक्र विधान’ को अर्थसहित प्रकाशित करने का भाव है; देखें, भविष्य में क्या है?
श्रीपाल-मैनासुन्दरी का ‘सिद्धचक्र विधान’ से क्या सम्बन्ध?
श्री सिद्धचक्र विधान करने के साथ श्रीपाल और उनके साथियों का कुष्ठरोग दूर होने की घटना जुड़ी हुई है। सिद्ध भगवन्तों में अत्यधिक गुणानुराग शुभ भाव, तदनुसार सातों सद्भावों का उदय और आठ अंगुल कुष्ठरोग की प्राप्ति - इन निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध में किसी के रोगादि दूर हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है; परन्तु सिद्धचक्र की महिमा मात्र कुष्ठ-निवारक तक सीमित करना, उसकी महानता को हीन प्रदर्शित करना है। कुष्ठ तो शरीर का रोग है, आत्मा का रोग तो मोह-राग-द्वेषादि विकारी भाव हैं; अरे! सिद्ध का स्वरूप जानकर, उन जैसी अपनी आत्मा को पहचानकर, उसमें ही लीन हो जाने पर मोह-राग-द्वेष और जन्म-मरण जैसे महान रोग भी नष्ट हो जाते हैं।
एक और निवेदन - पूजन करते समय पूजन की लिखी सबसे सर्वत्र पूजकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्थापना के समय हम अपने पूज्य पुरुषों का आह्वान करते हैं, अतः उससमय उनके नाम का संस्कृत भाषा के अनुसार सम्बोधनवाची चिह्न (!) के साथ प्रयोग करें तथा जब अष्टक या अर्घ्य समर्पित करें, उस समय हमें उनके नाम के साथ चतुर्थी का प्रयोग करें; क्योंकि नमः, अर्घ्य आदि के योग में चतुर्थी का प्रयोग होता है।
श्री सिद्धचक्र विधान की आठ पूजनों की विशेषता
सिद्धचक्र विधान की आठ पूजनों में सर्वत्र सिद्धचक्रपूजित सिद्ध-परमेष्ठिभ्यो को ‘मंत्र-स्थापन’ के माध्यम से स्थापित करके उनकी अष्टकों के माध्यम से पूजा की गई है, इसका कारण यह प्रतीत होता है कि यह सिद्धचक्र विधान है, इसमें किसी एक सिद्धभगवान की पूजन नहीं की गई है, इसमें त्रिकालवर्ती अनन्त सिद्ध भगवन्तों की पूजन की गई है, अतः उनकी स्थापना किसी एक मूर्ति में नहीं की जा सकती है, अतः उसके लिए सिद्धचक्र का यन्त्र
श्री सिद्धचक्र विधान
स्थापित करके पूजन की जाती है। सिद्धयंत्रों में अनन्त सिद्धों के साथ सभी सिद्धों के नामों का भी उल्लेख होता है, क्योंकि सभी सिद्धों के नाम वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से करते हैं, अतः सिद्धयंत्र में अनन्त सिद्धों की स्थापना करके उनकी पूजन की जाती है।
यही कारण है कि प्रत्येक पूजन के पूर्व स्थापना के छंद में निम्न छंद बोला जाता है -
उरधो अधो सु रेफ, सयुदध कारण विराजे।
अकारादि स्वर-लिंग, कणिका अन सो छाजे॥
वर्णित-पति वल-दल-अंगज तत्त्व-अधि धारे।
अग्र भाग में अष्टात सहित अतिसव ॥
पुनि प्रति अष्ट बेकओ परम, सिद्ध ध्यान ही में नागे को।
है केसर सम पुनि निमित्त, सिद्धचक्र प्रगारे करो॥
