श्री सिद्ध पूजन (पं. राजेन्द्र कुमार जैन) | Shri Siddh Pujan (Pt. Rajendra Kumar Jain)

सिद्ध पूजन
(सोरठा)
सिद्ध अनन्तानंत, अविनाशी आनंदमय ।
जयवन्तो भगवन्त, सर्व सिद्धि दाता नमन ।।
(दोहा)
सिद्धालय शाश्वत बसो, त्रिभुवनपति जग शीर्ष ।
हृदय विराजो हे प्रभो, जयवंतो जगदीश ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्ध परमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सिद्ध परमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सिद्ध परमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(भुजंगप्रयात)
निजातम की महिमामयी भावना से,
अचल ध्रुव अनूपम गति तुमने पायी।
त्रिभुवन तिलक शीर्ष चूड़ामणि प्रभु,
तुम्ही एक आदर्श शिवपथ सहाई ।।
ये संसार-सागर महा दुःख का घर ।
कहीं एक पल भी न सुख शांति पाया ॥
जयवन्तवर्ते प्रभो जैन शासन ।
महाभाग्य से प्रभु शरण तेरी आया ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
जिनागम की महिमा कभी भी न भायी ।
निजातम का वैभव कभी न सुहाया ।।
अध्यात्म की लोरियाँ भी सुनी ना ।
इसी से भवाताप में दुक्ख पाया ।।
महाशान्त-रस से लबालब भरा जो ।

दिखाया महा ज्ञान- सागर हमारा ।।
जयवन्तवर्ते प्रभो जैन शासन ।
महा भाग्य से प्रभु शरण तेरी आया ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारताप विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा
अक्षत हो प्रभुवर तुम्ही नाथ जग में ।
शरणागतों को भी अक्षय बनाते ।।
सहे कष्ट पांचों परावर्तनों के ।
तुम्ही नाथ भव-भव भ्रमण से बचाते ।।
ये संसार बिजली की आभा सा अस्थिर ।
है ध्रुवधाम आनंद मंदिर दिखाया ।।
जयवन्तवर्ते प्रभो जैन शासन ।
महाभाग्य से प्रभु शरण तेरी आया ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
अहो वीतरागी परम शांत जिनवर ।
विषय वासना पर विजय तुमने पायी ।।
ये संसार सागर तो जल क्षार सम ही ।
कभी तृप्ती हुई है न होगी कदापि ।।
‘सुदर्शन’ सा पालूं प्रभो शील संयम ।
‘सुमेरू’ डिगे पर न मैं मन डिगाऊँ ।।
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
सिद्धों की शरणों में जीवन सजाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
समता के सागर तुम्ही हो जिनेश्वर ।
परम तृप्ती तुमने स्वयं से ही पायी ।।
क्षुधाव्याधि से मुक्ति पाई सदा को ।
शरण आपकी ही मुझे भी सुहाई ।।

जगे भूख ऐसी निजातम की भगवन ।
लगे प्यास परमात्म रस की सदा ही ।।
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
सिद्धों की शरणा महाभाग्य पायी ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निजातम की महिमामयी ज्ञान-ज्योति ।
यही मोह मिथ्यात्व भ्रम तम निवारे ।।
यही आत्म ख्याति प्रकाशे हे भगवन ।
सहज ज्ञानमय हूँ यही मात्र भासे ।।
“तुष मास भिन्नं” का कर भाव भासन ।
“शिवभूति” मुनिवर जी शिवपुर सिधाये ॥
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
सिद्धों की शरणा महाभाग्य पाये ।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा
प्रभो वीतरागी सुगंधी से सुरभित ।
प्रासाद सुन्दर है शोभित तुम्हारा ।।
हराया करम शत्रु को, दुर्ग जयकर ।
बजे यश का डंका, सदा ही तुम्हारा ।।
धरुँ ध्यान आतम का मैं भी प्रभूजी ।
यही ज्ञान वैराग्य सौरभ जगाये ॥
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
सिद्धों की शरणा महा भाग्य पाये ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
सहज सिद्ध हो प्रभु स्वयं बुद्ध हो तुम ।
सरस शांत रस में सदा मग्न रहते ।।
चैतन्य तरू पर फलें मुक्ति के फल ।

इन्हीं भक्ति भावों से पूजन हैं करते ।।
शुभाशुभ के फल में फली चार गतियाँ ।
मिला स्वर्ग भी पर न सुख शांति पाये ।।
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
सिद्धों की शरणा महा भाग्य पाये ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सजाऊँ प्रभो अर्घ्य आठों दरब ले ।
सहज भक्ति भावों से पूजन करूँगा ।।
न लौटूंगा संसार में अब कभी भी ।
सहज ज्ञान आनंद में नित रमूँगा ।।
महाशान्त-रस से लबालब भरा जो ।
दिखाया महा ज्ञानसागर हमारा ।।
जयवन्त वर्ते प्रभो जैन शासन ।
जजूँ अर्घ्य लेकर प्रभु पद तुम्हारा ।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
(दोहा)
स्वयं सिद्ध शुद्धात्मा - साध हुये भगवन्त ।
प्रभु सम प्रभुता अनुभवँ, पाऊँ भव का अन्त ।।
(रोला)
जयवन्तो भगवन्त सिद्ध आदर्श हमारे ।
जयवन्तो भगवन्त सर्व जग जानन हारे ।।
जयवन्तो भगवन्त अचल अनुपम गति पायी ।
जयवन्तो भगवंत आत्म निधि हमें दिखाई ।।
तीन काल के सब सिद्धों को नमन हमारा ।
मात्र नाम ही धन्य भविक को तारणहारा ।।

सम्यक् दर्शन ज्ञान चरित, वीरज प्रगटाया ।
अगुरुलघु अवगाहन सूक्षम श्री जिनराया ॥
अव्यावाध परम आनंदमय परणति जागी ।
जयवन्तो भगवन्त पूजते शत इन्द्रादि ॥
स्वयं सिद्ध परमातम ध्याकर सिद्ध हो गये ।
कर्म कलंक समूल नष्टकर मुक्त हो गये ।।
तीन लोक के मुकुट तुम्हीं हो हे सिद्धेश्वर ।
निजानंद रसलीन तदपि हो त्रिभुवन ईश्वर ॥
पंचपरावर्तन में प्रभु अनंत दुख पाया ।
कोई संगी साथी नहीं बचाने आया ।।
पूजन करते नाथ हृदय हर्षित अति भारी ।
यही भावना ऐसी दशा होय कब म्हारी ।।
सिद्ध प्रभू के वंदन से निर्मलता आती ।
भव संतति खिरने लगती खुशियाँ भर जाती ।।
सहज स्वानुभवगम्य कौन तुमरे गुणगावे ।
वचनातीत स्वरूप वचन में कैसे आवे ।।
विषय कषायों में परिणति अब कभी न जावे ।
सतत स्वानुभवमय जीवन हो कब दिन आवे ॥
निर्मोही हो नाथ आप सम समता पाऊँ ।
आप - आप में लीन रहूँ अपने घर जाऊँ ।॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद प्राप्तये जयमाला अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
सिद्ध प्रभु की वंदना, हरती भव दुख क्लेश ।
स्वयं सिद्ध की साधना, यही सिद्ध संदेश ॥
।। पुष्पाजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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