श्री समयसार कलश महामण्डल विधान | Shri Samaysar Kalash Mahamandal Vidhan

प्रक्षाल पाठ

( दोहा )

भक्तिभाव से हम करें जिन प्रतिमा प्रक्षाल।
अरे विकारी भाव का हो जावे प्रक्षाल ।। १ ।।
दिन का शुभ आरंभ हो चित्त रहे निर्भ्रान्त१।
प्रतिमा के प्रक्षाल से मन हो जावे शान्त।। २ ।।

( हरिगीतिका )

यद्यपि इस काल में अरहंत जिन उपलब्ध ना।
किन्तु हमारे भाग्य से जिनबिंब तो उपलब्ध हैं।।
जिनबिंब का प्रक्षाल पूजन और दर्शन भाव से।
जो भाग्यशाली करें प्रतिदिन भाव से अति चाव से।। ३ ।।
वे भाग्यशाली भव्य निज हित कार्य में नित रत रहें।
आपके गुणगान वे नित निरन्तर करते रहें।।
निज आतमा को जानकर वे शीघ्र ही भव पार हों।
निज आतमा का ध्यान धर वे भवजलधि से पार हों ।। ४ ।।
जिसतरह समव-शरण में अरहंत जिन विद्यमान हैं।
और उनका इस जगत् में उच्चतम स्थान है।।
व्यवहार होता जिसतरह का अरे उनके सामने।
बस उसतरह की विनय हो जिनमूर्तियों के सामने ।। ५ ।।
१. जिसमें कोई सन्देह या भ्रम न हो।

यदि मूर्तियाँ हों प्रतिष्ठित स्थापना निक्षेप से।
अरहंत सम ही पूज्य हैं जिनमार्ग में व्यवहार से।।
अरे कृत्रिम-अकृत्रिम जिनबिंब जितने लोक में।
वे पूज्य हैं शत इन्द्र कर जिनशास्त्र के आलोक में ।। ६ ।।

अति विनयपूर्वक बिंब का प्रक्षाल होना चाहिये।
अर दिवस में प्रत्येक दिन इकबार होना चाहिये ।।
स्वस्थ तन-मन स्वच्छ पट अर सावधानी पूर्वक।
सद्भाव से ही पुरुष को प्रक्षाल करना चाहिये ।। ७ ।।

प्रत्येक नर-नारी अरे पूजन करे प्रत्येक दिन ।
प्रक्षाल तो बस एक जन इकबार ही दिन में करे।।
प्रक्षाल पूजन अंग ना प्रत्येक को अनिवार्य ना।
प्रक्षाल तो इक बिंब का इक बार होना चाहिये ।। ८ ।।

छवि वीतरागी शान्त मुद्रा कही है जिनदेव की।
जिनमूर्ति की भी शान्त मुद्रा वीतरागी छवि कही।।
‘जिनमूर्तियाँ हों मुस्कुराती’ - कभी हो सकता नहीं।
और हँसना वीतरागी भाव हो सकता नहीं।। ९ ।।

जब वीतरागी जिनवरों का न्हवन हो सकता नहीं।
एवं दिगम्बर मुनिवरों का न्हवन हो सकता नहीं।।
जब मुनिवरों के मूलगुण में एक गुण अस्नान है।
तब प्रतिष्ठित मूर्तियों का न्हवन होवे किस तरह ? ।। १० ।।

प्रक्षाल पाठ

बस इसलिये जिनमूर्तियों को स्वच्छ रखने के लिये।
और अपनी भावना को व्यक्त करने के लिये।।
अरे प्रासुक नीर से प्रक्षाल करना चाहिये।
न्हवन ना अभिषेक ना प्रक्षाल होना चाहिये ।। ११ ।।

जिनबिंब का स्पर्श महिला वर्ग कर सकता नहीं।
जिनबिंब का प्रक्षाल महिला वर्ग कर सकता नहीं।।
दिगम्बर जिनबिंब से सम्पूर्ण महिला वर्ग को।
एक सीमा तक सुनिश्चित दूर रहना चाहिये ।। १२ ।।

क्योंकि ये जिनबिंब जिनवरदेव के प्रतिबिंब हैं।
वीतरागी सर्वज्ञानी देव के ही बिंब हैं।।
उन बिंब का जिनबिंब का अति हर्ष से उल्लास से।
प्रक्षाल सब जन कर रहे अत्यन्त निर्मल भाव से।। १३ ।।

जिनबिंब का प्रक्षाल जो जन करें निर्मलभाव से।
और पूजन करें प्रतिदिन भाव से अति चाव से।।
जिन शास्त्र का स्वाध्याय एवं रहें संयमभाव से।
वे भव्यजन भवपार होंगे स्वयं के आधार से ।। १४ ।।

(दोहा)

महाभाग्य हमने किया जिन प्रतिमा प्रक्षाल।
चरणों में जिनबिंब के सदा नवावें भाल।। १५ ।।

भक्तिभाव से जो करें जिन प्रतिमा प्रक्षाल ।
निज आतम का ध्यान धर वे होवें भव पार।। १६ ।।
–●–

विनय पाठ

( दोहा )

अरहंतों को नमन कर नमूँ सिद्ध भगवान् ।
आचारज उवझाय अर सर्व साधु गुणखान।। १ ।।
मोक्ष मोक्ष के मार्ग में विद्यमान जो जीव।
यथायोग्य नम कर प्रभो वन्दन करूँ सदीव ।। २ ।।
चौबीसों जिनराज की दिव्यध्वनि अनुसार।
ज्ञानिजनों ने जो लिखी वाणी विविधप्रकार।। ३ ।।
नय-प्रमाण से विविधविध कही तत्त्व की बात।
भविकजनों के लिये जो एकमात्र आधार।। ४ ।।
सब द्रव्यों के सभी गुण अर सामान्य-विशेष।
आज सभी को सहज ही हैं उपलब्ध अशेष ।। ५ ।।
जिनवाणी उपलब्ध है उसे बतावनहार ।
बहुत अधिक दुर्लभ नहीं उसके जाननहार ।। ६ ।।
मोहनींद में जो पड़े नहीं कोई आधार।
साधर्मीजन कम नहीं उन्हें जगावनहार।। ७ ।।
सारा जग बेचेत है मोहनींद के द्वार।
किन्तु हमें उपलब्ध हैं मार्ग बतावनहार ।। ८ ।।
महाभाग्य से प्राप्त हो देव-गुरु संयोग।
पर जिनवाणी मात की शरण सहज संयोग ।। ९ ।।
विनय पाठ
उसके अध्ययन मनन से चिन्तन से निजतत्व ।
जाना जाता सहज ही होता है सम्यक्त्व।। १० ।।
जिनवाणी के मर्म को अरे जानने योग्य।
ज्ञान प्रगट पर्याय में होवे सहज संयोग¹।। ११ ।।
और कषायें मन्द हों भाव रहें निष्काम।
एक आतमा में लगे छोड़ हजारों काम²।। १२ ।।
देव-गुरु संयोग या जिनवाणी के योग।
तत्व श्रवण में मन लगे और न मन में रोग³।। १३ ।।
अरे क्षयोपशम विशुद्धि और देशना लब्धि।
जिसके ये तीनों बने उसे तत्त्व उपलब्धि।। १४ ।।
आतम में अति अधिक रुचि जब होवे सर्वांग।
विशेष तरह की योग्यता वह लब्धि प्रायोग्य।। १५ ।।
आतम का उपयोग जब आतम में रमजाय।
करणलब्धि है आतमा आतम माँहि समाय।। १६ ।।
करणलब्धि के अन्त में आतम अनुभव होय।
सम्यग्दर्शन प्राप्त हो मन रोमांचित होय।। १७ ।।
तीर्थंकर चौबीस ही हमें जगावनहार।
जागें आतम में लगें हो जावें भव पार।। १८ ।।
देव-शास्त्र-गुरु की कृपा से कटता संसार।
नमन करूँ इन सभी को भगवन् बारंबार।। १९ ।।
अरे हमारा आतमा आतम में रम जाय।
अन्य न कोई चाह मन आतम माहि समाय।। २० ।।
१. क्षयोपशम लब्धि २. विशुद्धि लब्धि ३. देशना लब्धि

पूजा पीठिका

ॐ जय जय जय ! नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु ।

(वीर)

