श्री सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र पूजन | Shri Sammed Shikhar Siddh Kshetra Pujan

श्री सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र पूजन

स्थापना
(दोहा)
शाश्वत शिखर सम्मेद श्री, तीरथराज महान् ।
मुनि अनंत भगवंत ने, यहीं लिया निर्वाण ॥
(चांद्रायण छंद)
तीन काल के जिनवर सिद्ध होंय जिस भू पर ।
तीन काल के मुनिवर चरण पड़े जिस दर पर ॥
तीन काल के भव्य इसी भू पर आते हैं।
शाश्वत सिद्ध क्षेत्र का यश गणधर गाते हैं ।।
तीर्थराज सम्मेदाचल की करूँ वंदना ।
भावतीर्थ से तिरुँ करूँ आतम - आराधना ।।
मुनि अनंत निर्वाण पधारे सम श्रेणी में ।
तीन लोक सिर राज रहे कलगी सम प्रभु जे ॥
आओ पधारो नाथ सभी तीर्थंकर आओ ।
कोटि-कोटि मुनि मुक्त हुये सब हृदय समाओ ।।
शाश्वत सिद्धिधाम, तुम्हारा अभिनंदन है ।
मुक्ति पधारे कोटि-कोटि प्रभुवर वंदन है ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । परिपुष्पांजलि क्षिपेत्।
(वीर)
मुनिवृंदों के पावन थल का, कण-कण वैराग्य जगाता है।
सम्मेदशिखरजी तीर्थ सदा, आराधक भाव सजाता है ।।
निज मंगलमय शुद्धात्म तीर्थ, जीवन मंगलमय हो जाये ।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जो भाव सहित वंदन करते, सिद्धों सम ध्यान लगाते हैं
भवताप रहित हो जाते हैं, वे जगत् पूज्य बन जाते हैं ।।
चंदन से चरचूं चरणाम्बुज, जो सन्त मुनि भगवंत हुये ।
जयवंते श्री सम्मेद शिखर, जयवंते मुनि जो मोक्ष गये ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा।
शाश्वत मुक्ति का पावन थल, सम्मेद शिखर कहलाता है।
तीर्थंकर हुये अनंत मुक्त, सबका यह मोक्ष विधाता है ।।
चारों ही गतियाँ अति दुखमय, अक्षयपद पाकर मुक्त हुये ।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
निष्काम भावना भाकर प्रभु-तुम कामजयी हो गए नाथ ।
चैतन्य ब्रह्म को निरख रहे, तुम सम हो जाउँ मैं सनाथ ।।
एकाभवतारी लौकांतिक, अनुमोदन करते धन्य भये ।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
हे महातपस्वी महातीर्थ, है ज्ञानस्वभाव अनाहारी ।
इस देह-व्याधि के मंदिर से, छोडूं मैं भी रिश्तेदारी ।।
इस क्षुधा-व्याधि को जीत सकूँ, वंदूँ प्रभु तुम तो मुक्त हुये।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अब तक जितने भी सिद्ध हुये, अर जो भविष्य में भी होगें।
सब भेदज्ञान की ज्योति जला, अनुभव कर मुक्ति श्री लेगे ॥
इस महाज्योति से ज्योति जला, वंदूँ मुनिवर जो मुक्त हुये।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
हँस हँसकर कर्म सदा बांधे, रो रोकर सहता आया हूँ।

अपनी प्रभुता को भूल गया, भव-भव में गोते खाया हूँ ॥
संसार महासागर दुखमय, वसु कर्म नाश भव-मुक्त हुये।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्धात्म तत्त्व का अनुभव ही, शाश्वत तीरथ सम्मेद शिखर।
यह ही भव्यों को धर्मस्थल, बस भाव वंदना होय सफल ॥
प्रभु पाप-पुण्य फल से विरक्त, निज रस में आप प्रमत्त हुये।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि जो मोक्ष गये ॥
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जयवंते तीर्थ सम्मेद शिखर, जयवंते आराधक महान् ।
जयवंते रत्नत्रय तीरथ, सर्वोदय तीरथ मुक्ति-यान ॥
पंचमगति पाने भव्य पथिक, मुनि वृंद यहाँ ही आते हैं।
शुद्धातम ध्यान लगाते हैं, भव-सागर से तिर जाते हैं ।॥
यह अर्घ्य समर्पित करता हूँ, पाऊँ अनर्घ पद हे स्वामी ।
जयवन्ते श्री सम्मेद शिखर, जयवन्ते मुनि अर्न्तयामी ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर क्षेत्रेभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(ताटंक)
जय तीर्थराज सम्मेद शिखर, भविजन ही दर्शन पाता है ।
यहीं आतम ध्यान लगाता है, यहीं सिद्ध प्रभू बन जाता है ।।
पर्वत का कण-कण वंदनीय, सिद्धों की याद दिलाता है।
हे जीवराज ! जागो सत्वर, यह अवसर तुम्हें जगाता है ॥
तीर्थंकर बीस जिनेश्वर ने, यहाँ मुक्तिवधू का वरण किया।
मुनिराज असंख्य अनंतों ने, कण-कण को आकर धन्य किया ॥
जहाँ साधु संत के चरण पड़ें, वह भूमि तीर्थ हो जाती है।
यहाँ द्रव्य तीर्थ और भाव तीर्थ, संगम सरिता दिखलाती है ।।
दिनकर की प्रतिदिन शुभ यात्रा, इस गिरि वंदन से होती है।

