वर्तमान हुंडावसर्पिणी कर्मभूमि शुभ चौथा काल ।
तृतिय तीर्थंकर श्री संभवनाथ सुसेना मां के लाल ।।
मगधदेश श्रावस्ती नगरी के राजा जितारिनन्दन ।
मति श्रुत अवधि ज्ञान के धारी जन्मे स्वामी संभवजिन ।।
निज पुरुषार्थ स्वबल के द्वारा तुमने पाया केवलज्ञान ।
चारघातिया की सैंतालीस प्रकृतियों का करके अवसान ।।
चऊँ अघाति की सोलह क्रूर प्रकृति नाशी अरहन्त हुए ।
त्रेसठ कर्म प्रकृतियाँ छयकर वीतराग भगवन्त हुए ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट्, श्री संभवनाथजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठः, श्री संभवनाथजिनेन्द्र अत्र मम् सन्निहितो भव-भव वषट् ।
स्वानुभूति वैभव का निर्मल सलिल सातिशय जल भरलूँ ।
निज स्वभाव की निर्मलता से मैं शुद्धत्व प्राप्त करलूँ ।।
संभव जिनका संभवतः निज अन्तर में दर्शन करलूँ ।
तो भव भय हर कर हे स्वामी मुक्ति लक्ष्मी को वरलूँ ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि ।
स्वानुभूति वैभव का शीतल चंदन मैं चर्चित करलूँ ।
निज स्वभाव की शीतलता से मैं सिद्धत्व प्राप्त करलूँ ।।संभव.।।२ ।।
भव भय को हरने वाला सम्यक्दर्शन अति पावन ।
शिव सुख को करने वाला सम्यक्त्व परम मन भावन ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि ।
स्वानुभूति वैभव के उत्तम उज्ज्वल अक्षत चित धरलूँ ।
निज स्वभाव की उज्ज्वलता से मैं आत्मत्वप्राप्त करलूँ ।।संभव.।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्रायअक्षयपद प्राप्ताये अक्षतं नि. ।
स्वानुभूति वैभव के कोमल नव प्रसून उर में धरलूँ ।
निज स्वभाव की मृदुसुवाससेनिज शीलत्व प्राप्तकरलूँ ।।संभव.।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि. ।
स्वानुभूति वैभव के पावन चरु पवित्र निज में धरलूँ ।
निज स्वभाव की शुद्धवृत्ति से पर प्रवृत्तिका क्षयकरलूँ ।।संभव।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि ।
स्वानुभूति वैभव प्रकाश् से अन्तर ज्योतिर्मय कर लूँ ।
निजस्वभाव के ज्ञानदीप से मैं अज्ञान तिमिर हर लूँ ।।संभव।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि ।
स्वानुभूति वैभव की शुचिमय ध्यान धूप उर में धरलूँ
निजस्वभाव के पूर्ण ध्यान से अष्टकर्म रिपु को हर लूँ ।।संभव।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म विनाशनाय धूप नि ।
स्वानुभूति वेभव के पावन शिवफल अन्तर में भर लूँ ।
निज स्वभाव अवलंबन द्वारा मैं मोक्षत्व प्राप्त करलूँ । ।संभव ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय महामोक्षफल प्राप्तये फल नि स्वाहा ।
स्वानुभूति वैभवमय दर्शन ज्ञान चरित्र हृदय धर लूँ ।
चित्स्वभावमय समयसारवैभव का स्वत्व प्राप्त करलूँ ।।संभव.।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं नि ।
श्री पंचकल्याणक
नव बारह योजन की नगरी रचकर धनपति मग्न हुआ ।
गर्भ पूर्व छह मास रत्न बरसा कर इन्द्र प्रसन्न हुआ ।।
“अप्पा से परमप्पा” जिनके उर में भाव समाया ।
पर पदार्थ से निमिष मात्र में उसने राग हटाया ।।
ग्रैवेयक से आये मात सुसेना का उर धन्य हुआ ।
फागुन शुक्ल अष्टमी को संभव प्रभु का शुभ स्वप्न हुआ ।।१।।
ॐ ह्रीं फागुन शुक्ल अष्टम्यां गर्भकल्याण प्राप्तये श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि. ।
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रावस्ती में जन्म हुआ ।
नृप जितारि मन में हर्षाये तिहुँ जग में आनन्द हुआ ।।
मेरु सुदर्शन पांडुकवन में संभव प्रभु का न्हवन हुआ ।
एक सहस्र अष्ट कलशों में क्षीरोदधि आगमन हुआ ।।२।।
