स्थापना (दोहा)
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ को, नमोऽस्तु बारम्बार ।
पूजा के पहले करें, शीश झुका सत्कार॥
(ज्ञानोदय)
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेश्वर, तीन-तीन पद के धारी।
कामदेव चक्री तीर्थंकर, क्रम-क्रम से जग हितकारी॥
पूजा करने भाव बनाए, द्रव्य सजाए मनहारी।
हृदय कमल पर आन विराजो, तीनों भगवन उपकारी॥
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रा ! अत्र अवतर-अवतर…। अत्र
तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः… । अत्र मम सन्निहितो… । (पुष्पांजलिं…)
जीवन की जो रही परीक्षा, नाम उसी का मरण रहा।
जनम बुढ़ापा उसके साथी, इनसे काई नहीं बचा॥
सफल परीक्षा में होने को, प्रासुक जल यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं…।
तपकर कंचन कंचन सा हो, हार गले का बन चमके।
किन्तु नाथ ! हम भवाताप से, आज तलक तो ना चमके
ताप हरें कुन्दन से चमकें, सो चंदन यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यः संसारताप-विनाशनाय चंदनं…।
ऊँचाई पर जाना हो तो, सूर्य ताप सहना होगा।
शाश्वत पद को पाना हो तो, सम्यक् तप करना होगा
सम्यक् तप कर शाश्वत बनने, उज्ज्वल अक्षत अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान्…।
छेद काष्ठ में कर सकता पर, भ्रमर फूल में फँस मरता।
त्यों चेतन सुख वाला है पर, काम व्यथा से दुख सहता
ब्रह्मचर्य सौरभ महकाने, पुष्प पुंज यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यः कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पाणि…।
कभी पेट को कभी जीभ को, कभी मनोगत इच्छा को ।
पापी बन जाती है दुनियाँ, भूल आपकी शिक्षा को
क्षुधा मिटाने नैवेद्यों की, श्रेष्ठ भेंट यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं…।
असुरक्षित दीपक ज्यों बुझते, आँधी तूफानों द्वारा।
त्यों ही तुम बिन हम भक्तों के, जीवन में है अँधयारा
उजयारा तुम सम पाने को, जगमग दीपक अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं…।
धूप जले तो धुँआ राख के, साथ सुगंधी भी फैले।
पर कर्मों की रज से हम तो, सदा रहे मैले-मैले
नाथ! आपकी पद रज पाने, धूप सुगंधी अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं…।
नहीं परीक्षा से हम डरते, किन्तु कटुक फल से डरते।
मधुर-मधुर फल पाएँ खाएँ, यह इच्छा भी ना रखते
लेकर दीक्षा मुक्ती पाने, प्रासुक फल यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।
दुनियाँ में जड़ वस्तु पाके, हमने उनका मूल्य किया।
किंतु आप ने इन्हें त्यागकर, निज चेतन बहुमूल्य किया।।
हम भी हों बहुमूल्य आप सम, अतः अर्घ्य यह अर्पित है।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ प्रभु को, नमोऽस्तु रोज समर्पित है।।
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य… ।
पंचकल्याणक अर्घ्य
दोहा
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ के, गर्भों के कल्याण।
अर्घ्य चढ़ा हम पूजते, हो नमोऽस्तु धर ध्यान॥
ॐ ह्रीं गर्भमङ्गलमण्डिताय श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य…।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ के, जन्मों के कल्याण।
अर्घ्य चढ़ा हम पूजते, हो नमोऽस्तु धर ध्यान॥
ॐ ह्रीं जन्ममङ्गलमण्डिताय श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य… ।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ के, दीक्षा के कल्याण।
अर्घ्य चढ़ा हम पूजते, हो नमोऽस्तु धर ध्यान॥
ॐ ह्रीं तपोमङ्गलमण्डिताय श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य…।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ के, ज्ञानों के कल्याण।
अर्घ्य चढ़ा हम पूजते, हो नमोऽस्तु धर ध्यान॥
ॐ ह्रीं ज्ञानमङ्गलमण्डिताय श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य…।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ के, मोक्षों के कल्याण।
अर्घ्य चढ़ा हम पूजते, हो नमोऽस्तु धर ध्यान॥
ॐ ह्रीं मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य…।
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अईं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्राय
नमो नमः ।
जयमाला
दोहा
तीनों पदधारी रहे, शान्ति-कुन्थु-अरनाथ।
जयमाला के पूर्व में, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
(ज्ञानोदय)
जय हो ! जय हो ! शान्तिनाथ की, जग के शान्ति प्रदाता की।
जय हो ! जय हो ! कुंथुनाथ की, सबके आश्रयदाता की॥
जय हो ! जय हो ! अरहनाथ की, त्रद्धि-सिद्धि सुख दाता की।
शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेश्वर, जय हो ! भाग्य विधाता की॥१॥
कामदेव चक्री तीर्थंकर, तीन-तीन पदवी धारी।
कामदेव के रूप जन्म ले, दुनियाँ मोहित की सारी॥
जिनको देख युवतियाँ नारीं, निज शृंगार भूलती थीं।
गोदी में बच्चे उल्टे ले, भोजन पान भूलती थीं॥२॥
षट्खण्डों के अधिपति बनकर, शौर्य पराक्रम दिखा दिए।
जिससे दुश्मन राजाओं के, जग में छक्के छुड़ा दिए॥
चौदह रत्न नवोनिधि पाई, छ्यानवें हजार रानी थीं।
चक्ररत्न पा चक्रवर्ति हो, ली दीक्षा कल्याणी भी॥३॥
तीर्थंकर हो धर्मचक्र से, समवसरण को सजा दिया।
कर्मचक्र को नष्ट किया फिर, मुक्तिवधू को रिझा लिया॥
तीन लोक के उच्च शिखर पर, नाथ ! विराजे हैं जाकर ।
हम तो वहाँ न जा सकते सो, करें अर्चना गुण गाकर॥४॥
अब तो केवल यही प्रार्थना, शान्तिप्रभु दो शान्ति हमें।
कुन्थुनाथ जी करुणा कर दो, अरहनाथ दो मुक्ति हमें॥
है विश्वास आश भी पूरी, हमको आप निहारोगे।
आज नहीं तो कल या परसों, हम भक्तों को तारोगे॥५॥
ॐ ह्रीं श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये जयमाला
पूर्णार्घ्य…।
दोहा
शान्ति-कुन्थु-अर प्रभु करें, विश्वशान्ति कल्याण।
प्रासुक जल की धार दे, हम पूजत भगवान्॥
(शान्तये शान्तिधारा)
कल्पवृक्ष के पुष्प सम, पुष्पांजलि पद लाए।
भव दुःखों को मेंट दो, शान्ति-कुन्थु-अर राय॥
(पुष्पांजलिं…)
Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)