अर्थात् सिद्ध-चक्र यन्त्र का वर्णन करते हुए इस छन्द में कहते हैं कि - जिसके ऊपर-नीचे रेफ है, मध्य में बिन्दु सहित हकार है, अकारादि स्वरों से जो लिंग है, जिसके अन्त में कणिका है, जिसके चारों ओर आठ प्रकार के वर्गों से पूरित अष्ट-दल-कमल है, जिनकी सन्धि में तत्त्व अर्थात् तत्त्वज्ञान-प्रदत्त ‘नमो अरहंताणं’ शोभायमान है, उन कमलों पर अग्रभाग में अष्टात मंत्र ‘के’ तथा अन्त में पुनः ‘हीं’ सुशोभित होता है। इस सिद्धचक्र को देवता भी सामान्य-आराधना करते तथा देवों के समूह के सिंह वशीभूत कर लेता है, उसीप्रकार यह यन्त्र, कमलोंकी शुभाओ से विजन प्राप्त कर लेता है; अतः मैं पूजन के लिए इस सिद्धचक्र की स्थापना करता हूँ।
आठ पूजनों की अर्घ्यावली में भी उन सिद्ध भगवन्तों के गुणों का स्मरण करके, सिद्धचक्र स्थापित सिद्धों के समूह को क्रमशः ८-१६-३२-६४-१२८-२५६-५१२-१०२४ अर्घ्य समर्पित करके पूजन-विधि समाप्त की जाती है।
एक सिद्धचक्र विधान में अनेक विधानों का अन्तर्भाव
इस एक सिद्धचक्र विधान को करने से अनेक विधानों को करने का लाभ प्राप्त होता है। जैसे, सिद्ध-गुण-विधान, चौंसठ-ऋद्धि-विधान, पाद-दवन-विधान, प्रवचनचित्त विधान, कर्म-दवन-विधान, पंच-परमेष्ठी-विधान, जिन-सहस्र-नाम-विधान आदि। उनका विवरण इसप्रकार है -
प्रारम्भिक तीन पूजनों में प्रथम पूजन में सिद्धों के आठ विशेष गुण में से प्रत्येक गुण को अलग-अलग को याद करते हुए सिद्धचक्र को आठ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। द्वितीय पूजन में इन्हीं आठ गुणों में अनन्तचतुष्टय और अन्य गुणों को शामिल करके सोलहगुण के माध्यम से उन्हें सोलह अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। तृतीय पूजन में सिद्धों के शुद्ध बत्तीस गुण का स्मरण करके उन्हें बत्तीस अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इन तीन पूजनों के माध्यम से मानो ‘सिद्ध-गुण-विधान’ किया गया है।
चतुर्थ पूजन में चौंसठ ऋद्धियों के माध्यम से सिद्ध भगवन्तों को प्राप्त हुई भूतपूर्व ऋद्धियों का स्मरण करके उन्हें चौंसठ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘चौंसठ-ऋद्धि-विधान’ किया गया है।
पंचम पूजन में सिद्ध भगवन्तों के १० सामान्य-विशेष गुणों का स्मरण करके, पश्चात् उन सिद्ध भगवन्तों ने भूतपूर्व साधु अवस्था में जो मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना, संस्मरण-सामारम्भ-आरम्भ तथा क्रोध-मान-माया-लोभ के परस्पर संयोग से होनेवाले १००८ पापों का जो परिहार या प्रायश्चित्त किया था, उनके स्मरणस्वरूप एक सौ अट्ठाईस अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘पाद-दवन-विधान’ एवं ‘प्रायश्चित्त-विधान’ किया गया है।