अरहंतों को सब सिद्धों को आचार्यों को करूँ प्रणाम।
उपाध्याय एवं त्रिलोक के सर्व साधुओं को अभिराम ।। १ ।।
ॐ ह्रीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः पुष्पांजलि क्षिपामि।
अरे चार मंगल हैं जग में अर्हत सिद्ध साहु मंगल।
और केवली कथित जगत् में होता परम धरम मंगल ।। २ ।।
और चार ही लोकोत्तम अर्हत सिद्ध साहु उत्तम।
और केवली कथित जगत् में होता परम धरम उत्तम।। ३ ।।
अरे चार की शरणा जाऊँ अर्हत सिद्ध साहु शरणा।
और केवली कथित लोक में जाऊँ परम धरम शरणा ।। ४ ।।

( हरिगीत )

परमेष्ठी सम शुद्धात्मा भी शरण है इस लोक में।
है परम मंगल परम उत्तम शरण भी इस लोक में ।।
व्यवहार से परमेष्ठी परमार्थ से शुद्धात्मा ।
की शरण में नित हम रहें जिनमार्ग के आलोक में ।। ५ ।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा पुष्पांजलि क्षिपामि।
मंगल विधान

(वीर)

हो अपवित्र-पवित्र और सुस्थित हो अथवा दुःस्थित हो।
सब पापों से छूट जाय वह नमोकार को ध्यावे जो।। १ ।।
हो अपवित्र-पवित्र अधिक क्या किसी अवस्था में भी हो।
अन्दर-बाहर से पवित्र निज परमातम को ध्यावे जो।। २ ।।

अपराजित यह मंत्र सभी विघ्नों का परमविनाशक है।
सभी मंगलों में मंगल यह पावन पहला मंगल है।। ३ ।।
सब पापों का नाशक है यह महामंत्र मंगलमय है।
सभी मंगलों में यह अद्भुत पावन पहला मंगल है।। ४ ।।
‘अर्ह’ ये अक्षर परमेष्ठी परमब्रह्म के वाचक हैं।
सिद्धचक्र के बीज मनोहर नमस्कार हम करते हैं।। ५ ।।
अष्टकर्म से रहित मोक्षलक्ष्मी के सुखद निकेतन हैं।
सम्यक्त्वादि अष्टगुणों से सहित सिद्ध को नमते हैं।। ६ ।।
जिनवर की स्तुति करने से विघ्न विलय हो जाते हैं।
भूत डाकिनी एवं विषभय सभी विघ्न टर जाते हैं।। ७ ।।
(पुष्पांजलि क्षिपेत् )

जिनसहस्रनाम अर्घ्य

(वीर)

जल चन्दन अक्षत सुमन चरु, अर दीप धूप फल द्रव्यमयी।
अर्घ्य समर्पण करता हूँ मैं श्रीजिनवर आनन्दमयी ।।
ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिनसहस्रनामेभ्योर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।
पूजा प्रतिज्ञा पाठ

(वीर)

अनन्तचतुष्टय पद के धारी स्याद्वाद के नायक की।
पूजन करता नमस्कार कर तीन लोक परमेश्वर की।।
मूलसंघ के सम्यग्दृष्टि उनके सत्कर्मों के हेतु ।
मेरे द्वारा कही जा रही यह जैनेन्द्रयज्ञविधि सेतु ।। १ ।।

जिनपुंगव त्रैलोक्य गुरु की स्वस्ति हो कल्याणमयी।
जिनका रे सुस्थित स्वभाव महिमामय है कल्याणमयी ।।
सहज प्रकाशमयी दृगज्योति मंगल मंगलदाता है।
स्वस्ति मंगल अद्भुत वैभव अति आनन्द प्रदाता है।। २ ।।
रे स्वभाव-परभाव सभी को करे प्रकाशित निर्मल ज्ञान ।
अमृतमय वह ज्ञान मनोहर उछले अन्तर महिमावान।।
तीन लोक अर तीनकाल में विस्तृत है अति व्यापक है।
तीन लोक एवं त्रिकाल की पर्यायों का ज्ञायक है।। ३ ।।
यथायोग्य है द्रव्य शुद्धि पर भावशुद्धि पूरी चाहूँ।
अरे विविध आलंबन लेकर शुद्धभाव को अपनाऊँ।।
जो सचमुच भूतार्थ पुरुष हैं पावन हैं अतिपावन हैं।
उनकी पूजा करूँ ध्यान से जो अति ही मनभावन हैं।। ४ ।।
जिनकी केवलज्ञान ज्योति में सभी भाव भासित होते।
वे अर्हन् पुराण पुरुषोत्तम परम भाव भावित होते।।
उनकी केवलज्ञान बह्नि में मैं अपने पूरे मन से।
सभी पुण्य अर्पित करता हूँ निकला चाहूँ भव वन से।। ५ ।।
ॐ ह्रीं यज्ञप्रतिज्ञायै प्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
स्वस्ति मंगल पाठ

(चौपाई )

स्वस्ति श्री श्री ऋषभ जिनेश, स्वस्ति करें जिनवर अजितेश ।
संभव करें असंभव द्वेष, अभिनन्दन दुख हरें अशेष ।। १ ।।
सुमति प्रदाता सुमति जिनेश, पद्मप्रभ जिनवर पद्येश।
जय सुपार्श्व पारस सम जान, चन्द्रप्रभ जिन चन्द्र समान।। २ ।।
परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ
सुविधिनाथ विधिनाशनहार, शीतल शीतलता दातार।
जय श्रेयांश श्रेय करतार, वासुपूज्य शिवसुख दातार।। ३ ।।
विमल विमल जीवन दातार, श्री अनन्त आनन्द अपार।
धर्म कहें संसार असार, शान्ति अनन्त शान्ति दातार ।। ४ ।।
कुन्थु कुन्थु के रक्षणहार, अरजिन आनन्द के अवतार।
जीता है मन मल्लि जिनेश, मुनिसुव्रत व्रत धरें अशेष ।। ५ ।।
नमि चरणों में नमें नरेश, जीता मन्मथ नेमि जिनेश।
पारस पारस से दातार, वीर अहिंसा के अवतार ।। ६ ।।

(दोहा)

चौबीसों जिनराज ही मंगल मंगल हेतु ।
स्वस्ति स्वरूप विराजहीं सबको मंगल देतु ।। ७ ।।
(पुष्पांजलि क्षिपेत् )
परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ

( हरिगीत )

ज्ञानी तपस्वी मुनिवरों को ऋद्धियाँ उपलब्ध हों।
पर ऋद्धियों की सिद्धियों पर रंच न वे मुग्ध हों।।
वे तो निरन्तर लीन रहते आतमा के ज्ञान में।
आतमा के चिन्तवन निज आतमा के ध्यान में ।। १ ।।
अरे चौंसठ ऋद्धियों में प्रथम केवलज्ञान है।
दूसरी है मनःपर्यय तृतीय अवधीज्ञान है।।
इत्यादि चौंसठ ऋद्धियाँ सब ज्ञान का विस्तार है।
रे ज्ञान के विस्तार का न आर है न पार है।। २ ।।

अन्य लौकिक सिद्धियाँ भी ऋद्धियों से प्राप्त हो।
पर मुनिवरों को उन सभी से नहीं कोई राग हो।।
वे तो स्वयं में जम गये वे तो स्वयं में रम गये।
सारे जगत् से विमुख हो सद्ज्ञान में परिणम गये।। ३ ।।

आतमा के चिन्तवन में आतमा के ज्ञान में।
वे तो निरन्तर लगे रहते आतमा के ध्यान में।।
कैसे कहें उन मुनिवरों से तुम बताओ हे प्रभो।
निज आतमा को छोड़कर हे प्रभो हम पर ध्यान दो।। ४ ।।

नहीं कोई किसी का कुछ भी करे इस लोक में।
यह जानते हैं सभी आगम ज्ञान के आलोक में।।
सब जानते हैं समझते व्यवहार में यों बह रहे।
उन ऋद्धिधारी ऋषिवरों से प्रभो फिर भी कह रहे।। ५ ।।

रे ऋद्धिधारी मुनिवरो! कल्याण सब जग का करो।
अज्ञान मोहित जगत् की दुर्गति मुनिवर परिहरो।।
यह जगत् मिथ्यामार्ग तज सन्मार्ग में वर्तन करे।
जिनशास्त्र का स्वाध्याय कर निजज्ञान का मार्जन करे।। ६ ।।

अन्याय और अनीति छोड़े अभक्ष्य भक्षण न करे।
न्याय एवं नीति से सन्मार्ग पर आगे बढ़े।।
होवे अहिंसक आचरण आहार और विहार में।
सावधानी रखें हम व्यवहार में व्यापार में।। ७ ।।

