सिद्धचक्र विधान
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श्री सिद्धचक्र विधान
सिद्धचक्र विधान के छन्दों की तर्ज/धुन
मंगलाचरण
- अखिल – सरव पख में बड़ो …
- अर्द्ध रोला – रोला के समान
- इन्द्रवज्रा – नसे धारिया कर्म …
- उपेन्द्रवज्रा – नित्याश्रमा …
- उल्लाला – दोहा के समान
- कामिनी मोहन – नीर नभ अज्ञान …
- गीता – कुन्दकुन्द शतक …
- सुणिये जिन अरज हमारी …
- चाल – नन्दीश्वर श्री जिन धाम …
- रे मन भज ले आतमराम …
- जगिरेमला – असम को हित है सुख …
- चंचला – पार्श्वनाथ देव सेव …
- ध्रकार – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- भुजंगीका – दोहा के समान
- चौपाई – दश विशुद्धि धरे जे कोई …
- चौबोला – आतम को हित है सुख …
- डुलना – माहे तोई सेवते सुतत्वता …
- छप्पय – शिव चैतन्य कुमार सदा …
- डालर – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- तोमर – तू जाग रे चेतन प्राणी …
- त्रोटक – केवल रवि किरणों से …
- जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …
- दोधक – चौपाई के समान
- दोहा – दृढ़ विधि ताही होय के …
- धत्ता – वसु द्रव्य सँवारी …
- नागरूपिणी – पार्श्वनाथ देव सेव …
- नाराच – पार्श्वनाथ देव सेव …
- पद्धरि – ऐसे क्रिया दुग्ग-ज्ञान-चरण …
- पायत्ता – चाल के समान
- बड़ी चौपाई – चौपाई के समान
- बारहमासा – इन्द्रिय के भोग मधुर विष …
- भुजंगप्रयात – नसे धारिया कर्म …
- मरहटा – वीर/धत्ता के समान
- माला – केशरिया चावल रंगवा लो …
- मालिनी – अति कषायि मूला …
- मेरीयादाम – अहो पीतम् आनन्दस्य …
- तिहारे ध्यान की मूरत …
- मोदक – चौपाई
- रेखता – तिहारे ध्यान की मूरत …
- रोला – सम्यक साधे ज्ञान होय पै …
- लम्बीछंद – पार्श्वनाथ देव सेव …
- लावणी – हे सीमंधर भगवान अरज ली तेरी …
- लोलारती – चौपाई के समान
- वसन्ततिलका – भक्तामर …
- षट्पदरी – नरेन्द्र फलेन्द्र सुरेन्द्र …
- सुन्दरी – पंचकल्याणक अगम्या …
श्री सिद्धचक्र विधान
कविवर सन्तलालजी विरचित
श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान
कविवर सन्तलालजी के स्वनगर नकुड़ (उत्तरप्रदेश) से प्राप्त
प्राचीन शुद्ध हस्तलिखित प्रति के आधार से संशोधित
प्रेरक :
बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री, देवलाली
सम्पादक :
डॉ. राकेश जैन शास्त्री, नागपुर
इंजी. संयम जैन शास्त्री, नागपुर
प्रकाशक :
अजितप्रसाद वैभवकुमार जैन
श्री दिगम्बर जैन दिव्य देशना ट्रस्ट
२२, ए/९, राजपुर रोड, सिविल लाइन, दिल्ली - ११००५४
प्रकाशकीय
जैन
श्री सिद्धचक्र विधान
सम्पादकीय
जैन शास्त्रों में वर्णित अनेक पूजन-विधानों में ‘सिद्धचक्र विधान’ का विधान महत्त्व है; क्योंकि इस विधान में हमारे चरम लक्ष्य ‘सिद्धत्व की प्राप्ति’ का ही विस्तृत गुणानुवाद किया गया है।
जो संसार के बन्धनों से छूट गए हैं; जो द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं; जिनमें क्षायिक अनन्तदर्शन-क्षायिक अनन्तज्ञान-क्षायिक सम्यक्त्व (क्षायिक अनन्तचतुष्टय) - क्षायिक अनन्तवीर्य के अलावा अव्याबाधत्व, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व और अगुरुलघुत्व भी प्राप्त हो गए हैं, उन्हें ‘सिद्ध’ कहते हैं - ऐसे अनन्त सिद्ध परमात्मा, लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं।
सिद्धों का समूह ही ‘सिद्धचक्र’ कहलाता है और इस ‘सिद्धचक्र विधान’ में सभी सिद्धों का नामस्मरण-वन्दन-पूजन आदि के माध्यम से उनका गुणानुवाद करते हुए ‘सिद्ध दशा प्राप्त करने का विधान अर्थात् उपाय’ भी बतलाया है।
ज्ञानी जीवों का चरम लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है, अतः उसके हृदय में पूर्ण सुखी अनन्त-सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य-उपाध्याय-साधु परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख का मार्ग बतलानेवाली जिनवाणी के प्रति भक्तिभाव होना स्वाभाविक है। ज्ञानी जीव, विषय-कषाय रूप अशुभों में तो रहना ही नहीं चाहते, परन्तु सिद्धों के समान पूर्ण सुख प्राप्त करने को उनको वर्तमान में सामर्थ्य नहीं है, अतः सिद्ध भगवन्तों के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति रहते हैं एवं संलग्न रहते हुए वे अशुभभावों से तो सहज ही बच जाते हैं।
यह प्रकाशन, मुख्यरूप से जिस हस्तलिखित प्राचीन प्रति को आधार बना कर किया जा रहा है, उसका संक्षिप्त इतिहास जानना अत्यन्त आवश्यक है -
‘सिद्धचक्र विधान’ के रचयिता कविवर सन्तलालजी के जीवनकाल में लिखित अत्यन्त प्राचीन प्रति का संक्षिप्त इतिहास एवं उसकी विशेषताएँ :
‘सिद्धचक्र विधान’ का यह विधि-वर्णन संकलित प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री की निजी वृत्ति का परिणाम है, जब वे आज से लगभग ३० वर्ष पूर्व सन् १९९० में सिद्धचक्र विधान के रचयिता कविवर
सन्तलालजी के जन्म-स्थान में गये थे, यह भारत के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले के निकट स्थित नकुड़ गाँव है, वे दरअसल महाप्रज्ञ में प्रवचनार्थ नहीं गये थे, तब समाज ने आपके ही विधानवाचन में ‘सिद्धचक्र विधान’ भी रचाया था।
उससमय वहाँ उन्हें समाज के स्थानीय पण्डित श्री विजेन्द्रजी जैन, नकुड़ ने मन्दिरजी के हस्तलिखित ग्रन्थ भण्डार में विराजमान इस शुद्ध प्रति के दर्शन / अवलोकन कराए थे, वे विजेन्द्रजी आज भी हमारे बीच में विद्यमान हैं। जब उनसे इस प्रति की फोटोकॉपी देने के लिए निवेदन किया तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए; फिर उन्हें इसकी एक प्रति फोटोकॉपी अवलोकनाथ प्राप्त भी की। बाद में और अनेक महानुभावों को उन्होंने इस प्रति की फोटोकॉपी उपलब्ध कराई है।
यह प्रति वर्तमान विक्रम संवत् २०७७ से लगभग १३५ वर्ष पूर्व प्रति संवत् १९४२ में लिखी गई थी, उससमय कविवर सन्तलालजी भी जीवित थे।
इस हस्तलिखित प्रति के अन्त में निम्न प्रशस्ति एवं लिपिकर्ता का नाम प्राप्त होता है - इति सिद्धचक्र सम्पूर्णम्। शुभम् सुखदायकम्। लिखतं पण्डित किशनदत्त नकुड़ ग्राम-स्थिति (निवासी)।
(दोहा)
माघ शुक्ल तिथि सप्तमी, दिन है बेपतवार।
पुत्तला लिखी पूरी करी, सबको हो सुखकार ।।
संवत् विक्रम के कहे, नख-नख-बार अरु होय।
सज्जनपूजा पूर्ण करे, भव-भव आनन्द होय ।।
[अर्थात् यह पुस्तक विक्रम संवत् १९४२, माघ शुक्ल सप्तमी तिथि, दिन बेपतवार अर्थात् बृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन लिखकर पूरा किया गया है, जो सबको सुखदायक हो, तथा जो सज्जनजन, इसके माध्यम से पूजन (सिद्धचक्र मण्डल विधान पूजन) करेंगे, उन्हें भव-भव में आनन्द की प्राप्ति होगी अर्थात् शीघ्र मुक्ति की प्राप्ति होगी।]
यह नकुड़ प्रति का पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियों के पाठ से अधिक शुद्ध, उचित एवं प्रामाणिक होता है; तथा नकुड़ निवासियों ने बतलाया कि यह प्रति कविवर सन्तलालजी के जीवनकाल में ही लिखी गई थी तथा
श्री सिद्धचक्र विधान
इसे कविवर ने देख भी लिया था और इसे शुद्ध भी कर लिया था; संवत् १९४२ ही कविवर की मृत्यु का भी संवत् है, तथा अनेक स्थानों पर हाशिये पर की गई शुद्धियाँ भी इसकी प्रमाण हैं; कि किसी विद्वान् व्यक्ति ने इस प्रति का शुद्धिकरण अवश्य किया है। अथवा यह भी सम्भव है कि स्वयं कविवर ने अपनी मूल प्रति को ही व्यावसायिक लेखक से अच्छीतरह साफ-सुथरी लिखाया हो। इस कारण हम देख रहे हैं कि इस प्रति की लेखनी भी अत्यन्त स्पष्ट एवं सुन्दर है। इसके कुछ पृष्ठों की फोटो इस संस्करण के अन्तर्गत प्रकाशित भी किये गये हैं।
एक त्रुटि यह भी ज्ञात होती है कि जो भी मूल रचनाकार होते हैं, वे सामान्य साक्षर उपयोग में आनेवाले मन्त्रादि आदि को अपनी हस्तलिखित प्रति में नहीं लिखते हैं, वे प्रतिलिपिकारों को यह निर्देश दे देते हैं कि इन स्थानों पर इन सामान्य बारम्बार उपयोग में आनेवाले मन्त्रों आदि को लिख देवें। तथा यह पण्डितजी की स्वयं के उपयोग में आनेवाली प्रति थी, अतः इसमें सर्वत्र समान रहनेवाले स्थापक-अष्टक-मन्त्रमाला आदि के मन्त्रों को लिखा नहीं गया है, वहाँ मात्र ‘अमुक स्थापन’ तथा अष्टकों के पूर्व ‘अष्टक’ या ‘अथ पूजा’ लिख दिया है, तथा जलादि के मन्त्र भी पूरे न लिखकर मात्र ‘जल’ ‘चन्दन’ ‘अक्षत’ आदि लिख दिया है। ‘जयमाला के बाद के अर्घ्य एवं’ ‘पुष्पांजलि क्षिपेत्’ आदि मन्त्रों को भी नहीं लिखा गया है, क्योंकि इन सबका सर्वत्र समान प्रयोग होता है। हाँ, जब पूजन के अन्तर्गत ८-१६-३२ आदि विशेष अर्घ्य आते हैं तो उनके मन्त्र भी नहीं हस्तलिखित प्रति में अवश्य विस्तार से मिलते हैं।
इसप्रकार हम साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि यह कविवर की मूल प्रति की ही प्रथम प्रतिलिपि होना चाहिए, जिसे कविवर ने अपनी प्रति को ही शुद्ध साफ प्रति अन्य प्रशिक्षित प्रतिलिपिकार से लिखवायी होगी। लेकिन इतना होने पर भी हमें ऐसे कोई स्पष्ट साक्ष्य प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह संकेत मिलता कि यह प्रति कविवर ने स्वयं शुद्ध कर ली थी, अतः हमने प्रस्तुत प्रकाशन में अनेक हस्तलिखित और प्रकाशित प्रतियों को सामने रखकर भी पाठ मिलाये हैं; यद्यपि हमें यह कहने में बिलकुल भी संकोच नहीं है कि अन्य हस्तलिखित प्रतियों के सामने यह अत्यन्त शुद्ध प्रति है, अतः इस प्रकाशन में मुख्यरूप से तो इसी नकुड़ प्रति के पाठ को ही सर्वत्र रखा गया है, तथापि जहाँ इस प्रति के पाठ
सम्पादकीय
में सन्तोष नहीं हुआ, अथवा अर्थ समझने में कठिनाई प्रतीत हुई, वहाँ अन्य हस्त-लिखित प्रतियों तथा प्रकाशित प्रतियों के पाठों को सामने रखकर अन्तिम निर्णय लिया गया है। इसप्रकार इस प्रकाशित पाठ को अन्तिम रूप दिया गया है।
प्रस्तुत प्रकाशन के प्रमुख सम्पादन बिन्दु
१. प्रस्तुत हस्तलिखित प्रति के लेखन में उसके लेखक की बुद्धि के अनुसार अनेक शब्दों को वर्तमान वर्तनी के प्रकारों से भिन्न लिखा मिलता है, जिसे वर्तमान शैली के अनुसार इस संस्करण में सुधारा गया है। जैसे, ‘सरूप’ को ‘स्वरूप’, ‘सभाव’ को ‘स्वभाव’, ‘अचन या अिचन’ को ‘अर्चन’, ‘नमु’ को ‘नमो’ आदि।
२. इस संस्करण में जगह-जगह प्राकृतगाथाएँ श्लोक-उद्धरण भी दिये गये हैं, जिससे विषय समझने में सरलता हो। जैसे, सप्तम पूजन में पंच परमेष्ठी के अर्घ्य में प्रत्येक सी-सी छन्दों के बाद अष्टक परमेष्ठी के अर्घ्य, सिद्ध परमेष्ठी के अर्घ्य आदि। इसीप्रकार छठे पूजन में १४८ कर्म-प्रकृतियों के भेदों में शीर्षक-उपशीर्षक लगाये हैं। इसीप्रकार अन्यत्र भी संशोधन चाहिए।
३. प्रस्तुत प्रकाशन में अनेक स्थानों पर संस्कृत विधान के आधार पर अर्घ्यावलियों के मन्त्रों का मिलान तथा संशोधन भी किया गया है। इस प्रति में कहीं-कहीं लिपिकार मन्त्र भी नहीं लिख पाये हैं, वहाँ संस्कृत विधान का सहारा लेकर उसको पूर्ति कर ली गई है।
४. मूल प्रति में मन्त्रों में ‘के ही’ के बाद ‘अहं’ शब्द कहीं मिलता है, कहीं नहीं मिलता है; तो उसे प्रकरणार्थ को दृष्टि से सर्वत्र जोड़ा गया है।
५. ‘जयमाला’ के लिए ‘आरती’ शब्द का भी प्रयोग मिलता है, अतः एक जगह उसका संकेत किया गया है।
६. अनेक स्थानों पर कठिन शब्दों के अर्थ भी नीचे पाद-टिप्पण में दिये हैं; जैसे, सप्तम पूजन में मन्त्र ४३८ के छन्द में ‘अष्टला - ढेर, राशि या अंबार’ और ‘अष्टोला = आवरण, बाधा या आड़ रहित’ इत्यादि पाद-टिप्पण में दिये हैं।
इस सम्पादन-कार्य को सम्पन्न करने में आदरणीय प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री, खानियाबधा/झालरापाटन का आग्रह तो था ही, उन्होंने स्वयं हमारे साथ नागपुर आकर, अनेकों बार में महीनों परिश्रम किया
