श्री सरस्वती पूजन
रचयिता: संघी पन्नालाल जी (शिष्य पं. सदासुखजी, जयपुर)
पूर्ण पाठ नीचे दिया है, मूल PDF (19 पृष्ठ) सबसे नीचे संलग्न।
श्री वीतरागाय नमः
श्री सरस्वती पूजन
-: रचियता :-
स्व० पं० श्री सदासुखजी, जयपुर
के शिष्य गृहपति संघी
स्व० श्री पन्नालाल जी
-: प्रकाशक :-
अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन,
मेरठ ।
देखो! शास्त्राभ्यास की महिमा
जिसके होने पर परंपरा आत्मानुभव दशा की प्राप्ति होती है,
मोक्षमार्ग रूप फल की प्राप्ति होती है। यह तो दूर ही रहो,
तत्काल ही इतने गुण प्रकट होते हैं :-
१. क्रोधादि कषायों की मंदता होती है,
२. पंचेन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्ति रूकती है,
३. अति चंचल मन भी एकाग्र होता है,
४. हिंसादि पाँच पाप नहीं होते,
५. स्तोक (अल्प) ज्ञान होने पर भी त्रिलोक के तीन काल
सम्बन्धी चराचर पदार्थों का जानना होता है,
६. हेय - उपादेय की पहिचान होती है,
७. आत्मज्ञान सम्मुख होता है,
८. अधिक-अधिक ज्ञान होने पर आनन्द उत्पन्न होता है,
९. लोक में महिमा - यश विशेष होता है,
१०. अतिशय पुण्य का बंध होता है,
इत्यादिक गुण शास्त्राभ्यास करने से तत्काल ही उत्पन्न
होते हैं, इसलिये शास्त्राभ्यास अवश्य करना।
सम्यग्ज्ञान चन्द्रिका पीठिका, पृष्ठ ६
ऊँ नमः सिद्धेभ्यः
दोहा - मायातीत मयंक सम हरन ताप संसार
ऐसे जिनपद कमल प्रति नमूं टरन भवभार॥१॥
वीतराग निर्ग्रन्थ गुरू परमागम करतार।
वृषभ सैनादिक ऋषि नमूं सुमति भरतार॥२॥
श्रीजिन मुख तें दिव्य ध्वनि प्रगटी जग हितकार।
ताहि वंदितदगुणनि को पूजन रचों विचार॥३॥
इति सरस्वती पूजन की प्रतिज्ञा करके पुष्पांजलि क्षेपण करें।
अथ श्रुतावतार वर्णन - गीतिका छन्द
जग मांहि आगम अर्थ रूपी वर्तमान त्रिकाल में।
फुनि ताहि प्रगटी करत अरहन दिव्यवाक्य विशाल में॥
तसु अर्थधारी पूज्य गणधर रचत द्वैविधि वेद हैं।
इक अंग रूपी भेद द्वादश वाह्य चवदश भेद हैं॥४॥
सब अंक चौसठ शुद्ध ज्ञायक जैनआगम माय है।
तसु भेद व्यंजन तीन त्रिंशत सात बीस सुराय है॥
फुनि योग वाहक च्यार अक्षर परम आगम बीज है।
इनके संयोग प्रसिद्ध विंशति अंक पूजित बीज हैं॥४॥
इक आठ चार सुचार छै फुनि सप्त चौ चौ मानिये।
फिर शून्य सात रू तीन सप्तक शून्य नौ तहँ जानिये॥
फुनि पंच पंचरू एक षट् इक इक पंच या विधि अंक है।
पुनरूक्त अक्षर परम आगम माँहि नाँहि निशंक हैं॥६॥
अथ सर्व श्रुत अंक रचना -
१८४४६७४४०७३७०९५५१६११५ पद तीन जाति विज्ञात जग में अर्थ नामक एक है।
तसु सप्त अक्षर परम होवे अर्थवाचक टेक है ॥
सब अष्ट अक्षर धरत जो पद तास नाम प्रमान है।
पद मध्य नामक तास तें ही परम आगम मान है ॥७॥
तसु रूप उर मधि धरन के हित शास्त्र गोमटसार है।
धनि नेमिचन्द्र सिद्धान्त भाष्यो परम दर्शनकार है ॥
तहं अंक या विधि एक षट पुनि तीन चउ अठ तीन है।
नभ सप्त वसु वसु आठ जानूं मध्य पद गुनपीन हैं ॥८॥
मध्यम पद अक्षर अंक रचना -
१६३४८३०७८८८
पद मध्य संख्या अंक इक इक दोय अठ त्रय पांच है।
फुनि आठ नभ पांच सब पद अंग द्वादश पाठ है ॥
तसु अर्थ संयुत पाठ नित प्रति करत ऋषि उवझाय हैं।
-हम तास के पद पद्म ध्यावें ज्ञान पूरन दाय हैं ॥९॥
समस्त द्वादशांग में पद अंक रचना -
११२८३५८००५
अवशेष अक्षर अष्ट नभ इक शून्य अष्ट सु एक है।
फुनि सप्त पांच विधान सेती पूजि भवि शिवनेक है॥
तसु ग्रन्थ नाम प्रकीर्ण चउ दस वर्ण गणपति कीन है।
तहं शुद्ध षट् विधि कर्म द्वै विधि आदि सब गुणलीन है॥१०॥
अंक बाह्य अक्षर अंक रचना-
८०१०८१७५
इस कल्प के मधि काल चौथो शेष निश्चय इम रह्यो।
त्रय वर्ष औ अठ मास पंदरा रोज आगम में कह्यो ॥
तब तीर्थ कारक नाम सन्मति देह त्यागन करि दियो।
धरि ब्रह्मरूप अखण्ड अनुपम जाय शिव निजपद लियो ॥११॥
तिस काल पीछे सर्व जग हित ज्ञान केवल त्रिय धरयो।
मुनि इन्द्र भूति, सुधर्म, जम्बू परम आगम विस्तरो ॥
वर्ष साठ दोय युत आर्यभूमि मांहि कीन बिहार हो।
हनि कर्म वसु विधि परम ब्रह्मन् पूज्य शिव सुखकार हो॥१२॥
श्रुतज्ञान पूरन पंच ऋषिवर वर्ष शत तक तप किया।
तसु नाम अघहन जानि विष्णु नन्दि मित्र दिगम्बरा ॥
शुभ योगधारी उग्रधारी नाम अपराजित धरा।
गोवर्द्धन फुनि भद्रबाहु पूज्य जग मधि विस्तरा ॥१३॥
इक सौ तिरासी वर्ष के मधि एक दश मुनि संग है।
ऋषि धृतिसैन विसाख क्षत्रिय सिद्ध अर्थ अभंग है ॥
जयसैन प्रोष्ठिल विजयनामी नागसैन प्रसिद्ध है।
जिनसैन बुद्धि लहि पूर्व दश लो ज्ञानधर गुन इद्ध है ॥१४॥
वर्ष द्वै शत बीस अधिके मांहि मुनिवर पांच है।
दश इक अंग विज्ञान धारी उग्र तप धर सांच है ॥
ध्रुवसैन पाण्डुक कंस नामी और मुनि जयपाल है।
जित क्रोध मोह नक्षत्र नामा कामजीत दयाल है ॥१५॥
फुनि आदि एक सुअंग धारी चार मुनिवर और हैं।
तिन मध्य पूज्य सुभद्र स्वामी भव्य पूजन ठौर है ॥
यश आदि भद्ररू सुभद्रबाहु मान्य लोहाचार्य जी।
फिर अंगधारी भये न कोई दिव्य ज्ञानी आर्य जी ॥१६॥
फिर अंग पूरव देश धारी चार मुनिवर विस्तरे।
विनयादि श्रीधर दत्त नामा भव्य बोधित जिन करे॥
शिवदत्त संज्ञक अरहदत्त सुध्याय उरमधि हम करे।
शत एक अष्टादशक वर्षा आठ यतिवर श्रुत धरे॥१७॥
छस्सै तिरेसठि वर्ष के मधि तीस दोय मुनि इम भये।
फुनि अंग देश प्रदेश धारक चारि दश ऋषिवर ठये॥
अर्हद्बली ऋषि माघ नन्दी परम मुनि धरसैन जी।
यति पुष्प दन्त रु भूतिबलि जिनचन्द्र श्रुतवर देन जी॥१८॥
मुनि कुन्द कुन्द विख्यात उमास्वामि आगमकार हैं।
पद भद्र अन्त समन्त स्वामी भव्य जन दुखहार है॥
शिव कोटि और शिव आयनं वर पूज्यपाद जगीश है।
ऋषि वीरसैन विशाल तप जिनसैन आदि मुनीश है॥१९॥
इति श्रुतावतार - अथ स्थापना
जिनानां येऽधीशा सकलजनपूज्या नरवरा।
अहो तेषां वाणी तसु धरन योग्या गणधरा॥
तथा तेषां सूत्रं श्रुतधरन्ते अघ हरैं।
स्मरानि तान् सर्वान यजन् हित सुआव्हानन करौं॥२०॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी अत्र अवतर