( दोहा )

सभी संत मंगलमयी मंगल के आधार।
मल गाले मंगल करें करें मंगलाचार।। ८ ।।
सभी ऋद्धियों के धनी सभी दिगम्बर संत।
और कछु नहिं चाहिये चाहे भव का अंत।। ९ ।।

(इति परमर्षि स्वस्ति मंगल विधानं पुष्पांजलि क्षिपेत् )

-●-

देव-शास्त्र-गुरु-पूजन

( दोहा )

शुद्धब्रह्म परमात्मा, शब्दब्रह्म जिनवाणि।
शुद्धातम साधकदशा, नमौं जोड़ जुगपाणि।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

आशा की प्यास बुझाने को, अबतक मृगतृष्णा में भटका।
जल समझ विषय-विष भोगों को, उनकी ममता में था अटका।।
लख सौम्यदृष्टि तेरी प्रभुवर, समता-रस पीने आया हूँ।
इस जल ने प्यास बुझाई ना, इसको लौटाने लाया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रोधानल से जब जला हृदय, चन्दन ने कोई न काम किया।
तन को तो शान्त किया इसने, मन को न मगर आराम दिया।।
संसार-ताप से तप्त हृदय, सन्ताप मिटाने आया हूँ।
चरणों में चन्दन अर्पण कर, शीतलता पाने आया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अभिमान किया अबतक जड़ पर, अक्षयनिधि को ना पहचाना।
मैं जड़ का हूँ जड़ मेरा है, यह सोच बना था मस्ताना।।
क्षत में विश्वास किया अबतक, अक्षत को प्रभुवर ना जाना।
अभिमान की आन मिटाने को, अक्षयनिधि तुम को पहिचाना।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

दिन-रात वासना में रहकर, मेरे मन ने प्रभु सुख माना।
पुरुषत्व गँवाया पर प्रभुवर, उसके छल को ना पहिचाना ।।
माया ने डाला जाल प्रथम, कामुकता ने फिर बाँध लिया।
उसका प्रमाण यह पुष्प-बाण, लाकर के प्रभुवर भेंट किया ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
पर पुद्गल का भक्षण करके, यह भूख मिटानी चाही थी।
इस नागिन से बचने को प्रभु, हर चीज बनाकर खाई थी।।
मिष्टान्न अनेक बनाये थे, दिन-रात भखे न मिटी प्रभुवर ।
अब संयम-भाव जगाने को, लाया हूँ ये सब थाली भर।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पहले अज्ञान मिटाने को, दीपक था जग में उजियाला।
उससे न हुआ कुछ तब युग ने, बिजली का बल्ब जला डाला।।
प्रभु भेद-ज्ञान की आँख न थी, क्या कर सकती थी यह ज्वाला।
यह ज्ञान है कि अज्ञान कहो, तुमको भी दीप दिखा डाला ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ-कर्म कमाऊँ सुख होगा, अबतक मैंने यह माना था।
पाप कर्म को त्याग पुण्य को, चाह रहा अपनाना था।।
किन्तु समझ कर शत्रु कर्म को, आज जलाने आया हूँ।
लेकर दशांग यह धूप, कर्म की धूम उड़ाने आया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्योः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
भोगों को अमृतफल जाना, विषयों में निश-दिन मस्त रहा।
उनके संग्रह में हे प्रभुवर ! मैं व्यस्त-त्रस्त-अभ्यस्त रहा ।।
शुद्धात्मप्रभा जो अनुपम फल, मैं उसे खोजने आया हूँ।
प्रभु सरस सुवासित ये जड़फल, मैं तुम्हें चढ़ाने लाया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

बहुमूल्य जगत् का वैभव यह, क्या हमको सुखी बना सकता।
अरे पूर्णता पाने में, इसकी क्या है आवश्यकता ।।
मैं स्वयं पूर्ण हूँ अपने में, प्रभु है अनर्घ्य मेरी माया।
बहुमूल्य द्रव्यमय अर्घ्य लिये, अर्पण के हेतु चला आया ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

समयसार जिनदेव हैं, जिन-प्रवचन जिनवाणि।
नियमसार निर्ग्रन्थ गुरु, करें कर्म की हानि ।।

(वीरछन्द)

हे वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, तुमको ना अबतक पहिचाना।
अतएव पड़ रहे हैं प्रभुवर, चौरासी के चक्कर खाना ।।
करुणानिधि तुमको समझ नाथ, भगवान् भरोसे पड़ा रहा।
भरपूर सुखी कर दोगे तुम, यह सोचे सन्मुख खड़ा रहा।।
तुम वीतराग हो लीन स्वयं में, कभी न मैंने यह जाना।
तुम हो निरीह जग से कृत-कृत, इतना ना मैंने पहिचाना ।।
प्रभु वीतराग की वाणी में, जैसा जो तत्त्व दिखाया है।
जो होना है सो निश्चित है, केवलज्ञानी ने गाया है।।
उस पर तो श्रद्धा ला न सका, परिवर्तन का अभिमान किया।
बनकर पर का कर्त्ता अब तक, सत् का न प्रभो सम्मान किया ।।
भगवान् तुम्हारी वाणी में, जैसा जो तत्त्व दिखाया है।
स्याद्वाद-नय, अनेकान्त-मय, समयसार समझाया है।।
उस पर तो ध्यान दिया न प्रभो, विकथा में समय गँवाया है।
शुद्धात्म-रुचि न हुई मन में, ना मन को उधर लगाया है।।

मैं समझ न पाया था अबतक, जिनवाणी किसको कहते हैं।
प्रभु वीतराग की वाणी में, कैसे क्या तत्त्व निकलते हैं।।
राग धर्ममय धर्म रागमय, अबतक ऐसा जाना था।
शुभ-कर्म कमाते सुख होगा, बस अबतक ऐसा माना था।।
पर आज समझ में आया है, कि वीतरागता धर्म अहा।
राग-भाव में धर्म मानना, जिनमत में मिथ्यात्व कहा।।
वीतरागता की पोषक ही, जिनवाणी कहलाती है।
यह है मुक्ति का मार्ग निरन्तर, हम को जो दिखलाती है।।
उस वाणी के अन्तर्तम को, जिन गुरुओं ने पहिचाना है।
उन गुरुवर्यों के चरणों में, मस्तक बस हमें झुकाना है।।
दिन-रात आत्मा का चिन्तन, मृदु सम्भाषण में वही कथन।
निर्वस्त्र दिगम्बर काया से भी, प्रकट हो रहा अन्तर्मन ।।
निर्ग्रन्थ दिगम्बर सद्ज्ञानी, स्वातम में सदा विचरते जो।
ज्ञानी-ध्यानी-समरससानी, द्वादश विधि तप नित करते जो।।
चलते-फिरते सिद्धों-से गुरु-चरणों में शीश झुकाते हैं।
हम चलें आपके कदमों पर, नित यही भावना भाते हैं।।
हो नमस्कार शुद्धातम को, हो नमस्कार जिनवर वाणी।
हो नमस्कार उन गुरुओं को, जिनकी चर्या समरससानी।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा

(दोहा)

दर्शन दाता देव हैं, आगम सम्यग्ज्ञान ।
गुरु चारित्र की खानि हैं, मैं वंदौं धरि ध्यान ।।
(इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
●

ॐ

मंगलाचरण

( अडिल्ल )

समयसार का एकमात्र प्रतिपाद्य जो ।
आत्मख्याति का एकमात्र आराध्य जो।।
अज अनादि अनिधन अविचल सद्भाव जो ।
त्रैकालिक ध्रुव सुखमय ज्ञायकभाव जो ।। १ ।।
परमशुद्धनिश्चयनय का है ज्ञेय जो।
सत्श्रद्धा का एकमात्र श्रद्धेय जो।।
परमध्यान का ध्येय उसे ही ध्याऊँ मैं।
उसे प्राप्त कर उसमें ही रम जाऊँ मैं ।। २ ।।


१. अपूर्व अवसर ऐसा किस दिन आएगा ? … की धुन पर गायें।

अपनापन हो निज आतम में नित्य ही।
अपना जानूँ निज आतम को नित्य ही ।।
रहे निरन्तर निज आतम में ही रमन ।
रहूँ निरन्तर निज आतम में ही मगन ।। ५ ॥

अन्य न कोई हो विकल्प हे आत्मन् ! ।
निज आतम का ज्ञान-ध्यान-चिन्तन-मनन ।।
गहराई से होय निरन्तर अध्ययन ।
निश-दिन ही बस रहे निरन्तर एक धुन ।। ६ ।।

( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

समयसार कलश अद्भुत और अजोड़
आचार्य अमृतचन्द्र ने समयसार की विषयवस्तु को लेकर
अध्यात्मरस से सरावोर २७८ छन्द लिखे हैं, जो ‘आत्मख्याति’ नामक
संस्कृत टीका के ही अभिन्न अंग हैं। आत्मख्याति टीकारूपी स्वर्णहार
में वे मुक्तामणियों की भाँति यथास्थान जड़े हुए हैं। इसप्रकार इस
आत्मख्याति टीका में विविधवर्णी छन्दों और प्रांजल गद्य का मणिकांचन
संयोग हो रहा है।
विषयवस्तु के अनुसार विविधवर्णी छन्दों में रचित और विभिन्न
अलंकारों से अलंकृत ये छन्द ‘कलश’ नाम से जाने जाते हैं। आत्मख्याति
से सुसज्जित समयसाररूपी मन्दिर के गगनचुम्बी शिखर पर आरोहित ये
कलश अपने आप में अद्भुत हैं, अजोड़ हैं।
– समयसार अनुशीलन भाग-१, पृष्ठ-१२८

समयसार कलश पूजन

स्थापना

(रोला )

समयसार की आत्मख्याति नामक टीका में।
आये हैं जो छन्द विविध अत्यन्त मनोरम ।।
वे मनमोहक छन्द हृदय को हर लेते हैं।
आत्मतत्त्व का प्रतिपादन उनमें अति मनहर ।। १।।
समयसार के कलश उन्हीं को कहते हैं सब।
उन कलशों में मानों अमृत भरा हुआ है।।
आतम रस से भरे हुये उन कलशों का ही।
आज कर रहे हैं हम सब वन्दन-अभिनन्दन।। २।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम !! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ, ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम!!! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( अवतार )
जल
निर्मल जल शुद्ध स्वरूप, अपने अन्तर में।
पावन कर लूँ निजरूप, अपने इस भव में ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय जन्म-जरा-मत्यु-विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन
शीतल चन्दन-सा शान्त, अपना आतम है।
निज नित्य निरंजन जान, परम परमातम है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं
निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षत
अक्षत जो आतमराम, उसमें अपनापन ।
करके हम अपने आप, करें सम्यग्दर्शन ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा।

पुष्प
निर्गन्ध आतमाराम, सुख का सागर है।
पुष्पों का है क्या काम, अगन्ध अपना घर है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।

नैवेद्य
अत्यन्त मधुर शुद्धात्म-रूपी चरु लेकर ।
हे समयसार जिनराज ! तुमको अर्पित कर ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

दीप
यह समयसार-सा दीप, आतम परकाशक ।
महिमा है अगम अनूप, अद्भुत सुखदायक ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय मोहान्धकार-विनाशयनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा।

धूप
निज समयसारमय धूप, कर्मेन्धन दाहे।
निर्मल शुद्धात्मस्वरूप, अनुपम अपना है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं नि. स्वाहा।

फल
निज समयसार के ध्यान, का है अनुपम फल ।
जो करे ध्यान से ध्यान, वही हो जाय सफल ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

अर्घ्य

यह समयसार बहुमूल्य, अद्भुत अनुपम है।
मिट जावे सब अज्ञान, हमारा अनुभव है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय अनर्घ्य-पद-प्राप्तयेऽर्घ्यं नि. स्वाहा।

जयमाला

(दोहा)

समयसार को साधकर, बने सिद्ध भगवान् ।
अनन्त चतुष्टय के धनी, श्री अरिहन्त महान् ।। १।।
आचारज पाठक मुनी, प्रमत्त और अप्रमत्त ।
गुण में नित विचरण करें, नमन करूँ मैं नित्य ।। २।।

(रोला)

संस्कृत भाषा में निर्मित अत्यन्त मनोरम ।
अरे विविध-विध छन्दों और अलंकारों से ।।
सज्जित इनको सभी लोग कलशा कहते हैं।
आतम रस से भरे कलश मन को हरते हैं।।३।।
अध्यात्म रसामृत कूट-कूट कर खूब भरा है।
अमृतचन्द्राचार्यदेव ने इन कलशों में ।।
समयसार का सार आ गया इन कलशों में।
अमृतसागर समा गया है इन कलशों में ।।४।।
परम विशुद्धि आतम की हो यद्यपि उनने।
इसी भावना से सब अमृत कलश लिखे थे।।
फिर भी इनमें जो अनुपम अमृत बरसा है।
उसकी महिमा अद्भुत है एवं अपार है।।५।।
इतने अनुपम कलश लिखे फिर भी कहते हैं।
मैंने नहीं लिखे ये पुद्गल की रचना है।।
इन सबका कर्त्ता मैं हूँ – ऐसा तुम कहकर ।
अधिक कहें क्या व्यर्थ मोह में नाच रहे हो।।६।।

यद्यपि आये आत्मख्याति टीका के भीतर।
पर स्वतंत्र ग्रन्थों जैसा गौरव पाया है।।
कई स्वतंत्र टीकायें इन पर लिखीं गई हैं।
अधिक कहें क्या ये अपने में स्वयं पूर्ण हैं।।७।।
परमागम के कई रहस्य इनमें आये हैं।
ये हजार वर्षों से निरन्तर पढ़े जा रहे।।
सबसे पहले हिन्दी गद्य में राजमल्ल ने।
इनकी टीका लिखी मनोहर बालबोधनी ।।८।।
उसको पढ़कर रीझ गये कविवर बनारसी।
उनने उनपर छन्द लिखे अत्यन्त मनोहर ।।
समयसार नाटक के नाम से जाने जाते ।
सभी मुमुक्षु उन्हें प्रेम से गाते रहते ।। ९ ।।
मैंने भी तो अरे किया है इन छन्दों का।
अक्षरशः पद्यानुवाद हिन्दी भाषा में।।
आगे चलकर इस विधान की अर्ध्यावलि में ।।
आप स्वयं ही उसका आस्वादन कर लेंगे ।।१०।।

(दोहा)

अरे ध्यान से पढ़े सब, कलशों का अनुवाद।
आ जावेगा ध्यान में, जिन आगम का सार ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय जयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा )

महिमा शुद्धस्वभाव की, जिसका आर न पार ।
ये कलशा गाते रहें, अद्भुत और अपार ।। १२।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

पूर्वरंग-समन्वित जीव-अजीव अधिकार पूजन
( अवतार )
जल
पूर्वरंग-समन्वित

जीव-अजीव अधिकार पूजन

स्थापना

( हरिगीत )

जगत् के चेतन-अचेतन, तत्त्व की यह बात है।
जीव और अजीव के, अधिकार की यह बात है ।।
आतमा की बात है, परमातमा की बात है।
परम अनुपम शुद्ध ज्ञायकभाव की यह बात है ।।

( दोहा)

देहादिक से भिन्न जो, पर्यायों से पार ।
ज्ञानस्वभावी आतमा, दे आनन्द अपार ।।
वर्णादि - रागादि से, है यह आतम भिन्न।
शुद्ध बुद्ध चैतन्यमय, और अखण्ड अनन्य ।।
जीव-अजीव अधिकार की, पूजन परमानन्द ।
भक्तिभाव से करें तो, कटें करम के फन्द ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-समन्वित-
श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ, ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
यह जल मलनाशक वस्तु, अनुपम निर्मल है।
रे! तृषा-वेदनाशान्त-करन को शीतल है ।।
रे ! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान’-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय जन्म-जरा-मत्यु-विनाशनाय जलं नि. स्वाहा।
चन्दन
भव-तप-हर चन्दन-गन्ध, शशि-समशीतल है।
इसका आराधक आज, सभी भूमण्डल है।।
रे ! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व. स्वाहा।
अक्षत
अक्षत आतम अभिराम, अमर अविनाशी है।
इस आतम का गुणगान, सभी करते ही है ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
सुर-तरु के पुष्प अनेक, सुर-गण लावत हैं।
१. लोकालोक के
है समयसार गुण-खान, गणधर गावत हैं।।

रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।
नैवेद्य
नैवेद्य मधुर गुणखान, षट्रस के लाया।
ना तृप्त हुआ भगवान्, भक्ती से लाया ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।
दीप
तमहर दीपक ना देव, मोहतम नाश करे।
शरणा मैं आया नाथ, मोहतम नाश करो ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय मोहान्धकार-विनाशयनाय दीपं नि. स्वाहा।
धूप
यह धूप दशांगी नाथ!, न कर्म की नाशक है।
यह आतम है सुखधाम, स्व-परप्रकाशक है।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
फल
ताजे प्रासुक फल आज, लेकर आया हूँ।
हो सफल भावना आज, शरण में आया हूँ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