श्री सिद्धचक्र विधान
है; वे हस्तलिखित प्रति से पढ़े थे और इस प्रकाशित में संशोधन करते थे; अतः मैं भाईसाहब श्री अभिनन्दनजी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
साथ ही मन्त्रों का मिलान करने में संस्कृत प्रकाशन - ‘बृहद् श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान’, मुनिश्री सहिष्णु सदन, दिल्ली, सन् १९८९ को आधार बनाकर संशोधन कार्य किया गया है। यद्यपि इस प्रकाशन में कहीं भी इस ग्रन्थ के मूल रचयिता के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है, परन्तु इन्दौर से सन् १९४४ में प्रकाशित प्राचीन प्रति में इसके रचयिता का नाम श्री शुभचन्द्राचार्य का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस प्रति को श्री अरुण जैन कमेटी से प्राप्त पी०डी०एफ० में भारतीय श्रुति-दर्शन केन्द्र, जयपुर की सौजन्य प्राप्त होती है।
संस्कृत मन्त्रों का मिलान करने में तथा भाईसाहब ब्र. अभिनन्दनजी की अनुपस्थिति में हस्तलिखित प्रति से भी पाठों का मिलान करने में हमारे सुपुत्र इंजी. पण्डित संयम जैन शास्त्री एवं धर्मपत्नी श्रीमती डॉ. स्वर्णलता जैन भी बहुत सहयोग प्रदान किया है, अतः हम इनके भी विशेष आभारी हैं।
संस्कृत सिद्धचक्र विधानों के प्रकाशन का संक्षिप्त इतिहास
इस प्रकाशन इन्दौर-निवासी श्रीमान् सेठ सर हुकमचन्दजी के पुत्र एवं श्रीमान् सेठ जैसरन राजकुमार सिंह के सुपुत्र श्री चन्द्रकुमार सिंह की पवित्र स्मृति (जन्मतिथि ३०.७.१९४३ एवं देहावसान २६.६.१९९१; कुल आयु लगभग सात वर्ष) में किया गया था।
इस विधान का प्रकाशन, इन्दौर के दिगम्बर जैन उदासीनाश्रम में स्थित अमर ग्रन्थालय से प्राप्त हस्तलिखित प्रति के आधार से पर्याप्त संशोधन करके किया गया है। इसके प्रकाशन में पण्डित खुशालचन्द जैन ने लिखा है -
'यद्यपि कुछ वर्षों पहले मुंशी स्व. श्री चंवरमल सन्तलालजी कृत एक सिद्धचक्र मण्डल विधान छप प्रकाशित हो चुका है, परन्तु वह संस्कृत में नहीं, हिन्दी में है। संस्कृत का यह विधान वहाँ तक हम समझते हैं, वह अभी तक कहीं से प्रकाशित नहीं हुआ है। … पाठक महाशय, विधान को पढ़कर स्वयं समझ सकेंगे कि यह कितना एक विद्वान् की सम्पूर्ण कृति न होकर एक संग्रहीत पाठ है, जिसके कर्ता ब्रह्मकुश श्री शुभचन्दजी हैं।
प्रस्तुत पाठ में एक ही जयमाला दो पूजनों में पाई जाती थी, परन्तु हमने
वैसा न करके दूसरे स्थान पर श्री १०८ आचार्यप्रवर पूज्यपादस्वामी कृत सिद्ध-स्तोत्र को जयमाला की जगह रख दिया है।’
इस प्रकार आचार्य पूज्य के १०४ मन्त्रों की रचना के आधारभूत आगम के सम्बन्ध में वे लिखते हैं -
'आठों पूजों के जितने मन्त्र हैं, वे सब महापण्डित आशाधरजी कृत सद्यमरण के आधार पर ही हैं - उन नामों का अर्थ समझने में प्रायः विद्वानों को भी कठिनता प्रतीत होती थी, आचार्य वयों के श्री १०८, एकैक फलालात दिगम्बर जैन सरस्वती भक्त से प्राप्त श्री ब्रह्मसार मुनि कृत प्राचीन संस्कृत टीका के आधार पर हमने ऐसे शब्दों को निर्णीत और अर्थ दे दिया है।
कुछ महानुभावों की इच्छा भी थी कि आठों पूजों के मन्त्रों को भावतु जिनसेनाचार्य कृत सद्यमरण के द्वारा परिवर्तित कर देना चाहिए, अतः उनके सन्तोष के लिए भावतु जिनसेनाचार्य के सद्यमरण गन्ध मन्त्र भी अन्त में (पृष्ठ ११२-१२७) दे दिए गए हैं। आशाधरा इस पाठ में आठवीं पूजा का मन्त्र भाग अधूरा ही रहा है। पूजन करनेवाले सज्जनों को इनमें से यथारुचि किसी भी एक पाठ का उपयोग कर लेना चाहिए।’
अध्ययन करने पर दोनों संस्कृत विधानों में कुछ समानता एवं कुछ विशेषता भी ज्ञात होती है -
१. प्रत्येक में जयमालाओं के हिन्दी अर्थ भी दिये गये हैं, इससे प्रतीत होता है कि सिद्धचक्र विधानों के आयोजन के समय जयमालाओं का विशेषतया अर्थ करने की परम्परा भी बहुत प्राचीन समय से ही चली आ रही है।
२. सभी पूजनों में … आदि एवं निरवकाशसम्बन्धी … आदि स्थापना के दो छन्द, सभी पूजनों में एक ही हैं; जबकि अष्टक के छन्द अलग-अलग हैं।
३. प्रत्येक पूजन में अष्टक के अन्तर्गत जल के छन्द के बाद उस पूजन के ८-१६-३२ आदि अर्घ्यों के मन्त्रों को एकसाथ लिखा गया है, मानो वे उन-उन मन्त्रों में उल्लिखित गुणों के द्वारा अष्टद्रव्य सिद्ध भगवन्तों का पृथक्-पृथक् पूजन भी कर रहे हों। इसप्रकार प्रत्येक मन्त्र को पाठ करके उन गुणों के धारक सिद्ध भगवन्तों को पृथक्-पृथक् अष्टक एवं अर्घ्य समर्पित किया गया है। या तो हम सबको ज्ञात है कि अष्टकों के बाद में अर्घ्य में भी आठ द्रव्यों
श्री सिद्धचक्र विधान
का समावेश किया जाता है। हम यह भी कह सकते हैं कि अर्हत् के माध्यम से मानो संक्षिप्त पूजन ही की जाती है तथा संस्कृत विधानों में प्रथम पूजन के जल के छंद के बाद सामान्यीकरण से ८३-९२ आदि मंत्रों को लिखने के बाद नहीं पर नोट भी लिखा मिलता है कि - 'प्रत्येक मंत्र को क्रमशः नौ बार बोलना चाहिए तथा क्रमशः अर्हत्-अनाद्यनंतरोगाया के साथ (मंत्रों में जल के स्थान पर यथायोग्य चंदन-अक्षत आदि परिकल्पित करके) जल-चंदन-अक्षत-पुष्प-नैवेद्य-दीप-धूप-फल-अर्घ्य समर्पित करना चाहिए; इससे इस विधान का अत्यंत विस्तार के साथ भी करने की सूचना मिलती है।
४. दिल्ली में प्रकाशित प्रति में तो अष्टकों के बाद उक्त मंत्रों को आवली के अन्तर्गत श्लोक/छंद के साथ लिखकर अलग से अर्घ्य भी समर्पित किये गये हैं, परन्तु इन्दौर से प्रकाशित प्रति में नहीं। इसप्रकार इन्दौर से प्रकाशित प्रति में तो मंत्र एक बार ही लिखे गये हैं, जबकि दिल्ली से प्रकाशित प्रति में ८-१६-३२ आदि मंत्रों का उल्लेख प्रत्येक पूजन में दो-दो बार आया है।
५. इसप्रकार हिन्दी छंद/पद्य के साथ मंत्र लिखने का प्रयोग, हिन्दी ‘सिद्धचक्र विधान’ में भी कविवर श्री सन्तोलाल ने ही किया है। हाँ, इसमें मंत्रों को पृथक् सामूहिकरूप से कहीं भी उल्लिखित नहीं किया गया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विधानों को अपनी परिस्थिति के अनुसार संक्षिप्तरूप परिवर्तन के साथ भी किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी है कि बिल्कुल नहीं करने की अपेक्षा, समयानुसार अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण अवश्य करना चाहिए।
६. यद्यपि अधिकांश स्थानों पर तो दोनों संस्कृत पाठों में मंत्र समान ही है, परन्तु अनेक जगह मंत्रों और उनके क्रम में अन्तर भी दृष्टिगोचर होता है।
७. इन्दौर से प्रकाशित प्रति में अनेक स्थानों पर मंत्रों के निमित्त से नीचे पाद-टिप्पण भी मिलते हैं, जहाँ उनके सम्बन्ध में कुछ विशेष विवरण मिलता है। जैसे, अष्टम पूजन में क्रमांक ९९ पर एक मंत्र ‘के हीं अनन्तनिरोगाय नमः स्वाहा’ आया है; इसमें पाठकों को भ्रम हो सकता है, इसके निराकरणार्थ पाद-टिप्पण में शंका उत्पन्न करके नियमानुसार समाधान किया गया है -
परमप्रकाशिकत्वाद्वाच्यतः कथं निर्दोषत्वमिति चेत् ?
परिहृते - अतिरागो विनष्टोऽतो विनाशो यस्येत्यनः, निश्चितया दया
(सगुणनिर्गुणप्राणिवर्गसंरक्षण-लक्षणो करुणा) यस्येति निर्दोष्य अनन्तविनाशो निर्दोष्यत्वेऽनन्तत्वनिर्दोषः।
अथवा अति-अतिरावेन अतो अनन्ते यमे निर्दोषः, यदा अतिरावेन अनन्तविनाश-प्राप्ता निर्दोष्या समाप्ता।
अथवा अतिशयेन अन्ते मोक्षगमने निश्चिता दया यस्य।
अर्थात् उक्त संस्कृत पाद-टिप्पण का हिन्दी में अर्थ इसप्रकार है -
शंका - परम कार्पणिक होने से भावनाओं को निर्दोषपना कैसे सम्भव है?
समाधान - इसका परिहार करते हैं - अति को प्राप्त हुआ है अन्त या विनाश जिसका - ऐसा ‘अनन्त’ शब्द का अर्थ है तथा जिसकी निश्चित दया (अर्थात् करुणा एवं निर्मोह परिणाम का रक्षण करनेरूप है लक्षण जिसका - ऐसी करुणा) है - ऐसा निर्दोष का अर्थ है; इसप्रकार अति-अनन्तता को प्राप्त निश्चित स्वस्वभाववाली दया - ऐसे अनन्त निर्दोष (सिद्ध भगवन्तों) को हमारा नमस्कार है।
अथवा अति - अतिरावेन से, अन्त - अन्त करनेवाले, निर्दोष - यम; अर्थात् जिनके अतिशयभावपूर्वक अन्त या विनाश को प्राप्त हो गये वे निर्दोष यम - ऐसे अनन्त-निर्दोष (सिद्ध भगवन्तों) को हमारा नमस्कार है।
अथवा जिन्होंने अतिशयता से अन्ते मोक्ष-गमन करके निश्चितरूप से दया प्राप्त कर ली है - ऐसे सिद्ध भगवन्तों को हमारा नमस्कार है।
इसप्रकार पाद-टिप्पणों में श्री श्रुतसागर कृत प्राचीन संस्कृत टीका के आधार पर शब्दों के विशेषपूर्वक अर्थ दिये गये हैं।
८. दोनों में प्रत्येक पूजन के अष्टकों के बाद और जयमाला के पूर्व के हीं असिआउसा नमः - इस मंत्र को १०८ बार जाप देने का उल्लेख किया गया है।
इसप्रकार प्रस्तुत प्रकाशन को अनेक हस्तलिखित प्रतियों के अलावा अनेक प्रकाशित संस्कृत-हिन्दी के सिद्धचक्र विधानों के संस्करणों का अवलोकन करके/सहयोग लेकर प्रकाशित किया गया है, अतः हम इन सभी के प्रकाशन संस्थाओं के भी अत्यन्त आभारी हैं। इन सभी का संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है -
श्री सिद्धचक्र विधान
प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोगी हस्तलिखित एवं प्रकाशित प्रतियाँ
हस्तलिखित तीन प्रतियों का परिचय
१. हस्तलिखित प्रतियों में नकुड़ से प्राप्त प्रति (फोटोकॉपी) के लिए तो यह प्रकाशन समर्पित ही है, क्योंकि उसे भी आधार बनाकर इस संस्करण को प्रकाशित करने का भाव भी बना है - यह प्रति श्रीमान् पण्डित किशनलाल नकुड़ के द्वारा कविवर सन्तोलाल जी के मृत्यु संवत् १९४१ अर्थात् आज से १३० वर्ष पूर्व सन् १८८५ में ही लिखी गई थी।
२. यह श्री विक्रान्तजी झालरापाटन से प्राप्त हुई, महल्का (खास, श्रेष्ठ) की प्रति है, इस प्रति को भी श्रीमान् ताराचन्द जैन ने मिति कार्तिक शुक्ल १०, वि.सं. १९८८ में ही (आज से ८९ वर्ष पूर्व) लिखकर पूरा किया था।
३. यह भी श्री विक्रान्तजी झालरापाटन से प्राप्त हुई, महल्का (खास, श्रेष्ठ) की ही प्रति है, इसे भी श्रीमान् ताराचन्द जैन ने पूर्व प्रति से लगभग दो माह बाद मिति पौष सुदी ७, दिन शुक्रवार, विक्रम संवत् १९८८ (आज से ८९ वर्ष पूर्व) लिखकर पूरा किया था।
प्रकाशित चार संस्करणों का विवरण
१. श्री अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, जयपुर से प्रकाशित पंचम/अष्टम संस्करण, ई. सन् १९९६; नीलाक्षर राशि - मात्र ९९/१८ रुपये।
२. श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़ से प्रकाशित तृतीय रंगीन आवृत्ति, ई. सन् २००९; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
३. श्री वीर पुस्तक भण्डार, जयपुर से प्रकाशित नवीन संस्करण, ई. सन् २००९; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
४. श्री दिगम्बर जैन पुस्तकालय, सूरत से प्रकाशित संस्करण, प्रकाशन तिथि का प्रकाशन नहीं; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
प्रकाशित दो असंपादित (अनूदित) संस्करणों का विवरण
१. पण्डित सत्कुमार सिद्धचक्र नवोल्लास द्वारा अनूदित एवं सम्पादित संस्करण, प्रकाशक - श्री देवेन्द्रकुमार अभिषेककुमार जैन, शाहदरा, दिल्ली; ई. सन् २००५; नीलाक्षर राशि - मात्र १०० रुपये।
१. पं. कल्याणसेन द्वारा अनूदित एवं सम्पादित संस्करण, प्रकाशक - श्री अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, न्यू उस्मानपुर, दिल्ली; ई. सन् २०१०; नीलाक्षर राशि - मात्र ५० रुपये।
नोट - एक बार हमारा भी ‘श्री सिद्धचक्र विधान’ को अर्थसहित प्रकाशित करने का भाव है; देखें, भविष्य में क्या है?
श्रीपाल-मैनासुन्दरी का ‘सिद्धचक्र विधान’ से क्या सम्बन्ध?