षष्ठ पूजन में सिद्ध भगवन्तों ने जिन ८ कर्मों की १४८ प्रकृतियों का नाश किया है, उनके सामान्य-विशेष भेदों के प्रभाव में प्राप्त होनेवाले स्वभावभावों एवं अन्य अनन्तभाव-अनन्तज्ञान-अनन्तदर्शन-अनन्तसुख-समभाव-ब्रह्मभाव-शुद्धभाव-अव्ययभाव-चिन्मयभाव-निर्दोषभाव-स्वगतुभाव-परमभाव-एकत्वभाव-शाश्वतभाव-शुद्धत्वभाव-निरंजनभाव-अमृतुभाव-अक्षयभाव-निरात्मभाव-अचिन्त्यभाव-स्वात्मभाव-स्वगतभाव-सर्वलोकशीर्षभाव आदि से सम्बन्धित शताधिक सामान्य-विशेषभावों सहित सिद्ध भगवन्तों को कुल २५६ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘कर्म-दवन-विधान’ किया गया है।
इस पाद पूजन में १२८ अर्घ्य में विशेषगति नामक सप्तमी एकक भी है, जबकि १२८ प्रकृतियों में विशेषगति के प्रास और अग्रहास - ऐसे दो भेद मिलते हैं, दोहे में ‘भाव शुध्त काल … आदि’ प्रशस्त विधानगत ही है
श्री सिद्धचक्र विधान
वर्णन किया गया है, अप्रशस्त विद्यायोनि का नहीं, अतः इस संस्करण में वहाँ दोहे के बिना केवल ‘ॐ ह्रीं अप्रशस्त-विद्यायोनिगतानाम्-रहित-सिद्धाय नमः’ अर्थ - यह अर्घ्य समाविष्ट किया गया है। इस सम्बन्ध में एक टिप्पणी भी वहाँ दी गई है, जो इसप्रकार है - ‘प्रकृत या जयपुर की हस्तलिखित प्रति में विद्यायोनि नामकर्मा एक ही छंद है, वह भी प्रशस्त सम्बन्धी ही है, अतः अप्रशस्त विद्यायोनि नामकर्मा केवल अन्यत्र कहीं दिया गया है।’
सम्यग् पूजन में सिद्ध भगवन्तों ने भूतपूर्व मोक्षमार्ग और वर्तमान मोक्ष की अवस्था में जिन पंच परमेष्ठी पदों का धारण किया है, उनके क्रमशः २६-८-३६-२५-२८ आदि विशेष गुणों से सम्बन्धित १००-१०० (साधु परमेष्ठी के ११२) इस प्रकार कुल ५१२ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘पंच-परमेष्ठी-विधान’ किया गया है।
इस पूजन की अध्यात्मता में अर्घ्य ४४ और ४७ के बाद एक एक अर्घ्य लोकाग्रम के प्रसंग में द्वादशांग और श्रुतज्ञान के लिए भी आवश्यक प्रतीत हुआ; क्योंकि द्वादशांग और श्रुतज्ञान को पूर्व में मंगल के प्रसंग में अर्घ्य २७ एवं २१ में तथा पूरण के प्रसंग में ६३ एवं ६४ में अर्घ्य दिये ही गये हैं, इसलिए दिल्ली से प्रकाशित संस्कृत सिद्धचक्र विधान में भी वे नहीं हैं, जबकि इन्दौर से प्रकाशित संस्कृत सिद्धचक्र विधान में अर्घ्य ४४ में ‘ॐ ह्रीं अहोलोकाग्रम-द्वादशांगाय नमः स्वाहा’ - यह अर्घ्य मिलता है। यह भी सम्भव है कि लिखकर की गलती से वे छूट गये हों; अतः प्रकरण की सम्पुष्टि के लिए उनके मर्मों को इस संस्करण में समाविष्ट किया है। तद्विषयक टिप्पणी भी वहाँ लगाई है।
अष्टम पूजन में नाम रहित सिद्ध भगवन्तों के मानो एक हजार आठ नामों का स्मरण करके १०८ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस अष्टम और अन्तिम पूजन के माध्यम से मानो ‘जिन-सहस्र-नाम-विधान’ किया गया है। इस प्रकार हम एक ‘सिद्धचक्र विधान’ के माध्यम से अनेक विधानों का
लाभ प्राप्त कर सकते हैं - यह भी इस विधान की सर्वोत्कृष्ट महिमा को सूचित करता है।
छन्दों की तर्ज