यह अर्घ्य अनर्घ्य महान्, लेकर मैं आया ।
चरणों में अर्पित नाथ, करने को आया ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अनर्घ्य-पद-प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली
।। पूर्वरंग ।।

( दोहा)

देहादिक से भिन्न जो, पर्यायों से पार।
ज्ञानस्वभावी आतमा, दे आनन्द अपार ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
१. नोट – इस विधान में अर्ध्यावली के अन्तर्गत समयसार की टीका आत्मख्याति में समागत
कलशों के डॉ. भारिल्लकृत पद्यानुवादों का प्रयोग किया गया है; उनके क्रमांक भी
मूलानुगामी रखे गये हैं। पाठकगण, इनकी विस्तृत व्याख्या हेतु ज्ञायकभाव-प्रबोधिनी
टीका का अच्छी तरह अध्ययन करें।

सर्वप्रथम आचार्य अमृतचन्द्रदेव आत्मख्याति टीका के मंगलाचरण में
तीन कलशों के माध्यम से ‘भगवान् आत्मा व अनेकान्तमयी जिनवाणी माता’
को नमस्कार करके, टीका लिखने का प्रयोजन’ प्रगट करते हैं -

( दोहा )

निज अनुभूति से प्रगट, चित्स्वभाव चिद्रूप ।
सकलज्ञेय-ज्ञायक नमौं, समयसार सद्रूप ।।१।।
ॐ ह्रीं आत्मख्याति-मंगलाचरणयुक्त-श्रीसमयसाराय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा ।। १ ।।

( सोरठा )

देखे पर से भिन्न, अगणित गुणमय आतमा ।
अनेकान्तमय-मूर्ति, सदा प्रकाशित ही रहे ।।२।।
ॐ ह्रीं अनेकान्तमूर्तये श्रीसरस्वतीदेव्यै नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।२।।

( रोला )

यद्यपि मैं तो शुद्ध मात्र चैतन्यमूर्ति हूँ,
फिर भी परिणति मलिन हुई है मोहोदय से।
परम विशुद्धि को पावे वह परिणति मेरी,
समयसार की आत्मख्याति नामक व्याख्या से ।।३।।
ॐ ह्रीं परमविशुद्धिप्रदायक-श्रीआत्मख्यातये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।। ३ ।।

( अनुष्टुभ् )

नमः समयसाराय, स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय, सर्वभावान्तरच्छिदे ।। १ ।।
अनन्तधर्मणस्तत्त्वं, पश्यन्ती प्रत्यगात्मनः ।
अनेकान्तमयी मूर्तिः, नित्यमेव प्रकाशताम् ।। २ ।।

( मालिनी )

परपरिणतिहेतोर्मोहनाम्नोऽनुभावादविरतमनुभाव्यव्याप्तिकल्माषितायाः ।
मम परमविशुद्धिः शुद्धचिन्मात्रमूर्तेः, भवतु समयसारव्याख्ययैवानुभूतेः ।। ३ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब दो कलशों में ‘स्याद्वाद एवं निश्चय-व्यवहारनयों का महत्त्व
बताते हैं’ -

( रोला )

उभयनयों में जो विरोध है, उसके नाशक।
स्याद्वादमय जिनवचनों में जो रमते हैं।
मोह-वमन कर अनय-अखण्डित परमज्योतिमय ।
स्वयं शीघ्र ही समयसार में वे रमते हैं।।४।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वादमयी-जिनवाणीभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४।।
ज्यों दुर्बल को लाठी है हस्तावलम्ब त्यों।
उपयोगी व्यवहार सभी को अपरमपद में।
पर उपयोगी नहीं रंच भी उन लोगों को।
जो रमते हैं परम-अर्थ चिन्मय चिद्घन में ।।५।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्य भूतार्थ-अभूतार्थत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५।।
आगामी कलशों में निश्चय सम्यग्दर्शन का स्वरूप कहते हैं -

( हरिगीत )

नियत है जो स्वयं के, एकत्व में नय शुद्ध से।
वह ज्ञान का घनपिण्ड पूरण, पृथक् है परद्रव्य से ।।
नव तत्त्व की सन्तति तज बस ! एक यह अपनाइए।
इस आतमा का दर्श दर्शन, आतमा ही ध्याइए ।।६।।
ॐ ह्रीं निश्चयसम्यग्दर्शनस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६।।

( मालिनी )

उभयनयविरोधध्वंसिनिस्यात्पदांके, जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः ।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चैरनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव ।। ४ ।।
व्यवहरणनयःस्याद्यद्यपि प्राक्पदव्यामिह निहितपदानां हन्त हस्तावलम्बः।
तदपि परममर्थं चिच्चमत्कारमात्रं, परविरहितमन्तः पश्यतां नैष किंचित्।। ५ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

एकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो, व्याप्तुर्यदस्यात्मनः;
पूर्णज्ञानघनस्य दर्शनमिह, द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक् ।
सम्यग्दर्शनमेतदेव नियमादात्मा च तावानयं;
तन्मुक्त्वा नवतत्त्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः ।। ६ ।।

अब, दो कलशों में नवतत्त्वों में छिपी हुई आत्मज्योति को जानने की
प्रेरणा देते हैं -

( दोहा )

शुद्धनयाश्रित आतमा, प्रगटे ज्योतिस्वरूप ।
नव तत्त्वों में व्याप्त पर, तजे न एक स्वरूप ।। ७ ।।

( रोला )

शुद्ध कनक ज्यों छिपा हुआ है बानभेद में।
नव तत्त्वों में छिपी हुई त्यों आत्मज्योति है।।
एकरूप उद्योतमान पर से विविक्त वह।
अरे भव्यजन ! पद-पद पर तुम उसको जानो ।।८।।
ॐ ह्रीं विविक्ताऽऽत्मज्योतिप्रकाशक-श्रीसमयसाकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।८।।
यहाँ, ‘आत्मानुभूति की दशा का वर्णन’ करते हैं

( रोला )

निक्षेपों के चक्र विलय, नय नहीं जनमते ।
अर प्रमाण के भाव अस्त हो जाते भाई ! ।।
अधिक कहें क्या, द्वैतभाव भी भासित ना हो।
शुद्ध आतमा का अनुभव होने पर भाई ! ।।९।।
ॐ ह्रीं अद्वैतात्मानुभूतिप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।९।।

( अनुष्टुभ् )

अतः शुद्धनयायत्तं, प्रत्यग्ज्योतिश्चकास्ति तत् ।
नवतत्त्वगतत्वेऽपि, यदेकत्वं न मुंचति ।। ७ ।।

( मालिनी )

चिरमिति नवतत्त्वच्छन्नमुन्नीयमानं, कनकमिव निमग्नं वर्णमालाकलापे ।
अथ सततविविक्तं दृश्यतामेकरूपं, प्रतिपदमिदमात्मज्योतिरुद्योतमानम्।। ८ ।।

( मालिनी )

उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं, क्वचिदपि च न विद्मो याति निक्षेपचक्रम् ।
किमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वकषेऽस्मिन्ननुभवमुपयाते भाति न द्वैतमेव ।। ९ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब, शुद्धनय का स्वरूप बताते हैं

( हरिगीत )

परभाव से जो भिन्न है अर, आदि-अन्त विमुक्त है।
संकल्प और विकल्प के, जंजाल से भी मुक्त है।।
जो एक है परिपूर्ण है - ऐसे निजात्मस्वभाव को।
करके प्रकाशित प्रगट होता, है यहाँ यह शुद्धनय ।।१०।।
ॐ ह्रीं शुद्धनयस्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं नि.
स्वाहा ।।१०।।
अब, ‘बद्ध-स्पृष्टादि भावों की अभूतार्थता बताकर आत्मानुभव की
प्रेरणा’ देते हैं -
पावें न जिसमें प्रतिष्ठा, बस ! तैरते हैं बाह्य में।
ये बद्ध-स्पृष्टादि सब, जिसके न अन्तरभाव में ।।
जो है प्रकाशित चतुर्दिक, उस एक आत्मस्वभाव का।
हे जगज्जन ! तुम नित्य ही, निर्मोह हो अनुभव करो ।।११।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।११।।
अब, ‘आत्मा को देव संज्ञा से सम्बोधित करते हैं’ -

(रोला)

