श्री सप्तऋषि पूजन (पं. रंगलाल) | Shri Saptarishi Pujan (Ranglal)

श्री सप्तऋषि पूजन

श्री सप्त ऋषि पूजन - 1

स्थापना (छप्पय)

प्रथम नाम श्रीमन्व दुतिय स्वरमन्व ऋषीवर ।
तृतीय मुनि श्री निचय सर्व सुन्दर चौथो वर ।।
पंचम श्री जयवान विनयलालस षष्ठम भनि ।
सप्तम जय मित्राख्य सर्व चारित्र-धाम गनि ।।

ये सातों चारण-ऋद्धि-धर, करूँ तास पद थापना ।
मैं पूजूँ मन वचन काय करि, जो सुख चाहूँ आपना ।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादि चारणर्द्धिधर सप्तर्षीश्वराः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री मन्वादि चारणर्द्धिधर सप्तर्षीश्वराः ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री मन्वादि चारणर्द्धिधर सप्तर्षीश्वराः ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

(हरिगीतिका)
शुभ-तीर्थ-उद्भव-जल अनूपम, मिष्ट शीतल लायकैं ।
भव-तृषा-कंद-निकंद-कारण, शुद्ध घट भरवायकैं ।।

मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिनकी पूजा करूँ ।
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनन्द विस्तरूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री मन्व-स्वरमन्व-निचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्राख्य चारणर्द्धिभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्रीखण्ड कदलीनन्द केशर, मन्द-मन्द घिसायकैं ।
तसु गन्ध प्रसरित दिग-दिगन्तर, भर कटोरी लायकैं ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

अति धवल अक्षत खण्ड-वर्जित, मिष्ट राजत भोग के ।
कलधौत-थारा भरत सुन्दर, चुनित शुभ उपयोग के ।।
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिनकी पूजा करूँ ।
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनन्द विस्तरूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

बहु-वर्ण सुवरण-सुमन आछै, अमल कमल गुलाब के ।
केतकी चंपा चारु मरुआ, चुने निज कर चावके ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

पकवान नाना भाँति चातुर, रचित शुद्ध नये-नये ।
सदमिष्ट लाडू आदि भर बहु, पुरट के थारा लये ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

कलधौत-दीपक जड़ित नाना, भरित गोघृत-सारसों ।
अतिज्वलित जग-मग ज्योति जाकी, तिमिर नाशन हारसों ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

दिक्-चक्र गन्धित होत जाकर, धूप दश अंगी कही ।
सो लाय मन-वच-काय शुद्ध, लगाय कर खेहूँ सही ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

वर दाख खारक अमित प्यारे, मिष्ट चुष्ट चुनायकैं ।
द्रावडी दाडिम चारु पुंगी, थाल भर-भर लायकैं ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल गन्ध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना ।
फल ललित आठौं द्रव्य-मिश्रित, अर्घ्य कीजे पावना ।।मन्वादि.।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(घत्ता)
वन्दूँ ऋषिराजा, धर्म-जहाजा, निज-पर-काजा करत भले ।
करुणा के धारी, गगन-विहारी दुःख-अपहारी भरम दले ।।
काटत जम-फन्दा, भवि-जन वृन्दा, करत अनन्दा चरणन में ।
जो पूजैं ध्यावैं, मंगल गावैं, फेर न आवैं भव-वन में ।।

(पद्धरी छन्द)
जय श्रीमनु मुनिराजामहन्त, त्रस थावर की रक्षा करन्त ।
जय मिथ्या-तम-नाशक पतंग, करुणा रस-पूरित अंग-अंग ।।
जय श्रीस्वरमनु अकलंकरूप, पद-सेव करत नित अमर-भूप ।
जय पंच अक्ष जीते महान्, तप तपत देह कंचन-समान ।।

जय निचय सप्त तत्त्वार्थ भास, तप-रमातनों तन में प्रकाश ।
जय विषय-रोध सम्बोध भान, परणति के नाशन अचल ध्यान ।।
जय जयहिं सर्वसुन्दर दयाल, लखि इन्द्रजालवत जगत्-जाल ।
जय तृष्णाहारी रमण राम, निज-परणति में पायो विराम ।।

जय आनन्दघन कल्याणरूप, कल्याण करत सबकौ अनूप ।
जय मद-नाशन जयवानदेव, निरमद विरचित सब करत सेव ।।
जय जयहिं विनय लालस अमान, सब शत्रु मित्र जानत समान ।
जय कृशित-काय तप के प्रभाव, छवि छटा उड़ति आनन्द दाय ।।

जय मित्र सकल जग के सुमित्र, अनगिनत अधम कीने पवित्र ।
जय चन्द्र-वदन राजीव नैन, कबहूँ विकथा बोलत न बैन ।।
जय सातों मुनिवर एक संग, नित गगन-गमन करते अभंग ।
जय आये मथुरापुर मँझार, तहँ मरी रोग को अति प्रचार ।।

जय-जय तिन चरणनि के प्रसाद, सब मरी देवकृत भई वाद ।
जय लोक करे निर्भय समस्त, हम नमत सदा नित जोड़ हस्त ।।
जय ग्रीष्म-ऋतु पर्वत मंझार, नित करत आतापन योगसार ।
जय तृषा-परिषह करत जेर, कहूँ रंच चलत नहिं मन सुमेर ।।

जय मूल अठाइस गुणनधार, तप उग्र तपत आनन्दकार ।
जय वर्षा-ऋतु में वृक्ष तीर, तहं अति शीतल झेलत समीर ।।
जय शीतकाल चौपट मंझार, कै नदि सरोवर तट विचार ।
जय निवसत ध्यानारूढ़ होय, रंचक नहीं भटकत रोम कोय ।।

जय मृतकासन व्रजासनीय, गौदूहन इत्यादिक गनीय ।
जय आसन नाना भांति धार, उपसर्ग सहत ममता निवार ।।
जय जपत तिहारो नाम कोय, लख पुत्र पौत्र कुल वृद्धि होय ।
जय भरे लक्ष अतिशय भण्डार, दारिद्रतनो दुःख होय छार ।।

जय चोर अग्नि डाकिन पिशाच, अरु ईति भीति सब नसत साँच ।
जय तुम सुमरत सुख लहत लोक, सुर असुर नमत पद देत धोक ।।

(रोला)
ये सातों मुनिराज, महातप लछमी धारी ।
परमपूज्य पद धरैं सकल जग के हितकारी ।।

जो मन वच तन शुद्ध होय सेवे ओ ध्यावै ।
सो जन ‘मनरंगलाल’, अष्ट ऋद्धिनकौं पावै ।।

(दोहा)
नमन करत चरनन परत, अहो गरीब निवाज ।
पंच परावर्तननितैं, निरवारो ऋषिराज ।।

ॐ ह्रीं श्री मन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)


Artist: पण्डित रंगलाल जी
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २५२ से २५५
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ १२१ से १२४