श्री सीमंधर जिनेन्द्र पूजन
सीमंधर स्वामी थारी तो जय जयकार-2 ।। टेक ।।
शाश्वत जिन शासन जहँ वर्ते, महामहिम सुखकार ।
वैदेही हो रहे विदेही, धन्य विदेह मंझार ॥ सीमं. ॥
समयसार स्वर लहरी सुनते, धरि प्रमोद भवि सार ।
नियमसारमय परिणति होवे, तू ही तारणहार ।। सीमं. ।।
कुन्दकुन्द आचार्य पधारे, तेरे ही दरबार ।
भुला गये सर्वज्ञ विरह प्रभु, रचा समय का सार ॥ सीमं. ॥
विनय हमारी स्वीकारो प्रभु, अशरण शरण अधार ।।
भले दूर प्रभु रहो क्षेत्र से, बैठो हृदय मंझार ।। सीमं. ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(मानव छंद)
जीवत्व शक्ति के स्वामी, चेतन निज रूप निहारो ।
दूग ज्ञान वीर्य सुख मंडित, अपनी प्रभुता उजियारो ।।
जो नहीं जनमता मरता, शाश्वत प्रभु सत्य सनातन ।
कर्ता भोक्ता न किसी का, ज्ञाता है अपना भगवन ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, अद्भुत प्रभुता दर्शायी ।
जन्मादि व्याधि मिट जावे, हो तम सम दशा हमारी ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय जन्म-जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति ।
शक्ति अचिंन्त्य का धारी स्वयमेव देव शुद्धातम ।
चंदन सम शीतल चिन्मय दर्शाया प्रभु परमातम् ।।
हे नाथ सर्वदर्शी हो, सर्वज्ञ जिनेश हमारे ।
सब लोकालोक झलकते स्वच्छत्व शक्ति के द्वारे ।।
सीमंधर नाथ जिनेश्वर अद्भुत प्रभुता दर्शायी ।
भव ताप विनाशो स्वामी, हो तुम सम दशा हमारी ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति ।
अक्षय चैतन्य निलय में, अक्षय विलसो हे स्वामी ।
पर के न कार्य कारण हो, अक्षय पद दाता नामी ॥
परिणम्य पारणामिक से, जानो सब जानन हारे ।
नहिं ग्रहण त्याग की दुविधा, भोगें आनंद महा रे ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, शाश्वत ध्रुव धाम दिखाया।
उत्पाद ध्रौव्य व्यय शक्ति, से भ्रम का भार नशाया ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति ।
चैतन्य वाटिका में ही, प्रभुवर विहार करते हो ।
सुरभित हो नाथ सुमन से, सबको सौरभ देते हो ॥
चिद्ब्रह्म विलासी जिनवर, आनंद रसामृत पीते ।
नहिं रही वासना कोई, आनंद निर्झर से झरते ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, कब शील सुगुण प्रगटाऊँ ।
प्रभु तुम समान हो जाऊँ, अपने में आप समाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति ।
जब आतम अनुभव आवे, तब कुछ भी नहीं सुहावे ।
यह अमृतरस का प्याला, कोई विरला ही पी पावे ॥
प्रभु शक्ति अनंतों धर्मी, से हो अनंत गुण मंडित ।
शक्ति विरुद्ध धर्मी भी, से चेतन सदा सुरक्षित ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति ।
प्रभु भेद ज्ञान ज्योति से, अब मंगल दीप जलाऊँ ।
मैं ममता छोडूं क्षण-क्षण, समता जीवन में लाऊँ ॥
एकत्व विभक्त सदा से, है ज्ञायक प्रभु हमारा ।
परभावों से अति न्यारा आनंद रस ज्ञान पिटारा ॥
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति ।
अनहोनी कभी न होती, होनी भी कभी न टलती ।
है शक्तिपुंज परमातम, क्यों चिंता तुम्हें सताती ।।
प्रभु भाव अभावी शक्ति, हर कार्य सहज कर लाती ।
हमको निश्चिंत बनाती, पर गंध सहज विनसाती ।।
