वीर-छन्द
हो चक्रवर्ति अरु कामदेव, प्रभु तीर्थंकर पदवी धारी।
हे शांति-कुन्थु-अरनाथ ! सदा, मैं करूँ वंदना अविकारी ।।
आकर आप समीप जिनेश्वर, आनन्द उर न समाया है।
तव दर्शन पाकर नाथ आज, निजदर्शन मैंने पाया है।
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्राः ! अत्र अवतरन्तु अवतरन्तु
संवौषट् इत्याह्वननम् । ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्राः ! अत्र
तिष्ठन्तु तिष्ठन्तु ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्राः!
अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।
(अवतार छन्द)
मिथ्यामल धोने आज, सम्यक् जल पाया।
प्रभु जन्म-जरा-मृत्यु शून्य, ज्ञायक दिखलाया ।।
हे शांति-कुन्थु-अरनाथ, चरणन शिर नाऊँ।
है महामहिम निजभाव, प्रभुता प्रगटाऊँ।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं.. ।
संताप रहित निज भाव, निज में दरशाया।
भव ताप नशावन हेतु, चन्दन सम पाया।
हे शांति-कुन्थु-अरनाथ, चरणन शिर नाऊँ।
है महामहिम निजभाव, प्रभुता प्रगटाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चन्दनं.. ।
शाश्वत अक्षत निजभाव, दृष्टि में आया।
क्षत् रागादिक विनशाय, अक्षयपद ध्याया ॥ हे शांति.॥
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्योऽक्षयपद प्राप्तये अक्षतं नि. स्वाहा।
निष्काम रूप लख देव, काम पलाया है।
सम्यक् श्रद्धा का पुष्प, आज चढ़ाया है ॥ हे शांति.॥
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि.।
दर्शन कर निज में नाथ, तृप्ति पाई है।
भव-भव की क्षुधा जिनेश, आज नशायी है । हे शांति.।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
तिहुंजग का जाननहार, आज जनाया है।
आलोकित है निज लोक, मोह भगाया है ॥ हे शांति.॥
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि. ।
प्रभु आत्मध्यान की अग्नि, अब सुलगाई है।
पर-परणति की दुर्गन्ध सर्व जलाई है॥ हे शांति.॥
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्योऽअष्टकर्म दहनाय धूपं नि. स्वाहा ।
फल की अभिलाषा नाहिं, निजपद पाया है।
पूर्णत्व स्वयं में देख, आनन्द छाया है ॥ हे शांति.।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा ।
प्रभु वीतराग विज्ञान-मय शुभ अर्घ लिया।
निज में अनर्घ पद नाथ, निज से प्राप्त किया ।। हे शांति.।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ-कुन्थुनाथ-अरनाथ-जिनेन्द्रेभ्योऽनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा।
जयमाला
दोहा- जग जड़ वैभव त्यागकर, निज वैभव प्रगटाय।
शांति-कुन्थु-अरनाथ की, नित जयमाला गाय ॥
जोगीरासा
शांति जिनेश्वर दर्शन कर, निज शान्त स्वरूप लखाया।
धन्य परम उपकारी निज सुख, निज में मुझे दिखाया।टेक।।
चाह दाह में भटका अब तक, सुख का लेश न पाया।
मंद कषायों द्वारा अंतिम, ग्रेवियक तक हो आया।
काललब्धि जागी प्रभुवर, मैं पास आपके आया॥ धन्य.॥
आत्मा तो स्वभाव से सुखमय, दिव्य रहस्य बताया।
दीन दुखी पामर मैं हूँ, ये भ्रम का रोग मिटाया ॥
अन्तर में प्रत्यक्ष देख सुख, अब विश्वास जगाया॥ धन्य.॥
निज चैतन्य विभूती देखी, शक्ति अनन्त निहारी।
प्रभु सम प्रभुता लखकर, खुद ही भाव हुए अविकारी ।।
होना नहीं सदा हूँ सुखमय, सम्यक् ज्ञान उपाया॥धन्य.॥
अब तो यही भावना प्रभुवर, निज में ही रम जाऊँ।
स्वानुभूतिमय परणति में ही, काल अनन्त बिताऊँ ॥
निज में ही सन्तुष्ट, कामनाओं का हुआ सफाया॥धन्य.॥
कुन्थुनाथ स्तुति करते, गणधर इन्द्रादिक हारे।
तुम महिमा वर्णन करने में, हम को मंद विचारे॥
निजस्वभाव साधन द्वारा ही, प्रभु मुक्ति पद पाया॥धन्य.॥
कुन्थु आदि सूक्ष्म जीवों के, प्रति भी दया सिखाई।
परम अहिंसामयी धर्म की, ध्वजा प्रभो ! फहराई ॥
चलूँ आपके पद चिन्हों पर, आज यही मन भाया॥ धन्य.॥
धर्म चक्र के अर स्वरूप, सार्थक प्रभु नाम तुम्हारा।
प्रभो आपका दर्शन पाकर, जागा भाग्य हमारा ॥
भव का फेरा मिटा सहज ही, शिवपथ मैंने पाया ॥धन्य.॥
चक्री का साम्राज्य आपने, तृणवत् क्षण में छोड़ा।
हो निर्ग्रन्थ प्रभो उपयोग सु, निज ज्ञायक में जोड़ा॥
सकलकर्म का नाश किया प्रभु, अविचल शिवपद पाया॥
धन्य परम उपकारी निज सुख, निज में मुझे दिखाया॥
कहूँ कहाँ तक भाव बहुत हैं, अल्प शक्ति पर मेरी।
तुम सम ही प्रभुतामय निस्पृह, परिणति होवे मेरी॥
चाहूँ कुछ नहिं सहजभाव से, सविनय शीश नवाया ॥धन्य.॥
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ-कुन्थनाथ-अरनाथ जिनेन्द्रेभ्यो जयमालाऽर्घ्यं नि. स्वाहा।
दोहा
मंगलमय मंगलकरण, आत्मस्वरूप महान।
शुद्धातम में मग्न हो, प्रगटे पद निर्वाण ॥
।। पुष्पांजलिं क्षिपामि ॥
Artist: रवींद्र जी आत्मन
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह