श्री षट्खण्डागम पूजन
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स्थापना
(दोहा)
वीर प्रभु गौतम गुरु को कर जोरि प्रणाम ।
द्वादशांग श्रुत प्रकट हो वर्ते ऐसा ज्ञान ॥
भाव सहित पूजा करूँ, षट्खण्डागम सार।
भेद-प्रभेदों में लखूँ, प्रभो ! समय का सार ॥
स्थापना
(दोहा)
धन्य दिवस श्रुत पंचमी हुआ सुश्रुत अवतार ।
सम्यक् श्रुत आराधना कर होऊँ भव-पार ॥
ॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप-प्रथम-श्रुतस्कन्ध! अत्र अवतर अवतर
संवौषट् ।(इति आह्वानम्)
ॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप प्रथम श्रुतस्कन्ध ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
(इति स्थापनम् )
ॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप प्रथम श्रुतस्कन्ध ! अत्र मम सन्निहितो
भव भव वषट् ।(इति सन्निधिकरणम्)
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त ज्ञान सुनीर निर्मल, मोह-मल क्षालित करे।
जिन-चरण में अर्पित करें, भवि जीव भव-सागर तरें ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय
जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त ज्ञान-सुगन्ध मलयज प्रभु चरण अर्पित करूँ।
शुद्धात्म आश्रित ज्ञान पाकर भवातप सब क्षय करूँ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त सूत्र अखण्ड मिथ्या-वादि मद खण्डित करें।
प्रभु चरण में श्रद्धा समर्पित कर अखण्डित पद लहें ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त सुरभित सुमन भविजन-भ्रमर चित्त रमावते ।
निष्काम श्रुत आराधना कर काम भाव विनाशते ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त रस के रसिकजन को क्षुधा नहिं पीड़ित करे।
प्रभु भक्ति रस आस्वाद कर भवरोग शीघ्र शमित करे॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय
क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त दीप प्रकाश में भवि स्व-पर भेद पिछानते ।
प्रभु पद-कमल पूजा करें निज चित्-स्वरूप निहारते ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय
मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त ज्ञान-सुधूप ले ध्यानाग्नि प्रजलित भवि करें ।
निष्काम जिनवर-अर्चना कर कर्म-मल सब क्षय करें ॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा ।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त बोध सुवृक्ष पर कैवल्य फल निश्चित फलें।
प्रभु! भक्ति निर्वाछक फले भवि सहज चिन्मय सुख लहें॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
(हरिगीतिका)
सिद्धान्त वैभव द्रव्यश्रुत यह जगत में अनमोल है।
प्रभु ! भावश्रुत में भासता निज पद अनर्घ्य अमोल है॥
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।
धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्ध-स्वरूप षट्खण्डागमग्रन्थाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्घ्यावलि
(दोहा)
गुरु धरसेनाचार्य के चरणों का धरि ध्यान।
पुष्पदन्त अरु भूतबलि को नित करूँ प्रणाम॥
षट्खण्डागम शास्त्र की महिमा चित् में लाय।
द्वादशांग श्रुतज्ञान को पूजूँ अर्घ्य बनाय॥
भक्तिपूर्वक मैं करूँ वर्णन अति संक्षेप।
द्वादशांग श्रुतज्ञान हो मम उर में निक्षेप ॥
(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि / क्षिपेत् )
1. प्रथम खण्ड ‘जीवट्ठाण’ समन्वित
द्वादशांग के लिए अर्घ्य
(वीरछन्द-दोहा)
