श्री सप्त ऋषि पूजन - 2
जय जयति जय सुरमन्यु, जय श्रीमन्यु, निचय, मुनिश्वरम् ।
जय सर्व सुन्दर, पूज्य श्री जयवान, परम यतिश्वरम् ।।
जय विनयलालस और श्री जयमित्र, मुनिवर ऋषिवरम् ।
जय ध्यानिपति, जय ज्ञान मति जिन साधु सप्त ऋषिवरम् ।।
जय ऋद्धि सिद्धि महान् धारी, महामुनि जगदीश्वरम् ।
जय सकल जग कल्याणकारी, दयानिधि अवनिश्वरम् ।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, निचय, सर्व सुन्दर, जयवान, विनय लालस, जय मित्र, सप्तर्षीश्वराः! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, निचय, सर्व सुन्दर, जयवान, विनय लालस, जय मित्र, सप्तर्षीश्वराः! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, निचय, सर्व सुन्दर, जयवान, विनय लालस, जय मित्र, सप्तर्षीश्वराः! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
सप्त तत्त्व श्रद्धान पूर्वक आत्म प्रतीत वरूँ स्वामी ।
सप्त भयों से रहित बनूँ मैं जन्म मरण नाशूँ स्वामी ।।
सुरमन्यु, श्रीमन्यु आदि जयमित्र सप्त ऋषीवर बन्दन ।
श्रद्धा ज्ञान चरित्र शक्ति से काटूँ भव भव के बन्धन ।।
ॐ ह्रीं श्रीसुरमन्यु, श्रीमन्यु आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त दश नियम नित पालन कर सप्ताक्षरी मंत्र ध्याऊँ ।
सप्त नरक, सुर, पशु, नर गतिमय भव आताप नशाऊँ ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त सुगुण दाता के पाऊँ सप्त स्थान दान दूँ नित्य ।
सप्त व्यसन तज निज आतम भज अक्षय पद पाऊँ निश्चय ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त शुद्धिपूर्वक सामायिक करूँ त्रिकाल शुद्ध मन से ।
सप्त शील को पाल काम अरि नाश करूँ निज चिन्तन से ।।
सुरमन्यु, श्रीमन्यु आदि जयमित्र सप्त ऋषीवर बन्दन ।
श्रद्धा ज्ञान चरित्र शक्ति से काटूँ भव भव के बन्धन ।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्दरेभ्यो कामबाण विध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त कुम्भ व्रत चार शतक छयानवे महा उपवास करूँ ।
इनमें इकसठ करूँ पारणा क्षुधारोग फिर नाश करूँ ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त नयों के द्वारा स्वामी वस्तु तत्त्व का करूँ विचार ।
मोहनाश हित सात प्रतिक्रमण करके पालूँ ज्ञानाचार ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सातभंगस्याद्वाद मयी जिन वाणी की छाया पाऊँ ।
केवलज्ञान लब्धि को पाकर अष्टकर्म पर जय पाऊँ ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो अष्टकर्म विध्वंशनाय धुपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त समुद्घातों में स्वामी केवली समुद्घात पाऊँ ।
आठ समय पश्चात् मोक्ष पा पूर्ण शाश्वत सुख पाऊँ ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्त परम स्थानों में निर्वाण स्थान शिवपुर जाऊँ ।
पद अनर्घ से सादि अनन्त सिद्ध सुख पाऊँ हर्षाऊँ ।।सुरमन्यु.।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
महा पूज्य पावन परम श्री सात ऋषिराज ।
आत्म धर्म रथ सारथी तारण तरण ज़हाज ।।
तीर्थंकर मुनि सुव्रत प्रभु का जब था शासनकाल महान् ।
रामचन्द्र बलभद्र नृपति के गूंजे थे जग में यशगान ।।
धर्म भावना से करते थे अगणित जीव आत्म कल्याण ।
चारण आदि ऋद्धियाँ पाकर पा लेते थे मुक्ति विहान ।।
नगर प्रभापुर के अधिपति थे श्री नन्दन नृप वैभववान ।
उनके सात सुपुत्र हुए धरणी रानी से अति विद्वान् ।।
सुरमन्यु, श्रीमन्यु, निश्चय, जयमित्र सर्व सुन्दर जयवान ।
श्री विनयलालस गुणधारी सत्यशील से शोभावान ।।
लाड़ प्यार में सर्व भौतिक सुख से भूषित सुकुमार ।
राजकाज भी देखा करते थे सातों ही राजकुमार ।।