अपने बल से मोह नाशकर भूत-भविष्यत्-0
वर्तमान के कर्म-बन्ध से भिन्न लखे बुध ! ।।
तो निज अनुभवगम्य आतमा सदा विराजित ।
विरहित कर्मकलंकपंक से ‘देव’ शाश्वत ।। १२ ।।
ॐ ह्रीं कारणपरमात्मस्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१२।।

( मालिनी )

न हि विदधति बद्धस्पृष्टभावादयोऽमी स्फुटमुपरितरंतोऽप्येत्य यत्र प्रतिष्ठाम्।
अनुभवतु तमेव द्योतमानं समंतात् जगदपगतमोहीभूय सम्यक्स्वभावम् ।। ११ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

भूतं भान्तमभूतमेव रभसान्निर्भिद्य बन्धं सुधी-
र्यद्यन्तः किल कोऽप्यहो कलयति, व्याहत्य मोहं हठात् ।
आत्मात्मानुभवैकगम्यमहिमा, व्यक्तोऽयमास्ते ध्रुवं;
नित्यं कर्मकलंकपंकविकलो, देवः स्वयं शाश्वतः ।। १२ ।।

अब, आत्मानुभूति को ही ज्ञानानुभूति बताते हैं -

( रोला )

शुद्धनयातम आतम की अनुभूति कही जो ।
वह ही है ज्ञानानुभूति तुम यही जानकर ।
आतम में आतम को निश्चल थापित करके ।
सर्व ओर से एक ज्ञानघन आतम निरखो ।।१३।।
ॐ ह्रीं ज्ञानानुभूतिप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।१३।।
अब, ‘अभेद अखण्ड चैतन्यस्वरूप आत्मा ही हमें प्राप्त हो’, ऐसी
भावना एक कलश में प्रगट करते हैं -

( रोला )

खारेपन से भरी हुई ज्यों नमक डली है।
ज्ञानभाव से भरा हुआ त्यों निज आतम है।।
अन्तर-बाहर प्रगट तेजमय सहज अनाकुल ।
जो अखण्ड चिन्मय चिद्घन वह हमें प्राप्त हो ।।१४।।
ॐ ह्रीं अखण्डचैतन्याऽऽत्म-स्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१४।।
अब, प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि ‘परमात्मपद की प्राप्ति हेतु एक आत्मा
ही साधने योग्य है’ -

( वसन्ततिलका )

आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या, ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुद्ध्वा ।
आत्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकम्पमेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समन्तात् ।। १३ ।।
(पृथ्वी)
अखण्डितमनाकुलं, ज्वलदनन्तमन्तर्बहिः,
महः परममस्तु नः, सहजमुद्विलासं सदा ।
चिदुच्छलननिर्भरं, सकलकालमालम्बते,
यदेकरसमुल्लसल्लवणखिल्यलीलायितम् ।। १४ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग

(हरिगीत)

है कामना यदि सिद्धि की, ना चित्त को भरमाइये।
यह ज्ञान का घनपिण्ड चिन्मय, आतमा अपनाइये।।
बस ! साध्य-साधक भाव से, इस एक को ही ध्याइये।
अर आप भी पर्याय में, परमातमा बन जाइये ।।१५।।
ॐ ह्रीं परमात्मपदप्रापक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।। १६ ।।
अब, आगामी कलशों में यह बताते हैं कि ‘दर्शन-ज्ञान-चारित्र और
प्रमाण-नय से आत्मा की क्या स्थिति है और हमें क्या करना चाहिए?’ -
मेचक कहा है आतमा, दृग-ज्ञान अर आचरण से।
यह एक निज परमातमा, बस ! है अमेचक स्वयं से।।
परमाण से मेचक-अमेचक, एक ही क्षण में अहा !।
यह अलौकिक मर्मभेदी, वाक्य जिनवर ने कहा ।।१६।।
आतमा है एक यद्यपि, किन्तु नय-व्यवहार से।
त्रैरूपता धारण करे, सद्-ज्ञान-दर्शन-चरण से।।
बस ! इसलिए मेचक कहा है, आतमा जिनमार्ग में।
अर इसे जाने बिन जगत् जन, ना लगें सन्मार्ग में ।।१७।।

( अनुष्टुभ् )

एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः ।
साध्यसाधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम् ।। १५ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रित्वादेकत्वतः स्वयम् ।
मेचकोऽमेचकश्चापि सममात्मा प्रमाणतः ।। १६ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रिभिः
परिणतत्वतः ।
एकोऽपि त्रिस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचकः ।। १७ ।।

आतमा मेचक कहा है, यद्यपि व्यवहार से।
किन्तु वह मेचक नहीं है, अमेचक परमार्थ से।।
है प्रगट ज्ञायक ज्योतिमय, वह एक है भूतार्थ से।
है शुद्ध एकाकार, पर से भिन्न है, परमार्थ से।।१८।।
मेचक-अमेचक आतमा के, चिन्तवन से लाभ क्या?।
बस करो अब तो इन विकल्पों से तुम्हें है साध्य क्या?।।
हो साध्य-सिद्धि एक बस ! सद्-ज्ञान-दर्शन-चरण से।
पथ अन्य कोई है नहीं, जिससे बचे संसरण से।।१९।।
ॐ ह्रीं दर्शनज्ञानचारित्र-भेदाऽभेदप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।

अब, ‘रत्नत्रय में भी एकता स्थापित करते हुए कलश’ कहते हैं -
त्रैरूपता को प्राप्त है पर, ना तजे एकत्व को।
यह शुद्ध निर्मल आत्म-ज्योति, प्राप्त है जो स्वयं को।।
अनुभव करें हम सतत ही, चैतन्यमय उस ज्योति का।
क्योंकि उसके बिना जग में, साध्य की हो सिद्धि ना।।२०।।
ॐ ह्रीं अभेदात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामाति स्वाहा।।१८।।

( अनुष्टुभ् )

परमार्थेन तु व्यक्तज्ञातृत्वज्योतिषैककः ।
सर्वभावान्तरध्वंसिस्वभावत्वादमेचकः
।। १८ ।।
आत्मनश्चिन्तयैवालं मेचकामेचकत्वयोः ।
दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा ।। १९ ।।

( मालिनी )

कथमपि समुपात्तत्रित्वमप्येकताया, अपतितमिदमात्मज्योतिरुद्गच्छदच्छम् ।
सततमनुभवामोऽनन्तचैतन्यचिह्नं, न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः।। २० ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब, ‘भेदज्ञानमूलक आत्मानुभूति को किसी भी प्रकार से प्राप्त करने
की प्रेरणा’ देते हैं -

(रोला)

जैसे भी हो स्वतः अन्य के उपदेशों से।
भेदज्ञानमूलक अविचल अनुभूति हुई हो।।
ज्ञेयों के अगणित प्रतिबिम्बों से वे ज्ञानी।
अरे निरन्तर दर्पणवत् रहते अविकारी ।।२१।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानमूलकात्मानुभूतिप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।

अब, ‘अनादिकालीन मोह को तत्काल छोड़ने की प्रेरणा’ देते हैं -

( हरिगीत )

आजन्म के इस मोह को हे जगत् जन ! तुम छोड़ दो।
अर रसिकजन को जो रुचे, उस ज्ञान के रस को चखो।।
तादात्म्य पर के साथ जिनका, कभी भी होता नहीं।
अर स्वयं का ही स्वयं से, अन्यत्व भी होता नहीं।।२२।।
ॐ ह्रीं मोहनाशप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।२०।।

अब, ‘किसी भी प्रकार से निजात्मतत्त्व का कौतूहली बनने हेतु शरीर
के साथ पडौसी जैसा व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं’ -

( मालिनी )

कथमपि हि लभन्ते भेदविज्ञानमूला मचलितमनुभूतिं ये स्वतो वान्यतो वा ।
प्रतिफलननिमग्नानन्तभावस्वभावै र्मुकुरवदविकाराः सन्ततं स्युस्त एव ।। २१ ।।
त्यजतु जगदिदानीं मोहमाजन्मलीनं, रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत् ।
इह कथमपि नात्मा नात्मना साकमेकः, किल किलयति काले क्वापि तादात्म्यवृत्तिम्।। २२ ।।

अर्ध्यावली : पूर्वरंग

(हरिगीत)

निजतत्त्व का कौतूहली अर, पड़ौसी बन देह का।
हे आत्मन् ! जैसे बने, अनुभव करो निजतत्त्व का।।
जब भिन्न पर से सुशोभित लख, स्वयं को तब शीघ्र ही।
तुम छोड़ दोगे देह से, एकत्व के इस मोह को ।।२३।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।२१।।

