हे शान्ति-कुंथु-अरनाथ चित्त हर्षाया।
प्रभु दर्शन कर निजदर्शन मैंने पाया ॥ टेक ॥
इन्द्रिय विषयों की सर्व वासना छूटी।
मिट गयी स्वयं पर्याय-दृष्टि प्रभु झूठी ॥
अक्षय ज्ञानानन्द स्वाद जिनेश्वर आया। प्रभु…॥१॥
चक्री इन्द्रादिक पद भी हेय सु-भासे ।
शाश्वत अद्भुत प्रभुता निज-माँहिं प्रकाशे ॥
अविकारी चेतन पद स्वामी दर्शाया। प्रभु… ॥२॥
ऐसी प्रभुता अन्यत्र न देय दिखाई।
जिन मुद्रा ही दृष्टि में आज समाई ।।
वह धन्य घड़ी जब प्रगटे भाव जगाया। प्रभु…॥३॥
अब नहीं चाह कुछ रही नहीं कुछ चिंता ।
प्रभु चरण शरण पा हुई सहज निश्चिता ॥
निर्द्वन्द हुआ निष्काम भाव प्रगटाया। प्रभु… ॥४॥
हो प्रभु ऐसा पुरुषार्थ परम प्रभु ध्याऊँ।
तज सकल उपाधि बोधि समाधि पाऊँ ॥
आनंदित हो चरणों में शीश नवाया। प्रभु… ॥५॥
Artist: आ.बा.ब्र.रवींद्र जी आत्मन्