श्री समुच्चय पूजन (दशलक्षण धर्म) | Shri Samuchchay Pujan (Dashlakshan Dharm)

श्री समुच्चय पूजन (दशलक्षण धर्म)

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स्थापना
( छन्द-गीतिका )

धर्म दशलक्षण परम महिमामयी का ज्ञान लूँ।
धार इनको हृदय में शुद्धात्मा को जान लूँ॥
धर्म उत्तम क्षमा पावन क्रोध का करता विनाश।
धर्म उत्तम मार्दव निज विनय का करता प्रकाश॥

धर्म उत्तम आर्जव ऋजुतामयी सुखकार है।
धर्म उत्तम सत्य श्रेष्ठ असत्य नाशनहार है॥
धर्म उत्तम शौच तृष्णा लोभ हर्ता है महान।
धर्म उत्तम परम संयम मुक्ति सुखदाता प्रधान॥
धर्म उत्तम तप अनिच्छुक भाव करता है प्रदान।
धर्म उत्तम त्याग शोभा आत्मा की है महान॥
धर्म उत्तम पूर्ण आकिंचन परम सुखरूप है।
ब्रह्मचर्य स्वधर्म उत्तम शील सिन्धु अनूप है॥

यही हैं दश धर्म उत्तम करूँ मैं पूजन सदा।
मार्ग भव का छोड़कर शिवमार्ग पाऊँ सौख्यदा॥

( छन्द-सोरठा )

क्षमा आदि दश धर्म, निज आत्मा के धर्म हैं।
इनसे जो विपरीत, वे सब भव के कर्म हैं॥
आत्म-धर्म की प्राप्ति, होती है सम्यक्त्व से।
करूँ विधान महान, सम्यग्दर्शन प्राप्ति हित॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-
तपस्त्याग-आकिंचन्य-ब्रह्मचर्य दशधर्म!
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।

परि पुष्पांजलि क्षिपेत्।

अष्टक
( वीरछन्द )
समभावी निर्मल जल पाकर करूँ आत्मा का अभिषेक।
जन्म जरा मरणादि रोग हर गुण अनंत पाऊँ प्रत्येक॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढ़ूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी निज चंदन लाऊँ तिलक लगाऊँ भली प्रकार।
भवज्वर नाशूँ ताप विनाशूँ शीतल शिवसुख मिले अपार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढ़ूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः क्रोधकषायविनाशनाय
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी अक्षत गुण पाऊँ करूँ आत्मा का उद्धार।
अक्षय पद की प्राप्ति करूँ प्रभु ध्रुव सुख पाऊँ अपरम्पार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढ़ूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मानकषायविनाशनाय
अक्षतान् निर्वपमीति स्वाहा।

समभावी निज शील पुष्प ला करूँ आत्मा का शृंगार।
काम-बाण विध्वंस करूँ मैं महाशील गुण लूँ उर धार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मायाकषायविनाशनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी नैवेद्य चढ़ाऊँ परम तृप्ति पाऊँ अविकार।
क्षुधा-रोग विध्वंस करूँ पद निराहार पाऊँ इस बार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो लोभकषायविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी निज दीप उजारूँ पाऊँ उर में ज्ञान अपार।
दर्शनमोह चरित्रमोह हर केवल-रवि पाऊँ शिवकार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी निज ध्यान धूप ले आत्मधर्म का लूँ आधार।
अष्ट कर्म विध्वंस करूँ मैं हो जाऊँ स्वामी निर्भार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो विभावपरिणतिविनाशनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी तरु के फल लाऊँ महामोक्ष फल के दातार।
भाव-द्रव्य संयममय मुनि बन पाऊँ सुख ध्रुवधाम अपार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो महामोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

समभावी गुण अर्घ्य बनाऊँ हो जाऊँ भवसागर पार।
पद अनर्घ्य अविनश्वर पाऊँ सादि अनंत सौख्य दातार॥
उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों का पालन कर भली प्रकार।
चढ़ूँ मोक्ष के सोपानों पर पाऊँ मुक्ति-भवन का द्वार॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महार्घ्य