श्री सिद्धचक्र विधान करने के साथ श्रीपाल और उनके साथियों का कुष्ठरोग दूर होने की घटना जुड़ी हुई है। सिद्ध भगवन्तों में अत्यधिक गुणानुराग शुभ भाव, तदनुसार सातों सद्भावों का उदय और आठ अंगुल कुष्ठरोग की प्राप्ति - इन निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध में किसी के रोगादि दूर हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है; परन्तु सिद्धचक्र की महिमा मात्र कुष्ठ-निवारक तक सीमित करना, उसकी महानता को हीन प्रदर्शित करना है। कुष्ठ तो शरीर का रोग है, आत्मा का रोग तो मोह-राग-द्वेषादि विकारी भाव हैं; अरे! सिद्ध का स्वरूप जानकर, उन जैसी अपनी आत्मा को पहचानकर, उसमें ही लीन हो जाने पर मोह-राग-द्वेष और जन्म-मरण जैसे महान रोग भी नष्ट हो जाते हैं।
एक और निवेदन - पूजन करते समय पूजन की लिखी सबसे सर्वत्र पूजकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्थापना के समय हम अपने पूज्य पुरुषों का आह्वान करते हैं, अतः उससमय उनके नाम का संस्कृत भाषा के अनुसार सम्बोधनवाची चिह्न (!) के साथ प्रयोग करें तथा जब अष्टक या अर्घ्य समर्पित करें, उस समय हमें उनके नाम के साथ चतुर्थी का प्रयोग करें; क्योंकि नमः, अर्घ्य आदि के योग में चतुर्थी का प्रयोग होता है।
श्री सिद्धचक्र विधान की आठ पूजनों की विशेषता
सिद्धचक्र विधान की आठ पूजनों में सर्वत्र सिद्धचक्रपूजित सिद्ध-परमेष्ठिभ्यो को ‘मंत्र-स्थापन’ के माध्यम से स्थापित करके उनकी अष्टकों के माध्यम से पूजा की गई है, इसका कारण यह प्रतीत होता है कि यह सिद्धचक्र विधान है, इसमें किसी एक सिद्धभगवान की पूजन नहीं की गई है, इसमें त्रिकालवर्ती अनन्त सिद्ध भगवन्तों की पूजन की गई है, अतः उनकी स्थापना किसी एक मूर्ति में नहीं की जा सकती है, अतः उसके लिए सिद्धचक्र का यन्त्र
श्री सिद्धचक्र विधान
स्थापित करके पूजन की जाती है। सिद्धयंत्रों में अनन्त सिद्धों के साथ सभी सिद्धों के नामों का भी उल्लेख होता है, क्योंकि सभी सिद्धों के नाम वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से करते हैं, अतः सिद्धयंत्र में अनन्त सिद्धों की स्थापना करके उनकी पूजन की जाती है।
यही कारण है कि प्रत्येक पूजन के पूर्व स्थापना के छंद में निम्न छंद बोला जाता है -
उरधो अधो सु रेफ, सयुदध कारण विराजे।
अकारादि स्वर-लिंग, कणिका अन सो छाजे॥
वर्णित-पति वल-दल-अंगज तत्त्व-अधि धारे।
अग्र भाग में अष्टात सहित अतिसव ॥
पुनि प्रति अष्ट बेकओ परम, सिद्ध ध्यान ही में नागे को।
है केसर सम पुनि निमित्त, सिद्धचक्र प्रगारे करो॥
अर्थात् सिद्ध-चक्र यन्त्र का वर्णन करते हुए इस छन्द में कहते हैं कि - जिसके ऊपर-नीचे रेफ है, मध्य में बिन्दु सहित हकार है, अकारादि स्वरों से जो लिंग है, जिसके अन्त में कणिका है, जिसके चारों ओर आठ प्रकार के वर्गों से पूरित अष्ट-दल-कमल है, जिनकी सन्धि में तत्त्व अर्थात् तत्त्वज्ञान-प्रदत्त ‘नमो अरहंताणं’ शोभायमान है, उन कमलों पर अग्रभाग में अष्टात मंत्र ‘के’ तथा अन्त में पुनः ‘हीं’ सुशोभित होता है। इस सिद्धचक्र को देवता भी सामान्य-आराधना करते तथा देवों के समूह के सिंह वशीभूत कर लेता है, उसीप्रकार यह यन्त्र, कमलोंकी शुभाओ से विजन प्राप्त कर लेता है; अतः मैं पूजन के लिए इस सिद्धचक्र की स्थापना करता हूँ।
आठ पूजनों की अर्घ्यावली में भी उन सिद्ध भगवन्तों के गुणों का स्मरण करके, सिद्धचक्र स्थापित सिद्धों के समूह को क्रमशः ८-१६-३२-६४-१२८-२५६-५१२-१०२४ अर्घ्य समर्पित करके पूजन-विधि समाप्त की जाती है।
एक सिद्धचक्र विधान में अनेक विधानों का अन्तर्भाव
इस एक सिद्धचक्र विधान को करने से अनेक विधानों को करने का लाभ प्राप्त होता है। जैसे, सिद्ध-गुण-विधान, चौंसठ-ऋद्धि-विधान, पाद-दवन-विधान, प्रवचनचित्त विधान, कर्म-दवन-विधान, पंच-परमेष्ठी-विधान, जिन-सहस्र-नाम-विधान आदि। उनका विवरण इसप्रकार है -
प्रारम्भिक तीन पूजनों में प्रथम पूजन में सिद्धों के आठ विशेष गुण में से प्रत्येक गुण को अलग-अलग को याद करते हुए सिद्धचक्र को आठ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। द्वितीय पूजन में इन्हीं आठ गुणों में अनन्तचतुष्टय और अन्य गुणों को शामिल करके सोलहगुण के माध्यम से उन्हें सोलह अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। तृतीय पूजन में सिद्धों के शुद्ध बत्तीस गुण का स्मरण करके उन्हें बत्तीस अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इन तीन पूजनों के माध्यम से मानो ‘सिद्ध-गुण-विधान’ किया गया है।
चतुर्थ पूजन में चौंसठ ऋद्धियों के माध्यम से सिद्ध भगवन्तों को प्राप्त हुई भूतपूर्व ऋद्धियों का स्मरण करके उन्हें चौंसठ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘चौंसठ-ऋद्धि-विधान’ किया गया है।
पंचम पूजन में सिद्ध भगवन्तों के १० सामान्य-विशेष गुणों का स्मरण करके, पश्चात् उन सिद्ध भगवन्तों ने भूतपूर्व साधु अवस्था में जो मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना, संरम्भ-समारम्भ-आरम्भ तथा क्रोध-मान-माया-लोभ के परस्पर संयोग से होनेवाले १००८ पापों का जो परिहार या प्रायश्चित्त किया था, उनके स्मरणस्वरूप एक सौ अट्ठाईस अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘पाद-दवन-विधान’ एवं ‘प्रायश्चित्त-विधान’ किया गया है।
षष्ठ पूजन में सिद्ध भगवन्तों ने जिन ८ कर्मों की १४८ प्रकृतियों का नाश किया है, उनके सामान्य-विशेष भेदों के प्रभाव में प्राप्त होनेवाले स्वभावभावों एवं अन्य अनन्तभाव-अनन्तज्ञान-अनन्तदर्शन-अनन्तसुख-समभाव-ब्रह्मभाव-शुद्धभाव-अव्ययभाव-चिन्मयभाव-निर्दोषभाव-स्वगतुभाव-परमभाव-एकत्वभाव-शाश्वतभाव-शुद्धत्वभाव-निरंजनभाव-अमृतुभाव-अक्षयभाव-निरात्मभाव-अचिन्त्यभाव-स्वात्मभाव-स्वगतभाव-सर्वलोकशीर्षभाव आदि से सम्बन्धित शताधिक सामान्य-विशेषभावों सहित सिद्ध भगवन्तों को कुल २५६ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘कर्म-दवन-विधान’ किया गया है।
इस पाद पूजन में १२८ अर्घ्य में विशेषगति नामक सप्तमी एकक भी है, जबकि १२८ प्रकृतियों में विशेषगति के प्रास और अग्रहास - ऐसे दो भेद मिलते हैं, दोहे में ‘भाव शुध्त काल … आदि’ प्रशस्त विधानगत ही है
श्री सिद्धचक्र विधान
वर्णन किया गया है, अप्रशस्त विद्यायोनि का नहीं, अतः इस संस्करण में वहाँ दोहे के बिना केवल ‘ॐ ह्रीं अप्रशस्त-विद्यायोनिगतानाम्-रहित-सिद्धाय नमः’ अर्थ - यह अर्घ्य समाविष्ट किया गया है। इस सम्बन्ध में एक टिप्पणी भी वहाँ दी गई है, जो इसप्रकार है - ‘प्रकृत या जयपुर की हस्तलिखित प्रति में विद्यायोनि नामकर्मा एक ही छंद है, वह भी प्रशस्त सम्बन्धी ही है, अतः अप्रशस्त विद्यायोनि नामकर्मा केवल अन्यत्र कहीं दिया गया है।’
सम्यग् पूजन में सिद्ध भगवन्तों ने भूतपूर्व मोक्षमार्ग और वर्तमान मोक्ष की अवस्था में जिन पंच परमेष्ठी पदों का धारण किया है, उनके क्रमशः २६-८-३६-२५-२८ आदि विशेष गुणों से सम्बन्धित १००-१०० (साधु परमेष्ठी के ११२) इस प्रकार कुल ५१२ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस पूजन के माध्यम से मानो ‘पंच-परमेष्ठी-विधान’ किया गया है।
इस पूजन की अध्यात्मता में अर्घ्य ४४ और ४७ के बाद एक एक अर्घ्य लोकाग्रम के प्रसंग में द्वादशांग और श्रुतज्ञान के लिए भी आवश्यक प्रतीत हुआ; क्योंकि द्वादशांग और श्रुतज्ञान को पूर्व में मंगल के प्रसंग में अर्घ्य २७ एवं २१ में तथा पूरण के प्रसंग में ६३ एवं ६४ में अर्घ्य दिये ही गये हैं, इसलिए दिल्ली से प्रकाशित संस्कृत सिद्धचक्र विधान में भी वे नहीं हैं, जबकि इन्दौर से प्रकाशित संस्कृत सिद्धचक्र विधान में अर्घ्य ४४ में ‘ॐ ह्रीं अहोलोकाग्रम-द्वादशांगाय नमः स्वाहा’ - यह अर्घ्य मिलता है। यह भी सम्भव है कि लिखकर की गलती से वे छूट गये हों; अतः प्रकरण की सम्पुष्टि के लिए उनके मर्मों को इस संस्करण में समाविष्ट किया है। तद्विषयक टिप्पणी भी वहाँ लगाई है।
अष्टम पूजन में नाम रहित सिद्ध भगवन्तों के मानो एक हजार आठ नामों का स्मरण करके १०८ अर्घ्य समर्पित किये गये हैं। इस प्रकार इस अष्टम और अन्तिम पूजन के माध्यम से मानो ‘जिन-सहस्र-नाम-विधान’ किया गया है। इस प्रकार हम एक ‘सिद्धचक्र विधान’ के माध्यम से अनेक विधानों का
लाभ प्राप्त कर सकते हैं - यह भी इस विधान की सर्वोत्कृष्ट महिमा को सूचित करता है।
छन्दों की तर्ज
इस विधान में हिन्दी/संस्कृत के कुल मिलाकर ४७ छन्दों का प्रयोग किया गया है, जिनकी तर्ज / धुनें हमने छन्द के नाम के साथ ही देने का प्रयास किया है। इन धुनो को तैयार करने में प्रमुखरूप से पण्डित समकितजी शास्त्री खनियाधाना, साथ में पण्डित रमेशजी इन्दौर, पण्डित भानुजी शास्त्री सागर एवं पण्डित विजयजी शास्त्री का भी सहयोग प्राप्त हुआ है, इसके लिए हम इन सभी विद्वानों के विशेष आभारी हैं।
आध्यात्मिकता से भरपूर विधान
इस विधान के माध्यम से समयसार आदि अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों के स्वाध्याय का लाभ भी प्राप्त होता है। अनेक स्थलों पर लिपिकारों का अर्थ का भावरूपता नहीं होने से वे उसमें कुछ परिवर्तन भी कर देते हैं। जैसे, उदाहरणार्थ, अष्टम पूजन का ७२वाँ छन्द देखें -
निर्भय हो निर-आश्रयी, निःसंगी निर्द्वन्द्व।
निज साधन, साधक सुनिज, पर सौं नहिं संबंध ॥
अर्थात् हे प्रभु! निरभय से शुद्धात्मा और व्यवहार से सिद्ध भगवान निर्भय हैं, निःसंग हैं, निः संग हैं और निर्भय हैं; यहाँ तक कि वह स्वयं ही साधन है और स्वयं ही साधक है, पर से उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।
इसी पूजन के ७३वें छन्द में शुद्ध शब्द की व्याख्या में समयसार की ६, ७, ७३, ७८ आदि गाथाओं / टीकाओं की झलक दिखाई देती है -
परकृत भाव न लेश है, भेद कहो नहिं जाय।
वचन-अगोचर ‘शुद्ध’ है, सिद्ध महा सुखदाय ॥
अर्थात् प्रकृत अर्थात् छद्मस्थों में स्थित प्रशस्त-अप्रशस्त भाव से रहित हूँ, भेद अर्थात् ज्ञानादि गुणों के अनन्त भेद हैं, जो कहे भी नहीं जा सकते अथवा आत्मा का गुप्त स्वरूप कहा नहीं जा सकता, वह वचनों से अगोचर है, इसलिए
१. यहाँ पर अन्य हस्तलिखित प्रतियों में ‘निज’ को ही साधक ने लिखते हुए ‘सुगुण’ को साधक लिखा है। २. यहाँ भी ‘आश्रय’ को प्रतिलिपिकारों ने ‘प्रसिद्ध’ कर दिया है।
श्री सिद्धचक्र विधान
शुद्धात्मा या सिद्ध भगवान का स्वरूप ‘शुद्ध’ और ‘महा-सुख-प्रदायक’ है। इसी प्रकार १५८वाँ छन्द देखें -
जाकी शक्ति अपार है, हेतु-अहेतु असिद्ध।
गणधरादि जानत नहीं, मैं वंदूँ नित सिद्ध ॥
अर्थात् हे प्रभु! निश्चय से शुद्धात्मा और व्यवहार से सिद्ध भगवान की शक्ति अपार है - वह हेतुवाद या अहेतुवाद से सिद्ध नहीं की जा सकती है, उसे पूर्णरूप से गणधरादि भी जानने में समर्थ नहीं हैं, उसे मैं नमस्कार करता हूँ।
परकृत भाव न लेश है, भेद कहो नहिं जाय।
वचन-अगोचर ‘शुद्ध’ है, सिद्ध महा सुखदाय ॥
प्रस्तावना
श्री सिद्धचक्र विधान : उद्देश्य एवं महत्त्व
जैन शास्त्रों में वर्णित अनेक पूजन-विधानों में ‘सिद्धचक्र मण्डल विधान’ का विशेष महत्त्व है; क्योंकि इस विधान में हमारे चरम लक्ष्य सिद्धदशा की प्राप्ति का वर्णन है, उसका ही विशदूत गुणानुवाद इसमें किया गया है।
जो संसार के दुःखों से छूट गए हैं, जो द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं; जिनमें अष्ट कर्मों के अभाव से क्षायिक सम्यक्त्व आदि अष्ट गुण प्रगट हो गए हैं, उन्हें ‘सिद्ध’ कहते हैं - ऐसे अनन्त सिद्ध परमात्मा लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं। सिद्धों का समुदाय ही ‘सिद्धचक्र’ कहलाता है और इस ‘सिद्धचक्र विधान’ में सिद्ध दशा प्रगट करने का विधान (उपाय) बतलाते हुए सिद्धों का गुणानुवाद किया गया है।
ज्ञानी का चरम लक्ष्य पूर्ण सुख प्रगट करना है, अतः उसके हृदय में पूर्ण सुखी अरहन्त और सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख का मार्ग बतलानेवाली जिनवाणी के प्रति भक्ति-भाव होना स्वाभाविक है। ज्ञानी जीव विषय-कषाय रूप अशुभ भावों में तो रहना नहीं चाहते और सिद्धों के समान पूर्ण शुद्ध भाव प्रगट करने की उनको वर्तमान में सामर्थ्य नहीं है, अतः सिद्ध भगवन्तों के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क रहते हुए वे अशुभ भावों से सहज ही बच जाते हैं।
सिद्धचक्र विधान के साथ श्रीपाल और उनके साथियों का कुष्ठरोग दूर होने की घटना जुड़ी हुई है। सिद्ध भगवन्तों में अत्यधिक गुणानुराग शुभ भाव, तत्नुसार सातावेदनीय कर्म का उदय और बाह्य अनुकूल संयोग की प्राप्ति - इस निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध में किसी रोगादि दूर हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है; परन्तु सिद्धचक्र की महिमा मात्र कुष्ठनिधि तक सीमित करना, उसकी महानता में कमी करना है। कुछ तो शरीर का रोग है, आत्मा का रोग तो मोह-राग द्वेषादि विकारी भाव हैं। सिद्धों का स्वरूप जानकर, उन जैसी अपनी आत्मा को पहचानकर, उसमें ही लीन हो जाने पर मोह-राग द्वेष और जन्म-मरण जैसे महान रोग भी नष्ट हो जाते हैं।
श्री सिद्धचक्र विधान
सिद्धि की आराधना का सच्चा फल तो वीतराग भाव की वृद्धि होना है, क्योंकि वे स्वयं वीतराग हैं। सिद्धों का सच्चा भक्त उनसे लौकिक लाभ की चाह नहीं रखता, फिर भी पुण्यबन्ध होने से उसे लौकिक अनुकूलताएँ सहज ही प्राप्त होती हैं, परन्तु ज्ञानों की दृष्टि से उनका कोई महत्त्व नहीं है।
लौकिक अनुकूलताओं के लक्ष्य से चाहे वीतरागी देव-गुरु-धर्म की आराधना करें या कुदेव-कुगुरु-कुधर्म की आराधना करें, पापबन्ध ही होता है, अतः लौकिक अनुकूलताएँ भी उत्पन्न नहीं होतीं। इस सम्बन्ध में पण्डितप्रवर टोडरमलजी मोक्षमार्ग प्रकाशक में लिखते हैं :-
“इस प्रयोजन के हेतु अरहन्तादिक की भक्ति करने से भी तीव्र कषाय होने के कारण पापबन्ध ही होता है, इसलिए अपने को इस प्रयोजन का अर्थी होना योग्य नहीं है। अरहन्तादिक की भक्ति करने से ऐसे प्रयोजन तो स्वयमेव सिद्ध होते हैं।”¹
अतः हमें वीतरागी देव-गुरु-शास्त्र का सही स्वरूप पहचान कर सिद्धचक्र विधान के माध्यम से वीतराग भावों का ही पोषण करना चाहिए।
मण्डल-रचना (मोड़ना)
जिस दिन से विधान करना हो, उसके एक दिन पूर्व वेदी के सामने ८ X ८ फुट अथवा छोटा-बड़ा चौकोर समतल लकड़ी या स्याम के हिसाब से मोड़ना तैयार कर लेना चाहिए। मोड़ना के बीच में ॐ बनाना चाहिए तथा गोलाएँ में आठ वलयों में क्रम से ८, १६, २४, ३२, ४८, १५६, ५१२, १०२४, या जो फूल या साधिया या बिन्दु आदि बनाना चाहिए। यदि रंगोली से मोड़ना बनाना सम्भव न हो तो फ्लेक्स से बने हुए रंगीन मोड़ने का प्रयोग भी किया जा सकता है।
मण्डल-कलश-शोभायात्रा
जिस परिवार के द्वारा मण्डल-कलश-स्थापना करना निश्चित हो गया हो तो मण्डल-कलश-शोभायात्रा के पूर्व उनके घर जाकर स्थान का चयन करें, जहाँ कम से कम १००-५० भाई-बहन भेंट कर मङ्गलगान कर सकें। भक्ति के
१. मोक्षमार्ग प्रकाशक, पहला अधिकार, पृष्ठ ७
प्रस्तावना