पहला जीवट्ठाण खण्ड है अष्ट-नुयोग द्वार से युक्त ।
सत् संख्या अरु क्षेत्र स्पर्शन काल भाव अन्तर से युक्त ॥
अल्प बहुत्व और चूलिका नौ भी इसमें कही गईं।
प्रकृति स्थान महा दण्डक त्रय जघन तथा उत्कृष्ट रची॥
सम्यकोत्पत्ति गति आगति का वर्णन इसमें किया गया।
गुणस्थान मार्गणा कथन पद सहस-अठारह में मिलता।
1. प्रथम खण्ड ‘जीवट्ठाण’ समन्वित
द्वादशांग के लिए अर्घ्य
(छन्द-दोहा)
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
जिसके हैं ये भेद सब, वह अभेद चित् धार ॥
ॐ ह्रीं श्री जीवट्ठाणसमन्वित द्वादशांग श्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
2. द्वितीय खण्ड ‘खुद्दाबन्ध’ समन्वित द्वादशांग
के लिए अर्घ्य
खण्ड दूसरा खुद्दा अथवा क्षुल्लक बन्ध कहा जाता ।
ग्यारह अधिकारों में कर्मबन्ध भेदों की महाकथा ॥
अंतर काल तथा स्वामित्व-रु भंग विचयत्रय अनुगम द्वार ।
द्रव्य क्षेत्र स्पर्शन अधिगम नाना जीव-रु भागाभाग ॥
अनुगम-अल्पबहुत्व ग्यारवाँ, जीव कर्म का बन्ध करे ।
किन्तु शुद्धनय से यह चेतन कर्मों से नहिं कभी बँधे ॥
2. द्वितीय खण्ड ‘खुद्दाबन्ध’ समन्वित
द्वादशांग के लिए अर्घ्य
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मैं अबद्धस्पृष्ट हूँ, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री खुद्दाबन्धसमन्वित द्वादशांगश्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
3. तृतीय खण्ड ‘बन्ध-स्वामित्व विचय’
समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्य
खण्ड तृतीय बन्ध-स्वामित्व विचय नाम बुधजन ज्ञाता।
किसे कौन-सी प्रकृति बन्ध होता है अथवा नहिं होता।
स्वोदय और परोदय बन्धरूप प्रकृति का वर्णन है।
कर्मबन्ध सम्बन्धी सब विषयों का इसमें वर्णन है ॥
3. तृतीय खण्ड ‘बन्ध-स्वामित्व विचय’
समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्य
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मैं अबद्धस्पृष्ट हूँ, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री बन्धस्वामित्वविचयसमन्वित द्वादशांगश्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
4. चतुर्थ खण्ड ‘वेदना’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
चौथा खण्ड वेदना इसमें कृति एवं वेदना कथन।
पाँच शरीरों की संघातन परिशातन कृति का वर्णन ॥
नाम थापना द्रव्य ग्रन्थ गणना कारण अरु भाव कहे।
सात भेद से कृति का वर्णन किन्तु मुख्य गणना ही है॥
सोलह अधिकारों में वर्णन करें वेदना का आचार्य।
नय निक्षेप नाम अरु द्रव्य क्षेत्र काल प्रत्यय अरु भाव॥
4. चतुर्थ खण्ड ‘वेदना’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
गति स्वामित्व वेदना और अनन्तर सन्निकर्ष परिमाण
भागाभाग-रु अल्पबहुत्व सहस सोलह पद रचे सुजान॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
अहो! अवेदक मैं सदा, पद अनर्घ्य अविकार॥
ॐ ह्रीं श्री वेदनाखण्डसमन्वित - द्वादशांगश्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
5. पंचम खण्ड ‘वर्गणा’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
खण्ड पाँचवाँ नाम वर्गणा बंधनीय अधिकार प्रधान ।
तेइस एवं कर्मबन्ध के योग्य वर्गणा कहीं सुजान॥
और साथ में सोलह अधिकारों में तेरह स्पर्श बखान ।
दश प्रकार कर्मों का वर्णन करते ये अधिकार-महान ॥
नाम थापना द्रव्य भाव से शील-स्वभाव-प्रकृति वर्णन।
सोलह अधिकारों में करते वीरसेन आचार्य महान॥
5. पंचम खण्ड ‘वर्गणा’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मैं चिन्मय निष्कर्म हूँ, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री वर्गणाखण्डसमन्वित द्वादशांग श्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
6. षष्ठ खण्ड ‘महाबन्ध’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
भूतबलि भट्टारक ने ही महाबन्ध का रचा विधान।
प्रकृति थिति अनुभाग प्रदेश बंध का किया महा व्याख्यान॥
महा धवल भी कहते इसको मूल नाम सत्कर्म कहा।
अष्टादश अनुयोग द्वार से वर्णन इसमें किया गया।
6. षष्ठ खण्ड ‘महाबन्ध’ समन्वित द्वादशांग के
लिए अर्घ्य
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मैं चेतन निर्बन्ध हूँ, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री महाबन्धसमन्वित-द्वादशांग श्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
7. कसायपाहुड़ समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्य
ज्ञानप्रवाद पूर्व की दसवीं वस्तु महा अधिकार महान।
तीजा प्राभृत कसायपाहुड़ का गुणधराचार्य को ज्ञान ॥
पेज्ज-दोष पाहुड़ भी कहते राग-द्वेष वर्णन विस्तार।
हैं चौबिस अनुयोग द्वार से कहे गए पन्द्रह अधिकार ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मैं अकषाय स्वरूप हूँ, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री कषायपाहुडसमन्वित द्वादशांगश्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
8. पंच परमागम के लिए अर्घ्य
(हरिगीतिका- दोहा)
कलिकाल में सर्वज्ञवत् गुरु कुन्दकुन्दाचार्य हैं।
शिवमग प्रकाशक पंच परमागम सु-रचनाकार हैं।
नव तत्त्व में गत आत्मज्योति है समय के सार में।
ज्ञान-सुख अरु ज्ञेय का वर्णन सु-प्रवचनसार में ॥
मार्ग एवं मार्ग-फल वर्णन नियम के सार में।
षट् द्रव्य और पदार्थ नौ व्याख्या पंचास्तिकाय में ॥
8. पंच परमागम के लिए अर्घ्य
(हरिगीतिका-दोहा)
अष्टपाहुड़ में विविध वर्णन किया शिवमार्ग का।
ये पंच परमागम दिखाते मार्ग शिव सुख प्राप्ति का ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
शिव रमणी रमनार हूँ, पद अनर्घ्य अविकार॥
ॐ ह्रीं श्री पंचपरमागमसमन्वित द्वादशांग श्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
9. प्रथमानुयोग के लिए अर्घ्य
(हरिगीतिका-दोहा)
मन्दबुद्धि जीवों को यह प्रथमानुयोग जिनवर कहते।
पौराणिक पुरुषों के जीवन की घटना वर्णन करते ॥
पुण्य-पाप का फल बतलाकर उसे दुखद बतलाते हैं।
वीतरागता सुखदायी कह निज हित रुचि जगाते हैं॥
9. प्रथमानुयोग के लिए अर्घ्य
(हरिगीतिका-दोहा)
असद्भूत व्यवहार से ही यह जानन योग्य।
भेदज्ञान की पुष्टि ही, इसमें करने योग्य ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
निज चैतन्य स्वभाव ही, पद अनर्घ्य अविकार॥
ॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-प्रथमानुयोगशास्त्रेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(10). करणानुयोग के लिए अर्घ्य
सूक्ष्मबुद्धि जीवों को यह करणानुयोग जिनवर कहते।
कर्मप्रकृतियों से बन्धन अरु उदय आदि वर्णन करते॥
पर आश्रित परिणाम जीव को दुखदायी बतलाते हैं।
तीन लोक रचना का भी श्री गुरुवर ज्ञान कराते हैं॥
(10). करणानुयोग के लिए अर्घ्य
असद्भूत व्यवहार से ही यह जीव स्वरूप।
ज्ञान-राग की भिन्नता, मात्र प्रयोजनभूत ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