अब यहाँ 'अप्रतिबुद्ध, व्यवहार-स्तुति के माध्यम से अपना पक्ष रखता
है और टीकाकार उसे समझाने हेतु उदाहरण प्रस्तुत करते हैं –

(हरिगीत)

लोक-मानस रूप से, रवि-तेज अपने तेज से।
जो हरें निर्मल करें दश-दिश, कान्तिमय तन-तेज से ।।
जो दिव्यध्वनि से भव्यजन, के कान में अमृत भरें।
उन सहस अठ लक्षण सहित, जिन-सूरि को वन्दन करें ।। २४।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्तुतिपोषक -पूर्वपक्षप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। २२।।

अब, ‘नगर-वर्णन एवं जिनेन्द्र-वर्णन के सम्बन्ध में उदाहरण-स्वरूप दो
कलश’ कहते हैं –

( मालिनी )

अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहली सन्, अनुभव भव मूर्तेः पार्श्ववर्ती मुहूर्तम् ।
पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन, त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहम् ।। २३ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

कांत्यैव स्नपयंति ये दशदिशो धाम्ना निरंधंति ये।
धामोद्दाममहस्विनां जनमनो मुष्णंति रूपेण ये।।
दिव्येन ध्वनिना सुखं श्रवणयोः साक्षात्क्षरंतोऽमृतं ।
वंद्यास्तेऽष्टसहस्रलक्षणधरास्तीर्थेश्वराः सूरयः ।। २४ ।।

(हरिगीत)

प्राकार से कवलित किया, जिस नगर ने आकाश को।
अर गोल गहरी खाई से है, पी लिया पाताल को।।
सब भूमितल को ग्रस लिया, उपवनों के सौन्दर्य से।
अद्भुत अनूपम अलग ही है, वह नगर संसार से ।।२५।।
गम्भीर सागर के समान, महान् मानस मंग हैं।
नित्य निर्मल निर्विकारी, सुव्यवस्थित अंग हैं।।
सहज ही अद्भुत अनूपम, अपूरव लावण्य है।
क्षोभ-विरहित अर अचल, जयवन्त जिनवर अंग है।।२६।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्तुतिसमर्थक-दृष्टान्तप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।२३।।

अब, दो कलशों में ‘व्यवहार-निश्चय स्तुति’ के प्रकरण का उपसंहार
करते हैं –

(हरिगीत)

इस आतमा अर देह का, एकत्व बस ! व्यवहार से।
यह शरीराश्रित स्तवन भी, इसलिए व्यवहार से ।।
परमार्थ से स्तवन है, चिद्भाव का ही अनुभवन ।
परमार्थ से तो भिन्न ही हैं, देह अर चैतन्यघन ।। २७ ।।

( आर्या )
प्राकारकवलितांबरमुपवनराजीनिगीर्णभूमितलम् ।
पिबतीव हि नगरमिदं परिखावलयेन पातालम् ।। २५ ।।
नित्यमविकारसुस्थितसर्वांगमपूर्वसहजलावण्यम् ।
अक्षोभमिव समुद्रं जिनेन्द्ररूपं परं जयति ।। २६ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

एकत्वं व्यवहारतो न तु पुनः, कायाऽऽत्मनोर्निश्चयात्,
नुः स्तोत्रं व्यवहारतोऽस्ति वपुषः, स्तुत्या न तत्तत्त्वतः ।
स्तोत्रं निश्चयतश्चितो भवति चित्, स्तुत्यैव सैवं भवत्,
नातस्तीर्थकरस्तवोत्तरबलादेकत्वमात्माऽगयोः
।। २७ ।।

इस आतमा अर देह के, एकत्व को नय-युक्ति से।
निर्मूल ही जब कर दिया, तत्त्वज्ञ मुनिवरदेव ने।।
यदि भावना है भव्य तो फिर, क्यों नहीं सद्बोध हो।
भावोल्लसित आत्मार्थियों को, नियम से सद्बोध हो ।। २८ ।।
ॐ ह्रीं व्यवहार-निश्चयस्तुति-प्रकरणोपसंहारक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। २४।।

अब, एक कलश में आत्मानुभव शीघ्र करने की प्रेरणा देते हैं -

(हरिगीत)

परभाव के परित्याग की, दृष्टि पुरानी न पड़े।
अर जब तलक हे आत्मन् ! वृत्ति न हो अतिबलवती ।।
व्यतिरिक्त जो परभाव से, वह आतमा अतिशीघ्र ही ।
अनुभूति में उतरा अरे ! चैतन्यमय वह स्वयं ही ।। २९।।
ॐ ह्रीं शीघ्रात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।२५।।

अब, एक कलश के द्वारा ‘पौद्गलिक मोहादि भावकभावरूप परभावों से
भेदज्ञान कराने की विधि का प्रयोग’ कराते हैं -

(हरिगीत)

सब ओर से चैतन्यमय, निजभाव से भरपूर हूँ।
मैं स्वयं ही इस लोक में, निजभाव का अनुभव करूँ ।।

( मालिनी )

इति परिचिततत्त्वैरात्मकायैकतायां, नयविभजनयुक्त्याऽत्यन्तमुच्छादितायाम्।
अवतरति न बोधो बोधमेवाद्य कस्य, स्वरसरभसकृष्टः प्रस्फुटन्नेक एव ।। २८ ।।

( मालिनी )

अवतरति न यावद् वृत्तिमत्यन्तवेगादनवमपरभावत्यागदृष्ट्यन्तदृष्टिः ।
झटिति सकलभावैरन्यदीयैर्विमुक्ता, स्वयमियमनुभूतिस्तावदाविर्बभूव ।। २९ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
यह मोह मेरा कुछ नहीं, चैतन्य का घनपिण्ड हूँ।
हूँ शुद्ध चिद्घन महानिधि मैं, स्वयं एक अखण्ड हूँ।। ३०।।
ॐ ह्रीं भावकभावभेदज्ञानप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २६ ।।

अब यहाँ, ‘भेदज्ञान के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाली आत्मानुभूति की
प्रशंसा’ करते हैं -

(हरिगीत)

बस ! इस तरह सब अन्य भावों, से हुई जब भिन्नता ।
तब स्वयं को उपयोग ने, स्वयमेव ही धारण किया ।।
प्रकटित हुआ परमार्थ अर, दृग-ज्ञान-वृत परिणत हुआ।
तब आतमा के बाग में, आतम रमण करने लगा।।३१।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानफलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २७।।

यहाँ, ‘समस्त जगत् को भी ज्ञान-समुद्र भगवान् आत्मा में स्नान करने
की प्रेरणा देते हुए ‘पूर्वरंग’ का समापन’ करते हैं -

(हरिगीत)

सुख-शान्तरस से लबालब यह, ज्ञानसागर आतमा।
विभरम की चादर हटा, सर्वांग परगट आतमा ।।
हे भव्यजन ! इस लोक के, सब एक साथ नहाइये।
अर इसे ही अपनाइये, इसमें मगन हो जाइये ।।३२।।
ॐ ह्रीं स्वरूपसंचेतनप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २८।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( स्वागता )
सर्वतः स्वरसनिर्भरभावं, चेतये स्वयमहं स्वमिहैकम् ।
नास्ति नास्ति मम कश्चन मोहः, शुद्धचिद्घनमहोनिधिरस्मि ।। ३० ।।

( मालिनी )

इति सति सह सर्वैरन्यभावैर्विवेके, स्वयमयमुपयोगो बिभ्रदात्मानमेकम् ।
प्रकटितपरमार्थैर्दर्शनज्ञानवृत्तैः, कृतपरिणतिरात्माराम एव प्रवृत्तः ।। ३१ ।।

( वसन्ततिलका )

मज्जन्तु निर्भरममी सममेव लोका, आलोकमुच्छलति शान्तरसे समस्ताः ।
आप्लाव्य विभ्रमतिरस्करिणीं भरेण, प्रोन्मग्न एष भगवानवबोधसिन्धुः ।। ३२ ।।

।। जीव-अजीव अधिकार ।।

(दोहा)

वर्णादि रागादि से है यह आतम भिन्न।
शुद्ध-बुद्ध-चैतन्यमय और अखण्ड अनन्य ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के प्रारम्भ में सर्वप्रथम आचार्य अमृतचन्द्रदेव, आत्मख्याति
टीका में ‘जीव और अजीव को रंगमंच पर एकरूप में प्रस्तुत करके उस ज्ञान
की महिमा करते हैं, जो जीव-अजीव का भेद जान लेता है’ -

