श्री सम्यग्दर्शन पूजन
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श्री सम्यक् दर्शन पूजन
स्थापना
( सोरठा )
सम्यक् दर्शन पूर्ण, हर लेता मिथ्यात्व सब।
भव्य भावना पूर्ण, मोक्ष प्रदायक श्रेष्ठ है॥
पूजूँ मन वच काय, सम्यक् दर्शन भावमय।
करूँ आत्म कल्याण, यही सुमति दो हे प्रभो॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
( ताटंक )
सम्यक् नीर प्राप्त करने को ध्यान लगाऊँ निज स्वामी।
जन्म मृत्यु भय क्षय करने को स्वबल जगाऊँ हे स्वामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
समकित चंदन की गरिमा से शोभित हो जाऊँ स्वामी।
भव आतप ज्वर क्षय करने को शुद्ध भाव लाऊँ नामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक् अक्षत भावमयी ला भवदधि तर जाऊँ स्वामी
अक्षय पद अखंड निज पाऊँ निजानंद पाऊँ नामी।
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय अक्षयपदप्राप्ताय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक् पुष्प शील गुण भूषित तुम्हें चढ़ाऊँ हे स्वामी।
कामबाण पीड़ा को नाशूँ पद निष्काम वरूँ नामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक् अनुभव रस चरु लाऊँ क्षुधा व्याधि नाशूँ स्वामी।
चिर अतृप्ति को नष्ट करूँ मैं परम तृप्ति पाऊँ नामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक् दीप प्रभा से मिथ्याभ्रम तम चूर्ण करूँ नामी।
मोह तिमिर अज्ञान विपर्यय संशय सब नाशूँ स्वामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक् धूप चढ़ाऊँ पावन शुक्ल ध्यान वाली नामी।
अष्टकर्म अरिध्वंस करूँ मैं कर्म रहित होऊँ स्वामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध भाव फल महामोक्ष सुख नित्य निरंजन दो स्वामी।
यही प्राप्त करना है मूझको विनय सूनो अन्तर्यामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमा पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय मोक्षफलप्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा।
धर्म शुक्ल दोनों ध्यानों के अर्घ्य बनाए हैं स्वामी।
पद अनर्घ्य की प्राप्ति करूँ मैं विनय यही अन्तर्यामी॥
सम्यक् दर्शन की पूजन का भाव हृदय में आया है।
समकित की महिमां पाने को गुरु ने मुझे जगाया है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शनाय अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यग्दर्शन के अष्ट अंग सम्बन्धी अर्घ्य
(सार जोगीरासा)
शंका दोष विहीन बनूँ मैं निर्मल समकित धारूँ।
तत्त्वाभ्यास करूँ नित स्वामी आत्मस्वरूप विचारूँ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री निशंकित-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कांक्षादोष तजूँ हे स्वामी निर्मलता उर धर लूँ।
भवसुख की इच्छाएँ सारी हे प्रभु मैं सब हर लूँ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री निकांक्षित-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
विचिकित्सा का दोष त्याग दूँ समकित हृदय सजाऊँ।
ऋषि मुनियों की वैय्यावृत्ति में अपना ध्यान लगाऊँ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ ॥३॥
ॐ ह्रीं श्री निर्विचिकित्सा-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अनूपगूहनदोष त्यागकर गुण सबके प्रगटाऊँ।
ऋषि मुनि श्रावक सबके दोषों को न कभी प्रगटाऊँ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री उपगूहन-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मूढ़दृष्टियुत दोष विनाशूँ सकल मूढ़ता नाशूँ।
निज शुद्धात्मतत्त्व की महिमा पाऊँ ज्ञान प्रकाशूँ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री अमूढ़दृष्टि-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनपथ से जो डिगते हों मैं उनको सुथिर बनाऊँ।
धर्मीजन की सेवा करके अपना धर्म निभाऊँ ॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यग्दर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी, सर्वदोष विनशाऊँ ॥६॥
७. ॐ ह्रीं श्री स्थितिकरण-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
साधर्मी वात्सल्य न भूलूँ प्रीति करूँ मैं मन से।
मुनि अरु श्रावक संघ की सेवा करूँ मैं तन-मन-धन से॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यग्दर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री वात्सल्य-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रीजिनधर्म प्रभाव करूँ मैं शुद्ध आचरण द्वारा।
जिनश्रुत ज्ञानदान आदि से दूर करूँ अंधियारा॥
अष्टदोष से विरहित होकर सम्यदर्शन पाऊँ।
सम्यक् श्रद्धापूर्वक स्वामी सर्वदोष विनशाऊँ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री प्रभावना-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
सम्यक्दर्शन बिन नहीं, स्वपर भेद-विज्ञान।
रत्नत्रय का मूल यह, महिमामयी महान॥
(वीरछन्द)
आत्मतत्त्व की प्रतीति निश्चय सप्ततत्त्व श्रद्धा व्यवहार।
सम्यक्दर्शन से हो जाते भव्य जीव भव सागर पार॥
विपरीताभिनिवेशरहित अधिगमज निसर्गज समकित सार।
औपशमिक क्षायिक क्षयोपशम होता है यह तीन प्रकार॥
आर्ष, मार्ग, बीज, उपदेश, सूत्र, संक्षेप अर्थविस्तार।
समकित है अवगाढ़ और परमावगाढ़ दश भेद प्रकार॥
जिन वर्णित तत्त्वों में शंका लेश नहीं निःशंकित अंग।
सुरपद या लौकिक सुख वांछा लेश नहीं निकांक्षित अंग॥
अशुचिपदार्थों में न ग्लानि हो शुचिमय निर्विचिकित्सा अंग।
देव शास्त्र गुरु धर्मात्माओं में रुचिं अमूढ़दृष्टि सुअंग॥
पर दोषों को ढकना स्वगुण वृद्धि करना उपगूहन अंग।
धर्ममार्ग से विचलित को थिर रखना स्थितिकरण सुअंग॥
साधर्मी में गोवत्स सम पूर्ण प्रीति वात्सल्य सुअंग।
जिन पूजा तप दया दान मन से करना प्रभावना अंग॥
आठ अंग पालन से होता है सम्यक् दर्शन निर्मल।
सम्यक् ज्ञान चारित्र उसी के कारण होता है उज्ज्वल॥
शंका कांक्षा विचिकित्सा अरु मूढ़दृष्टि अनूपगूहन।
अस्थितिकरण अवात्सल्य अप्रभावना वसु दोष सघन॥
कुगुरु कुदेव कुशास्त्र और इनके सेवक छः अनायतन।
देव मूढ़ता गुरु मूढ़ता लोक मूढ़ता तीन जघन॥
जाति रूप कुल ऋद्धि तपस्या पूजा शक्ति ज्ञान मद आठ।
मूल दोष सम्यक् दर्शन के यह पच्चीसों तजो विराट॥
जय जय सम्यक्दर्शन आठों अंग सहित अनुपम सुखकार।
यही धर्म का सुदृढ़ मूल है इसकी महिमा अपरम्पार॥
मोक्ष महल की पहिली सीढ़ी पावन परम पवित्र प्रधान।
कुन्द कुन्द ने यही कहा है दंसण मूलो धर्म महान॥
ॐ ह्रीं श्री अष्ट-अंगयुतसम्यग्दर्शनाय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आशीर्वाद
(दोहा)
सम्यक् दर्शन प्राप्तकर, करूँ आत्म कल्याण।
निज स्वभाव की शक्ति से, पाऊँ पद निर्वाण॥
इत्याशीर्वाद
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shri_Samyagdarshan_Pujan.pdf (17.8 MB, 13 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/57825।