इस विधान में हिन्दी/संस्कृत के कुल मिलाकर ४७ छन्दों का प्रयोग किया गया है, जिनको तर्ज / धुनें हमने छन्द के नाम के साथ ही देने का प्रयास किया है। इन धुनो को तैयार करने में प्रमुखरूप से पण्डित समकितजी शास्त्री खनियाधाना, साथ में पण्डित रमेशजी इन्दौर, पण्डित भानुजी शास्त्री सागर एवं पण्डित विजयजी शास्त्री का भी सहयोग प्राप्त हुआ है, इसके लिए हम इन सभी विद्वानों के विशेष आभारी हैं।
आध्यात्मिकता से भरपूर विधान
इस विधान के माध्यम से समयसार आदि अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों के स्वाध्याय का लाभ भी प्राप्त होता है। अनेक स्थलों पर लिपिकारों का अर्थ का भावरूपता नहीं होने से वे उसमें कुछ परिवर्तन भी कर देते हैं। जैसे, उदाहरणार्थ, अष्टम पूजन का ७२वाँ छन्द देखें -
निर्भय हो निर-आश्रयी, निःसंगी निर्द्वन्द्व।
निज साधन, साधक सुनिज, पर सौं नहिं संबंध ॥
अर्थात् हे प्रभु! निरभय से शुद्धात्मा और व्यवहार से सिद्ध भगवान निर्भय हैं, निःसंग हैं, निः संग हैं और निर्भय हैं; यहाँ तक कि वह स्वयं ही साधन है और स्वयं ही साधक है, पर से उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।
इसी पूजन के ७३वें छन्द में शुद्ध शब्द की व्याख्या में समयसार की ६, ७, ७३, ७८ आदि गाथाओं / टीकाओं की झलक दिखाई देती है -
पाकृत भाव न लेश है, भेद कहो नहिं जाय।
वचन-अगोचर ‘शुद्ध’ है, सिद्ध महा सुखदाय ॥
अर्थात् प्रकृत अर्थात् छद्मस्थों में स्थित प्रशस्त-अप्रशस्त भाव से रहित हूँ, भेद अर्थात् ज्ञानादि गुणों के अनन्त भेद हैं, जो कहे भी नहीं जा सकते अथवा आत्मा का गुप्त स्वरूप कहा नहीं जा सकता, वह वचनों से अगोचर है, इसलिए
१. यहाँ पर अन्य हस्तलिखित प्रतियों में ‘निज’ को ही साधक ने लिखते हुए ‘सुगुण’ को साधक लिखा है। २. यहाँ भी ‘आश्रय’ को प्रतिलिपिकारों ने ‘प्रसिद्ध’ कर दिया है।
श्री सिद्धचक्र विधान
शुद्धात्मा या सिद्ध भगवान का स्वरूप ‘शुद्ध’ और ‘महा-सुख-प्रदायक’ है। इसी प्रकार १५८वाँ छन्द देखें -
जाकी शक्ति अपार है, हेतु-अहेतु असिद्ध।
गणधरादि जानत नहीं, मैं वंदूँ नित सिद्ध ॥
अर्थात् हे प्रभु! निश्चय से शुद्धात्मा और व्यवहार से सिद्ध भगवान की शक्ति अपार है - वह हेतुवाद या अहेतुवाद से सिद्ध नहीं की जा सकती है, उसे पूर्णरूप से गणधरादि भी जानने में समर्थ नहीं हैं, उसे मैं नमस्कार करता हूँ।
पाकृत भाव न लेश है, भेद कहो नहिं जाय।
वचन-अगोचर ‘शुद्ध’ है, सिद्ध महा सुखदाय ॥
प्रस्तावना
श्री सिद्धचक्र विधान : उद्देश्य एवं महत्त्व
जैन शास्त्रों में वर्णित अनेक पूजन-विधानों में ‘सिद्धचक्र मण्डल विधान’ का विशेष महत्त्व है; क्योंकि इस विधान में हमारे चरम लक्ष्य सिद्धदशा की प्राप्ति का वर्णन है, उसका ही विशदूत गुणानुवाद इसमें किया गया है।
