श्री सिद्ध क्षेत्र गजपंथा पूजन
(चांद्रायण)
गजपंथा में महामुनीश्वर जो भये ।
रत्नत्रय का पंथ धार शिवपुर गये ।।
धन्य हुई बलभद्र मुनिन की साधना ।
आठ कोड़ि मुनिवृंदों की आराधना ।।
अगणित मुनिवर चरण पड़े इस भूमि पर ।
यहीं ध्यान में रमते होंगे ऋद्धिधर ।।
कण-कण पावन गजपंथा गिरिराज का ।
सम श्रेणी में आप विराजें शाश्वता ।।
हे प्रभो ! मेरे हृदय-कमल में आईये ।
भव-सागर से हमको पार लगाइये ।।
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल नंदी नंदीमित्र सुप्रभ सुधर्म सुदर्शन सप्त बलभद्र आदि आठ
करोड़ मुनिवराः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् । परिपुष्पांजलिं क्षिपामि ।
(मानव)
चेतन-स्वरूप समझे बिन, प्रभु अगणित कष्ट उठाये ।
चारों गतियों में भटके, जन्मादि मरण दुख पाये ॥
अन्र्तमुख छवी निहारूँ, अर अन्तर्मुख हो जाऊँ ।
अपनी प्रभुता अपने में, लख सहज शांति पा जाऊँ ।।
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ।
मुनि आठ कोटि पद वन्दूँ, बलभद्र नमूँ सुखकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल बलभद्र आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अद्भुत छवि आज निहारी, मम रोम-रोम पुलकित है।
धनि धन्य घड़ी हुई मेरी, चिंतामणि पा हर्षित है ।।
विषयों की तपन बुझाने, बस आत्म ज्ञान ही चंदन ।
समता के सागर जिनवर, जयवन्ते यह जिन शासन ।।
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ।।मुनि।।
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल बलभद्र आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो चंदन निर्वपामीति स्वाहा।
इन्द्रादिक पद भी अस्थिर, कहीं शांति नही है तिल भर।
बस ज्ञान मात्र अवलोकन, ही देता आनंद झर-झर ॥
निज भाव सदा ही निर्मल, मुनि वृंद मगन मन रहते ।
अक्षय-स्वभाव पाने को, अक्षत-स्वभाव अनुभवते ।।
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ॥ मुनि।।
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु शील स्वभाव निरखते, रतिपति भी तुमसे हारा ।
निज में विहार नित करते, बहती आनंद की धारा ॥
विषयों की भीषण ज्वाला, प्रभु तुम्हें नहीं छू पाती ।
वह कला मुझे भी दे दो, हे ब्रह्मलीन शिववासी ।।
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ।। मुनि।।
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु चपल इन्द्रियों पर जय, पाकर तृप्ति है पायी ।
हो निजानंद रसस्वादी, यह क्षुधाव्याधि विनशाई ॥
विषयों की तृष्णा से प्रभु, नहीं तृप्ति कभी भी आती ।
बस अनाहारी प्रभु निरखूँ, अनुभूति ही शांति दिलाती ।।
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ॥ मुनि।।
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जितने भी सिद्ध हुये हैं, अर जो भविष्य में होगें ।
सिद्धत्व भाव अंतर लख, निज बल से सिद्ध हुये है ॥
लाखों दीपक जल जावें, अज्ञान-तिमिर नहिं जाताः ।
क्षणभर का आतम अनुभव, प्रभु मोक्षमार्ग दर्शाता ॥
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ॥ मुनि॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु सिद्धचक्र में शामिल, होने की युक्ति बतायी ।