अवतर संवौषट् आव्हाननं। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। अत्र
मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।
अथाष्टकं (त्रिभंगी छन्द)
द्युति मत मनुक्षीरं प्रासुक नीरं गंध गहीरं भरि झारी।
चाहत भवतीरं समन कुपीरं मन करि धीरं हम वारी॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२१॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाकवादिनी तुभ्यं जन्म
जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
केशर रंग सुभीनी ल्यायनवीनी घसि करि लीनी जल लारे।
चन्दन घनसारं परिमल भारं शीतलकारं सजिवारैं।
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२२॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं संसारताप
निवारणाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षय अनियारे उज्जवल भारे धोय संवारे द्युतिधारी।
अक्षय गुन वारे गंध सुधारे पूजन कारे भरी थारी॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२३॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं अक्षय
पद प्राप्ताये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
शुचि कुसुम मनोहर परमल चय धर पंच वरन धर चुनि ल्यावे।
श्रुतपद अति विस्तर धारत गणधर मनमथ मदहरयजि ध्यावें।
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२४॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं
कामवेदना विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
अतिमिष्ट सुगंधित शशिसम अतिशित पय गुणमंडित क्षुतहारी।
व्यंजन रसपूरित अग्र सुधर नित पूजैं नित हितमति धारी॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२५॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं
क्षुधादुख निवारणाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नादिक वारे दीपक भारे घनतमहारे द्युतिधारे।
निज हाथ सुधारे अग्र तिहारे भरि भरि वारे करि सारे॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२६॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं मोहताप
हरणाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
मलयागिरि चन्दन कदलीनन्दन दाह निकंदन गंधमयं।
इन आदि सुगंधित द्रव्यनि मंडित शुद्ध सुअर्पित धूपअयं॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२७॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं अष्टकर्म
विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
दाडिम रूचिकारी सेव सुपारी श्रीफल भारी कर धारे।
तुम चरन अगारी थुति विस्तारी भरि भरि थारी हम वारे॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२८॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं मोक्षफल
प्राप्ताये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
मृदुतर शुचि वस्तर नूतन द्युतिधर दृढ़ अतिविस्तर रंगभीने।
शिवपुर सुख यर्चन रचिविधि चर्चन करि श्रुत अर्जन धरि दीने॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥२९॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं वस्त्रं
निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत हव्य सुभक्षत दीपक रक्षत उजियारे।
पुष्पादिक सारे अष्ट प्रकारे करि इकतारे सजिवारे॥
भ्रम हर जिनवानी मोक्ष निशानी तत्त्व प्रधानी हे जननी।
मदनादिक हानी गणधर जानी निगम बखानी अघ हननी॥३०॥
ॐ ह्री अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वर वाग्वादिनी तुभ्यं अनर्घ्य
पद प्राप्ताये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इति दिव्यध्वनि पूजनं
दोहा: दिव्यध्वनि अर्चन कियो, गणधर गूंथित ग्रन्थ।
नाम अर्थपरिमान कहि यजें हरन अघ ग्रन्थ॥३१॥
इति द्वादशांग तथा चौदह प्रकीर्णक प्रत्येक पूजनं कृत्वा पुष्पांजलि
क्षिपेत्।
चौपाई
साधुव्रत प्रतिपादक जान, आचारांग सुनाम बखान।
सहस अठारा पद युत अंग, यजों जलादिक धार अभंग॥३२॥
ॐ ह्रीं अष्टादश सहस्त्रपद भूषिताय सकलसाधुचरण प्रतिपादकाय
आचारांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
विनयादिक श्रुतसाधन जोग, निजमतपरमत क्रिया संजोग।
यजों सूत्र कृत अंग उदार, जाके पद छत्तीस हजार॥३३॥
ॐ ह्रीं षट् त्रिंशत् सहस्त्रपद संयुताय श्रुताराधक विनयादि
क्रियोपदेशकाय सूत्रकृतांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
एकादिक जंह स्थान निहार, जीवादिक षट् द्रव्य विचार।
स्थान अंग में यजों अनूप, सहस बियालिस पद गुन रूप॥३४॥
ॐ ह्रीं द्वाचत्वारिंशत्पद सहस्त्र प्रमिताय जीव पुद्गलादि द्रव्यांणां
एकाद्युत्तर स्थान व्याख्याकारकायस्थानाँगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
जीवादिक षट् अर्थ प्रधान, द्रव्य क्षेत्र तें कहे समान।
चौसठ सहस्त्र लक्षपद थाय, अंग चतुर्थ चजों समवाय॥३५॥
ॐ ह्रीं एक लक्ष चतुषष्टि सहस्त्र प्रमितपदाय द्रव्य, क्षेत्र, काल,
भावाश्रित जीवाद्यार्थ सामान्य निरूपणपराय समवायांगाय जलाद्यर्घम्
निर्वपामीति स्वाहा।
जीवनि के सत आदि विचार, साठ हजार प्रश्न गुणधार।
व्याख्या प्रज्ञप्ति अंग सुवाद, सहस अठाईस द्वै लख पाद॥३६॥
ॐ ह्रीं लक्षद्वै षाष्टाविंशति सहस्त्रपद भूषिताय जीवोऽस्ति नास्ति
वेत्यादि गणधर कृतषष्टिसहस्त्रप्रश्ननिरूपण कृते व्याख्या प्रज्ञप्तांगाय
जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
गणधर पृक्षा उत्तर जान, धर्मकथा अरु अर्थ प्रमान।
पांच लक्ष अरु छप्पण हजार, ज्ञातृधर्म कथा सुविचार॥३७॥
ॐ ह्रीं पंच लक्ष षट पंचाशत् सहस्त्रप्रमितपदाय गणधरकृत प्रश्नानुसार
जीवादिक स्वभाव निरूपण धर्म कथा प्रतिपादकाय ज्ञातृधर्मकथांगाय
जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