रस-परिपक्व हेतु वाद्य-यन्त्र आदि की व्यवस्था हो तो उत्तम है। बैठने के लिए घर में चौकी ही अथवा बड़ा हॉल; यदि मकान के अन्दर उचित स्थान न हो तो बाहर टेंट लगा कर बिछायत करा दें। समाज के सदस्यगण यहाँ मण्डल-कलश लेने पहुँचें, उनसे पूर्व सामग्री भेज दें-सामग्री में जो कलश, सबसे सुन्दर वाले हों, उनमें से एक कलश, एक थाली में हल्दी-सुपारी, सरसों, पुष्प, पान, पूजनी रत्न, सिक्के, कलाश, आदि तथा परिवार के सदस्यों को भी हार-मुकुट, खास तौर से छोटे बच्चों को हार-मुकुट अवश्य भिजो। साथ ही हाथ धोने के लिए इत्र लगा जल, दो कटोरे में केसर, गेरुकोन, एक छोटी केची आदि भी भेज दें तथा उन परिवार वालों को समझा दें कि सम्पूर्ण समाज आपके घर आनेवाली है, अतः उनके सम्मान में कुछ भेंट आदि की व्यवस्था करें।
दिशा नहीं देख कर, परिवार को बिठाएँ, उनके सामने एक छोटी टेबल रखें। स्त्री-वर्ग बिछुआ दें, टेबल पर सामग्री को थाली एवं मण्डल-कलश रखें। परिवारवालों के हाथ धुला कर, मङ्गल-पञ्चक या मङ्गलष्टक पढ़ते हुए कलश पर पुष्प-प्रेषण करें। रक्षा-सूत्र बाँधें, सभी के हाथों में मङ्गल-कलश में हल्दी, सुपारी आदि माङ्गलिक सामग्री डलवाएँ।
सर्वयोगी प्रतिध्वनिवाद्य, परिवारवालों को रक्षा-सूत्र बाँधें, उनका तिलक करें। कलश पर रक्षा-सूत्र बाँधें, स्वस्तिक करें, पंक्ति-गीत भी साथ-साथ गाते रहें। पश्चात् फोटो खींचने हेतु स्थिर पर कलश रख कर, परिवार के जोड़े खड़े करें, छोटे बच्चों को आगे बिठा लें, बड़े सदस्य भी पीछे खड़े हो सकते हैं।
इसप्रकार सुन्दर सोंटा करके फोटो निकलवायें, उससे उस परिवार की मधुर-स्मृति का चित्र, सदा के लिए सुरक्षित रहेगा। भेंट वितरण करके यह मण्डल-कलश-शोभायात्रा विधान-स्थल हेतु रवाना करें।
धर्मध्वजारोहण की विधि
मण्डल-कलश-शोभायात्रा ध्वजारोहण स्थल पर पहुँचने के बाद सभी को ध्वजास्तम्भ पर ले जाकर, ध्वजदण्ड पर ध्वजारोहण-कर्ता-परिवार के सदस्यों द्वारा रक्षासूत्र मन्त्र बोलकर रक्षासूत्र बाँधें। कपड़े की ध्वजा पर भी केसर से स्वस्तिक बनवावें, संगीतवालों की सहायता से पंक्ति-गीत करते रहें। इस समय आमन्त्रित प्रमुख अतिथि, ब्र. भाई-बहिन, उपस्थित विद्वान्, समिति के अध्यक्ष,
१३
श्री सिद्धचक्र विधान
मन्त्री, आदि प्रमुख व्यक्तियों द्वारा यह विधि करावें। पश्चात् ध्वजा को फहरावें एवं सावधान होकर ध्वजगीत प्रस्तुत किया जावे।
मङ्गल कलश स्थापना
पश्चात् उद्घाटन-विधि करावें। उसके बाद मङ्गलकलश का स्थापन करावें। इस विधि के मन्त्र आगे दिये गये हैं। विधि के समय जय जयकार के नाद एवं मङ्गल गीतों के साथ उपस्थित भाई-बहिन सहभागी हों।
इसके पश्चात् निम्न अमृत-स्नान मन्त्र बोलते हुए प्रासुक जल से अमृत-स्नान करावें-
ॐ ह्रीं अमुके अमृतेदमये अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हः हः स्वाहा।
तत्पश्चात् निम्न रक्षा-सूत्र-मन्त्र बोलते हुए रक्षा सूत्र बँधवावें-
जिनेन्द्र-पूज गुरुन, श्रुत-वचः सदा धारण,
स्वशील-स्म-रक्षणं ददत् सन्मृ-वृंहणम्।
इति प्रतिन-पट्टिका-नितियामाद्यं,
तदवश्य प्रन-कर्मणे विहित-रक्षिकावम्।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः अः सि-अ-उ-सा सवौषधशान्तिं कुरु कुरु।
ॐ नमोऽर्हते भगवते थीथुट्ट-पर्मेश्राय एतस्य करपल्लवे
रक्षाबन्धनं करोमि समिद्धिस्तु।
ॐ ह्रीं श्रीं नमः स्वाहा।
पश्चात् निम्न मन्त्र पढ़कर स्वस्तिक बनवावें एवं कलश स्थापित करावें-
ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीसिद्धादि-ब्रह्मणे सतेऽस्मिन् …
मासे … पक्षे … तिथौ … वासरे … वर्षे … इह नगरे
… मन्दिरे … कार्येण निर्विघ्न-समाप्त्यर्थ, मण्डप-भूमिशुद्धयर्थ,
पाप-शुद्धयर्थ, शान्त्यर्थ, पुण्यावाप्त्यर्थ, यज-रक्ष-ग्रह-पिशाचादि
-बीजूर-शोधिमर्थ मङ्गल-कलश स्थापनं करोम्यहं इन्द्रौ इन्द्रौ हः स्वाहा।
इसके पश्चात् सभी पात्रों को समझा दें कि आज से महामहोत्सव
पर्यन्त सूतक-पातक नहीं लगेगा।
१४
प्रस्तावना
पात्र-शुद्धि एवं उनके नियम
(१) नियमित रूप से विधान में अन्त तक सम्मिलित रहें। (२) स्वस्थ हों। (३) विकलांग न हों। (४) हीन आचरण न हों। (५) विधान के अन्त तक संयम से ही रहें। (६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन करें। (७) विधान के समय व्यापार की चिन्ता से मुक्त रहें।
सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा रक्षासूत्र बाँधें।
‘ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्षा हं फट् स्वाहा।’
फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा अमृत स्नान करावें।
ॐ अमुके अमृतेदमये अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं
क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हः हः स्वाहा।
तिलक मन्त्र
मङ्गल भगवान् वीरो, मङ्गल गौतमो गणी।
मङ्गल कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम्।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हः हः मम सर्वार्थसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।
॥ अभिषेक पाठ ॥
श्रीमत्परम-अरहन्त-सिद्ध-दीप्तः,
तोजाऽभासि चरणाम्बुजम्पुणीम।
अहंतमुत्त-पद-पद्मभानवम्,
तन्नमिपुट्ट-पद्महिं करिष्ये ॥ १ ॥
अथ पञ्चादिक-देवनानां पूर्वाचार्यकृतेन सकलकर्मक्षयार्थं भानुपुजा
-स्तवन-वन्दन-समेतं श्री-पूज्य-महागुरु-बीजपुर्वकं कार्योऽहं करोम्यम्।
वाः कृमिमातलिप्तम्ः प्रनिप्य,
संस्थापयति पुरुषो-मुखादयः।
सद्भावलोक-समयादिभिर्मयोः,
तत्रेवमुन्नवधिना कुसुमा क्षिपामि ॥ २ ॥
इति अभिषेकप्रतिज्ञया पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ॥
१५
श्री सिद्धचक्र विधान
प्रस्तावना
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए पाषाणशिला अथवा चौकी पर केशर से ‘श्री’ लिखें -
(उपजाति)
श्री-पीठ-कल्पने, विशालशक्तीर्ये;
श्री-प्रस्तरे पूर्णा, -शशाङ्क-कल्प।
श्री-वदके चन्द्रा, -प्रसीति वार्ता,
सत्त्वापयन्तीं, क्षिमायलिङ्गाम् ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं अर्हत् श्रीपीठाय नमः।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए चौकी पर बड़ी व ऊँची किनार की थाली रख कर, उसमें ‘सिंहासन’ स्थापित करें -
(अनुष्टुप)
कनकदिनिभं कर्ष, पावनं पुण्यकाणम्।
स्थापयामि परं पीठं, जिन-सम्पन्नाय भक्तिः ॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्रीपीठस्थापनं करोमि।
पश्चात् निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए शुद्धात्माद पूर्वक जय-जय शब्द बोलते हुए वेदी में धातु की प्रतिमाओं व यंत्र को सिंहासन पर विराजमान करें -
(वसंततिलका)
भृङ्गार-चामर-सुदीर्घ-पीठ-कुम्भ-,
तात-छत्र-तप-निवाक-भूषिताग्र।
वर्धस्व नन्द जय पीठ-पदावलीभिः,
सिंहासने जिन-भवन्तमहं श्रयामि ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं अर्हत् श्रीप्रतिष्ठापनाय भगवन् ! इह सिंहासने तिष्ठ-तिष्ठ।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ कर चौकी पर चार दिशाओं में जल से भर कर कलश स्थापित करें -
श्री तीर्थकृत्तत्त्वन-सर्व-विधी सुरेन्द्रः,
श्रीश्राद्ध-वाभिपदद्वय-कुम्भाग्र।
तास्तादृशानिव विभाव्य यशाऽर्हणात्,
संस्थापये कुम्भ-चन्दन-भूषिताग्रान् ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं स्वस्तये चतुःकोणेषु चतुःकलशस्थापनं करोमि।
आनन्द-निर्भर-सुर-प्रदार्थ-गावैः,
वादिन्द्र-पर-जय-शब्द-कल्प-प्रशान्तः।
उद्गीर्यमान-जपतिपति-कीर्तिमंत्रां,
पीत-स्वली वसु-विशालंऽनयोल्लसामि ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं स्वपन-पीत-स्थितयाय जिनेन्द्राय अयं निश्वापामि स्वाहा।
यहाँ निम्न छंद एवं मंत्र पढ़ते हुए चारों कलशों के जल से अभिषेक करें -
कर्म-प्रबन्ध-निगड़ानि हीनताऽऽप्ते,
जावाऽपि भक्तिवतः पस्मादेवेम्।
त्वां व्योम-कल्प-गणमास्थनाय देव!,
शुद्धोदकै रभिष्यामि नवायितत्त्वम् ॥ ८ ॥
श्री सिद्धचक्र विधान
ये सर्वोषधऋद्धयः सुतपसो, वृद्धिंगता पञ्च ये;
ये चाऽष्टाङ्गमहानिमित्तकुशला, येऽष्टाविधाश्चारणाः । पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो, ये बुद्धि-ऋद्धीश्वराः; सप्तैते सकलाऽर्चिता गणभृतः, कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ 5॥ कैलासे वृषभस्य निर्वृतिमही, वीरस्य पावापुरे;
चम्पायां वसुपूज्यसज्ञ्जिनपतेः, सम्मेद-शैलेऽर्हताम् । शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे, नेमीश्वरस्याऽर्हतो;
निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः, कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ 6 ॥ ज्योतिर्व्यन्तरभावनाऽमरगृहे, मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः; जम्बूशाल्मलिचैत्यशाखिषु तथा, वक्षाररौप्याऽद्रिषु । इष्वाकार-गिरौ च कुण्डल-नगे, द्वीपे च नन्दीश्वरे; शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः, कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ 7 ॥ यो गर्भाऽवतरोत्सवो भगवतां, जन्माऽभिषेकोत्सवो;
यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो, यः केवलज्ञानभाक् । यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा, सम्भावितः स्वर्गिभिः; कल्याणानि च तानि पञ्च सततं, कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ४॥ इत्थं श्री जिनमङ्गलाऽष्टकमिदं, सौभाग्यसम्पत्करम्; कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियः, तीर्थङ्कराणामुषः । ये शृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैः, धर्मार्थकामान्विता; लक्ष्मीराऽश्रियते व्यपायरहिता, निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥ १॥ मङ्गलाष्टक पढ़ते हुए प्रत्येक छन्द के अन्त में थाली में पुष्प-क्षेपण करावें। अमृत-स्नान
विधानाचार्य, विधान में सम्मिलित होनेवाले सभी व्यक्तियों के हाथ धुला कर, दाहिने हाथ में जल लेने का निर्देश देते हुए निम्न मन्त्र बोल कर, जल के छींटे मस्तक पर सिंचित करवाएँ –
ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा। प्रस्तावना
पात्र-शुद्धि एवं उनके नियम
सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र द्वारा रक्षासूत्र बाँधें । ‘ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा।’
फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा अमृत स्नान करावें। ॐ अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं स्त्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लू ब्लू द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा। तिलक मन्त्र
मङ्गलं भगवान् वीरो, मङ्गलं गौतमो गणी।
मङ्गलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मङ्गलम् ॥ ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः मम सर्वाङ्गशुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा। ॥ अभिषेक पाठ ॥
श्रीमन्नताऽमर-शिरस्तट-रत्न-दीप्तिः,
तोयाऽवभासि चरणाम्बुजयुग्ममीशम् ।
अर्हन्तमुन्नत-पद-प्रदमाभिनम्य,
त्वन्मूर्तिषूद्यदभिषेकविधिं करिष्ये ॥ 1 ॥
अथ पौर्वाह्निक-देववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजा -स्तव-वन्दना-समेतं श्री-पञ्च-महागुरु-भक्तिपूर्वकं कायोत्सर्ग करोम्यहम् । याः कृत्रिमास्तदितराः प्रतिमाः जिनस्य,
संस्नापयन्ति पुरुहूत-मुखादयस्ताः ।
सद्भावलब्धि-समयादिनिमित्तयोगाः,
तत्रैवमुज्ज्वलधिया कुसुमं क्षिपामि ॥ 2 ॥
॥ इति अभिषेकप्रतिज्ञायै पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ॥ श्री सिद्धचक्र विधान
(उपजाति)
श्री-पीठ-क्लृप्ते, विशदाक्षतौघैः,
श्री-प्रस्तरे पूर्ण, -शशाङ्क-कल्प ।
श्री-वर्तके चन्द्र, -मसीति वार्ता,
सत्यापयन्तीं, श्रियमालिखामि ॥ ३॥
ॐ ह्रीं अईं श्रीलेखनं करोमि ।
यहाँ निम्न छन्द एवं मन्त्र पढ़ते हुए चौकी पर बड़ी व ऊँची किनार की थाली रख कर, उसमें ‘सिंहासन’ स्थापित करें – (अनुष्टुभ्)
कनकादिनिभं कम्रं, पावनं पुण्यकारणम् ।
स्थापयामि परं पीठं, जिन-स्नपनाय भक्तितः ॥ 4 ॥ ॐ ह्रीं श्रीपीठस्थापनं करोमि ।
पश्चात् निम्न छन्द एवं मन्त्र पढ़ते हुए घण्टानाद पूर्वक जय-जय शब्द बोलते हुए वेदी में से धातु की प्रतिमाजी व यन्त्र को सिंहासन पर विराजमान करें - (वसन्ततिलका)
भृङ्गार-चामर-सुदर्पण-पीठ-कुम्भ-,
ताल-ध्वजा-तप-निवारक - भूषिताग्र ।
वर्धस्व नन्द जय पीठ-पदावलीभिः,
सिंहासने जिन-भवन्तमहं श्रयामि ॥ 5 ॥
ॐ ह्रीं अर्ह श्रीधर्मतीर्थाधिनाथ भगवन् ! इह सिंहासने तिष्ठ-तिष्ठ। यहाँ निम्न छन्द एवं मन्त्र पढ़ कर, चौकी पर चार दिशाओं में जल से भरे चार कलश स्थापित करें –
श्री तीर्थकृत्स्नपन-वर्य-विधौ सुरेन्द्रः, क्षीराऽब्धि-वारिभिरपूरयदर्थ-कुम्भान् ।
तांस्तादृशानिव विभाव्य यथाऽर्हणीयान्,
संस्थापये कुसुम-चन्दन-भूषिताग्रान् ॥ 6 ॥
प्रस्तावना
ॐ ह्रीं स्वस्तये चतुःकोणेषु चतुःकलशस्थापनं करोमि । आनन्द-निर्भर-सुर-प्रमदादि-गानैः,
वादित्र-पूर-जय-शब्द-कल-प्रशस्तैः ।
उद्गीयमान-जगतीपति-कीर्तिमेनां,
पीठ-स्थलीं वसु-विधाऽर्चनयोल्लसामि ॥ 7 ॥
ॐ ह्रीं स्नपन-पीठ-स्थिताय जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। यहाँ निम्न छन्द एवं मन्त्र पढ़ते हुए चारों कलशों के जल से अभिषेक करें - कर्म-प्रबन्ध-निगडैरपि हीनताऽऽप्तं,
ज्ञात्वाऽपि भक्तिवशतः परमादिदेवम् ।
त्वां स्वीय-कल्मष-गणोन्मथनाय देव!,
शुद्धोदकै रभिनयामि नयार्थतत्त्वम् ॥ 8॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं पं पंझं झं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय पवित्रतरजलेन नमोऽर्हते भगवते श्रीमते जिनेन्द्रमाभिषेचयामि स्वाहा।
निम्न छन्द एवं मन्त्र पढ़ते हुए पुनः अभिषेक करें - दूराऽवनम्र-सुरनाथ-किरीट-कोटी,
संलग्न-रत्न-किरणच्छवि-धूसरांघ्रिम् ।
प्रस्वेद-ताप-मल-मुक्तमपि प्रकृष्टैः,
भक्त्या जलैर्जिनपतिं बहुधाऽभिषिंचे ॥ ९॥
ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालसन्तं वृषभादि-महावीरपर्यन्तं चतुर्विंशति- तीर्थंङ्कर-परमदेवं आद्यानामाद्ये मध्यलोके जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे…देशे …नाम्नि नगरेऽस्मिन् जिनालये मासानामुत्तमे मासे …पक्षे
…शुभदिने मुनि-आर्यिका-श्रावक-श्राविकाणां सकलकर्मक्षयार्थं जलेनाभिषेचयामः।
पानीय-चन्दन-सदक्षत-पुष्पपुञ्ज,
-नैवेद्य-दीपक-सुधूप- लव्रजेन ।
कर्माष्टक-क्रथन-वीर-मनन्त-शक्तिं,
संपूजयामि सहसा महसां निधानम् ॥ 10 ॥
श्री सिद्धचक्र विधान
ॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादिवीरान्तेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। हे तीर्थपा ! निजयशोधवलीकृताशा,
सिद्धौषधाश्च भवदुःखमहागदानाम् ।
सद्भव्यहृज्जनितपङ्ककबन्धकल्पाः,
यूयं जिनाः सततशांतिकरा भवन्तु ॥ 11 ॥
(इति शान्त्यर्थं पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
पश्चात् निम्न श्लोक व मन्त्र को पढ़ कर प्रतिमाजी का शुद्ध वस्त्र से मार्जन करें -
नत्वा मुहुर्निजकरैरमृतोपमेयैः,
स्वच्छैर्जिनेन्द्र ! तव चन्द्रकराऽवदातैः ।
शुद्धांऽशुकेन विमलेन नितान्तरम्ये,