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपनी शक्ति पहचाने, वो तुम समान बन जाये ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
षट् द्रव्यों का हे प्रभुवर, नित चक्र सुदर्शन चलता ।
षट् कारकीय क्षमता से, हर कार्य सहज ही होता ।।
प्रभु निज स्वभाव साधन से, सब ही सर्वज्ञ हुए हैं ।।
हे नाथ स्वयंभू हो तुम, आगम में कथन भरे हैं ।
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आए ।
निज सम्प्रदान शक्ति फल, से तुम समान हो जाये ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अखिलेश्वर हे जगदीश्वर सीमंधर नाथ जिनेश्वर ।
शक्ति अनंत दर्शायी, निज महिमा जागी जिनवर ।।
भक्ति भावों से प्रभुवर यह अर्घ्य सजाकर लाया ।।
मुनि कुन्दकुन्द अमृतचंद्र, ने सोया भाग्य जगाया ।
सीमंधर नाथ जिनेश्वर, जो शरण तुम्हारी आये ।
अपना स्वरूप पहचाने, वह तुम समान हो जावे ॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
सीमंधर भगवान के, गुण हैं अपरम्पार ।
गाऊँ जयमाला प्रभु, रोम-रोम हुलसाय ।।
(वीर छंद)
जयवन्तो सीमंधर स्वामी, निज स्वरूप में करो विलास ।
शुद्ध स्वानुभव सरिता बहती, मुद्रा जगा रही उल्लास ॥
निज स्वभाव सीमा में रहकर, भी असीम प्रभु केवलज्ञान ।
धर्मामृत बरसाते हो प्रभु, कौन करे तेरा गुणगान ॥
सकल ज्ञेय ज्ञायक होकर भी, निज स्वरूप ही प्रभु भाया।
निजानंद रस लीन स्वयं हो, यही बोधि पाने आया ।।
धन्य-धन्य वे जीव आपका, लाभ सदा जो लेते हैं।
भव-भव के संचित कर्मों का, नाश स्वयं कर लेते हैं ॥
कुन्दकुन्द आचार्य श्री ने, प्रभु प्रत्यक्ष दर्शन पाया ।
दिव्यध्वनि रस पान किया प्रभु, अति अपूर्व आनंद आया।।
आये मुनिश्री भरत क्षेत्र में, भवि जीवों को किया निहाल ।
रचे पंचपरमागम सुंदर, समयसार ने किया कमाल ।।
देव आपकी भक्ति में चित, आज सहज ललचाया है।
काललब्धि मेरी जागी है, मन में हर्ष समाया है ॥
पंच परावर्तन में प्रभुवर, भटक भटक अति दुख पाये ।
इस संसार महासागर में आज शरण तेरी आये ।।
भरत क्षेत्र में तीर्थंकर का विरह पड़ा है हे सर्वेश ।
इसलिए प्रभु याद आपकी आती है नित ही करूणेश ॥
पूरब पुंडरीकणी नगरी में, आप विराजे हैं अरिहंत ।
भव्य जनों के जीवन शिल्पी, मुक्ति विधाता श्री भगवंत ॥
मुनिसुव्रत तीर्थंकर युग था, तब पाया था केवलज्ञान ।
यहाँ तेरवें भगवन होंगे, तब प्रभुवर लेगें निर्वाण ॥
शक्ति अनंती विलस रही हैं, शोभित चिदानंद भगवान ।
सभी जीव भगवान आत्मा, समझाया हे दया निधान ॥
आज समझ में आया है प्रभु, वीतराग जिनधर्म महान ।
अमृत रस का पान कराता, यही बनाता है भगवान ।।
हे प्रभु साक्षात दर्शन हो, ऐसा दिन कब पाऊँगा ।
कब तुमसे सम्यक् शिक्षा ले, तुम समान बन जाऊँगा ।।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधर जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
(दोहा)
देह देवालय में बसे, फिर भी सदा विदेह ।
मेरे भी मन में बसो, जय सीमंधर देव ।।
निज सीमा में संयमित, हुये सीमंधर नाथ ।
फिर भी चहुँ दिश महकती, धम सुगंध सुवास ।।
(परिपुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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