पूजों अंग उपासकाध्येन, गृही धर्म ता मधि सुखदेन।
सत्तरि सहस ग्यारह लख पाद, नमों चरन जिनके करि याद॥३८॥
ॐ ह्रीं एकदश लक्ष सप्तति सहस्त्रपद संयुक्ताय श्रावक व्रत शीलाचार
क्रिया मंत्रोपदेशकाय उपासकाध्ययनांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपा० स्वाहा।
एक एक जिन समय मझार, अन्त समय में केवल धार।
दश दश मुनीवर हैं निर्वाण, पूजन करूँ करन कल्याण॥३९॥
अन्तःकृत दशांग है नाम, अष्टम अंग ज्ञान को धाम।
याके पद लख बीस अरु तीन, उपरि सहस अठाइस चीन॥४०॥
ॐ ह्रीं त्रयोविंशति लक्षाष्टाविंशति सहस्त्रपद संयुताय तीर्थकृतां प्रति
तीर्थ दश दश मुनीश्वरा उपसर्ग विसह्य निर्वाण मितासां तेषां
कथन निरूपणपराय अंतः कृतदशांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
इक इक जिनपति समय विचार, दश दश उग्र परीषह धार।
गये मुनीश अनुत्तर मांहि, हां ते चयकरि शिव ही जांहि॥४१॥
तिनको वरनन हरे विषाद, नाम अनुत्तर युत उत्पाद।
ताके पद हैं बानवै लाख, सहस चवालिस आगम साख॥४२॥
ॐ ह्रीं दानवति लक्ष चतुः चत्वाशित् सहस्त्रपद संयुताय तीर्थेषां तीर्थ
प्रति दश दश मुनीश्वरा दारुणोपसर्ग विसह्य पूजातिशय मवाप्य
विजयादिविमानेषूत्पन्नाः, तेषां कथन निरूपणपराय
आनुत्तरोपपादकांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
निर्वेदनिता अंग मझार, ऐसी कथा कहत शुभ चार।
प्रश्न शुभाशुभ करे जो कोय, ताको उत्तर ता मधि होय॥४३॥
ऐसो अंग दशम गुणधाम शुद्ध प्रश्न व्याकरण जु नाम।
लक्ष तिरानवै सोलह चार, संख्या पद की यजों चितार॥४४॥
ॐ ह्रीं त्रिनवति लक्ष षोडस सहस्त्रपद मिताय नष्ट मुष्टि लाभालाभ
सुख दुख जीवन मरणादि प्रश्न व्याख्या कृते प्रश्न व्याकरणांगाय
जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
द्रव्य क्षेत्र को कारण पात, काल भावतें उदय लहात ।
या विधि कर्म उदय की रीति, तीव्रमंद अनुभाग प्रतीत ॥४५॥
ऐसा अर्थ हृदय में धार, यजों विपाक सूत्र मद टारि ।
ग्यारम अंग पाद एक कोडि, चौरासी लख ऊपरि जोड॥४६॥
ॐ ह्रीं एक कोड़ि चतुर शीतिलक्षपदाय कर्मोदयोदीरणाय सत्ता
प्रतिपादकाय विपाक सूत्रांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
तीन शतक अरु त्रेसठि तर्क, मिथ्यामत में भई जु गर्क।
तिनको खण्डन या श्रुत मांहि, अर्चन वन्दन भव्य करांहि॥४७॥
कोड़ि एक सौ अड़सठ लाख, छप्पन सहस जिनागम साख।
दृष्टिवाद है वारम अंग, यजत हरत मिथ्यात प्रसंग॥४८॥
ॐ ह्रीं त्रिंशत् त्रिषष्टि कुवाद स्वरूप कथकाय् एक शत कोटि अष्ट
षष्टी लक्ष पद संयुताय दृष्टिवादांगाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा:
द्वादश अंगनि को यजे, परम भक्ति उरधार।
दृष्टिवाद के भेद प्रति, देहुं अर्घ उतार॥४९॥
ॐ ह्रीं दृष्टिवादस्यान्तरभेद पूजनस्य प्रतिज्ञा कृत्वा पुष्पांजलि क्षिपेत्।
-:: छन्द चालराग ::-
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो।
प्रथम चन्द्र प्रज्ञप्ति तास में पंच यजों सुखकारी हो॥
धारत पद षट् तीन अक्ष अरु ऊपर पंच हजारी हो।
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो॥५०॥
ॐ ह्रीं षट् त्रिंशत् पंच सहस्त्र पद भूषित चंद्रायुर्गति कला वृद्धि ह्रास
देवी विभवादि वर्णनोयेन चंद्र प्रज्ञप्तै जलादि अर्घ निर्वपामीति
स्वाहा।
सूर्य प्रज्ञप्ति भेद है दूजो वरनन रवि परिवारी हो ।
पंच लक्ष अरु तीन सहस पद तिन प्रति धोक हमारी हो ।
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो ॥५१॥
ॐ ह्रीं पंच लक्ष त्रिसहस्रपद संयुत सूर्यायुर्गति विभवादि वर्णन
विचित्र सूर्य प्रज्ञप्तये जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति तीसरो कहत क्षेत्र विस्तारी हो।
तीन लाख पंचस सहस पद गणधर कृत अघहारी हो।
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो॥५२॥
ॐ ह्रीं त्रिलक्ष पंचविंशति सहस्रपद संयुत जम्बूद्वीप सम्बन्धी क्षेत्र,
नदी, द्रह कुलाचलादि निरूपण पर जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तये जलादि अर्घ
निर्वपामीति स्वाहा।
सागर द्वीप नाम जिन मन्दिर भवनत्रिक गुनसारी हो।
बावन लख छत्तीस सहस पद ताहि यजों अविकारी हो।
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो॥५३॥
ॐ ह्रीं द्वीपंचास लक्ष षटत्रिंशत सहस्रपद संयुताय संख्येय द्वीप
समुद्रगत जिनभवन भावन व्यन्तर ज्योतिष्क निवासादि रचना विशेष
प्रतिपादकय द्वीप सागर प्रज्ञप्तये जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
जीवाजीव पदारथ व्याख्या प्रज्ञप्त कहत सुधारी हो।
सहस छत्तीसरू लक्ष चौरासी पद पूजें अघहारी हो॥
दृष्टिवाद के प्रथम भेद में पंच यजों सुखकारी हो॥५४॥
ॐ ह्रीं चतुर शत लक्ष षटत्रिंशत सहस्रपद संयुत जीव पुद्गलादि
द्रव्य निरूपणपराय व्याख्या प्रज्ञप्तये जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
दुमिला छन्द ![]()
वारम अंग तनो यह भेद, कहो जिन सूत्र सुनाम प्रमाने।
तामधि सो त्रय त्रेसठ वाद, मिथ्यात तनी पखि लेय वरवाने॥
जीव पदारथ में घटना करि, ज्ञान उपावन की विधि ठाने।
है तसु आठ असी लख पाद यजो, धरि ध्यान जिनाधिप जाने॥५५॥
ॐ ह्रीं अष्टाशीति लक्ष पदाय जीवास्त्येव वनास्त्येव कर्तैव
भौक्तैवेत्याद्येकान्त वाद प्रकल्पित जीव स्वरूप प्रदर्शकाय सूत्राय
जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
- मनहर छन्द -
प्रथमानुयोग है भेद तीसरो दृष्टिवाद को पूजन योग।
तीर्थंकर बलिभद्र आदि के वैभव परिकर इन्द्रिय भोग॥
आयु काय गति नाम शुभाशुभ वर्णन विधिवत योग वियोग।
पांच हजार पद नमोचार चाप ज्यों हरन आवर्ण कुजोग॥५६॥
ॐ ह्रीं पंच सहस्त्रपदाय त्रिषष्टी महापुरूषवर चरित्र प्रतिपादकाय
प्रथमानुयोग जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
: छन्द चालराग :
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके ॥ मैं पूरब..