देहे स्थितान्जलकणान्परिमार्जयामि ।॥ 12 ॥
ॐ ह्रीं अमलांशुकेन जिनबिम्बमार्जनं करोमि ।
पश्चात् निम्न श्लोक पढ़कर श्री जिनबिम्ब को वेदी में विराजमान करें - स्नानं विधाय भवतोऽष्टसहस्रनाम्ना,
-मुच्चारणेन मनसो वचसो विशुद्धिम्।
जिघृक्षुरिष्टिमिन ! तेऽष्टतयीं विधातुं,
सिंहासने विधिवदत्र निवेशयामि ॥ 13 ॥
अब यहाँ निम्न श्लोक पढ़कर स्वयं जिनचरणोदक लेकर दूसरों को देवें - नत्वा परीत्य निज-नेत्र-ललाटयोश्च,
व्याप्तं क्षणेन हरतादघसञ्चयं मे ॥
शुद्धोदकं जिनपते तव पादयोगाद्,
पुण्याहवाचन
भूयाद् भवाऽतपहरं धृतमादरेण ।। 14 ।।
विधान समाप्ति होने पर अन्तिम दिन महार्घ्य-शान्तिपाठ के पूर्व निम्नलिखित पुण्याहवाचन करें –
प्रस्तावना
ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता निर्वाण- सागरप्रभृतयश्चतुर्विंशतिपरमदेवाः वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ सम्प्रतिकालसंभवा वृषभादिवीरान्ताश्चतुर्विशतिपरमजिनेद्रा वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवा महापद्मादिचतुविंशतिः
भविष्यत्परमदेवाः वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा) विंशतिः परमदेवाः व प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ सप्तर्द्धिविशोभिताः कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणा। वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा)
इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजाः सर्वे गुरुभक्ता जिनधर्मपरायणा भवन्तु । दानतपोवीर्यानुष्ठानं नित्यमेवास्तु । सर्वजिनधर्मभक्तानां धनधान्यैश्वर्यबलद्युतियशः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम् । तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आरोग्यमस्तु, कर्मसिद्धिरस्तु, इष्टसम्पत्तिरस्तु, काममांगल्योत्सवाः सन्तु, पापानि शाम्यन्तु घोराणि शाम्यन्तु, पुण्यं वर्धताम्, धर्मो वर्धताम्, श्रीवर्धताम्, कुलं गोत्रं चाभिवर्धेताम्, स्वस्ति भद्रं चास्तु, आयुष्यमस्तु, क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा। श्रीमज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्तिः सदास्तु । तदनन्तर महार्घ्य, शान्तिपाठ और विसर्जनपाठ पढ़ें ।
श्री सिद्धचक्र माहात्म्य
श्री सिद्धचक्र गुणगान करो मन आन भाव से प्राणी; कर सिद्धों की अगवानी ॥ टेक ॥
सिद्धों का सुमरन करने से, उनके अनुशीलन चिन्तन से; प्रगटै शुद्धात्मप्रकाश, महा सुखदानी ऽ ऽ ऽ। पाओगे शिव रजधानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ १॥
श्रीपाल तत्त्वश्रद्धानी थे, वे स्व-पर भेदविज्ञानी थे; निज देह-नेह को त्याग, भक्ति उर आनी ऽ ऽ ऽ। हो गई पाप की हानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ २ ॥
मैना भी आतमज्ञानी थी, जिनशासन की श्रद्धानी थी; अशुभभाव से बचने को, जिनवर की पूजन ठानी ऽ ऽ ऽ। कर जिनवर की अगवानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ३ ॥ भव-भोग छोड़ योगीश भये, श्रीपाल ध्यान धरि मोक्ष गये; दूजे भव मैना पावे शिव रजधानी ऽ ऽ ऽ।
केवल रह गई कहानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ४ ॥
प्रभु दर्शन-अर्चन-वन्दन से, मिटता है मोह-तिमिर मन से; निज शुद्ध-स्वरूप समझने का, अवसर मिलता भविप्राणी । पाते निज निधि विसरानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ५ ॥ भक्ति से उर हर्षाया है, उत्सव युत पाठ रचाया है; जब हरष हिये न समाया, तो फिर नृत्य करन की ठानी ऽऽऽ । जिनवर भक्ति सुखदानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ६ ॥ सब सिद्धचक्र का जाप जपो, उनही का मन में ध्यान धरो; नहिं रहे पाप की मन में नाम निशानी ऽऽऽ । बन जाओ शिवपथ गामी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ७॥
जो भक्ति करे मन-वच-तन से, वह छूट जाय भवबंधन से; भविजन ! भज लो भगवान, भगति उर आनी ऽऽऽ । मिट जैहे दुःखद कहानी ॥ श्री सिद्ध. ॥ ८ ॥ – पण्डित रतनचन्द भारिल्ल, जयपुर
ॐ
॥ ॐ स्वस्ति श्री जिनेन्द्राय नमः॥
आध्यात्मिक कविवर श्री सन्तलालजी द्वारा विरचित श्री सिद्धचक्र विधान
।। अथ मंगलाचरण ।।
(दोहा : तर्ज - इह विधि ठाड़ो होय के …) जिनाधीस शिवईश नमि, सहस गुणित विस्तार । ‘सिद्धचक्र पूजन’ रचूँ, शुद्ध त्रियोग सम्हार ॥ १ ॥ पूजन करनेवाले यजमान का लक्षण
नीताश्रित धनपति सुधी, शीलादिक गुणखान । जिनपद-अंबुज भ्रमर-मन, सो प्रशस्त ‘यजमान’ ॥ २ ॥ पूजन करानेवाले याजक का लक्षण
देश-काल-विधि निपुणमति, निर्मल भाव उदार । मधुर वैन नयना सुघर, श्री ‘याजक’ निरधार ॥ ३ ॥ विद्वान् / गुरु / आचार्य का लक्षण
रत्नत्रय-मंडित महा, विषय-कषाय न लेश ।
संशय-हरन सुहित-करन, करत सुगुरु उपदेश ॥ ४॥ विधान-मण्डप / मांडना का लक्षण
(छप्पय : तर्ज - प्रिय चैतन्यकुमार सदा …) निर्मल मंडप भूमि दरव मंगल कर सोहत ।
सुरभि सरस सुभ पुष्पजाल-मंडित मन-मोहत ।। १-४. उक्त सभी शीर्षक झालरापाटन से प्राप्त महलका प्रति के आधार पर दिये गये हैं। श्री सिद्धचक्र विधान
यथायोग सुन्दर मनोग चित्राम अनूपा।
दीरघ मोल सुडोल वसन झखझोल१ सरूपा ।।
प्रासुक द्रव्य का प्रयोजन
हो वित्तसारु प्रासुक दरव, सर्व अंग मन को हरै।
सो महाभाग आनंद सहित, जो जिनेन्द्र अर्चा करै ॥ ५ ॥ ।। अथ सिद्ध-चक्र-यन्त्र स्थापना-विधि ।।
(दोहा : तर्ज - आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग …) सुर-मुनि-मन आनन्दकर, ज्ञान-सुधारस धार।
सिद्धचक्र सो थापहूं, विधि-दव-जल उनहार ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। ( इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
।। वर्णमाला के वर्णों को आठ वर्गों में विभाजित करके आठ दिशाओं से सिद्धि को प्राप्त सिद्ध भगवन्तों को अर्घ्य ।। (अडिल्ल : तर्ज - सरब परव में बड़ों …)
अर्ह शब्द प्रसिद्ध अर्द्ध मात्रिक कहा,
‘अकारादि-स्वर’ मंडित अति शोभा लहा।
अति पवित्र अष्टांग अर्घ कर लाय कै,
पूरव-दिश पूजूँ अष्टांग नमाय कै ॥ ७॥
ॐ ह्रीं अर्ह अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ऋ-लृ-लृ-ए-ऐ-ओ-औ-अं-अः ! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय पूर्व-दिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। (सोरठा : तर्ज – लिया प्रभु अवतार …)
वर्ण ‘कवर्ग’ महान, अष्ट पूर्व-विध अर्घ ले।
भक्ति-भाव उर ठान, पूजूं हूं अग्नेय दिश ॥ ८ ॥
ॐ ह्रीं अर्ह क-ख-ग-घ-ङ! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय आग्नेय-विदिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। १. झकझोर अर्थात् चमकदार
अथ सिद्ध-चक्र-यन्त्र स्थापना-विधि
वर्ण ‘चवर्ग’ प्रसिद्ध, वसुविधि अर्घ उतारि कै।
मिलि है वसु-विध ऋद्धि, दक्षिण-दिश पूजा करों ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं अर्ह च-छ-ज-झ-ञ ! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय दक्षिण-दिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। वर्ण ‘टवर्ग’ प्रशस्त, जल-फलादि शुभ अर्घ ले।
पाऊँ सब विधि स्वस्त, नैऋत-दिश अर्चा करों ॥ १०॥
ॐ ह्रीं अर्ह ट-ठ-ड-ढ-ण! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय नैऋत्य-विदिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। वर्ण ‘तवर्ग’ मनोग, यथायोग कर अर्घ धर।
मिल है सब शुभ-योग, पूजन कर पश्चिम दिशा ॥ ११ ॥
ॐ ही अर्ह त-थ-द-ध-न ! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय पश्चिम-दिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। वर्ण ‘पवर्ग’ सुभाग, करूँ आरती अर्घ ले ।
सब विध आरत-त्याग, वायव-दिश पूजा करूँ ॥ १२ ॥
ॐ ह्रीं अर्ह प-फ-ब-भ-म! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय वायव्य-विदिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। वर्ण यवर्गी सार, ‘दरव-अर्घ’ वसु द्रव्य कर।
‘भाव-अर्घ’ उर धार, उत्तर-दिश पूजा करूँ ॥ १३॥
ॐ ह्रीं अर्ह य-र-ल-व! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय उत्तर-दिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। शेष वर्ण चव अंत, उत्तम अर्घ बनाय कै ।
नशे कर्म वसु भन्त!, पूजूँ हूँ ईशान-दिशि ॥ १४ ॥
ॐ ह्रीं अर्ह श-ष-स-ह! अनाहत-पराक्रमाय सकल-कर्म-विमुक्ताय ईशान-विदिशये सिद्धचक्राधिपतये नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। ( इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
श्री सिद्धचक्र विधान
प्रथम पूजन
।। अथ प्रथम पूजन ।।
(आठ गुण सहित)
।। स्थापना ।।
(छप्पय : तर्ज - प्रिय चैतन्य कुमार सदा …)
ऊरध अधो सु रेफ, सबिंदु हकार विराजे ।
अकारादि स्वर-लिप्त, कर्णिका अन्त सु छाजे ॥
वर्गन-पूरित वसु-दल-अम्बुज तत्त्व-संधि धर।
अग्र भाग में मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ॥
पुनि अंत ह्रीं बेढ्यो परम, सुर ध्यावत ही अरि-नाग को । है केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो ॥२
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, अष्टगुण-संयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, अष्टगुण-संयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, अष्टगुण-संयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (दोहा : तर्ज - आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग …) सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निरसोग ।
सकल सिद्ध पूजूं सदा, मिटै उपद्रव योग ॥
(इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
१. हाथी, २. सिद्ध-चक्र-यन्त्र वर्णन - जिसके ऊपर-नीचे रेफ है, मध्य में बिन्दु सहित हकार है, अकारादि स्वरों से जो लिप्त है, जिसके अन्त में कर्णिका है, जिसके चारों ओर आठ प्रकार के वर्गों से पूरित अष्ट-दल-कमल है, जिनकी सन्धियों में तत्त्व अर्थात् तत्त्वज्ञान- प्रदाता ‘णमो अरहंताणं’ शोभायमान है; इन कमलों पर अग्रभाग में अनाहत मन्त्र ‘ऊँ’ तथा अन्त में पुनः ‘ह्रीं’ सुशोभित होता है। इस सिद्धयन्त्र की देवता भी साधना-आराधना करते हैं तथा जैसे, हाथियों के समूह को सिंह वशीभूत कर लेता है, उसीप्रकार यह यन्त्र, कर्मरूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है; अतः मैं भी पूजन के लिए इस सिद्धयन्त्र की स्थापना करता हूँ। ।। अथाष्टकं ।।
(चाल : तर्ज - नन्दीश्वर श्री जिनधाम …)
शीतल शुभ सुरभि सु नीर, कंचन कुंभ भरे।
पाऊँ भव-सागर तीर, आनन्द भेंट धरे ॥
अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं।
नमूँ सिद्धचक्र शिवभूप, अचल विराजत हैं ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, ‘सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरज-सुहम-अवगाहण- अगुरुलघु-अव्वावाह-अट्ठगुणा हुंति सिद्धाणं’ इति अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्ध- चक्राधिपतये नमः, जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन तुम वन्दन हेत, उत्तम मान्य गिना।
नातर सब काष्ठ समेत, ईंधन था ही बना ।। अन्तर. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। दीरघ शशि-किरण समान, अक्षत लावत हूँ।
शशि-मंडल सम बहुमान, पुंज रचावत हूँ । अन्तर. ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। तुम चन्द्र-चरण के पास, पुष्प धरे सोहै।
मनु नक्षत्रन की रास, सोहत मन मोहै ॥ अन्तर. ।।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तम नेवज बहु भाय, सरस सुधा साने।
अहमिन्द्रन मन ललचाय, भक्षण उमगाने ॥ अन्तर. ।॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। फैले दीपन की जोति, अति परकाश करै।
जिम स्याद्वाद उद्योत, संशय-तिमिर हरै ॥ अन्तर. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धर अग्नि धूप के ढेर, गंध उड़ावत हूँ।
कर्मों का धूम बखेर, ठोक जरावत हूँ ॥ अन्तर. ॥
श्री सिद्धचक्र विधान
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अष्ट-कर्म-विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। जिम धर्म-वृक्ष की डाल, शिव-फल सोहत है।
इम सुर-फल कंचन-थाल, मनि-मन मोहत है ।।
अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं।
नमूँ सिद्धचक्र शिवभूप, अचल विराजत हैं ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। कर अर्घ दर्व वसु जात, यातें ध्यावत हूँ।
अष्टांग सुगुण विख्यात, तुम ढिंग पावत हूँ ॥ अन्तर. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अनर्घ्य-पद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (गीता/हरिगीत : तर्ज - कुन्दकुन्द शतक …)
निर्मल सलिल शुभवास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी ।
शुभ पुष्प मधुकर नित रमें चरु, प्रचुर स्वाद सुविध घनी ॥ वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले ।
कर अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्म-दल सब दलमले ॥ १ ॥ ते क्रम-वर्त नशाय युगपत्, ज्ञान निर्मलरूप है।
दुख जन्म टार अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप है॥
कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिवकमलापती । मुनि ध्येय-सेय-अभेय चहुँ गुण ज्ञेय द्यो हम शुभमती ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, सम्यक्त्वादि-अष्टगुणसंयुक्तेभ्यो श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, सर्व-सुख-प्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। ।। अथ सिद्धों के अष्ट गुण सम्बन्धी अर्घ्य ।।
(चौपाई : तर्ज - दरश विशुद्धि धरै जो कोई …) मिथ्या-त्रय चहुँ आदि कषाया, मोह नाशि क्षायक गुण पाया। निज अनुभव प्रत्यक्षस्वरूपा, नमूँ सिद्ध समकित गुणभूपा ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं शुद्ध-सम्यक्त्वगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि.। सकल त्रिधा षद्रव्य अनन्ता, युगपत् जानत हैं सब भन्ता । निर-आवरण विशद स्वाधीना, ज्ञानानन्द परम रसलीना ॥ २॥
प्रथम पूजन
ॐ ह्रीं अनन्त-ज्ञानगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि.। चक्षु अचक्षु अवधि विधि नाशी, केवलदर्श जोति परकाशी। सकल ज्ञेय युगपत् अवलोका, उत्तम दर्श नमूँ सिद्धों का ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं अनन्त-दर्शनगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि. । अन्तराय विधि प्रकृति अपारा, जीव शक्ति घाते निरधारा। ते सब घात अतुल बल स्वामी, लसत अखेद सिद्ध प्रणमामी ॥ ४॥ ॐ ह्रीं अनन्त-वीर्यगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि. । रूपातीत मन-इन्द्रिय ताही, मनपर्यय हू जानत नाहीं। अलख अनूप अमित अविकारी, नमूँ सिद्ध सूक्षम गुणधारी ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं सूक्ष्मगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि. । एक-क्षेत्र-अवगाह स्वरूपा, भिन्न-भिन्न राजै चिद्रूपा। निज-परघात विभाव विडारा, नमूँ सहित अवगाह अपारा ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं परम-अवगाहनगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि.। परकृत ऊँच-नीच पद नाहीं, रमत निरंतर निजपद माहीं। उत्तम अगुरुलघु गुण भोगी, सिद्धचक्र ध्यावैं नित योगी ॥ ७॥ ॐ ह्रीं अगुरुलघुगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि.। नित्य निरामय भव-भय-भंजन, अचल निरंतर शुद्ध निरंजन । अव्याबाध सोई गुण जानों, सिद्धचक्र पूजन मन मानो ॥ ८ ॥ ॐ ह्रीं अव्याबाधगुण-समन्विताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि.। ।। अथ जयमाल (आरती) ॥
