श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Shanti-Kunthu-Arnath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री शान्ति-कुन्थु-अरनाथ जिन पूजन

जय शान्तिनाथ हे शान्ति मूर्ति जय कुन्थुनाथ आनन्दरूप ।
जय अरहनाथ अरि कर्मजयी तीनों तीर्थंकर विश्वभूप ।।
तुम कामदेव अतिशय महान सम्राट चक्रवर्ती अनूप ।
भव भोग देह से हो विरक्त पाया निज सिद्ध स्वपद स्वरूप ।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्र अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

पावन निर्मल नीर समुज्ज्वल श्री चरणों में अर्पित है ।
जन्म मरण नाशो हे स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।
शान्ति कुन्थु अरनाथ जिनेश्वर तीर्थंकर मंगलकारी ।
कामदेव सम्राट चक्रवर्ती पद त्यागी बलिहारी ।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

तन का ताप विनाशक चन्दन श्री चरणों में अर्पित है ।
भवआताप मिटाओ स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

अक्षय तन्दुल पुंज मनोहर श्री चरणों में अर्पित है ।
अनुपम अक्षय निज पद दो प्रभु सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

अतिशय सुन्दर भाव पुष्प शुभ श्री चरणों में अर्पित है ।
कामरोग विध्वंस करो प्रभु सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय कामबाणविध्वन्सनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

मनभावन नैवेद्य सुहावन श्री चरणों में अर्पित है ।
क्षुधा व्याधि नाशो हे स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

अन्धकार नाशक जड़दीपक श्री चरणों में अर्पित है ।
मोह तिमिर हरलो हे स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

महा सुगन्धित धूप निशंकित श्री चरणों में अर्पित है ।
अष्टकर्म अरि ध्वंस करो प्रभु सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

पुण्य भाव का सारा शुभफल श्री चरणों में अर्पित है ।
परम मोक्षफल दो हे स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अष्ट द्रव्य का अर्घ अष्ट विधि श्री चरणों में अर्पित है ।
निज अनर्घ पद दो हे स्वामी सादर हृदय समर्पित है ।।शान्ति.।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री शान्तिनाथ जी

नगर हस्तिनापुर के अधिपति विश्वसेन नृप परम उदार ।
माता ऐरादेवी के सुत शांतिनाथ मंगल दातार ।।
कामदेव बारहवें पंचम चक्री सोलहवें तीर्थेश ।
भरत क्षेत्र को पूर्ण विजयकर स्वामी आप हुए चक्रेश ।।
नभ में नाशवान बादल लख उर में जागा ज्ञान विशेष ।
भव भोगों से उदासीन हो ले वैराग्य हुए परमेश ।।३।।

निज आत्मानुभूति के द्वारा वीतराग अर्हन्त हुए ।
मुक्त हुए सम्मेद शिखर से परम सिद्ध भगवन्त हुए ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भजन्मतपज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री कुन्थुनाथ जी

नगर हस्तिनापुर के राजा सूर्यसेन के प्रिय नन्दन ।
राजदुलारे श्रीमती देवी रानी के सुत वन्दन ।।१।।

कामदेव तेरहवें तीर्थंकर सतरहवें कुन्थु महान ।
छटे चक्रवर्ती बन पाई षट् खण्डों पर विजय प्रधान ।।२।।

भौतिक वैभव त्याग मुनिश्वर बन स्वरूप में लीन हुए ।
भाव शुभाशुभ का अभाव कर शुक्लध्यान तल्लीन हुए ।।३।।

ध्यान अग्नि से कर्म दग्ध कर केवलज्ञान स्वरूप हुए ।
सिद्ध हुए सम्मेद शिखर से तीन लोक के भूप हुए ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री कुन्थुनाथ जिनेन्द्राय गर्भजन्मतपज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री अरनाथ जी

नगर हस्तिनापुर के पति नृपराज सुदर्शन पिता महान ।
माता मित्रा देवी की आँखों के तारे हे भगवान ।।
कामदेव चोदहवें सप्तम चक्री थे अरनाथ जिनेश ।
अष्टादशम तीर्थंकर जिन परम पूज्य जिनराज महेश ।।
छह खण्डों पर शासन करते करते जग अनित्य पाया ।
भव तन भोगों से विरक्तिमय उर वैराग्य उमड़ आया ।।
पंच महाव्रत धारण करके निज स्वभाव में हुए मगन ।
पा कैवल्य श्री सम्मेद शिखर से पाया मुक्ति गगन ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय गर्भजन्मतपज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

शान्ति कुन्थु अरनाथ जिनेश्वर के चरणों में नित वन्दन ।
विमल ज्ञान आशीर्वाद दो काट सकूँ मैं भव बन्धन ।।
सम्यक् दर्शन ज्ञान चरितमय लिया पंथ निर्ग्रन्थ महान ।
सोलह वर्ष रहे छद्मस्थ अवस्था में तीनों भगवान ।।
परम तपस्वी परम संयमी मौनी महाव्रती जिनराज ।
निज स्वभाव के साधन द्वारा पाया तुमने निज पद राज ।।
शुक्ल ध्यान के द्वारा स्वामी पाया तुमने केवलज्ञान ।
दे उपदेश भव्य जीवों को किया सकल जग का कल्याण ।।
मैं अनादि से दुखिया व्याकुल मेरे संकट दूर करो ।
पाप ताप संताप लोभ भय मोह क्षोभ चकचूर करो ।।
सम्यक्दर्शन प्राप्त करूँ मैं निज परिणति में रमण करूँ ।
रत्नत्रय का अवलम्बन ले मोक्ष मार्ग का ग्रहण करूँ ।।
वीतराग विज्ञान ज्ञान की महिमा उर में छा जाये ।
भेद ज्ञान व निज आश्रय से शुद्ध आत्मा दर्शाए ।।
यही विनय है यही भावना विषय कषाय अभाव करूँ ।
तुम समान मुनि बन हे स्वामी निज चैतन्य स्वभाव वरूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री शान्तिकुन्थु अरनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

मृग अज, मीन चिह्न चरणों में प्रभु प्रतिमा जो करे नमन ।
जन्म जन्म के पातक क्षय मिट जाता भव दुख क्रन्दन ।।
रोग शोक दारिद्र आदि पापों का होता शीघ्र शमन ।
भव समुद्र से पार उतरते जो नित करते प्रभु पूजन ।।
।।पुष्पांजलिम् क्षिपेत्।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २२९ से २३४