द्रव्य भाव नोकर्म बिन, पद अनर्घ्य अविकार॥
ॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-करणानुयोगशास्त्रेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(11) चरणानुयोग के लिए अर्घ्य
साधक जीवों के जीवन में होता है कैसा व्यवहार।
इसका वर्णन करते गुरुवर यह चरणानुयोग सुखकार ॥
श्रावक और श्रमण की बाह्य क्रिया इसमें गुरु बतलाते।
किन्तु मात्र उपचरित धर्म है यह रहस्य गुरु समझाते ॥
(11) चरणानुयोग के लिए अर्घ्य
जीव क्रिया करता, कहे असद्भूत व्यवहार।
करता है निज भाव का, कहता नय परमार्थ ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
निष्क्रिय चिन्मय तत्त्व ही, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्रीं 'जिनमुखोद्भूत-चरणानुयोगशास्त्रेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(12) द्रव्यानुयोग के लिए अर्घ्य
नौ पदार्थ छह द्रव्य बताता यह द्रव्यानुयोग सुखकार।
भेदज्ञान अरु वीतरागता ही शिव-पथ कहते आचार्य ॥
मलिन और निर्मल पर्यायों का भी इसमें कथन किया।
पर्यायों से भिन्न त्रिकाली ध्रुव दृष्टि में बसा लिया।
(12) द्रव्यानुयोग के लिए अर्घ्य
आत्मज्ञान ही ज्ञान है, द्वादशांग का सार।
चिन्मय ज्ञायक भाव ही, मात्र समय का सार ॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार
ज्ञानमात्र निज भाव ही, पद अनर्घ्य अविकार ॥
ॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-द्रव्यानुयोगशास्त्रेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्णार्घ्य
(जोगीरासा)
परिणामों को धवल बनाने धवलत्रयी पहचानूँ ।
इक शत बासठ सहस श्लोक हैं इसकी महिमा जानूँ ॥
सोलह खण्डों में धवला टीका षट्खण्डागम की।
श्लोक बहत्तर सहस रचे जय हो जय जिन आगम की ॥1॥
पूर्णार्घ्य
(जोगीरासा)
सोलह खण्डों में जयधवला है कषायपाहुड़ की।
वीरसेन जिनसेन सूरि की रचना साठ हजारी ॥
भूतबली कृत महाबन्ध ही महाधवल कहलाता।
तीस सहस श्लोक रचे जो सूक्ष्म बुद्धि पढ़ पाता ॥2॥
पूर्णार्घ्य
(जोगीरासा)
उनतालिस भागों में ये सब ग्रन्थ आज हैं मिलते।
नय-व्यवहार कथन से ज्ञानी परमारथ को लखते ॥
परमारथ के ज्ञान हेतु हस्तावलम्ब व्यवहारा।
अतः बहुत कथनी इस नय की कहे जिनागम सारा ॥3॥
पूर्णार्घ्य
(जोगीरासा)
परमागम के सारभूत निज ज्ञायक को पहचानूँ।
उसमें ही अपनापन करके भेदों को बस जानूँ ॥
वीतरागता की पोषक है श्री जिनवर की वाणी ।
है चारों अनुयोग कथन की शैली निज कल्याणी ॥4॥
श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार ।
मोक्ष महल में आइये, प्रिय चैतन्य कुमार।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूत-द्वादशांग श्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये
पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(हरिगीतिका)
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ की महिमा जगत विख्यात है।
यह प्रथम श्रुतस्कन्ध जिसमें जैनशासन व्याप्त है।
ज्यों चक्रवर्ती जीतते षट्खण्ड को पुरुषार्थ से।
त्यों जानकर षट् द्रव्य भविजन सुख लहें निज अर्थ से ॥1॥
जयमाला
(हरिगीतिका)
धरसेन गुरु कुछ अंग एवं पूर्व के ज्ञाता हुए।
गिरनार गिरि पर शुद्ध आतम के परम ध्याता हुए॥
गुरु भूतबलि अरु पुष्पदन्त महामुनि निर्ग्रन्थ थे।
सूक्ष्म प्रज्ञा के धनी वे पथिक थे शिवपंथ के ॥2॥
जयमाला
(हरिगीतिका)
श्रुतज्ञान पा धरसेन गुरु से उभय मुनिवर धन्य थे।
षट्खण्ड आगम ग्रन्थ रचना कर निजात्म अनन्य थे।
