सर्वतोभद्र पूजन करने का भाव हृदय में आया है ।
चारों दिशि में जिनराज चतुर्मुख दर्शनकर सुख पाया है ।
यह पूजन मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा की जाती है ।
अत्यन्त महावैभव पूर्वक वसुद्रव्य चढाई जाती है ।।
अतिभव्य चतुर्मुख मंडप का करते निर्माण भक्ति पूर्वक ।
अरहन्त चतुर्मुख जिन प्रतिमा पधराते परम विनयपूर्वक ।।
राग आग में जल जल तूने कष्ट अनंत उठाए हैं ।
भाव शुभाशुभ के बंधन में आँसू सदा बहाए हैं ।।
मैं मुकुटबद्ध तो नहीं किन्तु शुभ भावबद्ध हूँ याचक हूँ ।
शिव सुख की आकांक्षा मन में भोगों से दूर अयाचक हूँ ।।
मैं यथा शक्ति निज भावों की वसुद्रव्य सजाकर लाया हूँ ।
सर्वतोभद्र पूजन करने जिन देव शरण में आया हूँ ।।
ॐ ह्रीं सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिन अत्र अवतर अवतर संवौषट अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ, अत्रमम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
मैं एक शुद्ध हूँ चेतन हूँ सवीज्यमान गुणशाली हूँ ।
प्रभु जन्म मरण के नाश हेतु लाया पूजन की थाली हूँ ।।
सर्वतोभद्र पूजन करके यह जीवन सफल बनाऊँगा ।
जिनराज चतुर्मुख दर्शन कर मैं सम्यक्दर्शन पाऊँगा ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्रचतुर्मुखजिनेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि
मैं निर्विकल्प हूँ शीतल हूँ मैं परम शांत गुणाशाली हूँ ।
संसार ताप क्षय करने को लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो संसारतापविनाशनायचन्दन नि
मैं अविनश्वर हूँ अविकल हूँ अक्षय अनन्त गुण शाली हूँ ।
अक्षय पद प्राप्ति हेतु स्वामी लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षत नि
मैं हूँ स्वतन्त्र निष्काम पूर्ण सिद्धों सम वैभवशाली हूँ ।
इस काम शत्रु के नाश हेतु लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चयतुर्मुखजिनेभ्यो काम बाण विध्वंसनाय पुष्प नि
मैं परम तृप्त मैं परम शक्ति सम्पन्न परम गुणशाली हूँ ।
अब क्षुधारोग के नाश हेतु लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि
मैं स्वपर प्रकाशक ज्योति पुंज मैं परमज्ञान गुणशाली हूँ ।
मोहांधकार भ्रमनाश हेतु लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपनि मैं नित्य निरन्जन चिन्मय हूँ चिद्रूप चन्द्र गुणकारी हूँ ।
मैं अष्ट कर्म के नाश हेतु लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूप नि ।
मैं चित्स्वरूप चिच्चमत्कार चैतन्यसूर्य गुणशाली हूँ ।
मैं महामोक्ष फल पाने को लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र.।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुख जिनेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल नि ।
मैं द्रव्य कर्म अरु भाव कर्म नोकर्म रहित गुण शाली हूँ ।
अनुपम अनर्घ्य पद पाने को लाया पूजन की थाली हूँ ।।सर्वतोभद्र.।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं नि ।
जयमाला
सर्वतोभद्र पूजन करके जिन प्रभु की महिमा गाता हूँ ।
चारों दिशि में अरहंत चतुर्मुख वंदन कर हर्षाता हूँ ।।१।।
प्रभु समवशरण में अंतरीक्ष हैं रत्नमयी सिंहासन पर ।
त्रयछत्रशीश अतिशुभ्र धवल भामण्डल द्युति रवि से बढकर ।।२।।
है तरु अशोक शोभायमान हर लेता सर्व शोक गिन गिन ।
देवोपम दुन्दुभियाँ बजती सुर पुष्प वृष्टि होती छिन छिन ।।३।।
मिलयक्षचमर चौसठ ढोरे प्रभु द्रिव्य ध्वनि खिरती अनुपम ।
वसु 'प्रातिहार्यों से भूषित जिनवर छवि सुन्दर पावनतम ।।४।।
वसु मंगल द्रव्यों की शोभा जन जन का मन करती हर्षित ।
सम्यक्त्व उन्हें मिलता जिनके मन में होती जिन छवि अंकित ।।५।।
है परमौदारिक देह अनन्त चतुष्टय से तुम भूषित हो ।
सर्वज्ञ वीतरागी महान् निजध्यानलीन प्रभु शोभित हो ।।६।।
जिन मन्दिर समवशरण का ही पावन प्रतीक कहलाता है ।
वेदी पर गंधकुटी का ही उत्तम स्वरूप झलकाता है ।।७।।
मोह कर्म का जब उपशम हो भेद ज्ञान कर लो ।
भाव शुभाशुभ हेय जानकर संवर आदर लो ।।
मैं यही कल्पना कर मन में जिनवर को वंदन करता हूँ ।
भावों की भेंट चढा करके भव-भव के पातक हरता हूँ ।।८।।
जो मुकुटबद्ध नृप होते वे, यह पूजन महा रचाते हैं ।
अपने राज्यों में दान किमिच्छिक देते अति हर्षाते हैं ।।९।।
इसीलिए आजनिज वैभव से हे प्रभु मैंने की है पूजन ।
शुभ-अशुभ विभाव नाशहो प्रभु कटजाये सभी कर्म बंधन ।।१०।।
सर्वतोभद्र तप मुनि करते उपवास पिछत्तर होते हैं ।
बेला तेला चौला पंचौला, उपवासादिक होते हैं ।।११।।
पारणा बीच में होती है पच्चीस पुण्य बहु होते हैं ।
सर्वतोभद्र निज आतम के ही गीत हृदय में होते हैं ।।१२।।
प्रभु मैं ऐसा दिन कब पाऊँ मुनि बनकर निज आतमध्याऊँ ।
ज्ञानावरणादिक अष्ट कर्म हर नित्य निरन्जन पद पाऊँ ।।१३।।
घनघाति कर्मको क्षय करके अब निज स्वरुप में जाऊँगा ।
सर्वतोभद्र पूजन का फल अरहंत देव बन जाऊँगा ।।१४।।
फिर मैं अघातिया कर्म नाश प्रभु सिद्ध लोक में जाऊँगा ।
परिपूर्ण शुद्ध सिद्धत्व प्रगट कर सदा-सदा मुस्काऊँगा ।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि ।
सर्वतोभद्र पूजन महान् जो करते हैं निज भावों से ।
भव सागर पार उतरते हैं बचते हैं सदा विभावों से । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमन्त्र ॐ ह्रीं श्री सर्वतोभद्र चतुर्मुखजिनाय नम
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ११९ से १२२