जो संसार के दुःखों से छूट गए हैं, जो द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं; जिनमें अष्ट कर्मों के अभाव से क्षायिक सम्यक्त्व आदि अष्ट गुण प्रगट हो गए हैं, उन्हें ‘सिद्ध’ कहते हैं - ऐसे अनन्त सिद्ध परमात्मा लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं। सिद्धों का समुदाय ही ‘सिद्धचक्र’ कहलाता है और इस ‘सिद्धचक्र विधान’ में सिद्ध दशा प्रगट करने का विधान (उपाय) बतलाते हुए सिद्धों का गुणानुवाद किया गया है।
ज्ञानी का चरम लक्ष्य पूर्ण सुख प्रगट करना है, अतः उसके हृदय में पूर्ण सुखी अरहन्त और सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख का मार्ग बतलानेवाली जिनवाणी के प्रति भक्ति-भाव होना स्वाभाविक है। ज्ञानी जीव विषय-कषाय रूप अशुभ भावों में तो रहना नहीं चाहते और सिद्धों के समान पूर्ण शुद्ध भाव प्रगट करने की उनको वर्तमान में सामर्थ्य नहीं है, अतः सिद्ध भगवन्तों के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क रहते हुए वे अशुभ भावों से सहज ही बच जाते हैं।
सिद्धचक्र विधान के साथ श्रीपाल और उनके साथियों का कुष्ठरोग दूर होने की घटना जुड़ी हुई है। सिद्ध भगवन्तों में अत्यधिक गुणानुराग शुभ भाव, तत्नुसार सातावेदनीय कर्म का उदय और बाह्य अनुकूल संयोग की प्राप्ति - इस निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध में किसी रोगारि दूर हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है; परन्तु सिद्धचक्र की महिमा मात्र कुष्ठनिधि तक सीमित करना, उसकी महानता में कमी करना है। कुछ तो शरीर का रोग है, आत्मा का रोग तो मोह-राग द्वेषादि विकारी भाव हैं। सिद्धों का स्वरूप जानकर, उन जैसी अपनी आत्मा को पहचानकर, उसमें ही लीन हो जाने पर मोह-राग द्वेष और जन्म-मरण जैसे महान रोग भी नष्ट हो जाते हैं।
श्री सिद्धचक्र विधान
सिद्धि की आराधना का सच्चा फल तो वीतराग भाव की वृद्धि होना है, क्योंकि वे स्वयं वीतराग हैं। सिद्धों का सच्चा भक्त उनसे लौकिक लाभ की चाह नहीं रखता, फिर भी पुण्यबन्ध होने से उसे लौकिक अनुकूलताएँ सहज ही प्राप्त होती हैं, परन्तु ज्ञानों की दृष्टि से उनका कोई महत्त्व नहीं है।
लौकिक अनुकूलताओं के लक्ष्य से चाहे वीतरागी देव-गुरु-धर्म की आराधना करें या कुदेव-कुगुरु-कुधर्म की आराधना करें, पापबन्ध ही होता है, अतः लौकिक अनुकूलताएँ भी उत्पन्न नहीं होतीं। इस सम्बन्ध में पण्डितप्रवर टोडरमलजी मोक्षमार्ग प्रकाशक में लिखते हैं :-
“इस प्रयोजन के हेतु अरहन्तादिक की भक्ति करने से भी तीव्र कषाय होने के कारण पापबन्ध ही होता है, इसलिए अपने को इस प्रयोजन का अर्थी होना योग्य नहीं है। अरहन्तादिक की भक्ति करने से ऐसे प्रयोजन तो स्वयमेव सिद्ध होते हैं।”¹
अतः हमें वीतरागी देव-गुरु-शास्त्र का सही स्वरूप पहचान कर सिद्धचक्र विधान के माध्यम से वीतराग भावों का ही पोषण करना चाहिए।
मण्डल-रचना (मोड़ना)