(दोहा : तर्ज - इह विधि ठाड़ो होय के …)
जग आरत भारत महा, गारत कर जय पाय ।
विजय आरती तिन कहूँ, पुरुषारथ गुण गाय ॥ १॥
(पद्धरि : तर्ज - ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञान-चरण …) जय करण कृपाण सु प्रथम वार, मिथ्यात सुभट कीनो प्रहार। दिढ़ कोट-विपर्यय मति उलंघ, पायो समकित थल थिर अभंग ॥ १ ॥ स्व-पर विवेक मन्त्री पुनीत, स्वरुचि वरतायो राज-नीत । जग विभव विभाव असार एह, स्वातम-सुखरस विपरीत देह ॥ २ ॥ तिन नाशन लीनो दृढ़ संभार, शुद्धोपयोग-थित चरण सार। निर्ग्रन्थ कठिन मारग अनूप, हिंसादिक टारन सुलभ रूप ॥ ३ ॥ श्री सिद्धचक्र विधान
द्वय-बीस परीषह-सहन वीर, बहिरन्तर संयम धरण धीर। द्वादश भावन दश भेद धर्म, विधि-नाशन बारह तप सु पर्म ॥ ४ ॥ शुभ दया हेत धर समिति सार, मन शुद्धि करण त्रय गुप्ति धार। एकाकी निर्भय निरसहाय, विचरो प्रमत्त-नाशन उपाय ॥ ५ ॥ लख मोहशत्रु परचंड जोर, तिस हनन शुकल दल ध्यान जोर । आनन्द वीर रस हिये छाय, क्षायक श्रेणी आरम्भ थाय ॥ ६ ॥ बारम गुणथानक ताह नाश, तेरम पायो निज पद प्रकाश । नव केवललब्धि विराजमान, दैदीप्यमान सोहे सुभान ॥ ७॥ तिस मोह दुष्ट आज्ञा एकांत, थी कुमति स्वरूप अनेक भांत । निज-वाणी कर ताको विहंड, कर स्याद्वाद आज्ञा प्रचंड ॥८॥ वरतायो जग में सुमतिरूप, भविजन पायो आनन्द अनूप। थे मोह-नृपति उपकरण शेष, चारों अघातिया विधि विशेष ॥ ९ ॥ है नृपन सनातन रीति एह, अरि विमुख न राखे नाम तेह। यों तिन नाशन उद्यम सुठान, आरंभो परम शुकल सु ध्यान ॥ १० ॥ तिसबलकरितिनकीथितिविनाश, पायोनिर्भयसुखनिधिनिवास । यह अक्षय जोत लई अबाध, पुनि अंश न व्यापो शत्रु व्याध ॥ ११ ॥ शाश्वत स्वाश्रितसुख श्रेय स्वामि, हों शान्त सन्त तुम कर प्रणाम। अन्तिम पुरुषारथ फल विशाल, तुम विलसौ सुखसों अमित काल ॥ १२ ॥ ॐ ह्रीं सम्मत्तणाणादि-अट्ठगुणसंजुत्त-श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्य नि. स्वाहा। (धत्ता : तर्ज - वसु द्रव्य संवारी …)
परसमय-विदूरित, पूरित स्व-सुख, समयसार चेतनरूपा। नाना प्रकार पर को विकार, सब टार लसैं सब गुणभूपा ॥ ते निरावरण निर्देह अनूपम, सिद्धचक्र परसिद्ध जजूँ । सुर-मुनि नित ध्यावें, आनन्द पावें, मैं पूजत भववास भजूँ ॥ ( इत्याशीर्वादः, पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
‘ॐ ह्रीं अर्ह असिआउसा सर्वशान्तिं कुरु कुरु स्वाहा’ - इस शान्ति-मन्त्र की प्रतिदिन सामूहिक एक जाप करें। ।। इति प्रथम पूजा सम्पूर्णम् ।।
।। अथ द्वितीय पूजन ।।
(सोलह गुण सहित)
।। स्थापना ।।
(छप्पय : तर्ज - प्रिय चैतन्यकुमार सदा …) ऊरध अधो सु रेफ, सबिंदु हकार विराजे ।
अकारादि स्वर-लिप्त, कर्णिका अन्त सु छाजे ॥
वर्गन-पूरित वसु-दल-अम्बुज तत्त्व-संधि धर।
अग्र भाग में मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ॥
पुनि अंत ह्रीं बेढ्यो परम, सुर ध्यावत ही अरि नाग को। द्वै केहर सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः श्रीसिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (दोहा : तर्ज - आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग …) सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग।
सिद्धचक्र सो थापहुँ, मिटै उपद्रव योग ॥
( इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
।। अथाष्टकं ।।
(हरिगीत - तर्ज - प्रभु पतित पावन, मैं अपावन …) हिमशैल धवल महान कठिन, पाषाण तुम जस रास तें,
शरमाय अरु सकुचाय द्रव है, बही गंगा तास तें।
सम्बन्ध योग चितार चित, भेंटार्थ झारी में भरूँ, षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र, चितार उर पूजा करूँ ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
कश्मीर चंदन आदि अन्तर-बाह्य बहुविध तप हरै,
यह कार्य कारण लख नमित, मम भाव हू उद्यम करै ।
मैं हूँ दुखी भवताप तैं, घसि मलय चरनन ढिंग धरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
सौरभ चमक जिस सह न सक, अंबुज बसै सरताल में,
शशि गगन वस नित होत कृश, अहनिश भ्रमे इस ख्याल में। सो अक्षतौघ अखंड अनुपम, पुंज धर सन्मुख जुरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
जग प्रगट काम सुभट विकट कर, हट करत जिय घट जगा,
तुम शील कटक सु घट निकट, सरचाप पटक सुझट भगा।
इमि पुष्प राशि सुवास तुम ढिंग, कर सुयश बहु उच्चरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
जीवन सतावत नहिं अघावत, क्षुधा डायन-सी बनी,
सो तुम हनी तुम ढिंग न आवत, जान यह विधि हम ठनी।
नैवेद्य के संकेत कर निज, क्षुधा-नाशन विधि वरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । मैं मोह-अंध अशक्य अरु, ये विषम भववन है महा,
ऐसे रुले को ज्ञानदुति बिन, पार निवरन हो कहा।
सो ज्ञानचक्र उघार स्वामी, दीप ले पायनि परूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रासुक सुगंधित दिव्य सुन्दर, दिव्य घ्राण सुखावनो, धर अगन दश दिश वास पूरित, ललित धूम्र सुहावनो।
तुम भक्ति-भाव उमंग करत, प्रसंग धूप सु विस्तरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अष्ट-कर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
द्वितीय पूजन
चितहरण अचित सुरंग रस पूरित विविध फल सोहने,
रसना लुभावन कल्पतरु के, सुर-असुर मन मोहने ।
भर थाल कंचन भेंट धर, संसार फल तृष्णा हरूँ,
षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र, चितार उर पूजा करूँ ॥ ८ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ नीर वर कश्मीर चन्दन, धवल अक्षत युत अनी,
वर पुष्पमाल विशाल चरु सु, रसाल दीपक दुति मनी ।
वर धूप पक्व मधुर सुफल ले, अर्घ अठ विध संचरूँ ।। षोडश. ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, अनर्घ्य-पद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (गीता : तर्ज - प्रभु पतित पावन मैं अपावन …) निर्मल सलिल शुभवास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी ।
शुभ पुष्प मधुकर नित रमें चरु, प्रचुर स्वाद सुविध घनी ॥ वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले ।
कर अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्म-दल सब दलमले ॥ १ ॥ ते क्रमवर्त नशाय युगपत्, ज्ञान निर्मलरूप है ।
दुख जन्म टार अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप है॥
कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिवकमलापती । मुनि ध्येय-सेय-अभेय चहुँ गुण गेह द्यो हम शुभमती ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, षोडशगुणसंयुक्त-श्रीसिद्धचक्राधिपतये नमः, सर्व-सुख-प्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। ।। अथ सिद्धों के सोलह गुण सम्बन्धी अर्घ्य ।।
(त्रोटक : तर्ज - जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …) दर्शन आवरणी प्रकृति हनी, अथिता अवलोक सुभाव तनी । इक साथ समान लखो सब ही, नमूँ सिद्ध अनन्त दूगनि अब ही ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं अनन्तदर्शन-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
विधि ज्ञानावर्ण विनाश कियो, निज ज्ञान स्वभाव विकास लियो ।
समयांतर सर्व विशेष जनो, नमूँ ज्ञान अनन्त सुसिद्ध तनो ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं अनन्तज्ञान-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। सुख अमृत पीवत स्वेद न हो, निज भाव विराजत खेद न हो।
असमान महाबल धारत हो, हम पूजत पाप विडारत हो ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं अतुलवीर्य-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। विपरीत सभीत पराश्रितता, अतिरिक्त करे न धरे थिरता ।
पर की अभिलाष न सेवत हैं, निज भाविक आनन्द बेवत हैं ।॥ ४॥
ॐ ह्रीं अनन्तसुख-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। निज आत्मविकाशक बोध लह्या, भ्रमको परवेश न लेश कह्या।
निजरूप सुधारस मग्न भये, हम सिद्धन शुद्ध प्रतीति नये ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं अनन्तसम्यक्त्व-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्व. स्वाहा। निजभाव विडार विभाव न हो, गमनादिक भेद विकार न हो।
निजथान निरूपम नित्य बसे, नमूँ सिद्ध अनाचल रूप लसे ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं अचलगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (चौपाई : तर्ज – रोम रोम से निकले प्रभुवर …)
गुण-पर्यय परणति के भेद, अति सूक्षम असमान अछेद ।
ज्ञान गहै न कहै जड़ वैन, नमों सिद्ध सूक्षम गुण ऐन ॥ ७॥
ॐ ह्रीं अनन्तसूक्ष्मत्व-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्व. स्वाहा। जन्म-मरण युत धेरै न काय, रोगादिक संक्लेश न पाय।
नित्य निरंजन निर-अविकार, अव्याबाध नमों सुखकार ॥ ८ ॥
ॐ ह्रीं अव्याबाधगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्व. स्वाहा। एक पुरुष अवगाह प्रयन्त, राजत सिद्ध समूह अनन्त ।
एकमेक बाधा नहिं लहैं, भिन्न-भिन्न निजगुण में रहैं ॥ ९ ॥
ॐ ह्रीं अवगाहनगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। काययोग पर्यापति प्रान, अनवधि छिन-छिन होवे हान।
जरा कष्ट जग प्रानी लहै, नमों सिद्ध यह दोष न सहै ॥ १०॥
ॐ ह्रीं अजरगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। द्वितीय पूजन
काल अकाल प्राण को नाश, पावे जीव मरण को त्रास ।
तासौं रहित अमर अविकार, सिद्ध समूह नमूँ सुखकार ॥ ११ ॥
ॐ ह्रीं अमरगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। गुण-गुण प्रति है भेद अनन्त, यों अथाह गुणयुत भगवन्त ।
है परमाण-अगोचर तेह, अप्रमेय गुण वंदूँ एह ॥ १२ ॥
ॐ ह्रीं अप्रमेयगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (भुजंगप्रयात : तर्ज – नसे घातिया कर्म …)
अनुक्रम तें फर्श-वर्णादि जानो, किसी एक विशेष को किं प्रमानो। पराधीन आवर्ण अज्ञान त्यागी, नमूँ सिद्ध अत्यन्द्रिय ज्ञान भागी ॥ १३॥ ॐ ह्रीं अक्षोत्सव-अतीन्द्रियज्ञानधारक-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। त्रिधा वेद भावित महाकष्ट कारे, रमणभाव सों आकुलित जीव सारे।
निजानन्द रमणीय शिवनार स्वामी, नमों पुरुष आकृत सबै सिद्धनामी ॥ १४॥ ॐ ह्रीं अवेदगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। विशेषं सकल चेतनाधार माहीं, भये लय भली विध रहो भेद नाहीं।
तथा हीन अधिकाय को भाव टारी, नमों सिद्ध पूरण कला ज्ञानधारी ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं अभेदगुण-समन्वित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। निजानन्द रस-स्वाद में लीन अन्ता, मगन हो रहै रागवर्जित निरन्ता । कहाँ लों कहूँ आपको पार नाहीं, धरो आपको आप ही आप माहीं ॥ १६ ॥ ॐ ह्रीं अविलीन-निजाधीन-जिन-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। ।। अथ आरती (जयमाल) ।।१
(दोहा : आनन्द अपार है, भक्ति बेकरार है …)
पंच परम परमातमा, रहित करम के फन्द।
जगत-प्रपंच रहित सदा, नमों सिद्ध आनन्द ॥
(त्रोटक : केवल रवि किरणों से जिसका …)
दुख-कारन द्वेष-विडारन हो, वश-डारन राग-निवारन हो।
भवितारन पूरण कारण हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ १ ॥
१. यहाँ नकुड़ प्रति में ‘अथ जयमाल’ के स्थान पर ‘अथ आरती’ पद का प्रयोग है। श्री सिद्धचक्र विधान
समयामृत पूरित देव सही, पर आकृति मूरत लेश नहीं। विपरीत विभाव निवारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ २ २ ॥ अखिना अभिना अछिना सुपरा, अभिदा अखिदा अविनाशवरा। यम-जाम-जरा दुखजारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ३ ॥ निर-आश्रित स्वाश्रित वासित हो, परकाशित खेद विनाशित हो । विधि धारन-हारन-पारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ४॥ अमुधा अछुधा अद्विधा अविधं, अकुधा सुसुधा सुबुधा सुसिधं । विधि पारन-जारन-हारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ५ ॥ शरनं चरनं मरनं वरनं, करनं धरनं डरनं हरनं ।
तरनं भव-वारिधि तारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ६ ॥ भववास पराश विनाशन हो, दुखराश विनाश हुताशन हो। निज-दासन त्रास-निवारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ७॥ तुम ध्यावत शाश्वत व्याधि दहै, तुम पूजत ही पद पूज लहै। शरणागत ‘सन्त’ उभारन हो, सब सिद्ध नमों सुखसारन हो ॥ ८ ॥ ॐ ह्रीं अनन्तदर्शनज्ञानादिषोडशगुणयुक्ताय सिद्धपरमेष्ठिभ्यो महार्घ्य नि. । (दोहा : तर्ज - आओ जिनमन्दिर में आओ …)
सिद्ध-वर्ग-गुण अगम हैं, शेष न पावैं पार।
हम किहविध कहें इम करौ, भक्तिभाव उर धार ॥
( इत्याशीर्वादः, पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
‘ॐ ह्रीं अर्ह असिआउसा सर्वशान्तिं कुरु कुरु स्वाहा’ - इस शान्ति-मन्त्र की प्रतिदिन सामूहिक एक जाप करें। ।। इति द्वितीय पूजा सम्पूर्णम् ।।
।। अथ तृतीय पूजन ।।
(बत्तीस गुण सहित)
।। स्थापना ।।
(छप्पय : तर्ज - प्रिय चैतन्यकुमार सदा …) ऊरध अधो सु रेफ, सबिंदु हकार विराजे ।
अकारादि स्वर-लिप्त, कर्णिका अन्त सु छाजे ॥
वर्गन-पूरित वसु-दल-अम्बुज तत्त्व-संधि धर।
अग्र भाग में मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ॥
पुनि अंत ह्रीं बेढ्यो परम, सुर ध्यावत ही अरि नाग को। है केहर सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (दोहा : तर्ज - आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग …) सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग।
सकल सिद्ध सो थापहुँ, मिटै उपद्रव योग ॥
( इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
।। अथाष्टकं ।।
(चाल : रे मन ! भज ले आतमराम …)
तुम पूजो रे भाई !।
सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ आंचली. ॥ भव-त्रासित आकुलित रहै भवि, कठिन मिटन दुखताई। विमल चरण तुम सलिल धार दे, पायो सहज उपाई ॥ तुम. ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, जन्म- जरा-मृत्यु-रोग-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
जगवन्दन परसत पद चन्दन, महाभाग उपजाई।
हरि हर आदि लोकवर उत्तम, कर धर शीश चढ़ाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
शिव-नायक पूजन-लायक मैं, यह महिमा अधिकाई।
अक्षय-पद-दायक अक्षत यह, साँचो नाम धराई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अक्षय-पदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
आप श्राप कर पुष्प-चाप-धर, मम उर सर न उठाई।