( वीरछन्द )

समकित के घिर आए बदरा, तत्त्वज्ञान की चली बयार।
भेदज्ञान की दामिनि दमकी, अनुभव रस की झरी फुहार॥
तप्त हृदय चंदनसम शीतल, क्षीण क्षणिक में राग विकार।
शुद्धातम की अक्षत महिमा, की छायी है अजब बहार॥

परम विवेक मयूर कूजता, नाचत गावत शुद्ध मल्हार।
पुण्य-पाप शुभ-अशुभ आस्रव के सब बंद हो गए द्वार॥
संवर नाचे छम छम छम छम, हुई निर्जरा अब साकार।
शिव-सरि उमड़-उमड़ लहरायी, बहा ले गई राग विकार॥
रत्नत्रय की बजी बाँसुरी, चेतन हो भव-सागर पार।
मोक्षमहल की सुख-शय्या पर, मुक्ति-वधू की लो मनुहार॥

( दोहा )

महा अर्घ्य अर्पण करूँ, श्री दश धर्म महान।
एक मात्र ध्रुवधाम निज का शृंगार प्रधान॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला
( छन्द-चौपाई )

उत्तम दश लक्षण उर धारूँ,
कर्म-दोष सब ही निरवारूँ॥
अब इनकी जयमाला गाऊँ,
इन्हें धार उर शिवसुख लाऊँ॥

( वीर छन्द )

एकदेश श्रावक जन पालन करते हैं दशलक्षण धर्म।
सर्वदेश मुनि पालन करते हो जाते हैं वे निष्कर्म॥
केवल आत्मचिन्तवन करते विषयों की अभिलाषा त्याग।
निरारंभ मुनिवर होते हैं तिल-तुष तक से कभी न राग॥

आत्मध्यान में रत रहते हैं परम तपस्वी श्री मुनिराज।
ये दश उत्तम धर्म पाल कर पा लेते हैं निजपद राज॥
पहले सम्यग्दर्शन लेते फिर व्रत धारण करते हैं।
माया मोह विनाश शीघ्र ही निज अनुभव रस भरते हैं॥

स्व-पर विवेक बिना सम्यग्दर्शन का होता कभी न नाम।
सम्यग्दर्शन बिना न मिलता मुनि को भी सच्चा विश्राम॥
बिन समकित के जप तप व्रत सब कर्मबंध के ही कारण।
समकित हो तो जप तप व्रत संयम सब ही भवदधि तारण॥

जैसे अगर इकाई हो तो शून्य सभी होते बलवान।
बिना इकाई शून्य शून्य है सभी जानते हैं गुणवान॥
उसी भाँति समकित बिन सारा श्रम है शून्य समान सदा।
भवसागर दुख का कारण ही होता है यह सदा सदा॥

पहले दशलक्षण व्रत का अभ्यास करके हम रुचिपूर्वक।
जब सम्यग्दर्शन हो जाए तब व्रत धारें विधि पूर्वक॥
यही धर्म है श्रेष्ठ लोक में यही मोक्ष के दस सोपान।
इन पर क्रम-क्रम से चढ़ने पर प्राणी पा लेते निर्वाण॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-
सत्य-संयम-तपस्त्याग-आकिंचन्य-ब्रह्मचर्य-
दशलक्षणधर्मेभ्यो जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आशीर्वाद
( रोला )
दशलक्षण विधान की पूजन उर को भायी।
अब तो काललब्धि भी देखो मेरी आयी॥
दश धर्मों का पालन करूँ सदा ही स्वामी।
आत्मध्यान कर शिवसुख पाऊँ अन्तर्यामी॥
इत्याशीर्वादः

-: जाप्य मंत्र :-

॥ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि-दशलक्षणधर्मेभ्यो नमः॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51117।