जिस दिन से विधान करना हो, उसके एक दिन पूर्व वेदी के सामने ८ X ८ फुट अथवा छोटा-बड़ा चौकोर समतल लकड़ी या स्याम के हिसाब से मोड़ना तैयार कर लेना चाहिए। मोड़ना के बीच में ॐ बनाना चाहिए तथा गोलाएँ में आठ वलयों में क्रम से ८, १६, २४, ३२, ४८, १५६, ५१२, १०२४, या जो फूल या साधिया या बिन्दु आदि बनाना चाहिए। यदि रंगोली से मोड़ना बनाना सम्भव न हो तो फ्लेक्स से बने हुए रंगीन मोड़ने का प्रयोग भी किया जा सकता है।
मण्डल-कलश-शोभायात्रा
जिस परिवार के द्वारा मण्डल-कलश-स्थापना करना निश्चित हो गया हो तो मण्डल-कलश-शोभायात्रा के पूर्व उनके घर जाकर स्थान का चयन करें, जहाँ कम से कम १००-५० भाई-बहन भेंट कर मङ्गलगान कर सकें। भक्ति के
१. मोक्षमार्ग प्रकाशक, पहला अधिकार, पृष्ठ ७
प्रस्तावना
रस-परिपक्व हेतु वाद्य-यन्त्र आदि की व्यवस्था हो तो उत्तम है। बैठने के लिए घर में चौकी ही अथवा बड़ा हॉल; यदि मकान के अन्दर उचित स्थान न हो तो बाहर टेंट लगा कर बिछायत करा दें। समाज के सदस्यगण यहाँ मण्डल-कलश लेने पहुँचें, उनसे पूर्व सामग्री भेज दें-सामग्री में जो कलश, सबसे सुन्दर वाले हों, उनमें से एक कलश, एक थाली में हल्दी-सुपारी, सरसों, पुष्प, पान, पूजनी रत्न, सिक्के, कलाश, आदि तथा परिवार के सदस्यों को भी हार-मुकुट, खास तौर से छोटे बच्चों को हार-मुकुट अवश्य भिजो। साथ ही हाथ धोने के लिए इत्र लगा जल, दो कटोरे में केसर, गेरुकोन, एक छोटी केची आदि भी भेज दें तथा उन परिवार वालों को समझा दें कि सम्पूर्ण समाज आपके घर आनेवाली है, अतः उनके सम्मान में कुछ भेंट आदि की व्यवस्था करें।
दिशा नहीं देख कर, परिवार को बिठाएँ, उनके सामने एक छोटी टेबल रखें। स्त्री-वर्ग बिछुआ दें, टेबल पर सामग्री को थाली एवं मण्डल-कलश रखें। परिवारवालों के हाथ धुला कर, मङ्गल-पञ्चक या मङ्गलष्टक पढ़ते हुए कलश पर पुष्प-प्रेषण करें। रक्षा-सूत्र बाँधें, सभी के हाथों में मङ्गल-कलश में हल्दी, सुपारी आदि माङ्गलिक सामग्री डलवाएँ।
सर्वयोगी प्रतिध्वनिवाद्य, परिवारवालों को रक्षा-सूत्र बाँधें, उनका तिलक करें। कलश पर रक्षा-सूत्र बाँधें, स्वस्तिक करें, पंक्ति-गीत भी साथ-साथ गाते रहें। पश्चात् फोटो खींचने हेतु स्थिर पर कलश रख कर, परिवार के जोड़े खड़े करें, छोटे बच्चों को आगे बिठा लें, बड़े सदस्य भी पीछे खड़े हो सकते हैं।
इसप्रकार सुन्दर सोंटा करके फोटो निकलवायें, उससे उस परिवार की मधुर-स्मृति का चित्र, सदा के लिए सुरक्षित रहेगा। भेंट वितरण करके यह मण्डल-कलश-शोभायात्रा विधान-स्थल हेतु रवाना करें।
धर्मध्वजारोहण की विधि
मण्डल-कलश-शोभायात्रा ध्वजारोहण स्थल पर पहुँचने के बाद सभी को ध्वजास्तम्भ पर ले जाकर, ध्वजादण्ड पर ध्वजारोहण-कर्ता-परिवार के सदस्यों द्वारा रक्षासूत्र मन्त्र बोलकर रक्षासूत्र बाँधें। कपड़े की ध्वजा पर भी केसर से स्वस्तिक बनवावें, संगीतवालों की सहायता से पंक्ति-गीत करते रहें। इस समय आमन्त्रित प्रमुख अतिथि, ब्र. भाई-बहिन, उपस्थित विद्वान्, समिति के अध्यक्ष,
१३
श्री सिद्धचक्र विधान