प्रभु पारस शरण जिसे मिलती, वह पाता निश्चित मुक्ति है ।।
सीता गंधर्व सरस झरने, मुक्ति के गीत सुनाते हैं ।
साधक सन्तों के पग धोकर, अपना सौभाग्य बढ़ाते हैं ।।
सुरपति अपने परिवार सहित, यहाँ भक्ति-भाव से आता है।
एकाभवतारी इन्द्रराज, मुक्ति के वाद्य बजाता है ।।
श्री कुंथुनाथ कुन्थु-रक्षक, यह प्रथम टोंक सबसे मंगल ।
मन हर्षित गदगद हो जाता, जब मिलते प्रभु के चरण धवल ॥
चौबीस जिनेश्वर के गणधर, शुद्धात्म ध्यान धर मुक्त हुये ।।
श्री वृषभसेन गौतम आदिक, सबके पद वन्दूँ हर्ष लिये ।।
श्री कूट मित्रधर नमिनाथ, इस दिव्य भूमि पर आये थे ।
श्री नाटककूट अरह जिनवर, समता-सागर में समाये थे ।।
प्रभु मोह-मल्ल का नाश किया, श्री मल्लिनाथ जिनवर स्वामी ।
श्री संबल कूट किया पावन, आतम संबल से जग नामी ।।
श्री संकुल कूट श्रेयांसनाथ, निःश्रेयस पद को प्राप्त किया।
चारों गति के दुखियारों को, शिवपथ का श्रेयस मार्ग दिया ।।
श्री सुविधिनाथ जी सुप्रभ कूट, श्रीपद्म प्रभु जी मोहन कूट।
निर्जर टोंक मुनिसुव्रतजी ने, पाई अक्षय निधि अटूट ।।
ललित कूट से मोक्ष पधारे, चन्द्रप्रभ जी चन्द्रानन ।
सम्मेदशिखर प्रभु दर्शन पा, मैं धन्य हो गया हे भगवन ॥
कैलाश शिखर अष्टापद से, श्री आदिनाथजी मुक्त हुये ।
श्री बालि महाबलि मुनिवर, जयवंते मुनि जो मुक्त हुये ॥
श्री शीतलनाथ कूट विद्युतवर, स्वयंप्रभ कूट अनंतनाथ ।
श्री धवल कूट संभव जिनवर, नमूँ वासुपूज्य चम्पापुर जय ।।
अभिनंदन प्रभु का अभिनंदन, आनंद कूट ने जस पाया ।
श्री धर्मनाथ सुदत्त कूट, अविचल से सुमत सुपद पाया ।।
हे शांतिनाथ शांतिदाता, श्री कुन्द कूट से मुक्त हुए।
महावीर प्रभु पावापुर से, मुक्ति वधू के कंत हुए ।।

श्री सुपार्श्व जिनवर भवरज, हर कूट प्रभास किया पावन ।
विमलनाथ पद विमल लिया, जय कूट सुवीर मुक्ति आंगन ।।
श्री अजितनाथ जिनवर जीता, रिपुमोह सिद्धवर करूँ प्रणाम ।
श्री नेमिनाथ करुणा सागर, गिरि गिरनार लिया विश्राम ॥
श्री पार्श्वनाथ का अंतिम दर्शन, मन आनंदित करता है।
सुवर्णभद्र में आत्म ध्यान धर, साधक कल्मष हरता है।।
सिद्ध अनंतानंत शिखर से, मोक्ष गये और जायेंगे ।
सर्व सिद्धि दातार आत्मा, ध्याकर मुक्ति पायेंगे ।।
नंदीश्वर की अनुपम रचना, बाहुबली के शुभ दर्शन ।
ऊँचा मानस्तंभ मनोहर, पार्श्वनाथ का समवशरण ॥
चौबीसी के चरण पखाएँ, अपना जीवन धन्य करूँ ।
यह संसार-भ्रमण मिट जावे, मुनिव्रत धारूँ मुक्ति वरुँ ।
सम्मेद शि खर की पावन रज, माथे से वंदन करता हूँ।
कर्मों की रज कण रहित बनूँ, प्रभु यही प्रार्थना करता हूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अनंतानंत मुनिश्वरेभ्यो जयमाला पूर्णार्ध्य
निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
शाश्वत तीर्थ सम्मेद की, महिमा अपरम्पार ।
भाव सहित वन्दन करूँ, पाऊँ भवदधि पार ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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