मैं स्वयं सिद्ध प्रभु सम हूँ, मुक्ती की रीति सिखाई ॥
चैतन्य-भान बिन कितने, ही बार समाधि लगाई ।
हे ऋषिवर आतम की धुन, बस तेरे निकट ही आई ॥
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ।
मुनि आठ कोटि पद वन्दूँ, बलभद्र नमूँ सुखकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
स्वर्गादि विभूति न चाहूँ, विषयों में नांहि लुभाऊँ।
बस ज्ञान - ज्ञान ही भासे, चित कहीं नहीं भरमाऊँ ॥
चैतन्य भाव भासन हो, मैं शरण आपकी आया ।
अपनी निधि पाने भगवन, फल तुम्हें चढ़ाने लाया ॥
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ॥मुनि॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जल चंदनादि द्रव्यों से, प्रमुदित हो अर्घ्य बनाया ।
भवभय के भेदन हारे, भगवान आपको पाया ॥
इन्द्रादिक दास तुम्हारे, लौकांतिक गीत गुंजाते ।
शुद्धात्म सुधारस पीने, अब आया शरण तुम्हारे ॥
गजपंथा सिद्धाचल जी, निर्वाण भूमि अति प्यारी ॥ मुनि ॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(सखी)
गजपंथा तीरथ पावन, सिद्धालय नमन हमारा ।
अतिशयमय भूमि यही है, जहाँ हुआ सन्त उजियारा ॥
वैरागी सन्त मुनीश्वर, कभी इसी भूमि आये थे ।
संसार असार समझकर, निज समयसार पाये थे ॥
बलभद्र आदि मुनियों ने, यहीं आतम ध्यान लगाया ।
कैवल्य-कला अपनायी, निर्वाण यहीं से पाया ॥
बलभद्र सुदर्शन सुप्रभ नंदि, नंदिमित्र मुनि आये ।
श्री विजय अचल सुधर्म, भगवंत मुक्ति-श्री पाये ॥
अहो ! आठ कोटि मुनियों ने, यहीं सिद्ध दशा अपनायी ।
अशरीरी ज्ञानशरीरी, सिद्धों की भक्ति सुहायी ॥
पर्वत के तले तलहटी, यहीं पार्श्व प्रभु के दर्शन ।
अन्तरिक्ष विराजे भगवन, मानो हम आये मधुवन ॥
नेमीश्वर जिनवर प्रतिमा, अति ही विशाल मनहारी ।
मानो गिरनार शिखर ही, आया है अतिशयकारी ॥
यहीं अति सुंदर जिनमंदिर, सीमंधर बीस जिनेश्वर ।
अति भावमयी प्रतिमा हैं, जयवन्ते धर्म यतीश्वर ॥
शासन नायक सन्मति प्रभु, चौबीसी सहित विराजे ।
जिनदर्शन कर निजदर्शन, कर लो भविजन बतलाते ॥
प्रभु भूत भविष्यत की भी, चौबीसी सौम्य निराली ।
भक्ति भावों से निरखो, बन जाओ वैभवशाली ॥
सातों बलभद्र शिखर पर, खडगासन प्रभु पधराये ।
अति धवल मनोज्ञ जिनेन्द्र, महाभाग्य जो दर्शन पाये ॥
यहीं सिद्ध शिला है सिर पर, सिद्धों की सभा विराजी ।
जब काल लब्धि आ जाती, तब सिद्ध दशा भा जाती ॥
तुम ही हो अन्तर्यामी, तुम ही हो सबके स्वामी ।
तुम ही करूणा सागर हो, निस्पृह हो तुम जगनामी ॥
तुम ही सर्वज्ञ जिनेश्वर, तुम वीतराग परमेश्वर ।
रवि - शशि से तुम बढ़कर हो, शिवपथदर्शी सत् दिनकर ।।
प्रभु गुण अनन्त है तेरे, कवि कह न सके है सीमा ।
सुरगुरू भी कह नहि पाये, तेरी अनंत है महिमा ॥
प्रभु भक्तिभाव से आये, जयंवते श्री जिन शासन. ।
हम चलें सत्य शिवपथ पर, गजपंथा तीरथ वंदन ॥
ॐ ह्रीं श्री विजय अचल आदि आठ करोड़ मुनिवरेभ्यो जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
गजपंथाजी तीर्थ शुभ, वंदूँ धर नित ध्यान ।
सिद्ध प्रभु की भक्ति से, पाऊँ पद निर्वाण ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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