मन्त्री, आदि प्रमुख व्यक्तियों द्वारा यह विधि करावें। पश्चात् ध्वजा को फहरावें एवं सावधान होकर ध्वजगीत प्रस्तुत किया जावे।
मङ्गल कलश स्थापना
पश्चात् उद्घाटन-विधि करावें। उसके बाद मङ्गलकलश का स्थापन करावें। इस विधि के मन्त्र आगे दिये गये हैं। विधि के समय जय जयकार के नाद एवं मङ्गल गीतों के साथ उपस्थित भाई-बहिन सहभागी हों।
इसके पश्चात् निम्न अमृत-स्नान मन्त्र बोलते हुए प्रसुक जल से अमृत-स्नान करावें-
ॐ ह्रीं अमुके अमृतेदमये अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हः हः स्वाहा।
तत्पश्चात् निम्न रक्षा-सूत्र-मन्त्र बोलते हुए रक्षा सूत्र बँधवावें-
जिनेन्द्र-पूज गुरुन, श्रुत-वचः सदा धारण,
स्वशील-स्म-रक्षणं ददत् सन्मृ-वृंहणम्।
इति प्रतिन-पट्टिका-नितियामाद्यं,
तदवश्य प्रन-कर्मणे विहित-रक्षिकावम्।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः अः सि-अ-उ-सा सवौषधशान्तिं कुरु कुरु।
ॐ नमोऽर्हते भगवते थीथुट्ट-पर्मेश्राय एतस्य करपल्लवे
रक्षाबन्धनं करोमि समिद्धिस्तु।
ॐ ह्रीं श्रीं नमः स्वाहा।
पश्चात् निम्न मन्त्र पढ़कर स्वस्तिक बनवावें एवं कलश स्थापित करावें-
ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीसिद्धादि-ब्रह्मणे सतेऽस्मिन् …
मासे … पक्षे … तिथौ … वासरे … वर्षे … इह नगरे
… मन्दिरे … कार्येण निर्विघ्न-समाप्त्यर्थ, मण्डप-भूमिशुद्धयर्थ,
पाप-शुद्धयर्थ, शान्त्यर्थ, पुण्यावाप्त्यर्थ, यज-रक्ष-ग्रह-पिशाचादि
-बीजूर-शोधिमर्थ मङ्गल-कलश स्थापनं करोम्यहं इन्द्रौ इन्द्रौ हः स्वाहा।
इसके पश्चात् सभी पात्रों को समझा दें कि आज से महामहोत्सव
पर्यन्त सूतक-पातक नहीं लगेगा।
१४
प्रस्तावना
पात्र-शुद्धि एवं उनके नियम
(१) नियमित रूप से विधान में अन्त तक सम्मिलित रहें। (२) स्वस्थ हों। (३) विकलांग न हों। (४) हीन आचरण न हों। (५) विधान के अन्त तक संयम से ही रहें। (६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन करें। (७) विधान के समय व्यापार की चिन्ता से मुक्त रहें।
सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा रक्षासूत्र बाँधें।
‘ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्षा हं फट् स्वाहा।’
फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा अमृत स्नान करावें।
ॐ अमुके अमृतेदमये अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं
क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हः हः स्वाहा।
तिलक मन्त्र
मङ्गल भगवान् वीरो, मङ्गल गौतमो गणी।
मङ्गल कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम्।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः हः मम सर्वार्थसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।
॥ अभिषेक पाठ ॥
श्रीमत्परम-अरहन्त-सिद्ध-दीप्तः,
तोजाऽभासि चरणाम्बुजम्पुणीम।
अहंतमुत्त-पद-पद्मभानवम्,
तन्नमिपुट्ट-पद्महिं करिष्ये ॥ १ ॥
