श्री शान्तिनाथ विधान | Shri Shantinath Vidhan

स्थापना (शंभु)
हे ! शान्ति प्रदाता शान्ति प्रभु, चैतन्य शान्ति के अधिवासी ।
हो जीव मात्र के इष्ट तुम्हीं हम विश्व शान्ति के अभिलाषी॥
सुख शान्ति शीघ्र तुम सम पाएँ सो शान्ति प्रभु को पूज रहे।
प्रभु हृदय वेदिका पर तिष्ठो भक्तों के नमोऽस्तु गूँज रहे॥
ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक-सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्तिनाथ
जिनेन्द्र ! अत्र अवतर-अवतर…। अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः…। अत्र मम
सन्निहितो… । (पुष्पांजलि…)
है जन्म सुखों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ नव यौवन में।
है मरण दुखों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ इस जीवन में॥
दुख मातम रोग अशान्ति हरो, जल जैसी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं…।
है भव भोगों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ जग माया में।
रिश्तों-नातों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ इस काया में॥
धन पद गृह युद्ध अशान्ति हरो, चंदन सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं…।
है स्वर्ग सुखों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ सिंहासन में।
चौरासी लाख योनियों में, है शान्ति कहाँ भव भटकन में॥
जग भागमभाग अशान्ति हरो, अक्षत सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान्…।
है घर गृहस्थी में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ सुर कन्या में।
है स्त्री सुखों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ विष कन्या में॥
स्त्री पुरुषों की अशान्ति हरो, पुष्पों सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय कामवाण-विध्वंसनाय पुष्पाणि… ।
है भूख प्यास में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ विष अमृत में।
छप्पन भोगों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ रस व्यंजन में॥
रस भोजन भोग अशान्ति हरो, नैवेद्य सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपद्धारक श्री शान्ति-
नाथाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं…।
है अंधकार में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ उजयारों में।
बिजली बल्बों में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ नभ तारों में॥
दैनिक जीवन की अशान्ति हरो, दीपक सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं…।
है दौड़ धूप में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ जड़ कर्मों में।
है राग-द्वेष में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ नो-कर्मों में॥
परिषह उपसर्ग अशान्ति हरो, धूपों सी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय अष्टकर्म-दहनाय धूपं…।
खोने-पाने में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ घर भरने में।
निन्दा ईर्ष्या में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ कुछ करने में॥
भय वैर विरोध अशान्ति हरो, फल जैसी शान्ति करो आहा।

ओम् ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।
है तीन लोक में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ जड़ पुद्गल में।
है तीन काल में शान्ति कहाँ, है शान्ति कहाँ जग दलदल में॥
अपने सम विघ्न अशान्ति हरो, अर्धी सी शान्ति करो आहा।

ओम ह्रीं शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय, शान्तिं शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-

नाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं…।

पंचकल्याणक अर्घ्य (दोहा)

कृष्ण सप्तमी भाद्र को, तजकर स्वर्ग विमान ।
ऐरा माँ के गर्भ में, वसे शान्ति भगवान्॥

ॐ ह्रीं भाद्रकृष्णसप्तम्यां गर्भमङ्गलमण्डिताय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…।

चौदह कृष्णा ज्येष्ठ को, जन्मे शान्ति विराट ।
विश्वसेन के आँगने, ज्ञान-बताशा बाँट॥

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां जन्ममङ्गलमण्डिताय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…।

जन्म-तिथी में तप धरे, तजे अशान्ति शोर ।
शान्तिनाथ मुनि को हुई, नमोऽस्तु चारों ओर ॥

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां तपोमङ्गलमण्डिताय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…।

दशमी शुक्ला पौष में, पाया केवलराज।
नमन शान्ति अरिहंत को, करती भक्त समाज॥

ॐ ह्रीं पौषशुक्लदशम्यां ज्ञानमङ्गलमण्डिताय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…।

चौदस कृष्णा ज्येष्ठ को, मोक्ष गए शान्तीश।
कुन्दप्रभ कूट शाश्वतगिरि, को वन्दन नत शीश॥

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्यं…।

अर्ध्यावली (अनन्त चतुष्टय) (हाकलिका)
कर्म हरे ज्ञानावरणी, पूज्य बनें अनन्तज्ञानी ।
धर्म दान शुभ वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं ज्ञानावरणकर्मसम्बंधी उपद्रवनिवारकाय अनन्तज्ञानप्राप्ताय श्री शान्ति-

नाथाय अर्घ्य…॥१॥

हरे दर्शनावरणी जो, अनन्त दर्शन स्वामी वो।
निज दर्शन की वस्तु दो शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं दर्शनावरणकर्मसम्बंधी उपद्रवनिवारकाय अनन्तदर्शनप्राप्ताय श्री

शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥२॥

मोहनीय को नष्ट किए, अनन्त सम्यक् प्राप्त किए।
श्रद्धा सुख की वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं मोहनीयकर्मसम्बंधी उपद्रवनिवारकाय अनन्तसुखप्राप्ताय श्री शान्ति-

नाथाय अर्घ्य…॥३॥

अंतराय नाशे पाँचों, अनन्तवीर्य का यश वाँचों।
आत्म शक्ति की वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं अंतरायकर्मसम्बंधी उपद्रवनिवारकाय अनन्तवीर्यप्राप्ताय श्री शान्ति-

नाथाय अर्घ्य…॥४॥

(अतिशय)
हुए जन्म के दस अतिशय, क्षणिक शान्ति मिलती जय-जय।
अतिशयकारी वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥

ॐ ह्रीं गर्भजन्मसम्बन्धी कर्मोपद्रवनिवारकाय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥५॥