दृष्टिवाद को भेद जु चौथो ताको पूरब नाम।
ताके भेद चतुर्दश राजत सर्वगुणनि के धाम ॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके ॥५७॥
प्रथम पूर्व उत्पाद नाम में, जीवादिक के सारे।
उत्पादादिक धर्म कहे पद एक कोड़ि विस्तारे।
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके।मैं पूरब … ॥५८॥
ॐ ह्रीं एक कोटि पदाय जीवादिक द्रव्योत्पादादि स्वभाव निरूपणपराय
उत्पादाख्यपूर्वाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
सप्त तत्त्व षट् द्रव्य पुण्य अरु पाप सुनय पर जानूं।
अग्रायणी नाम पूर्व के छियानवे लख पद मानूं।
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब … ॥५९॥
ॐ ह्रीं षण्णवदि लक्ष पदाय द्वादशांग सारभूत सप्त तत्त्व नव पदार्थ
षट् द्रव्य सुनय दुर्नयादि स्वरूप निरूपकायाग्रायणी पूर्वाय जलाद्यर्घम्
निर्वपामीति स्वाहा।
शक्ति रूप षट् द्रव्य तने सब वरनन देत बताय।
वीर्यप्रवाद नाम पद सत्तरि लाख यजों गुन गाय॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६०॥
ॐ ह्रीं सप्तति लक्ष पद भूषिताय आत्मवीर्य परवीर्योभयवीर्य क्षेत्र
वीर्य काल वीर्य भाव वीर्य तपो वीर्यादि समस्त द्रव्य गुण पर्याय
वीर्य निरूपकाय वीर्यानुप्रवादाख्य तृतीय पूर्वाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
अस्ति नास्तिप्रवाद पूर्व में स्वै पर क्षेत्र सुआदि।
लेय अपेक्षा सप्त भंग धरि ये पद लख साठ अनादि।
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब … ॥६१॥
ॐ ह्री षष्टि लक्ष पद संयुताय जीवादि वस्तु स्व द्रव्यादि
चतुष्टयापेक्षया स्यादस्ति पर चतुष्टयापेक्षयास्यान्नास्ति इत्यादि
एवमेकानेक नित्यानित्याद्यनन्त धर्माणां विधिनैषेधा क्तव्य भंगानां
प्रत्येक द्विसंयोगत्रिसंयोगजानां प्रत्येक संख्यानां मेलनं सप्तभंगी
प्रश्नवशादेकस्मिन् वस्तुन्यविरोधेन संभवनानानय मुख्य गौणभावेन
प्ररूप कायास्तिनास्ति प्रवादनाम्ने चतुर्थ पूर्वाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
ज्ञान तने सब भेदरू संख्या रूप विषय फल आदि।
ज्ञान प्रवाद नाम पद पूजूं एक कोड़ि इक वादि॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६२॥
ॐ ह्रीं रूपो न कोटि पदाय मति श्रुतावधि मनःपर्यय केवलाख्यज्ञान
पंचकुमतिकुश्रुति विभंगाख्य ज्ञानत्रयं स्वरूप संख्या
विषयफलान्याश्रित्य तेषां प्रमाण्य विभागं निरूपकाय ज्ञानप्रवादाख्य
पंचम पूर्वाय जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
सत्य प्रवाद नाम पूरब में सत्या सत्य विचार।
वचन भेद इक कोडि पाद परि षटपद् है सुखकार।
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६३॥
ॐ ह्रीं षडुत्तरैक कोडि पद भूषिताय वाग्गुप्ति वाक् संस्कार कारणानि
द्वादशभाषा वक्तव्य भेदान् बहुविधंमृषाभिधानं दशविधं सत्यं च परूपयेत्
सत्यप्रवाद षष्टम् पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
आत्म पदारथ कर्ता भोक्ता आदिक धर्म अनेक।
आत्म प्रवाद पूर्व पद पूजूं कोटि छब्बीस विवेक।
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६४॥
ॐ ह्रीं षडविंशत् कोडि पद मिताय जीवः कर्ता भोक्ता प्राणी
वक्तापुद्गलः वेद विष्णुः स्वयंभूः शरीरीमानवः शक्ता जंतुमानी मायावी
योगी संकुटः असंकुटः क्षेत्रज्ञः इत्याद्यात्मनः स्वरूपं निरूपकाय
आत्म प्रवाद नामध्येयाय सप्तम पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्म क्रिया वसुकर्म उदीरण सत्व उदय अरु बंध।
अस्सी लख इक कोटि यजों पद कर्मप्रवाद प्रबन्ध॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६५॥
ॐ ह्रीं एक कोटि अशीति लक्ष पद भूषिताय कर्मबन्धोदयोदीरण
सत्वोत्कर्षणाय कृष्णोपशमनं संक्रमणनिधत्ति निकांचिताद्यवस्था
समवधानैर्यापथ तपस्याधः कर्मादि निरूपकाय कर्मप्रवाद पूर्वाय
जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
पाप कर्म त्यागन की बहुविधि जामें है सुखकार।
प्रत्याख्यान नाम पूरब पद चौरासी लख सार॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६६॥
ॐ ह्रीं चतुरशीत लक्ष पदाय नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र काल भावनाश्रित्य
पुरुष संहनन वलादि अनुसारेण परिमितकालंवा प्रत्याख्यान सावद्य
वस्तु निवृत्तिमुपवास विधिं तद्भावनांग पंच समिति त्रिगुप्त्यादिकं च
निरूपकाय प्रत्याख्यान नवम पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
निमित्त ज्ञान विद्यानुवाद में विद्या मन्त्र प्रसंग।
रूप सुसाधनफल पद दस लख एक कोडि शुभ चंग॥
मैं पूरब पूजाँ चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६७॥
ॐ ह्रीं एक कोडि दश लक्ष पद भूषिताय सप्तशतान्यगुंष्ठ
प्रसेनाद्यल्पविद्या पंच शतानि रोहिण्यादि महा विद्याः तत्स्व रूप
सामर्थ्य साधन मन्त्र तन्त्र पूजा विधानानि विद्वानां तासां फल
विशेषान्नष्टौ महानिमितान्यन्तरिक्ष भौमांग स्वरूप स्वप्न लक्षण व्यंजन
चिह्नानां निरूपकाय विद्यानुवाद दशम पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति
स्वाहा।
षोडश कारण आदि भावना गर्भादिक कल्याण।
तीर्थंकर आदिक के कहि पद कोडि छब्बीस सुजान॥
मैं पूरब पूजौं चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६८॥
ॐ ह्रीं षड् विंशत् कोटि पद संयुताय तीर्थंकर चक्रधर बलदेव
बासुदेव प्रति वासुदेवादिनां गर्भावतारणादि कल्याण महोत्सवान् तत्
कारणतीर्थंकरत्वादि पुण्य विशेषे हेतु षोडशकारण भावना तपो
विशेषाद्यनुष्ठानानि चन्द्र सूर्य ग्रह नक्षत्र वार ग्रहण शकुनादि फलादि
च निरूपकाय कल्याणानुवाद एकादशम पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति
स्वाहा।
भूत रोग विष दोष हरण विधि मंत्र औषधी तंत्र।
सूर साधन प्राणानुवाद पद तेरह कोड़ि स्वतंत्र॥