यह निश्चय कर पुष्प भेंट धरि, मांगूँ वर शिवराई ॥१
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
चरु वर प्रचुर क्षुधा नहीं मेटे, पूरि परौ इन ताई।
भेंट करत तुम इनहूँ न भेटूं, रहुँ चिरकाल अघाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दिव्य रतन इस देश काल में, कहैं कौन है नाहीं ?।
तुम पद भेंटे दीप प्रगट यह, चिंतामणि पद पाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप हुताशन वासन में धर, दस दिश वास वसाई।
तुम पद पूजत या विधि वसुविध, ईन्धन जर हो छाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ७॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
१. आपके श्राप से कामदेव ने मेरे हृदय में स्थान प्राप्त नहीं किया है। (पाट - नकुड़प्रति) तृतीय पूजन
सर्वोत्तम फल द्रव्य ठान मन, पूजूँ हूँ तुम पाई।
जासौं जजैं मुक्तिपद पइये, सर्वोत्तम फलदाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ८ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
वसुविध अर्घ्य देहूँ तुम मम द्यो, वसुविध गुण सुखदाई। जास पाय वसु त्रास न पाऊँ, ‘सन्त’ कहे हर्षाई ॥
तुम पूजो रे भाई ! सिद्धचक्र बतीस गुण, तुम पूजो रे भाई ! ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अनर्घ्य-पद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(गीता : तर्ज - प्रभु पतित पावन मैं अपावन …)
निर्मल सलिल शुभवास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी ।
शुभ पुष्प मधुकर नित रमें चरु, प्रचुर स्वाद सुविध घनी॥ वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले ।
कर अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्म-दल सब दलमले ॥ १ ॥
ते क्रमवर्त नशाय युगपत्, ज्ञान निर्मलरूप है ।
दुख जन्म टार अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप है॥
कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिवकमलापती ।
मुनि ध्येय-सेय-अभेय चहुँ गुण गेह द्यो हम शुभमती ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं सिद्धाणं, द्वात्रिंशत्गुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो सर्व-सुख-प्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
।। अथ सिद्धों के बत्तीस गुण सम्बन्धी अर्घ्य ।।
(पद्धरि : तर्ज - जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …)
चेतन विभाव पुद्गल विकार, है शुद्ध बुद्ध तिस निमित टार । दृग-बोध रूप स्वभाव एह, नमुँ शुद्ध चेतना सिद्ध देह ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धचेतनाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। मति आदि भेद विवछेद कीन, क्षायक विशुद्ध निजभाव लीन । निरपेक्ष निरन्तर निर्विकार, नमुँ शुद्ध ज्ञानमय सिद्ध सार ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धज्ञानाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
तृतीय पूजा
सर्वांग चेतना व्याप्तरूप, तुम हो चेतन व्यापक स्वरूप।
पर लेश न निज परदेश मांह, नमुँ शुद्ध सिद्ध चिद्रूप ताह ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धचिद्रूपाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। अन्तर विधि उदय विपाक टार, तुम जातिभेद बाहिज विडार ।
निज परिणति में नहिं लेश शेष, नमुँ सिद्धस्वरूपी गुण-विशेष ॥ ४॥ ॐ ह्रीं शुद्धस्वरूपाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। रागादिक परिणति को विध्वंस, आकुलित भाव राखो न अंश।
पायो निज शुद्ध स्वरूप भाव, नमुँ सिद्ध-वर्ग-धर हिये चाव ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धस्वरूपभावाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (दोहा : तर्ज - आओ जिन-मन्दिर में आओ …)
तिहूँ काल में ना डिगें, रहैं निजानन्द थान।
नमूं शुद्ध दृढ़ गुण सहित, सिद्धराज भगवान ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं शुद्ध-दृढाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। निज आवर्तक में वसे, नित ज्यों जलधि कलोल ।
नमूं शुद्ध आवर्तकी, करि निज हिये अडोल ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं शुद्ध-आवर्तकाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। परकृत करि उपजो नहीं, ज्ञानादिक निजभाव।
नमूँ सिद्ध निज अमलपद, पायो सहज सुभाव ॥ ८ ॥
ॐ ह्रीं शुद्ध-स्वयंभुवे श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (पद्धरि : तर्ज - ऐसे मिथ्या दृग-ज्ञान-चरण …)
स्व-सिद्ध अनन्त-चतुष्ट पाय, स्व-शुद्ध-चेतना-पुंज काय ।
स्व-शुद्ध सबै पायो संयोग, तुम सिद्धराज स्व-शुद्ध-योग ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धयोगाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। एकेन्द्रिय आदिक जातिभेद, हीनाधिक नाम प्रकृति छेद।
संपूरण लब्धि विशुद्धि जात, हम पूजै हैं पद जोड़ हाथ ॥ १०॥ ॐ ह्रीं शुद्धजाताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (दोहा : तर्ज - भूतकाल प्रभु आपका …)
महातेज आनन्दघन, महातेज परताप।
नमों सिद्ध निजगुण सहित, दिपै अनूपम आप ॥ ११॥
ॐ ह्रीं शुद्धतपसे श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (पद्धरि : तर्ज - जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …)
वर्णादिक को अधिकार नाहिं, संस्थान आदि आकार नाहिं ।
अति-तेज-पिण्ड चेतन अखण्ड, नमूँ शुद्ध मूर्ती कर्मखण्ड ॥ १२ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धमूर्तये श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। बाहिज पदार्थ को इष्ट मान, नहिं रमत तास सों ममत ठान ।
निज अनुभवरस में सदालीन, तुम शुद्धसुखी हम नमन कीन ॥ १३॥
ॐ ह्रीं शुद्धसुखाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (दोहा : तर्ज - इह विधि ठाड़ो होय के …)
धर्म अर्थ अरु काम बिन, अन्तिम पौरुष साध।
भये शुद्ध पुरुषारथी, नमूँ सिद्ध निरबाध ॥ १४॥
ॐ ह्रीं शुद्धपौरुषाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (पद्धरि : तर्ज - ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञान-चरण…)
पुद्गल निर्मापित वर्णयुक्त, विधि नामरचित तासों विमुक्त । पुरुषाकृत चेतनमय प्रदेश, ते शुद्ध शरीर नमूँ हमेश ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धशरीराय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (दोहा : तर्ज - कर लो जिनवर का गुणगान …)
पूरण केवलज्ञान-गम, तुम स्वरूप निर्बाध।
और ज्ञान जाने नहीं, नमूँ सिद्ध तज आध ॥ १६ ॥
ॐ ह्रीं शुद्धप्रमेयाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। दरशन-ज्ञान सुभेद हैं, चेतन लक्षण योग।
पूरण भई विशुद्धता, नमूँ शुद्ध-उपयोग ॥ १७॥
ॐ ह्रीं शुद्धोपयोगाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (पद्धरि : तर्ज - जब जन्म हुआ तीर्थंकर का …)
परद्रव्य जनित भोगोपभोग, ते खेदरूप प्रत्यक्ष योग।
निजरस-स्वादन है भोग सार, सो भोगो तुम हम नमस्कार ॥ १८ ॥
ॐ ह्रीं शुद्धभोगाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (दोहा : तर्ज – जिनवर दरबार तुम्हारा …)
निर्ममत्व युगपद लखो, तुम सब लोकालोक ।
शुद्ध ज्ञान तुमको लखे, नमूँ शुद्ध अवलोक ॥ १९॥
ॐ ह्रीं शुद्धावलोकाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
(पद्धरि : तर्ज - ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञान-चरण…)
निर-इच्छक मन वेदी महान, प्रज्वलित अग्नि है शुक्लध्यान । निर्भद अर्घ दे मुनि महान, तुम पूजत अर्हज्जात जान ॥ २० ॥ ॐ ह्रीं अर्हज्जाताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य.. । (दोहा : तर्ज - म्हारे आंगणे में आये जिनराज …)
आदि अन्त वर्जित महा, शुद्ध इष्ट की जात।
स्वयं सिद्ध परमात्मा, प्रणमूँ शुद्ध निपात ॥ २१ ॥
ॐ ह्रीं शुद्धनिपाताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। लोकालोक अनन्तवें - भाग वसो तुम आन ।
पै तुमसों अति भिन्न है, शुद्ध गर्भ यह जान ॥ २२ ॥
ॐ ह्रीं शुद्धगर्भाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। लोकशिखर शुभ थान में, तथा निजातम वास ।
शुद्ध वास परमात्मा, नमूँ सुगुण की रास ॥ २३॥
ॐ ह्रीं शुद्धवासाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। अति विशुद्ध निज धर्म में, वसत नशत सब खेद।
परम वास नम सिद्ध को, वासी वास अभेद ॥ २४॥
ॐ ह्रीं विशुद्धपरमवासाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। बहिरंतर द्वै-विध रहित, परमातम पद पाय।
निर्विकार परमातमा, नमूँ नमूँ सुखदाय ॥ २५ ॥
ॐ ह्रीं शुद्धपरमात्मने श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। हीन-अधिक इक देश को, विकल विभाव उछेद ।
शुद्ध अनन्त दशा लई, नमूँ सिद्ध निर्भेद ॥ २६ ॥
ॐ ह्रीं शुद्ध-अनन्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। (त्रोटक : आया कहाँ से कहाँ है जाना…)
तुम राग-विरोध विनाश कियो, निज ज्ञान-सुधारस स्वाद लियो। तुम पूरण शांत विशुद्ध धरो, हमको इकदेश विशुद्ध करो ॥ २७॥ ॐ ह्रीं शुद्धशान्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। १. ॐ ह्रीं प्रज्वलित-शुक्लध्यानाग्नि-जिनार्हज्जाताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य.. । - पूर्व मुद्रित प्रति पाठ
२. दृष्ट - नकुड़ प्रति / इष्ट - जयपुर प्रति
तृतीय पूजन
विद पंडित नाम कहावत है, विद अन्त जु अन्त हि पावत है। निजज्ञान प्रकाश सु अन्त लहो, कछु अंश न जानन माहिं रहो ॥ २८ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धविदन्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। वरणादिक भेद-विडारन हो, परिणाम कषाय-निवारन हो।
मन इन्द्रिय ज्ञान न पावत ही, अति शुद्ध निरूपम ज्योतिमयी ॥ २९॥ ॐ ह्रीं शुद्धनिरूपमाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। जन्मादिक व्याधि न फेर धरो, मरणादिक आपद नाहिं वरो।
निर्वाण महान विशुद्ध अहो ! जिनशासन में परसिद्ध कहो ॥ ३० ॥ ॐ ह्रीं शुद्धनिर्वाणाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। करि अन्त न गर्भ लियो फिरकै, जनमे शिववास जनम धरकै । जिनको फिर गर्भ न हो कबहूँ, शिवराय कहाय नमूँ अबहूँ ॥ ३१ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धसन्दर्भगर्भाय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। जग-जीवन पाप-नशायक हो, तुम आप महा सुखनायक हो।
तुम मंगल मूरत शान्त सही, सब पाप नशें तुम पूजत ही ॥ ३२ ॥ ॐ ह्रीं शुद्धशान्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नमः, अर्घ्य निर्वपा. स्वाहा। ।। अथ आरती (जयमाल) ।।
(दोहा : तर्ज - रोम रोम से निकले जिनवर …)
पंच परम पद ईश हैं, पंचमगति जग-शीश।
जगत-प्रपंच रहित बसैं, नमों सिद्ध जग-ईश ॥ १ ॥
परम ब्रह्म परमातमा, परम ज्योति शिवथान।
परमातम पद पाइयो, नमूँ सिद्ध भगवान ॥ २ ॥१
(कामिनी मोहन : नीर-गन्ध-अक्षतान् …)
जय मरण कष्ट को टार अमरा भये,
जय जनम-व्याधि परिहार अजरा भये ।
जय दुविध कर्ममल जार अमला भये,
जय दुविधि टार संसार अचला भये ॥ १ ॥
जय जगत-वास तज जगत-स्वामी भये,
जय विनाश नाम थित परम नामी भये।
१. यह दोहा नकुड़ प्रति में नहीं है, अन्यत्र हस्तलिखित एवं प्रकाशित प्रतियों में है। श्री सिद्धचक्र विधान
जय कुविध रूप तज सुविध रूपा भये,
जय निषध दोष तज सुगुण भूपा भये ॥ २ ॥
कर्मरिपु नाश कर परम जय पाइयो,
लोक-त्रय-पूर तुम सुजस घन छाइयो ।
इन्द्र-नागेन्द्र धर शीश तुम पद जजें,
महा वैराग रस पाग मुनिगण भजें ॥ ३॥
विघन वन दहन दौ अघन घन पौन हो,
सघन गुण-रास के वास को भौन हो।
शिवतिय-वशिकरन मोहनी मंत्र हो,
काल-क्षयकार बैताल के यंत्र हो ॥४॥
कोट थित क्लेश की पोट धर सिर बहौ, १
उपल की नकल हो अचल इक थल रहो।
स्वप्न में हू न निज अर्थ को पावहीं,
जे महाखल न तुम ध्यान धरि ध्यावहीं ॥ ५ ॥ आपके जाप बिन पाप सब भेंटहीं,
पाप के ताप को पाप कब मेंटहीं।
‘सन्त’ निज दास की आस पूरी करो,
जगत से काढ निज चरण में ले धरो ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, द्वा-त्रिंशत्गुण-युक्त-श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अनर्घ्य-पद-प्राप्तये जयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (धत्ता : तर्ज - वसु द्रव्य संवारी …) जय अमल अनूपं, शुद्ध स्वरूपं, निखिल निरूपं, धर्म धरा। जय विघन-नशायक, मंगलदायक, तिहुँ जगनायक, परमपरा ॥ ( इत्याशीर्वादः, पुष्पांजलिं क्षिपेत् ) ‘ॐ ह्रीं अर्ह असिआउसा सर्वशान्तिं कुरु कुरु स्वाहा’ - इस शान्ति-मन्त्र की प्रतिदिन सामूहिक एक जाप करें। ।। इति तृतीय पूजा सम्पूर्णम् ।।
१. अर्थात् संसारी जीव, संसाररूपी कोट में स्थित रहकर कष्टों की पोटली अपने सिर पर (यह पाठ – नकुड़ प्रति के आधार पर प्रकाशित है) धारण करते हैं।
।। अथ चतुर्थ पूजन ।।
(चौंसठ गुण सहित)
।। स्थापना ।।
(छप्पय : तर्ज - प्रिय चैतन्यकुमार सदा …) ऊरध अधो सु रेफ, सबिंदु हकार विराजे ।
अकारादि स्वर-लिप्त, कर्णिका अन्त सु छाजे ॥ वर्गन-पूरित वसु-दल-अम्बुज तत्त्व-संधि धर। अग्र भाग में मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ॥
पुनि अंत ह्रीं बेढ्यो परम, सुर ध्यावत ही अरि नाग को। द्वै केहर सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठि-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठि-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठि-गुणसंयुक्त-सिद्धचक्राधिपतयः सिद्धपरमेष्ठिनः ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (दोहा : तर्ज - आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग …) सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग। सकल सिद्ध सो थापहुँ, मिटै उपद्रव योग ॥
( इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् )
।। अथाष्टकं ।।
(चाल/लावनी : तर्ज - रे मन ! भज ले आतमराम …) सिद्धगण पूजो रे भाई ! ॥
त्रिभुवन उमा वास लख, तुम पद-अम्बुज के माई। निर्मल जल की धार देहु, अभिषेक करण ताई ॥ सिद्धगण पूजो रे भाई !।
चौंसठि सुगुण नामविध माला सुमरो सुखदाई ॥ आंचली ॥ श्री सिद्धचक्र विधान
चतुर्थ पूजन
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्त-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। तुम पद-अम्बुज वास लेन मनु, चन्दन मन भाई।
निज सो गुणाधिक्य-संगत, को लहै न हरषाई ! ॥
सिद्धगण पूजो रे भाई ! ।
चौंसठि सुगुण नामविध माला सुमरो सुखदाई ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। क्षीरज धान सुवासित नीरज, कर सों छरलाई।
अंगुल से तंदुल सों पूजत, अक्षय पद पाई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। धूलिसाल छवि हरण विवर्जित, फूलमाल लाई।
काम-शूल निर्मूल-करण, पूजूँ हूँ तुम पाई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। भूख-गार अक्षीण-रसी हू, पूरत है नांई।
चरु मात्र तुम पद पूजत हो, पूरन सिखराई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपन प्रति तुम पद पूजत, शिवमारग दरशाई।
