जयजय जय ग्रन्थाधिराज श्री समयसार जिन श्रुत बन्दन ।
कुन्दकुन्द आचार्य रचित परमागम को सादर वन्दन ।।
द्वादशांग जिनवाणी का है इसमें सार परम पावन ।
आत्म तत्त्व की सहज प्राप्ति का है अपूर्व अनुपम साधन ।।
सीमंधर प्रभु की दिव्य ध्वनि इसमें गूंज रही प्रतिक्षण ।
इसको हृदयंगम करते ही हो जाता सम्यक्दर्शन ।।
समयसार का सार प्राप्त कर सफल करूँ मानव जीवन ।
सब सिद्धों का वन्दन करके करता विनय सहित पूजन ।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसाराय पुष्पांजलि क्षिपामि ।
निज स्वरूप को भूल आज तक चारों गति में किया भ्रमण ।
जन्म मरण क्षय करने को अब निज स्वरूप में करूँ रमण ।।
समयसार का करूँ अध्ययन समयसार का करूँ मनन ।
कारण समयसार को ध्याऊँ समयसार को करूँ नमन ।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
भव ज्वाला में प्रतिफल जलजल करता रहा करुण क्रन्दन ।
निज स्वभाव ध्रुव का आश्रय ले काटूँगा जग के बन्धन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
पुण्य पाप के मोह जाल में बढ़ी सदा भव की उलझन ।
संवरभाव जगा उर में तो, भव समुद्र का हुआ पतन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार अक्षय पद प्राप्तये-अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
कामभोग बन्धन की कथनी सुनी अनन्तों बार सघन ।
चिर परिचित जिन श्रुत अनुभूति न जागी मेरे अंतर्मन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षुधारोग की औषधि पाने का न किया है कभी जतन ।
आत्मभान करते ही महका वीतरागता का उपवन ।।
समयसार का करूँ अध्ययन समयसार का करूँ मनन ।
कारण समयसार को ध्याऊँ समयसार को करूँ नमन ।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
भ्रम अज्ञान तिमिर के कारण पर में माना अपनापन ।
सत्य बोध होते ही पाई ज्ञान सूर्य की दिव्य किरण ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
आर्त रौद्र ध्यानों में पड़कर पर भावों में रहा मगन ।
शुचिमय ध्यान धूप देखी तो धर्म ध्यान की लगी लगन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भव तरु के विषमय फल खाकर करता आया भाव मरण ।
सिद्ध स्वपद की चाहजगी तो यह पर्याय हुई धन धन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार महा मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
आश्रव बंधभाव का कारण मिटा राग का एक न कण ।
द्रव्य दृष्टि बनते ही पाया निज अनर्घ पद का दर्शन ।।समय।।
ॐ ह्रीं श्री परमागम समयसार अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
समयसार के ग्रन्थ की महिमा अगम अपार ।
निश्चय नय भूतार्थ है अभूतार्थ व्यवहार ।।
दुर्नय तिमिर निवारण कारण समयसार को करूँ प्रणाम ।
हूँ अबद्धस्पृष्ट नियत अविशेष अनन्य मुक्ति का धाम ।।
सप्त तत्त्व अरूँ नव पदार्थ का इसमें सुन्दर वर्णन है ।
जो भूतार्थ आश्रय लेता पाता सम्यक्दर्शन है ।।
जीव अजीव अधिकार प्रथम में भेद ज्ञान की ज्योति प्रधान ।
१"जो पस्सदि अप्पाणं", णियंदं हो जाता सर्वज्ञ महान् ।।
कर्ता कर्म अधिकार समझकर कर्ता बुद्धि विनाश करूँ ।
२ “सम्मद्दंसणं णाणं एसो” निज शुद्धात्म प्रकाश करूँ ।।
पुण्य पाप अधिकार जान दोनों में भेद नहीं मानूँ ।
ये विभाव परिणति से हैं उत्पन्न बंधमय ही जानूँ ।।
३ “रत्तों बंधदि कम्मं” जानूँ उर विराग ले कर्म हरूँ ।
राग शुभाशुभ का निषेध कर निज स्वरूप को प्राप्त करूँ ।।