मैं पूरब पूजौं चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥६९॥
ॐ ह्रीं त्रयोदश कोटि पद प्रमितायकाय चिकित्साद्यष्टांगमा युर्वेद
भूति कर्म जांगुलिक पक्रर्म इला पिंगला सुषुम्ना बहु प्रकार
प्राणायामविभांग दशप्राणानामुपकाराय कारक द्रव्याणि च
गत्याद्यनुसारेण प्ररूपकाय प्राणप्रवादाख्य द्वादशं पूर्वाय जलाद्यर्घं
निर्वपामीति स्वाहा।
संगीतादिक शास्त्र क्रिया चव चौंसठि कलाप्रसार।
त्रिलोक बिन्दुसार पूर्व के पाद कोडि नवसार॥
मैं पूरब पूजौं चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब …॥७०॥
ॐ ह्रीं नव कोटि पद भूषिताय संगीत शास्त्र छन्दोलंकारादि द्वादश
सप्तति कला चतुःषष्टि त्रीगुणान शिल्पादि विज्ञानानि चतुर्शीतिं
गर्भाधानादिकाः अष्टोत्तरशतं सम्यग्दर्शनादिका पंचविंशति देव
वन्दनादिका नित्यनैमित्तिक क्रियाश्च प्रदर्शकाय क्रियाविशालनाम्ने
त्रयोदश पूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
तीन लोक विस्तार गणित युत क्रिया मोक्ष सुखकार।
लाख पचास कोड़ि पद द्वादश लोक बिन्दु नगसार॥
मैं पूरब पूजौं चौदह भेद जितायके॥ मैं पूरब ०॥७१॥
ॐ ह्रीं पंचाशत् लक्षाग्र द्वादश कोटि पद विभ्राज मानाय त्रिलोकस्वरूप
षट् विंशति परिकर्माणि अष्टौ व्यवहारान् चत्वारि बीजानि मोक्षस्वरूप
तद्भमन कारण क्रियाः मोक्ष सुखं च प्रत्यायकाय त्रिलोकबिन्दुसार
चतुर्दशमपूर्वाय जलाद्यर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
:: मनहर छन्द ::
नाम चूलिका भेद पंचमू बारम अंग तनो यह जान।
ताके भेद पंच जिन भाषित तिनके पद दश कोडि सुजान॥
एक घाटि पचास लाख फुनि सहस छियालिस संख्या मान।
यजों सदा उरधार ज्ञानयुत भिन्न भिन्न पद नाम बखान॥७२॥
इति चूलिका पूजन प्रतिज्ञां कृत्वां पुष्पांजलि क्षिपेत्।
प्रथम चूलिका जलगत नामा कहत गमन जल थंभन मंत्र।
तथा अग्नि के थंभन भक्षण गमनादिक विधि भाषत तंत्र॥
याके पद दो कोडि लक्ष नव सहस्त्र नवासी दौ सै युक्त।
अर्घ चढ़ाय यजें हम नित्यप्रति देहु ज्ञान सब संशय मुक्त॥७३॥
ॐ ह्रीं द्वि कोटि नवलक्ष नवशीति सहस्त्र द्विशतपद विराजमानायै
जलस्थंभन जलगमनाग्निस्तंभन भक्षणासन प्रवेशनादि कारण मंत्र
तंत्र तपश्चरणादि निरूपिकायै जलगत चूलिकायै जलाद्यर्घम्
निर्वपामीति स्वाहा।
द्वितीय चूलिका स्थलकगत नामा मेरु कुलाचल भूमि प्रवेश।
तथा शीघ्र गमनादिक कारण मंत्र तंत्र तप आदि विशेष॥
कहत यथावत भ्रमतम नाशत जैसे भाषो केवलि नाद ।
यजों कोडि दो लक्ष नवाधिक सहस नवासी दौ सै पाद ॥७४॥
ॐ ह्रीं द्वि कोटि नवलक्ष नदशीति सहस्र द्विशतपद विराजमानायै
जलस्थंभन जलगमनाग्निस्तंभन भक्षणासन प्रवेशनादि कारण मंत्र
तंत्र तपश्चरणादि निरूपिकायै चूलिकायै जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
तृतीय चूलिका मायागत है इन्द्रजाल विधि करे बखान ।
सब विधि माया करत प्रकट नित मंत्र तंत्र तपश्चरण विधान॥
लक्ष नवाधिक कोटि दोय फुनि सहस नवासी द्वैशत जान ।
ज्ञानावरणी नाश करन हित शीश नवाऊं पूजा ठान ॥७५॥
ॐ ह्रीं पूर्वोक्त चूलिका पद प्रमाण संहिताये मायारूपेन्द्र जाल
विक्रिया करणमंत्र तंत्र तपनुष्ठानादीनि निरूपिकायै मायागत चूलिकायै
जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
तूर्य चूलिका रूप गया है ताके पद दो कोटि विख्यात ।
लक्ष नवाधिक सहस नवासी द्वै शत युत यजत भ्रम जात ॥
सिंह अश्व गज रूप धरण हित मंत्र तंत्र तप कहत रसाल ।
काष्ठ लेप चित्राम आदि के लक्षण धातु रसायण चाल ॥७६॥
ॐ ह्रीं पूर्वोदितपद प्रमाणाश्रितायै सिंह अश्व करी तुरंगगरूड़ नर
तरू हरिण शश वृषभ व्याघ्रादि रूपं परावर्तन कारण मंत्र तंत्र
तपश्चरणादि चित्रकाष्ठ तप तपनादि लक्षण धातु वादरसंवाद
वान्यवादानि प्रतिष्ठायै चूलिकारूपगतायै नमः जलाद्यर्घं निर्व० स्वाहा।
पंचम नभगति नाम चूलिका कोटि दोय नवलक्ष प्रमान।
सहस नवासी द्वैशत संयुत कहे तास पद बुद्धिनिधान॥
तामधि गगन गमन गणनायक कारणहेतु विधि कही न जाय।
मंत्र तंत्र तप आदि प्ररूपण जानि यजें शुभ अर्घ चढ़ाय ॥७७॥
ॐ ह्रीं पूर्वोदित चूलिका गत पद आकाशगमन कारण मंत्र तंत्र
तपश्चरणादीनि प्रदर्शिकायै आकाशगत चूलिकायै नमः जलाद्यर्घं
निर्वपामीति स्वाहा।
इति द्वादश अंग पूजन
दोहाः अंग बाह्य अक्षर रहे तिनके चौदह ग्रन्थ ।
नाम प्रकीर्णक थापि के रचे परम निर्ग्रन्थ ॥
अर्चना अनुक्रम तैं अब करें द्रव्य वसु धार ।
मन,वच,तन अति नम्र करि लक्षण नाम उचार॥७८॥
इति प्रकीर्णकपूजायाः प्रतिज्ञां कृत्वा पुष्पांजलि क्षिपेत्।
अष्टपदी छन्दः-
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥
षट् नाम स्थापन आदि राजत हैं भेद सही ।
सामायिक धर्म अनादि सब विधि नित्य कही ॥७९॥
ॐ ह्रीं नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र काल भाव भेदात् षट् विधाय मिथ्या
दर्शन कषायादि संक्लेश निवृत्ति वाचकाय सामायिक नाम्ने प्रथम
प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
तहँ तीर्थंकर चौबीस महिमा नित्य धरें।
हम स्तवन भेद प्रति सीस मन वच नम्र करें ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८०॥
ॐ ह्रीं पंच महाकल्याण चतुःत्रिंशत अतिशयाष्टौ महाप्रातिहार्य
परमौदारिक दिव्य देह समवशरण धर्मोपदेशनादि तीर्थंकर महात्म्य
व्यापकाय संस्तवविधानाय द्वितीय प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम्
निर्वपामीति स्वाहा।
कहि तीर्थंकर इक नाम थुति जहं राजत ही ।
तसु नाम वन्दना धाम सब गुणकार सही ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८१॥
ॐ ह्रीं एक तीर्थंकरावलम्बनाय चैत्यालयादि स्तवन प्रतिपादकाय
वंदना नाम्ने तृतीय प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
यह प्रतिक्रमण गुणवेश सप्त सुभेद धरै ।
जिन भाषित धर्म विशेष संचित पाप हरै ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८२॥