दसों ज्ञान के अतिशय हों, शान्ति ज्ञान के आलय हों।
ज्ञान-ध्यान की वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥

ॐ ह्रीं ज्ञानसम्बंधी कर्मोपद्रवनिवारकाय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥६॥

हुए देवकृत अतिशय जो, शान्तिविधायक चौदह वो।
विघ्न विनाशक वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं चतुर्विध-उपसर्गसम्बन्धी कर्मोपद्रवनिवारकाय श्री शान्तिनाथाय

अर्घ्य…॥७॥

(त्रयपद)
सोलम तीर्थंकर चक्री, कामदेव त्रय पदधारी।
रत्नत्रय की वस्तु दो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥

ॐ ह्रीं पंचकल्याणकसम्बन्धी-पदप्रदाय श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥८॥

(अष्टप्रातिहार्य)
अशोक तरुवर हरे भरे, शान्तिप्रभु सम शोक हरे।
हं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं ह्लर्क्ष्यूँ बीजसहित अशोकतरुसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥९॥

दिव्य सुमन सुर बरसाते, शान्तिप्रभु सम सुख लाते ।
भं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं भ्र्क्ष्यूँ बीजसहित पुष्पवृष्टिसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय श्री

शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१०॥

दिव्य ध्वनि ओंकारमयी, सुख संपद दे नयी-नयी।
मं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं म्म्ल्य़ूँ बीजसहित दिव्यध्वनिसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रव-शान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥११॥

चॅवर दुराएँ चौसठ देव, उर्ध्वगमन होता स्वयमेव।
रं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं र्म्ल्य़ूँ बीजसहित चामरसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१२॥

शान्तिप्रभु सिंहासन पर, ऋद्धि-सिद्धि दें मोहित कर।
घं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं घूम्यूँ बीजसहित सिंहासनसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१३

सात भवों को भामण्डल, दर्शाकर करता मंगल।
झं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं झुम्ल्यूँ बीजसहित भामण्डलसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१४॥

देव दुंदुभि वाद्य बजें, दसों-दिशा तक गूंज उठें।
सं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं स्म्र्क्यूँ बीजसहित देवदुंदुभिसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१५॥

तीन लोक के अधिपति जो, तीन छत्र से शोभित सो।
खं बीजाक्षर मय भज लो, शान्ति प्रभु को नमोऽस्तु हो॥
ॐ ह्रीं खुम्ल्यूं बीजसहित छत्रत्रयसत्प्रातिहार्यमण्डित सर्वोपद्रवशान्तिकराय

श्री शान्तिनाथाय अर्घ्य…॥१६॥

पूर्णार्घ्य (अर्द्ध जोगीरासा)
तेरा मंगल मेरा मंगल, सबका मंगल होवे।
शान्तिप्रभु को करके नमोऽस्तु, जग का मंगल होवे॥

दोहा

ओम् ह्रीं बीजाक्षर सहित, ह भ म र घ झ स ख आठ ।

शान्तिप्रभु को हम भजें, करके शान्तिपाठ॥

ॐ ह्रीं षट्चत्वारिशत् गुणसहित अष्टबीजमण्डित सर्वविघ्नशान्तिकराय श्री

शान्तिनाथाय पूर्णार्घ्य…।

जाप्यमंत्र– ॐ ह्रीं जगच्छान्तिकराय श्री शान्तिनाथाय नमः

सर्वोपद्रव शान्तिं कुरु-कुरु स्वाहा।

जयमाला (दोहा)
जिनके चरणों में बहे, विश्वशान्ति की धार।
ऐसे शान्तिनाथ को, नमोऽस्तु बारम्बार॥
(ज्ञानोदय)
तीन लोक में तीन काल में, विश्वशान्ति की चाह हमें।
देश शान्ति की हमें कामना, राज्य शान्ति की आश हमें ॥
नगर शान्ति के हम प्रेमी, हैं हम गृह शान्ति सदा पाएँ।
आत्म शान्ति के हम इच्छुक सो, शान्तिप्रभु के गुण गाएँ।॥१॥

जी हाँ ये वो शान्तिनाथ हैं, जो सोलहवें तीर्थंकर।
बारहवें जो कामदेव हैं, तथा पाँचवें चक्रेश्वर॥
विश्वसेन-ऐरा के नन्दन, समवसरण के नाथ रहे।
तत्त्वज्ञान दे रोग शोक दुख, हरने को विख्यात रहे॥२॥

नाथ! हमारी सुनो प्रार्थना, हम पर कृपा जरूर करो।
जीव मात्र की हरो अशान्ति, विश्वशान्ति भरपूर करो॥
कर्म उपद्रव शान्ति करो प्रभु, मन-वच-तन के रोग हरो।
योग-वियोग की हरो वेदना, त्रस थावर भव भोग हरो ॥३॥

जैसे शान्ति नाम के यश हैं, वैसे कार्य आपके हैं।
तब ही चौबीसी में सबसे, ज्यादा भक्त आपके हैं॥
स्वामी हम बस शान्ति चाहते, शान्ति शान्ति सुख शान्ति मिले।
कूट कुन्दप्रभ सम्मेदाचल, जैसी आत्मिक शान्ति मिले॥४॥

ॐ ह्रीं परमशान्तिविधायक सर्वोपद्रवशान्तिकारक-त्रयपदधारक श्री शान्ति-
नाथाय अनर्घपद-प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य…।

दोहा

शान्ति शान्ति धारा करें, पुष्पांजलि कर जाप।

‘सुव्रत’ करें नमोऽस्तु अब, भूल चूक हो माफ ॥

(शान्तये शान्तिधारा…पुष्पांजलिं…)


Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)