मैं आस्रव अधिकार जानकर राग द्वेष अरु मोह हरूँ ।
भिन्न द्रव्य आस्रव से होकर भावास्रव को नष्ट करूँ ।।
मैं संवर अधिकार समझकर संवरमय ही भाव करूँ ।
४"अप्पाणं झायंतो" दर्शन ज्ञानमयी निज भाव करूँ ।।
मैं अधिकार निर्जरा जानूँ पूर्ण निर्जरावन्त वनूँ ।
पूर्व उदय में सम रहकर मैं चेतन ज्ञायक मात्र रहूँ ।।
५ “अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो” सारे कर्म झराऊंगा ।
मैं रतिवन्त ज्ञान में होकर शाश्वत शिव सुख पाऊंगा ।।
बन्ध अधिकार बन्ध की ही तो सकल प्रक्रिया बतलाता ।
बिन समकित जप, तप व्रत संयम बंध मार्ग है कहलाता ।।
राग-द्वेष भावों से विरहित जीव बन्ध से रहता दूर ।
६"णिच्छय णया सिदापुणमुणिणो" अष्टकर्म करता चकचूर ।।
(१) स. सा. १५ अपनी आत्मा को …नियत देखता है…
(२) स. सा. १४४ सम्यक्दर्शन ज्ञान ऐसी संज्ञा मिलती है…
(३) समयसार १५० -रागी जीव कर्म बांधता है…
(४) स. सा. १८६ -आत्मा को ध्याता हुआ…
(५) स. सा. २१०-११-१२-१३-अनिच्छुक को अपरिग्रही कहा है…
(६) स. सा. १७२ -निश्चय नयाश्रित मुनि मोक्ष प्राप्त करते हैं…
जान मोक्ष अधिकार शीघ्र ही नष्ट करूँ विष-कुम्भ-विभाव ।
आत्म स्वरूप प्रकाशित करके प्रकटाऊँ परिपूर्ण स्वभाव ।।
शुद्ध आत्मा ग्रहण करूँ मैं सर्व बंध का कर छेदन ।
निशंकित होकर पाऊँगा मुक्ति शिला का सिंहासन ।।
सर्व विशुद्ध ज्ञान का है अधिकार अपूर्व अमूल्य महान् ।
पर कर्तृत्व नष्ट हो जाता होता शिव पथ पर अभियान ।।
कर्म फलों को मूढ़ भोगता ज्ञानी उनका ज्ञाता है ।
इसीलिये अज्ञानी दुख पाता ज्ञानी सुख पाता है ।।
भाव भासना नौ अधिकारों से कर निज में वास करूँ ।
७"मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोग" की सत्ता नाश करूँ ।।
कुन्दकुन्द ने समयसार मन्दिर का किया दिव्य निर्वाण ।
वीतराग सर्वज्ञ देव की दिव्य-ध्वनि का इसमें ज्ञान ।।
सर्व चार सौ पन्द्रह गाथाएं प्राकृत भाषा में जान ।
सारभूत निज समयसार को ही अनुभव लूँ भव्य महान् ।।
अमृतचन्द्राचार्य देव ने आत्मख्याति टीका लिखकर ।
कलश चढ़ाये दो सौ अठहत्तर स्वर्णिम अनुपम सुन्दर ।।
श्री जयसेनाचार्य स्वामी की सरस तात्पर्यवृत्ति टीका ।
ऋषि मुनि विद्वानों ने लिक्खा वर्णन समयसार जी का ।।
ज्ञानी ध्यानी मुनियों ने भी तोरण द्वार सजाये हैं ।
समयसार के मधुर गीत गा वन्दनवार चढ़ाये हैं ।।
भिन्न-भिन्न भाषाओं में इसके अनुवाद हुए सुन्दर ।
काव्य अनेकों लिखे गये हैं समयसारजी पर मनहर ।।
(७) स. सा. १६४ -मिथ्यात्व अविरति कषाय योग ये आश्रव है ।
श्री कानजी स्वामी ने भी करके समयसार प्रवचन ।
समयसार मन्दिर पर सविनय हर्षित किया ध्वजारोहण ।।
समयसार पढ़ सम्यक्दर्शन ज्ञान चरित्र प्रगटाऊँगा ।
८"तिब्बं मंद सहावं" क्षयकर वीतराग पद पाऊँगा ।।
पंच परावर्तन अभाव कर सिद्ध लोक में जाऊँगा ।
काल लब्धि आई है मेरी परम मोक्ष पद पाऊँगा ।।
भक्ति भाव से समयसार की मैंने पूजन की है देव ।
कारण समंयसार की महिमा उरमें जाग उठी स्वयमेव ।।
नमः समयसाराय स्वानुभाव ज्ञान चेतनामयी परम ।
एक शुद्ध टंकोत्कीर्ण, चिन्मात्र पूर्ण चिद्रुप स्वयम् ।।
नय पक्षों से रहित आत्मा ही है समयसार भगवान् ।
समयसार ही सम्यक्दर्शन समयसार ही सम्यक्ज्ञान ।।
समयसार के भाव को जो लेते उर धार ।
निज अनुभव को प्राप्तकर हो जाते भव पार ।।
इत्याशीर्वादः
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २८१ से २८५