ॐ ह्रीं दैवशिक रात्रिक पाक्षिक चौमासिक साम्वत्सरिकेर्यापथिकोतमार्थ
भेदात्सप्त विधाय प्रमादजनित दोष निराकरणाय प्रतिक्रमणाख्याय
चतुर्थ प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
जहं दर्शन आदि विभेद विजय जु पंच विधि ।
यजौ बैन इक वर भेद पाऊं आत्मनिधि ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८३॥
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र तप उपचार विनय पंच विधि
प्रदर्शकाय वैनयक नाम्ने पंचम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
कृति कर्म छठो शुचि अंग भाषत सब किरिया।
भवि पूजन धार उमंग जलनिधि जग तिरिया॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं॥८४॥
ॐ ह्रीं अर्हत्सिद्धाचार्य बहुश्रुतसाध्वादीनां देवतानां च वन्दना निमित्त
त्रिवारं प्रदक्षिणा चतुःशिरोनतय द्वादशावर्तादि लक्षण नित्य नैमित्तिक
क्रिया विधाय कृति कर्माख्यषष्ठं प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम्
निर्वपामीति स्वाहा।
हैं द्वादश वैतालिक मांहि यति आचार सही ।
भवि पूजि शिवालय जांहि जिनवर एम कही ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८५॥
ॐ ह्रीं साधूनामाचार गोचर विधिं पिण्ड सुलक्षणं च वर्णयते द्वादश
वैतालिकाख्य सप्त प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
वर नाम उत्तराध्येयन अष्टम भेद लह्यो।
बहु भांति परीषह लेन यतिन विधान कह्यो॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं॥८६॥
ॐ ह्रीं चतुर्विधोपसर्ग द्वाविंशति परीषह सहन विधानं तत्फलं वर्णयते
उत्तराध्ययननाम्ने अष्टम् प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति
स्वाहा।
मुनि नवम कल्प व्यवहार प्रायश्चित राखै ।
मुनि योग्य अहार विहार विधिवत विधि भाखै ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रत तम नाशत हैं ॥८७॥
ॐ ह्रीं ऋषीणां योग्यानुष्ठानविधान योग सेवायां प्रायश्चितं च प्रख्यायकार्य कल्प व्यवहार नाम नवम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
यह कल्पाकल्प मनोज्ञ मुनिवर योग्य अबै ।
कहे द्रव्य क्षेत्र के योग्य अवर अयोग्य सबै ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८८॥
ॐ ह्रीं द्रव्य क्षेत्र काल भावनाश्रित्य साधूनामदयोग्य मिति विभागं विवर्णयते कल्पाकल्प नाम दशम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
जिन कल्प मुनि त्रय योग प्रतिमा योग चहैं ।
फुनि स्थिविर कल्प मुनि योग महा सुकल्प कहैं ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८९॥
ॐ ह्रीं महा साधूनां जिनकल्पानामुत्कृष्टं संहननादि विशिष्ट द्रव्य क्षेत्र काल भाववर्तिनां योग्यं त्रिकाल योगाद्यनुष्ठानस्थविर कल्पानां दीक्षाशिक्षागणपोषणात्मक संस्कार सल्लेखनोतमार्थं स्थानगतोत्कृष्टाय आराधना विशेषं च निरूपकाय एकादशम महाकल्प संज्ञक प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
कहिं पुडरीक मधि चार, सुरगति सुख कारण ।
सुनि शरण गहो मुझ तार, भव भव दुख वारण ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८९॥
ॐ ह्रीं भवन व्यन्तर ज्योतिषीकल्पवासी विमानेषुत्पत्तिकरण दान पूजाँतपश्चरण काम निर्जरा सम्यक्त्व संयमादि विधानं तदुपपाद स्थान वैभवविशेषं चं व्यावर्णयते पुंडरीकसंज्ञक द्वादशम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
वर पुन्डरीक मधि इन्द्र, आदिक बहु ऋद्धि के ।
सब उत्पत्ति हेतु गणेन्द्र, भाषे सब विधि के ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८९॥
ॐ ह्रीं महर्द्धिकेषु इन्द्र प्रतीन्द्रादिषुत्पत्ति कारण तपो विशेषाद्याचरणा ख्यायकाय महापुन्डरीक संज्ञक त्रयोदशम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
चवदशम निषिधिका जान आतम शुद्धि करैं ।
सब प्रायश्चित विधान पूजत पाप हरैं ॥
शुभ नाम प्रकीर्णक जास गणधर भाषित हैं ।
हम पूजि पदाम्बुज तास भ्रम तम नाशत हैं ॥८९॥
ॐ ह्रीं प्रमाद जनित दोष विशुद्ध्यर्थम् बहु प्रकार प्रायश्चित्त प्रकथकाय निषिद्धकासंज्ञक चतुर्दशम प्रकीर्णकाय नमः जलाद्यर्घम् निर्वपामीति स्वाहा।
इति चतुर्दश प्रकीर्णक पूजनं।
दोहा:
द्विविध वेद कूं पूजि करि वर्तमान श्रुत हेत ।
अर्घ बनाकर देत हूँ पूरन पुन्य निकेत ॥
इति वर्तमान श्रुत पूजन प्रतिज्ञां कृत्वा पुष्पांजलि क्षिपेत्।
हरिगीता छन्द :-
इस काल फुनि इस क्षेत्र माहीं नित्य दर्शनकार हैं ।
तत्त्वार्थ सूत्र त्रिलोक गोमट लब्धिक्षपणा सार हैं ॥
त्रय ज्ञान नाटक अष्ट पाहुड द्रव्य संग्रह नाम हैं ।
फुनि न्याय कुमुदनंदी चन्द्रकोदय नेमसार जु धाम हैं।९४॥
जैनेन्द्र वैय्याकरण अनुपम युक्तियुत अनुशासनं ।
सर्वार्थ सिद्धि श्लोकवार्तिक राजवार्तिक भाषनं ॥
स्वामिकार्तिक कथित द्वादश भावनां अघमुक्त हैं ।
आत्मानुशासन स्तोत्र देवागम की टीकायुक्त हैं।९५॥
फुनि पद्मनन्दि पचीसिका शुभ परम आप्तपरीक्षका ।
पुरुषार्थ सिद्धोपाय मूलाचार न्याय सुदीपका ॥
त्रय रतन करंड श्रावक वरण सब गुण युक्त हैं ।
आचार साररु ज्ञान अर्णव योग सार विमुक्त हैं ।९६॥
तत्त्वार्थ सार प्रमाण पंकज मार्तण्ड प्रमाण हैं ।
वृहदादि उत्तर खण्ड द्वै युत महत नाम पुराण हैं ।
इन आदि और अनेक ऋषिकृत ग्रन्थ जिनमत माहि हैं।
तिन सर्व के प्रति अर्घ देकर ज्ञान निर्मल पाय हैं ॥९७॥
ॐ ह्रीं वर्तमान सकल जिनागमैभ्यौ नमः अर्घ्यम् निर्वपामिति स्वाहा।
॥ अथ जयमाला ॥
छन्द राग सरंग :-
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग । सर ०।
जिन मुख कंज प्रसव को थानक उपजत तरुण सुचंग ॥
द्वादश अंग धर प्रसरति जग में चवदश धारि उपंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग। सर ०॥९८॥
मुनिजन को मन स्वच्छ करण हित नितप्रति धरत उमंग ।