घोर-अंध-संसार-हरण की, भली सूझ पाई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागर कर्पूर पूर-घट, अग्नि प्रजलाई ।
उडै धूम यह उडै किधौं, जर करमन की छाई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
१. यश / ख्याति / शान्ति
मधुर मनोग प्रासुक फल सों, पूजूँ शिवराई।
यथायोग विध फल को दे गुण, फल की अधिकाई ॥
सिद्धगण पूजो रे भाई ! ।
चौंसठि सुगुण नामविध माला सुमरो सुखदाई ॥
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। निरघ उपावन पावन वसुविध, अरघ हरष ठाई।
भेंट धरत तुम पद पाऊँ पद, निर-आकुलताई ॥ सिद्धगण. ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, अनर्घ्य-पद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (गीता : तर्ज - प्रभु पतित पावन मैं अपावन …) निर्मल सलिल शुभवास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी । शुभ पुष्प मधुकर नित रमें चरु, प्रचुर स्वाद सुविध घनी ॥ वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले ।
कर अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्म-दल सब दलमले ॥ १ ॥ ते क्रमवर्त नशाय युगपत्, ज्ञान निर्मलरूप है । दुख जन्म टार अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप है ॥ कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिवकमलापती । मुनि ध्येय-सेय-अभेय चहुँ गुण गेह द्यो हम शुभमती ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं, चतुःषष्ठिगुणसंयुक्तसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः, सर्व-सुख-प्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। ।। अथ सिद्धों के चौंसठ गुण सम्बन्धी अर्घ्य ।। (चाल : सुनिये जिन अर्ज हमारी …)
चव घाती कर्म नशायो, अरहंत परम पद पायो।
द्वै धर्म कहो सुखकारा, नमूँ सिद्ध भए अविकारा ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं अर्हन्त-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। संक्लेश भाव परिहारी, भए अमल अवधि-बलधारी।
सो अतिशय केवलज्ञाना, उपजाय लयो शिवथाना ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं अवधि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
निर्मल चारित्र संभारा, परमावधि पटल उघारा।
केवल पायो तिस कारण, नमूँ सिद्ध भये जग तारण ॥ ३॥
ॐ ह्रीं परमावधि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। वर्द्धमान विशद परनामी, सर्वावधि के हो स्वामी।
अन्तम वसुकर्म नसाया, नमूँ सिद्ध भये सुखदाया ॥ ४॥
ॐ ह्रीं सर्वावधि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। जिस अन्त अवधि को नाहीं, तुम उपजायो पद ताही।
निरमल अवधी गुणधारी, सब सिद्ध नमूँ सुखकारी ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं अनन्तावधि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। सामान्य-विशेष चौंसठ ऋद्धियों सम्बन्धी अर्घ्य
तप-बल-महिमा अधिकाई, धी कोष्ठ ऋद्धि उपजाई।
श्रुतज्ञान-कोष्ठ-भंडारी, नमूँ सिद्ध भये हितकारी ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं कोष्ठ-बुद्धि-ऋद्धि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। ज्यों बीज फले बहुरासी, त्यों छिन ही बहु अभ्यासी।
यह पावत ही योगीशा, भये सिद्ध नमूँ शिव-ईशा ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं बीज-बुद्धि-ऋद्धि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। पद मात्र समस्त चितारै, है ऋद्धि यह पद-अनुसारै।
यह पाय यतीश्वर ज्ञानी, भये सिद्ध नमूँ शिवथानी ॥ ८ ॥
ॐ ह्रीं पादानुसारिणी-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। जो भिन्न-भिन्न इक लारै, शब्दन सुन अर्थ विचारै।
यह ऋद्धि पाय सुखदाता, नमूँ सिद्ध भये जग-त्राता ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं संभिन्न-श्रोतृ-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। मति श्रुत अरु अवधि अनूपा, बिन गुरु के सहज स्वरूपा।
भयो स्वयंबुध निजज्ञानी, नमूँ सिद्ध भये सुखदानी ॥ १०॥ ॐ ह्रीं स्वयंबुद्धत्व-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। जो पाय न पर-उपदेशा, जाने तप-ज्ञान विशेषा।
प्रत्येकबुद्ध गुणधारी, भये सिद्ध नमूँ हितकारी ॥ ११ ॥ ॐ ह्रीं प्रत्येकबुद्ध-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। गणधर से समकित धारी, तुम दिव्यध्वनि अनुसारी।
ज्ञानिन सिरताज कहाये, भये सिद्ध सुजस हम गाये ॥ १२ ॥
ॐ ह्रीं बोधितबुद्ध-ऋद्धि-जिन-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। चतुर्थ पूजन
मन-योग सरलता धारे, तिस अन्तर भेद उघारे।
यों होय ऋजुमति ज्ञानी, नमूँ सिद्ध भये सुखदानी ॥ १३ ॥ ॐ ह्रीं ऋजुमति-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। बाँके मन की सब बाता, जानें सो विपुल कहाता।
तुम पाय भये शिवधामी, नमूँ सिद्धराज अभिरामी ॥ १४॥
ॐ ह्रीं विपुलमति-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। सुर विद्या को नहिं चाहैं, निज चारित्र विरद निवाहैं।
दस पूर्व ऋद्धि यह पायो, भये सिद्ध मुनिन गुण गायो ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं दशपूर्वित्व-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। चौदस पूरव श्रुतज्ञानी, जानें परोक्ष परमाणी।
प्रत्यक्ष लखो तिस सारू, भये सिद्ध हरो अघ म्हारू ॥ १६ ॥ ॐ ह्रीं चतुर्दशपूर्वित्व-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। (सुन्दरी : जय वीतराग विज्ञान पूर …)
ज्योतिषादिक लक्षण जानकै, शुभ अशुभ फल कहत बखानिकै ।
निमित ऋद्धि प्रभाव न अन्यथा, होय सिद्ध भये प्रणमूँ यथा ॥ १७॥ ॐ ह्रीं अष्टांग-निमित्त-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। बहुविध अणिमादिक ऋद्ध जू, तप-प्रभाव भई तिन सिद्ध जू।
निष्प्रयोजन निजपद लीन हैं, नमूँ सिद्ध भये स्वाधीन हैं ॥ १८ ॥ ॐ ह्रीं विक्रिया-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। भूम-जल-तंतु जिय ना हौं, नमूं ते मुनि शिवकामिनी वरें। नैक नहिं बाधा-परिहार हो, नमूँ सिद्ध सभी सुखकार हो ॥ १९ ॥ ॐ ह्रीं विद्याधरत्व-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। जंघ पर दो हाथ लगाव ही, अन्तरीक्ष पवनवत् जाव ही।
पाय ऋद्धि महामुनि चारणी, यथायोग्य विशुद्ध विहारणी ॥ २० ॥ ॐ ह्रीं चारणऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। खग समान चलें आकाश में, लीन नित निजधर्म प्रकाश में।
शुद्ध चारित कर निज सिद्धता, पाइयो हम नमन करें यथा ॥ २१ ॥ ॐ ह्रीं आकाशगामिनी-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। वाद विद्या फुरत प्रमाण में, वज्रसम परमत-गिर हान में। सब कुपक्षी दोष प्रगट करें, स्याद्वाद महा द्युति को धेरै ॥ २२ ॥ ॐ ह्रीं परामर्श-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
विषम जहर मिला भोजन करें, लेत ग्रास हि तिस शक्ति हरैं। ते महा मुनि जग सुखदाय जू, हम नमें तिन शिवपद पाय जू ॥ २३ ॥ ॐ ह्रीं आशीर्विष-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। जे महाविष अति परचण्ड हो, दृष्टि कर तिन कीने खण्ड हो। सो यतीश्वर कर्म विडारकै, भये सिद्ध नमूँ उर धारकै ॥ २४॥ ॐ ह्रीं दृष्टिविष-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। अनशनादिक नित प्रति साधना, मरणकाल तईं न विराधना ।
उग्र तप करि वसुविधि नासतैं, हम नमैं शिवलोक प्रकाशर्तें ॥ २५ ॥ ॐ ह्रीं उग्र-तप-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। बढ़त नित प्रति सहज प्रभावना, उग्र तप कर क्लेश न पावना। दिप्त तप करि कर्म जरायकैं, भये सिद्ध नमूँ सिर नायकैं ॥ २६ ॥ ॐ ह्रीं दीप्त-तप-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। अन्तराय भये उत्सव बढ़े, बाल चन्द्र समान कला चढ़े। वृद्ध तप की ऋद्धि लहै यती, भये सिद्ध नमत सुख हो अती ॥ २७ ॥ ॐ ह्रीं तपवृद्धि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। सिंहक्रीड़ित आदि विधान तें, नित बढ़ावत तप विधि मान तें। महामुनीश्वर तप परकास तें, नमूँ मुक्त भए जगवास तें ॥ २८ ॥ ॐ ह्रीं महातप-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। गिर शिखर ग्रीषम हिम सरतटै, तरु निकट पावस निजपद रटै। घोर परिषह करि नाहीं हटै, भये सिद्ध नमत हम दुख कटै ॥ २९ ॥ ॐ ह्रीं घोर-तप-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। महाभयंकर निमित मिलै जहाँ, निरविकार यती तिष्ठै तहाँ । महापराक्रम गुण की खान हैं, नमो सिद्ध जगत् सुखदान हैं ॥ ३० ॥ ॐ ह्रीं घोर-पराक्रम-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। सघन गुण की राश महायती, रत्नराश समान दिपै अती।
शेष-जिन वर्णन करि थक रहे, नमूँ सिद्ध महापद को लहे ॥ ३१ ॥ ॐ ह्रीं घोर-गुण-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। अतुल वीर्यधनी हन काम को, चलत मन न लखत सुरवाम को । बालब्रह्मचारी योगीश्वरा, नमूँ सिद्ध भए वसु विधि हरा ॥ ३२ ॥ ॐ ह्रीं ब्रह्मचर्य-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। १. हजार जिव्हा वाले शेष नाग
चतुर्थ पूजन
सकल रोग मिटै संस्पर्श तें, महा यतीश्वर के आमर्श तें। औषधी यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ॥ ३३॥ ॐ ह्रीं आमर्शोषधि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। मूत्र में अमृत अतिशय वसै, जा परस तै सब व्याधी नसै। औषधी यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ॥ ३४॥ ॐ ह्रीं मलौषधि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। तन पसीजत जलकण लगत ही, रोग-व्याधि सर्वजन भगत ही।
औषधी यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ॥ ३५ ॥ ॐ ह्रीं जलौषधि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। हस्त-पादादिक नख-केश में, सर्व औषध है सब देश में।
औषधी यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ॥ ३६ ॥ ॐ ह्रीं सर्वोषधि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। (अडिल्ल : आत्मा हूँ आत्मा हूँ आत्मा …)
मन-सम्बन्धी वीर्य बढ़े अतिशय महा,
एक महूरत अन्तर श्रुत-चितवन लहा।
मनोबली यह ऋद्ध भई सुखदाय जू,
भये सिद्ध सुखदाय जजूं तिन पाय जूं ॥ ३७॥
ॐ ह्रीं मनोबल-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। भिन्न-भिन्न अति शुद्ध उच्च स्वर उच्चरै,
एक महूरत अन्तर श्रुत-वर्णन करै ।
वचनबली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू ॥ भये… ॥ ३८ ॥
ॐ ह्रीं वचनबल-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। खड्गासन इक अंग मास छै मास लों,
अचल रूप थिर रहैं छिनक खेदित न हों।
कायबली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू ॥ भये… ॥ ३९॥
ॐ ह्रीं कायबल-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। अति अरस चरु क्षीर होय कर धरत ही,
वचन-खिरत पर-श्रवण तुष्टता करत ही।
क्षीरस्रवी यह ऋद्ध भई सुखदाय जू ॥ भये… ॥ ४० ॥
ॐ ह्रीं क्षीर-स्त्रावि-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। श्री सिद्धचक्र विधान
चतुर्थ पूजन
रूखे भोजन सें कर में घृतरस स्रवे,
वचन-सुनत पर को घृत सम स्वादित हवे ।
सप्पस्त्रवी यह ऋद्ध भई सुखदाय जू,
भये सिद्ध सुखदाय जजूं तिन पाय जूं ॥ ४१ ॥ ॐ ह्रीं सर्पि-स्रावी-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। हस्त-कमल में अन्न मधुर रस देत है,
मधुकर सम जिय वचन गंध को लेत है।
मधुस्त्रवी यह ऋद्ध भई सुखदाय जू ॥ भये…४२ ॥ ॐ ह्रीं मधुस्रावी-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। अमृतसम आहार होय कर आय कै,
वचनामृत दे सुख श्रवण में जाय कै ।
अमियरस यह ऋद्धि भई सुखदाय जू ॥ भये…४३ ॥ ॐ ह्रीं अमृतरस-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। जिस वासन जिस थान आहार करें यती,
चक्री-सेना खाय अखै होवे अती।
यह अक्षीणरसी ऋद्धि भई सुखदाय जू ॥ भये…४४ ॥ ॐ ह्रीं अक्षीणरस-ऋद्धि-ऋषि-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। सिद्धों के अन्य सामान्य-विशेष गुणों सम्बन्धी अर्घ्य (सोरठा : पावन हो गई आज ये धरती …)
सिद्धराशि सुखदाय, वर्धमान नित प्रति लसै। नमूं ताहि सिर नाय, वृद्ध रूप गुण अगम है ॥ ४५ ॥ ॐ ह्रीं वर्द्धमान-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। रागादिक परिणाम, अन्तर के अरि नाश कै।
लह अरहंत सु नाम, नमों सिद्धपद पाइया ॥ ४६ ॥ ॐ ह्रीं अर्हद-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। दो अन्तम गुणथान, भाव-सिद्ध इस लोक में।
तथा द्रव्य-शिव-थान, सर्व सिद्ध प्रणमूँ सदा ॥ ४७॥ ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व सिद्धाणं नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। शत्रु-व्याधि भय नाह, महावीर धीरज धनी।
नमूँ सिद्ध जिन ताह, संतन के भव-भय हरै ॥ ४८ ॥ ॐ ह्रीं भयवदो-महावीर-वह्नमाणं नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। क्षपकश्रेणि आरूढ़, निजभावी योगी तथा।
निश्चय दर्श अमूढ़, सिद्धयोग सब ही जजों ॥ ४९ ॥ ॐ ह्रीं योग-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। वीतराग परधान, ध्यान करें तिनको सदा।
सोई ध्येय महान, नमों सिद्ध हम अघ हरो ॥ ५० ॥ ॐ ह्रीं ध्येय-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। लोकशिखर शिवथान, अचल विराजित सिद्धजिन ।
लोकवास सर्वान, भए सिद्ध प्रणमूँ सदा ॥ ५१ ॥ ॐ ह्रीं सर्व-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। औरन करत कल्यान, आप सर्व कल्यानमय ।
सोई सिद्ध महान, मंगल-हेतु नमूँ सदा ॥ ५२ ॥ ॐ ह्रीं स्वस्ति-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। तीन लोक के पूज, सर्वोत्तम सुखदाय हैं।
जिन-सम और न दूज, तिन पद पूजों भाव युत ॥ ५३ ॥ ॐ ह्रीं अर्ह सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा। लोकोत्तम परधान, तिन पद पूजत हैं सदा।
तातैं सिद्ध महान, सर्व पूज्य के पूजनीय ॥ ५४ ॥ ॐ ह्रीं अर्ह सिद्ध-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। परम धरम निज साध, परमातम पद पाइयो।
सोई धर्म अबाध, पूजत हैं हम दीजियो ॥ ५५ ॥ ॐ ह्रीं परमात्म-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। सर्व ऋद्ध नव निद्ध, सिद्ध भये नहिं सिद्ध हो। निजपद साधन सिद्ध, होत सही तिनको नमों ॥ ५६ ॥ ॐ ह्रीं परम-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। परमागम की शाख, परम अगम गुणगण सहित ।
सोई मन में राख, सरधा युत पूजा करों ॥ ५७ ॥ ॐ ह्रीं परमागम-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्य नि. स्वाहा। गुण अनंत परकाश, महा विभवमय लसत हैं।
आवर्णित पद नाश, ते पूजूं प्रणमूँ सदा ॥ ५८ ॥ ॐ ह्रीं प्रकाशमान-सिद्धेभ्यो नमः, अर्घ्यं नि. स्वाहा।
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 509.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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