वीरसेन महामुनि टीका रची धवला महा ।
जिसका पठन कर धवल-धी से भव्य सुख पाते अहा॥
ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूत- द्वादशांग श्रुतज्ञानाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
श्रुत-सेवनमय अर्घ्य यह, भविजन को सुखकार।
जिन आगम अभ्यास ही, पद अनर्घ्य दातार ॥
( इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत् । )
जाप्य मन्त्र- ॐ ह्रीं श्रीसम्पूर्णद्वादशांगाय नमः ।
श्री धरसेनाचार्य के लिए अर्घ्य
(चौपाई)
धन्य धन्य धरसेनाचार्य करते निज चैतन्य विहार।
गिरि गिरनार शिखर विख्यात में करते सिद्धों से बात ॥
व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग का ज्ञान दृष्टिवाद का भी कुछ ज्ञान।
रहे सुरक्षित कैसे ज्ञान चिन्ता गुरु को कृपा-निधान ॥
हुआ योग द्वय मुनि महान उन्हें पढ़ाया निज श्रुत-ज्ञान ।
गुरु-चरणों में अर्घ्य चढ़ाय पद-अनर्घ्य दृष्टि में लाय॥
ॐ ह्रीं श्री अंगपूर्वांग-अंशधारि-धरसेनाचार्यदेवाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री पुष्पदन्त मुनिराज के लिए अर्घ्य
(चौपाई)
पुष्पदन्त मुनिराज महान सुरगण पूजित गुरु गुणखान ।
श्री धरसेन सुगुरु सन्देश आए मुनि गिरनार प्रदेश ॥
स्वयं विवेकी प्रज्ञावन्त किया शुद्ध गुरु का इक मन्त्र।
पाया श्रीगुरु से श्रुत-ज्ञान अनुभव में निज आतम-ज्ञान॥
ज्ञान किया मुनि ने लिपिबद्ध सूत्र एक सौ सतत्तर बद्ध।
गुरु-चरणों में अर्घ्य चढ़ाय पद-अनर्घ्य दृष्टि में लाय॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्धप्रदातृ-पुष्पदन्तमुनये
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भूतबलि मुनिराज के लिए अर्घ्य
(चौपाई)
भूतबली मुनिराज महान रत्नत्रय भूषित गुण- खान ।
पुष्पदन्त संग किया विहार आए गिरि गिरनार मँझार ॥
स्वयं विवेकी प्रज्ञावन्त शुद्ध कर दिया गुरु का मंत्र ।
गुरु धरसेन समीप निवास प्राप्त किया श्रुतज्ञान विलास॥
वह श्रुतज्ञान किया लिपिबद्ध छह हजार सूत्रों में बद्ध।
गुरु-चरणों में अर्घ्य चढ़ाय पद-अनर्घ्य दृष्टि में लाय॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्धप्रदातृ-भूतबलिमुनये
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री वीरसेन आचार्य के लिए अर्घ्य
(चौपाई)
वीरसेन आचार्य महान आर्यनन्दि गुरु थे गुण-खान।
धवल बुद्धिधारी सुविशाल अठ सौ सोलह सन शुभ काल ॥
अक्टूबर महिना दिन आठ धवला टीका रची सुपाठ ।
श्लोक बहत्तर सहस प्रमाण धवला में निर्मल श्रुतज्ञान॥
जयधवला भी रची महान बीस सहस्र श्लोक प्रमाण ।
गुरु चरणों में अर्घ्य चढ़ाय पद-अनर्घ्य दृष्टि में लाय॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्धटीकाकार-वीरसेनाचार्यदेवाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री गुणधर आचार्य के लिए अर्घ्य
(चौपाई)
गुणभूषण गुणधर आचार्य परिणति पाप-रहित अविकार ।
श्रुतस्कन्ध प्रथम दातार सर्वप्रथम श्रुत रचनाकार ॥
ग्रन्थ कसायपाहुड़ दातार निष्कषाय परिणति व्यापार ।
पेज्जदोसपाहुड़ भी नाम वीतराग परिणति सुखधाम ॥
दो सौ तेतिस गाथा-बद्ध जयधवला टीका उपलब्ध ।
गुरु-चरणों में अर्घ्य चढ़ाय पद-अनर्घ्य दृष्टि में ल्याय ॥
ॐ ह्रीं श्री प्रथम श्रुतस्कन्घटीकाकार-वीरसेनाचार्यदेवाय
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Shatkhandagam_Pujan.pdf (9.7 MB, 48 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/50964।