सप्त भंग नय तरल तरंगनि सोहत है जिमि गंग ॥
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग। सर ०॥९९॥
मोह महाचल भेद ताप हर करत ज्ञान सर्वंग ।
लोक शिखर शिवसदन लसत तव प्रेरित बढ़त अपंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग। सर०।१००॥
एक रूप निर अक्षर उपजत उचरत नेक प्रसंग ।
द्वादशभाषा मय है विचरत परचत ज्ञान अभंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०।१०१॥
एक दोय त्रय चार पंच षट् आदि प्रमाण प्रसंग ।
बौद्ध आदि मत मान्य खंड कर दो विधि कहत अभंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०२॥
विषय अविद्या युत है जग जान होय रहे अरधंग ।
चन्द्र किरण सम होय निरन्तर जाग्रत करत सुचंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०३॥
भव विष क्षत चित् चेतन दायक सुधा अनोपम संग ।
मनमथ मद कृत ज्वर रुग भंजन औषधि एक अभंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०४॥
करत कुतर्क खंडनहिं तेरो गणधर कहत अभंग ।
संशयादि त्रय दोष विगत है मम हरि शत्रु अनंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०५॥
समयसार निज रूप तिहारो गतमल ज्ञान सुरंग ।
तत्त्वारथ के ज्ञाता गणधर स्तवन करत नमि अंग॥
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०६॥
निखिल वस्तु को तत्त्व दिखावे दिनकर जेम उतंग।
जड़ता ममता हरता देवी करता ज्ञान सुचंग॥
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०७॥
दुर्द्धर दुर्जय अष्ट मदादिक और कषाय कुरंग ।
अनादि काल तें भव वन मांहि दुखित कियो दुरंग ।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०८॥
श्रद्धा दृढ युत ज्ञान चरित करि हरिये कुमति कुसंग।
दोष वचन हरि प्रियहित वाणी करिये सुमति सुचंग।
सरस्वती जगमाता तू तो करत सदा शिव संग।सर०॥१०९॥
छन्द द्रुमिलता :-
नित राजत आगम अर्थ मई, जिनराज प्रकाशतु बुद्धि ठई।
सुनि कीन गणाधिप ग्रंथ जईं, पुनि ग्रंथ रचे मुनिराज कई॥११०॥
तिनके पद नाम यथावत ही, भवि जीवयति शिव जावत ही।
करि अर्घ यजों जस गावत ही, जिन वच महिमा कही सब ही॥१११॥
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखोत्पन्न सरस्वती भगवती वरवाक्वादिन्यै नमः तुभ्यं
अर्घ्यं - महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
अथ फलस्तुतिरूप आशीर्वाद ![]()
शिखरिणी :
करै हैं जो पूजा श्रुतपद तनी शुद्ध चित्त सूं ।
तथा कृत्वा स्तोत्रं निज उर धरैं अर्थ हित सूं ॥
टरैं तेषां विघ्नं सकल जन सेवा नित करैं ।
लहे स्वच्छं सौख्यं विविधि नित युक्ताक्षति हरैं ॥
इति पठत्वा पुष्पांजलि क्षिपेत्।
जाप्य मंत्र (108 बार)
ॐ ह्रीं वर वाग्वादिनी भगवती सरस्वती ह्रीं नमः।
-: अथ श्री गुरावली जी :-
छंद शेर -
जयवंत दयावंत सुगुरू देव हमारे,
संसार विखम षार से जिन भक्ति उधारे।
जिन वीर के पीछे यहां निर्वान के थानी,
बासठ बरस में तीन हुये केवल ज्ञानी।
फिर सौ बरस में पांच श्रुत केवली भये,
सर्वांग द्वादशांग का उमंग रस लये ॥१॥
तिस बाद बरस एक शतक और तिरासी,
इनमें हुये दश पूर्व ग्यारह अंग के भासी।
ग्यारह महामुनीस ज्ञान दान के दाता,
गुरूदेव सोई देयगें भवि वृंद की साता ॥ २ ॥
तिस बादि बरस दोय सतक बीस के मांही,
मुनि पंच ग्यारह अंग के पाठी हुये आही।
तिस बादि बरष एक सौ अठारह में जानी,
मुनि चार हुये एक आचारंग के ज्ञानी ॥ ३ ॥
तिस बाद हुये हैं जु सुगुरू पूर्व के धारक,
करूना निधान भक्त को भव सिन्धु उधारक।
करकंज ते गुरू मेरे ऊपर छाह कीजिये,
दुषदंद के निकद को आनन्द दीजिये ॥ ४ ॥
यो वीर के पीछे सौ वरस छः सौ तिरासी,
तब तक रहें इस अंग के गुरूदेव अभ्यासी।
तिस वाद कोई फिर न हुये अंग के धारी,
पर होत भये महा सो विद्या न उदारी ॥ ५ ॥
जिन सौं रहा इस काल में जिनधर्म का साका,
रोपा है सात भंग क़ा उमंग पताका।
गुरू देव नंद और आदि दे बड़े नामी,
निर्ग्रन्थ जैन पंथ के गुरू देव जो स्वामी ॥६॥
भाषों कहां लों नाम बडी वार लगेगा,
परनाम करो जिससे बेड़ा पार लगेगा।
तिसमें से कछुक नाम सूत्रकार का कहो,
जिस नाम के परभाव से परभाव को दहो। ७ ॥
तत्त्वार्थ सूत्र नाम उमा स्वामी किया है,
गुरू देव ने संक्षेप से क्या काम किया है।
जिसमें अपार अर्थ विश्राम किया है,
बुद्ध वृंद जिसे ओर सेइ नाम किया है ॥ ८ ॥
दह सूत्र है इस काल में जिन पंथ की पूंजी,
सम्यक्त ज्ञान भाव है जिस सूत्र की कूंजी।
लड़ते हैं उसी सूत्र से परवाद के मूंजी,
फिर हार के हट जाते हैं इक पक्ष के लूंजी ॥ ९ ॥
स्वामी समंत भद्र महाभाष रचा है,
सर्वांग सात भंग का उमंग मचा है।
परवादियों का सर्व गर्व जिससे पचा है,
निर्वान सदन का सोई सुयान जचा है ॥ १० ॥
अकलंक देव राजवार्तिक बनाया,
परमान नय निक्षेप से सब वस्तु बताया।
श्लोक वारतीक विद्यानन्द जी मंडा,
गुरूदेव ने जड़ मूल से पाखंड को खंडा ॥ ११ ॥
गुरूपाद पूज्य जी हुये मरजाद के धोरी,
सर्वार्थ सिद्ध सूत्र की टीका जिन्होंने जोरी।
जिसके लखै सु फिर न रहे चित्त में भरम,
भवि जीव को भासे है सुपर भाव का मरम ॥ १२ ॥
धरसैन गुरू जी हरो भव वृंद की वृथा,
कर्म प्रवाद पूर्व में कछु ज्ञान जिन्हें था।
जिनके हुये दो शिष्य पुष्पदंत भूतबली,
धवलादि का सूत्र जिससे मग चली ॥ १३ ॥
गुरू और ने उस सूत्र का सर्व अर्थ लहा है,
तिन धवल महाधवल जेसु धवल कहा है।
गुरू नेमि चन्द्र जी हुये धवलादि के पाठी,
सिद्धान्त के चक्रीस की पदवी जिन्होंने गाठी ॥ १४ ॥
तिन तीन हो सिद्धान्त के अनुसार सो प्यारे,
गोमटसार आदि सो सिद्धान्त उचारे।
इह पहिलई सिद्धान्त का विरतान्त कहा है,
अब और सुनो भाव से जो भेद महा है ॥ १५ ॥
गुणधर मुनीस ने पढ़ा था तीजा पराभूर्त,
ज्ञान प्रवाद पूर्व में जो भेद है आश्रित।
गुरू हस्त नागजी ने सोई तिन से लहा है,
फिर तिन से जतीनायक ने मूल गहा है ॥ १६ ॥
तिस चूर्णिका सरूप तिससे सूत्र बनाया,