ॐ ह्रीं कार्तिक शुक्ल पूर्णिमायां जन्मकल्याण प्राप्तये श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
मगसिर शुक्ल पूर्णिमा को ही जब उर में वैराग्य हुआ ।
राज्य सम्पदा को ठुकराया वस्त्राभूषण त्याग हुआ ।।
संभव प्रभु को लौकान्तिक देवों का शत शत नमन हुआ ।
गये सहेतुक वन में हर्षित पंच महाव्रत ग्रहण हुआ ।।३।।
ॐ ह्रीं मगसिरशुक्ल पूर्णिमायां तपोमंगलप्राप्ताय श्री संभवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक प्रभु चौदह वर्ष रहे छद्मस्थ ।
केवलज्ञान लक्ष्मी पाई चार घातिया करके ध्वस्त ।।
समवशरण में जग जीवों के अन्धकार का नाश हुआ ।
संभव जिनकी दिव्य प्रभा से सम्यग्ज्ञान प्रकाश हुआ ।।४।।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्ण चतुर्थीदिने ज्ञानकल्याणप्राप्ताय श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
धवलदत्त शुभ कूट शिखरजी अन्तिमशुक्ल स्वध्यान किया ।
संभवजिन ने हो अयोगकेवली परम निर्वाण लिया ।।
शेष अघाति कर्म सब क्षय कर पदसिद्धत्व महान् लिया ।
जय जय संभवनाथ सुरों ने मंगल मोक्षकल्याण किया ।।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लषष्ठीदिने मोक्षकल्याणप्राप्ताय श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि. ।
अंतर्मन निग्रंथ नहीं तो फिर सच्चा निग्रंथ नहीं ।
बाह्य क्रिया कांडों से होता इस भव दुख का अंत नहीं । ।
जयमाला
सर्व लोक जित सर्व दोषहर सदानंद सागर सर्वेश ।
संभवनाथसुधी संवरमय स्वयं बुद्ध सौभागी स्वेश ।।१।।
इक्ष्वाकुकुल भूषण स्वामी न्यायवान अति परम उदार ।
अश्व चिह्न चरणों में शोभित स्वर्गों से आता श्रृंगार ।।२।।
भव तन भोग भोगते स्वामी पूरी यौवन वय बीती ।
एक दिवस नभ में देखी छाया बदली की छवि रीती ।।३।।
मेघ विनाश देखकर उरमें नश्वरता का भान हुआ ।
राज्य, पाट, पुर, वैभव त्यागा वन की ओर प्रयाणहुआ ।।४।।
एक सहस्त्र नृपों के संग में तुमने जिन दीक्षाधारी ।
पंच मुष्टि कच लोच किया प्रभु लिए महाव्रत सुखकारी ।।५।।
नृप सुरेन्द्र गृह किया पारणा पंचाश्चर्य हुए तत्क्षण ।
मौन तपस्या वर्ष चतुर्दश में जा पूर्ण हुई भगवन ।।६।।
समवशरण में द्वादश सभाभरी जग का कल्याण किया ।
सकल जगत् ने देव आपका उपदेशामृत पान किया ।।७।।
शक्ति रूप से सभी जीव है ज्ञान स्वभावी सिद्ध समान ।
व्यक्त रूप से जो हो जाता वही कहाता सिद्ध महान् ।।८।।
जो निजात्म को ध्याता आया वह बन जाता है भगवान् ।
जो विभाव में रत रहता है वह दुखिया संसारी प्राण ।।९।।
पुण्य पाप दोनों विभाव हैं इनको जानो ज्ञाता बन ।
पुण्य पाप के खेल जगत् में देखे केवल दृष्टा बन ।।१०।।
इनमें राग द्वेष मत करना समता भाव हृदय धरना ।
मोह ममत्व नाश कर प्राणी अघमिथ्यात्व तिमिर हरना ।।११।।
यह उपदेश हृदय में धारूँ निज अनुभव महिमा आये ।
अनुभव की हरियाली सावन भादों सी उर में छाये ।।१२।।
देवालय में देव नहीं है मनमंदिर में देव है ।
अंतर्मुख हो देख स्वयं तू महादेव स्वयमेव है ।।
पाँचों इन्द्रिय वश में करके चार कषायें मंद करूँ ।
मन कपि की चंचलता रोकूँ उर में निज आनंद भरूँ ।।१३।।
सम्यक् दर्शन को धारण कर ग्यारह प्रतिमाएँ धारूँ ।
क्रमक्रम से इनका पालन कर श्रेष्ठ महाव्रत स्वीकारूँ ।।१४।।
इस प्रकार प्रभु पथपर चलकर निज स्वरूप पाजाऊँगा ।
निज स्वभाव के अनुभव से ही महामोक्ष पद पाऊँगा ।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि ।
संभव प्रभु के पद कमल भाव सहित उर धार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार । ।
इत्याशीर्वाद:
जाप्यमंत्र-श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय नम: ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १७९ से १८३