अथ पञ्चादिक-देवनानां पूर्वाचार्यकृतेन सकलकर्मक्षयार्थं भानुपुजा
-स्तवन-वन्दन-समेतं श्री-पूज्य-महागुरु-बीजपुर्वकं कार्योऽहं करोम्यम्।
वाः कृमिमातलिप्तम्ः प्रनिप्य,
संस्थापयति पुरुषो-मुखादयः।
सद्भावलोक-समयादिभिर्मयोः,
तत्रेवमुन्नवधिना कुसुमा क्षिपामि ॥ २ ॥
इति अभिषेकप्रतिज्ञया पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ॥
१५
श्री सिद्धचक्र विधान
प्रस्तावना
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए पाषाणशिला अथवा चौकी पर केशर से ‘श्री’ लिखें -
(उपजाति)
श्री-पीठ-कल्पने, विशालशक्तीर्ये;
श्री-प्रस्तरे पूर्णा, -शशाङ्क-कल्प।
श्री-वदके चन्द्रा, -प्रसीति वार्ता,
सत्त्वापयन्तीं, क्षिमायलिङ्गाम् ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं अर्हत् श्रीपीठाय नमः।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए चौकी पर बड़ी व ऊँची किनार की थाली रख कर, उसमें ‘सिंहासन’ स्थापित करें -
(अनुष्टुप)
कनकदिनिभं कर्ष, पावनं पुण्यकाणम्।
स्थापयामि परं पीठं, जिन-सम्पन्नाय भक्तिः ॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्रीपीठस्थापनं करोमि।
पश्चात् निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए शुद्धात्माद पूर्वक जय-जय शब्द बोलते हुए वेदी में धातु की प्रतिमाओं व यंत्र को सिंहासन पर विराजमान करें -
(वसंततिलका)
भृङ्गार-चामर-सुदीर्घ-पीठ-कुम्भ-,
तात-छत्र-तप-निवाक-भूषिताग्र।
वर्धस्य मन्त्र जय पीठ-पवत्त्वनीभिः,
सिंहासने जिन-भवन्महं श्रयामि ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं अर्हत् श्रीप्रतिष्ठापनाय भगवन् ! इह सिंहासने तिष्ठ-तिष्ठ।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ कर चौकी पर चार दिशाओं में जल से भर कर कलश स्थापित करें -
श्री तीर्थकृत्तत्त्वन-सर्व-विधी सुरेन्द्रः,
श्रीश्राद्ध-वाभिपदद्वय-कुम्भाग्र।
तास्तादृशानिव विभाव्य यशाऽर्हणात्,
संस्थापये कुम्भ-चन्दन-भूषिताग्रान् ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं स्वस्तये चतुःकोणेषु चतुःकलशस्थापनं करोमि।
आनन्द-निर्भर-सुर-प्रदार्थ-गावैः,
वादिन्द्र-पर-जय-शब्द-कल्प-प्रशान्तः।
उद्गीर्यमान-जपतिपति-कीर्तिमंत्रां,
पीत-स्वली वसु-विशालंऽनयोल्लसामि ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं स्वपन-पीत-स्थितयाय जिनेन्द्राय अयं निश्वापामि स्वाहा।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए चारों कलशों के जल से अभिषेक करें -
कर्म-प्रबन्ध-निगड़ानि हीनताऽऽप्ते,
जावाऽपि भक्तिवतः पस्मादेवेम्।
त्वां व्योम-कल्प-गणमास्थनाय देव!,
शुद्धोदकै रभिष्यामि नवायितत्त्वम् ॥ ८ ॥
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 509.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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