प्रमान छः हजार यो सिद्धान्त में गाया।
तिसका किया उद्धर्न समुर्द्धन जी टीका,
बारह हजार के प्रमाण ज्ञान की ठीका ॥ १७ ॥
तिस ही से रचा कुन्दकुन्द जी ने सुससान,
जो आतमीक पर्म धर्म का प्रकासन।
पंचास्तिकाय समैसार सार प्रवचन,
इत्यादि जो सिद्धान्त स्याद्वाद का रचन ॥ १८ ॥
सम्यक्त ज्ञान दर्श सो चारित्र अनूपा,
गुरूदेव ने अध्यात्मीक धर्म निरूपा।
गुरूदेव अभीन्दु ने तिसकी करी टीका,
झरता है निजानंद से अभिवृंद सरीका ॥ १९ ॥
चरनान भेद में निर्वेद के कर्ता,
गुरूदेव जो हुये हैं पाप ताप के हर्ता।
वसुनंद वट्ठकेय आदि धर्म के चक्री,
निर्ग्रंथ ग्रंथ पंथ के निर्ग्रंथ ये सक्री ॥ २० ॥
जोगेन्द देव ने रचा परमात्मा प्रकाश,
शुभचन्द्र ने किया है ज्ञानार्णव प्रकाश।
कि पद्मनंद जी ने पद्मनंद पचीसी,
शिव कोटि ने आराधना सुसार रचीसी ॥ २१ ॥
दो संध तीन संध चार संध पांच संध,
षट् संध सात संध लों गुरू रचा है प्रबन्ध।
गुरू देव नन्द ने किया जैनेन्द्र व्याकर्ण,
जिसमें हुआ पर वादियों का मान हरन ॥ २२ ॥
गुरू देव ने रची है रुचिर जैन संधिता,
वरनाश्रमादि की किया है हि संधिता।
वसुनंद वीर नंद जसोनंद संधिता,
इत्यादि है वनी सु दश प्रकार संधिता ॥ २३ ॥
परमेय कमल मारतंड के हुए कर्ता,
प्रमेन्दु माणिक्य नंदि नय प्रमाण के भरता।
जैवंत सिद्ध सैन सुगुरू देव दिवाकर,
जै वाद सिंध देव सिंध जैति जसोधर ॥ २४ ॥
श्री दत्त काण भिक्ष और पात्र केसरी,
श्री वज्रसूर महासेन श्री प्रभाकरी।
श्री जटाचारी वीर सैन महा सैन हैं,
जय सैन श्रीपाल मुझे काम धेन हैं ॥ २५ ॥
ये एक एक गुरु ने जोके ग्रन्थ बनाया,
कहि कौन सके नाम कोई पार न पाया।
जिनसैन गुरू ने महा पुराण रचा है,
मर्याद क्रिया काण्ड का सब भेद खरा है ॥ २६ ॥
गुणभद्र गुरू ने रचा उत्तर पुराण को,
सो देव सुगुरू देवजी कल्याण थान को।
रवि सैन गुरू जी रचा राम का पुरान,
जो मोह तिमिर भानने को भान के समान ॥ २७ ॥
पुन्ना दृगण विषै हुये जिन सैन दूसरो,
हरिवंश को बना के दास आस को भरो।
इत्यादि जे बसु बीस सुगुण मूल के धारी,
निर्ग्रंथ गुरू जे हुये जिन ग्रन्थ के कारी ॥ २८ ॥
बंदों तिन्हें मुनि जे हुये कवि काव्य के करैया,
वंदामिगमक साध जे टीका के धरैया।
वादी नमो मुनि वाद में परवाद हरैया,
गुरू वागमीक को नमो उपदेश भरैया ॥ २९ ॥
इह नाम गुरू देव का कल्यान करे है,
भवि वृंद का तत्काल ही दुःख दर्द हरे है।
धन धान्य ऋद्धि सिद्धि नवो निद्धि भरे हैं,
आनंद कंद देहे सबै विघ्न टरे हैं ॥ ३० ॥
इह कण्ठ में धारे जु सुगुरू नाम की माला,
परतीत सो अरु प्रीति सों ध्यावे सु त्रिकाला।
इह लोक का सुख भोगि सो सुर लोक में जावे,
नर लोक में फिरि आयके निर्वान को पावे ॥ ३१ ॥
जयवंत दयावंत सुगुरू देव हमारे,
संसार विखम खार से जिन भक्ति उधारे॥
॥ इति श्री सरस्वती पूजन - श्री गुरावली सम्पूर्णम् ॥
: चौपाई :
आर्य क्षेत्र मधि जयपुर नाम, रामसिंह भूपति जसधाम।
मंत्री पद में राव महान, तिष्ठत जीवनसिंह सुजान॥
गृहपति संघी पन्नालाल, धारत श्रद्धा भाव दयाल।
विद्यागुरू तसु जगत प्रसिद्ध नाम सदा सुख है गुन इद्ध॥
जेठ शुक्ल पंचमी शनि जान उगणीसै इक बीस बखान।
मंगलहित जिन वचनचितार, पूजन रच्यो भक्ति उरधार॥
श्रावक वकसी नेमिचन्द्र, शुद्ध कियो नित गाय सुछंद।
यजत सुनत भविज्ञान लहाय, अर्हत्पद धरि शिवपुर जाय॥
मंगल कारक श्री अरहन्त, सिद्धचिदातम सूरि भनंत।
पाठक सब साधु गुनवंत, सुमरि भव्य शिव सौख्य लहंत॥
शास्त्र का अभ्यास करो।
तुमने भाग्य से अवसर पाया है, इसलिये तुमको हठ से भी
तुम्हारे हित के लिये प्रेरणा करते हैं। जैसे हो सके वैसे इस शास्त्र
का अभ्यास करो। अन्य जीवों को जैसे बने वैसे शास्त्राभ्यास
कराओ। जो जीव शास्त्राभ्यास करते हैं उनकी अनुमोदना करो।
पुस्तक लिखवाना व पढ़ने-पढ़ाने वालों की स्थिरता करनी
इत्यादि शास्त्राभ्यास के बाह्य कारण, उनका साधन करना;
क्योंकि उनके द्वारा भी परंपरा कार्य सिद्धि होती है व महत् पुण्य
उत्पन्न होता है।
सम्यग्ज्ञान चन्द्रिका पीठिका, पृष्ठ १६
भेद ज्ञान के घन घिर आये…
भेद ज्ञान के घन घिर आये, समकित-सावन बरसे-री।
बूँद-बूँद सीपी-अन्तर में, मोती बनकर सरसे-री॥१॥
बँद पाँखुड़ी खिली हृदय की, पवन ज्ञान की परसे-री।
तप-संयम की बेला आयी, जियरा मेरो हरषे-री॥२॥
द्रव्य-द्रष्टि पाई चेतन ने, निज-स्वभाव ही दरशे-री।
संयम के दो क्षण पाने को, इन्द्रादिक भी तरसे-री॥३॥
भेद ज्ञान के घन घिर आये…
माँ जिनवाणी स्तुति
जयवन्तो जिनवाणी माता, जयवन्तो जिनधर्म महान।
जयवन्तो श्री कुन्दकुन्द अरु, जयवन्तो वीतराग-विज्ञान॥
भव सागर से तर जाने का, मार्ग तुम्ही दिखलाती हो।
भेद-ज्ञान की अनुपम विधि, हमको तुम सिखलाती हो॥
शुद्ध-बुद्ध अरु नित्य निरंजन, शाश्वत सुख की खान है।
द्रव्य द्रष्टि से जो देखेगा, स्वयं-सिद्ध भगवान है॥
हे माता! तेरी करूणा से, पायेंगे हम पद निर्वाण।
जयवन्तो जिनवाणी माता, जयवन्तो जिनधर्म महान॥
देहादिक संयोग कर्म के, पुद्गल का विस्तार है।
इन सबसे अति भिन्न चिदानन्द, आतम तत्त्व हमारा है॥
राग-द्वेष से भिन्न हो जिसने, अपनी वस्तु पिछानी है।
राग-द्वेष परिणति पुद्गल की, उनसे मेरी क्या हानि है॥
रत्नत्रय की निधि को पाकर, हम भी बन जायें भगवान।
जयवन्तो जिनवाणी माता, जयवन्तो जिनधर्म महान॥
होनहार वह भली हमारी, आज उदय में आयी है।
नरभव पाया जैनधर्म अरु, माँ जिनवाणी पायी है॥
है उपकार श्री गुरूओं का, जिनवाणी समझायी है।
हे गुरू! तव पावन करूणा से, हमको सुबुद्धि आयी है॥
भव कानन से हम निकलेंगे, आज रहे है मन में ठान।
जयवन्तो जिनवाणी माता, जयवन्तो जिनधर्म महान॥
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Saraswati_Pujan_Sanghi_Pannalal_ji.pdf (41.3 MB, 19 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/58858।