नृप प्रीतिंकर मुनि बन घोर तपश्या में रत हुए महान् ।
शुक्ल ध्यान धर घाति कर्म हर पाया अनुपम केवलज्ञान ।।
अगणित देवों ने स्वर्गों से आकर गाया जय जय गान ।
पिता सहित सातों पुत्रों को भी आया निज आतम भान ।।
प्रतिबोधित होकर दीक्षा मुनि पद अंगीकार किया ।
अट्ठाइस मूल गुण धारे मोक्ष मार्ग स्वीकार किया ।।
श्री नन्दन ने केवल ज्ञान प्राप्त कर सिद्धालय पाया ।
सातों पुत्रों ने भी तप करके सप्त ऋषि नाम पाया ।।
ये सातों ही एक साथ तप करते थे भव भय हारी ।
महाशील का पालन करते अनुपम दान ब्रह्मचारी ।।
कुछ दिन में इन चारणादि ऋद्धियों के स्वामी ।
महा तपस्वी परम यशस्वी ऋद्धिश्वर जग में नामी ।।
रामचन्द्रजी के लघुभ्राता करते थे मथुरा में राज ।
न्यायपूर्वक प्रजा पालते थे शत्रुघ्न नृपति महाराज ।।
मधु राजा को जीत राज मथुरा का इनने पाया था ।
मधु का मित्र असुरपति एक चमरेन्द्र यक्ष तब आया था ।।
अति क्रोधित हो रौद्र भावमय उसके मन में बैर जगा ।
किया प्रकोप महामारी का मथुरा का सौभाग्य भगा ।।
ईति भीति फैलाई इतनी नगरी सूनी हुई अरे ।
जहाँ गीत मंगल होते थे वहाँ शोक के मेघ घिरे ।।
हाहाकार मचा नगरी में शून्य हुए गृह मानवों से ।
पाप उदय हो तो क्या कोई पार पा सका दानवों से ।।
पुण्योदय से इक दिन श्री सप्त ऋषि मथुरा में आये ।
गगन विहारी नभ से उतरे जन जन ने दर्शन पाये ।।
तत्क्षण रोग महामारी का नष्ट हुआ सब हर्षाये ।
राजा प्रजा सभी ने अति हर्षित होकर मंगल गाये ।।
मुनि चरणों के शुभ प्रताप से सारी नगरी धन्य हुई ।
सात महा ऋषियों के दर्शन करके पुरी अनन्य हुई ।।
जल थल नभ से सप्त ऋषियों की गुंज्जी जय जयकार ।
धन्य तपश्या धन्य महामुनि धन्य हुआ तुमसे संसार ।।
सीताजी ने नगर अयोध्या में इनको आहार दिया ।
विनय भाव से वन्दन करके अक्षय पुण्य अपार किया ।।
श्री सप्त ऋषि परम ध्यान धर हुए भवार्णव के उस पार ।
परम मोक्ष मंगल के स्वामी सकल लोक को मंगलकार ।।
महा ऋद्धिधारी ऋषियों को सादर शीश झुकाऊँ मैं ।
मन वच काय त्रियोग पूर्वक चरण शरण में आऊँ मैं ।।
ऐसा दिन कब आयेगा प्रभु जब जिन मुनि बन जाऊँगा ।
जिन स्वरूप का अवलम्बन ले आठों कर्म नशाऊँगा ।।
सप्त भूमि अथवा निगोद आदि भव व्यथा मिटाऊँगा ।
जिन गुण सम्पत्ति हेतु महाव्रत धार सब राग नशाऊँगा ।।
सप्ताहार दोष मैं टालूँ सात विषय करो नित नाश ।
तजूँ सप्त पक्षमासों को पाऊँ सम्यक्ज्ञान प्रकाश ।।
सप्त रत्न का लोभ ना जागे ना चौदह रत्नों का राग ।
सप्त विंशति अधिक शताक्षरी मंत्र जपूँ कर निज अनुराग ।।
मनुज देव पशु नर्क निगोदादिक में दुख ही दुःख पाया ।
भव संताप मिटाने का प्रभु आज स्वर्ण अवसर आया ।।
सप्त तपों ऋद्धियाँ प्राप्तकर वीतरागता उर लाऊँ ।
पाप पुण्य पर भाव नाश हित श्री सप्त ऋषि को ध्याऊँ ।।
द्वादश तप की महिमा पाऊँ शुद्धातम के गुण गाऊँ ।
ग्रीष्म शीत वर्षा ऋतु में भी निज आत्म लख मुस्काऊँ ।।
विविध भांति के व्रत मैं पालूँ निरतिचार हो शल्य रहित ।
प्रभो सिंह निष्क्रीडित आदिक तप व्रत परिसख्यान सहित ।।
केवलज्ञान प्रगट कर स्वामी चार घातिया नाश करूँ ।
सिद्ध शिला पर सदा विराजूँ आदिकाल मोक्ष प्रकार वरूँ ।।
सप्त ईति और भीतिया पल में हो जाये अवसान ।
अखिल विश्व में मंगल छाये सभी सुखी हों समतावान ।।
ॐ ह्रीं श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु आदि सप्तर्षिश्वरेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री सप्त ऋषिवर चरण जो लेते उर धार ।
अष्ट ऋद्धियाँ प्राप्त कर हो जाते भव पार ।।
।।पुष्पांजलिम् क्षिपेत्।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २५६ से २६०