( सवैया इकतीसा )

जीव और अजीव के विवेक से है पुष्ट जो,
ऐसी दृष्टि द्वारा इस नाटक को देखता।
अन्य जो सभासद हैं उन्हें भी दिखाता और,
दुष्ट अष्ट कर्मों के बन्धन को तोड़ता ।।
जाने लोकालोक को पै निज में मगन रहे,
विकसित शुद्ध नित्य निज अवलोकता।
ऐसो ज्ञानवीर धीर मंग भरे मन में,
स्वयं ही उदात्त और अनाकुल सुशोभता ।। ३३।।
ॐ ह्रीं जीवाऽजीवभेदज्ञापक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २९ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

जीवाजीवविवेकपुष्कलदृशा, प्रत्याययत्पार्षदान्;
आसंसारनिबद्धबन्धनविधिध्वंसाद्विशुद्धं स्फुटत् ।
आत्माराममनन्तधाममहसाध्यक्षेण नित्योदितं;
धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनो ह्लादयत् ।। ३३ ।।
अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार
यहाँ, आचार्यदेव ‘छह माह तक निरन्तर आत्मानुभव का अभ्यास करने
पर उसकी प्राप्ति होना सुनिश्चित करते हुए उसकी प्रेरणा’ करते हैं -

( हरिगीत )

हे भव्यजन ! क्या लाभ है, इस व्यर्थ के बकवाद से।
अब तो रुको निज को लखो, अध्यात्म के अभ्यास से ।।
यदि अनवरत छह मास हो, निज आतमा की साधना ।
तो आतमा की प्राप्ति हो, सन्देह इसमें रंच ना ।। ३४।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवाभ्यासप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३०।।
अब, ‘भगवान् आत्मा के अनुभव की प्रेरणा’ एक कलश में देते हैं -

( हरिगीत )

चैतन्यशक्ति से रहित, परभाव सब परिहार कर।
चैतन्यशक्ति से सहित, निजभाव नित अवगाह कर ।।
है श्रेष्ठतम जो विश्व में, सुन्दर सहज शुद्धात्मा ।
अब उसी का अनुभव करो तुम, स्वयं हे भव्यातमा ! ।। ३५ ।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा ।। ३१ ।।
अब, ‘परमार्थ जीव से भिन्न, उनतीस भावों की पौद्गलिकता’ को दो
कलशों द्वारा बताते हैं -

( मालिनी)

विरम किमपरेणाऽकार्यकोलाहलेन, स्वयमपि निभृतः सन् पश्य षण्मासमेकम् ।
हृदयसरसि पुंसः पुद्गलाद्भिन्नधाम्नो, ननु किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धिः।। ३४ ।।
सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छक्तिरिक्तं स्फुटतरमवगाह्य स्वं च चिच्छक्तिमात्रम् ।
इममुपरि चरंतं चारु विश्वस्य साक्षात् कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनंतम् ।। ३५ ।।

( दोहा )

चित् शक्ति सर्वस्व जिन, केवल वह है जीव।
उसे छोड़कर और सब, पुद्गलमयी अजीव ।। ३६ ।।
वर्णादिक रागादि सब, हैं आतम से भिन्न।
अन्तर्दृष्टि देखिये, दिखे एक चैतन्य ।। ३७।।
ॐ ह्रीं वर्णादिगुणस्थानपर्यन्तभावान् पुद्गलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। ३२।।
अब, दो कलशों में जीव का वर्णादि से तादात्म्य नहीं है यह
दृष्टान्तपूर्वक स्पष्ट करते हैं

( दोहा )

जिस वस्तु से जो बने, वह हो वही न अन्य ।
स्वर्ण-म्यान तो स्वर्ण है, असि है उससे अन्य ।। ३८ ।।
वर्णादिक जो भाव हैं, वे सब पुद्गल जन्य ।
एक शुद्ध विज्ञानघन, आतम इनसे भिन्न ।। ३९।।
ॐ ह्रीं वर्णादितादात्म्यनिषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।३३।।

( अनुष्टुभ् )

चिच्छक्ति-व्याप्त-सर्वस्व-सारो जीव इयानयम् ।
अतोऽतिरिक्ताः सर्वेऽपि, भावाः पौद्गलिका अमी ।। ३६ ।।
( शालिनी )
वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा, भिन्ना भावाः सर्व एवाऽस्य पुंसः ।
तेनैवाऽन्तस्तत्त्वतः पश्यतोऽमी, नो दृष्टाः स्युर्दृष्टमेकं परं स्यात् ।। ३७ ।।
( उपजाति )
निर्वर्त्यते येन यदत्र किंचित् तदेव तत्स्यान्न कथंचनान्यत् ।
रुक्मेण निर्वृत्तमिहासिकोशं पश्यंति रुक्मं न कथंचनासिम् ।। ३८ ।।
वर्णादिसामग्र्यमिदं विदन्तु, निर्माणमेकस्य हि पुद्गलस्य ।
ततोऽस्त्विदं पुद्गल एव नात्मा, यतः स विज्ञानघनस्ततोऽन्यः ।। ३९ ।।
अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार
आगामी दो कलशों में व्यवहार-निश्चय जीव का स्वरूप बताते हैं

( दोहा )

कहने से घी का घड़ा, घड़ा न घीमय होय ।
कहने से वर्णादिमय, जीव न तन्मय होय ।।४०।।
स्वानुभूति में जो प्रगट, अचल अनादि अनन्त ।
स्वयं जीव चैतन्यमय, जगमगात अत्यन्त ।।४१।।
ॐ ह्रीं व्यवहारनिश्चयजीवप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३४।।
अब, आगामी चार कलशों में ‘जीव-अजीव को लक्षणों से जानकर
भेदज्ञान करने की प्रेरणा देते हुए इस अधिकार का उपसंहार’ करते हैं

( सवैया इकतीसा )

मूर्तिक-अमूर्तिक अजीव द्रव्य दो प्रकार,
इसलिए अमूर्तिक लक्षण न बन सके।
सोचकर विचारकर भलीभाँति ज्ञानियों ने,
कहा वह निर्दोष लक्षण जो बन सके।
अतिव्याप्ति-अव्याप्ति दोषों से विरहित,
चैतन्यमय उपयोग लक्षण है जीव का।
अतः अवलम्ब लो अविलम्ब इसका ही,
क्योंकि यह भाव ही है जीवन इस जीव का ।।४२।।
( अनुष्टुभ )
घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत्।
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः ।। ४० ।।
अनाद्यनन्तमचलं, स्वसंवेद्यमिदं स्फुटम् ।
जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्चैश्चकचकायते ।। ४१ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

वर्णाद्यैः सहितस्तथा विरहितो द्वेधास्त्यजीवो यतो ।
नामूर्तत्वमुपास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्वं ततः ।।
इत्यालोच्य विवेचकैः समुचितं नाव्याप्यतिव्यापि वा।
व्यक्तं व्यंजितजीवतत्त्वमचलं चैतन्यमालंब्यताम् ।। ४२ ।।

अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार (जयमाला)

( हरिगीत )

निज लक्षणों की भिन्नता से, जीव और अजीव को।
जब स्वयं से ही ज्ञानिजन, भिन्न-भिन्न ही हैं जानते।।
जग में पड़े अज्ञानियों का, अमर्यादित मोह यह।
अरे! तब भी नाचता क्यों? खेद है आश्चर्य है ।।४३।।
अरे ! काल अनादि से, अविवेक के इस नृत्य में।
बस ! एक पुद्गल नाचता, चेतन नहीं इस कृत्य में ।।
यह जीव तो पुद्गलमयी, रागादि से भी भिन्न है।
आनन्दमय चिद्भाव तो, दृग-ज्ञानमय चैतन्य है।।४४।।
जब इस तरह धारा-प्रवाही, ज्ञान का आरा चला।
तब जीव और अजीव में, अतिविकट विघटन हो चला।।
अब जब तलक हों भिन्न, जीव-अजीव उसके पूर्व ही।
यह ज्ञान का घनपिण्ड निज, ज्ञायक प्रकाशित हो उठा ।। ४५ ।।
ॐ ह्रीं जीवाजीवभेदज्ञानप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३५।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( वसन्ततिलका )

जीवादजीवमिति लक्षणतो विभिन्नं, ज्ञानी जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसंतम् ।
अज्ञानिनो निरवधिप्रविजृम्भितोऽयं, मोहस्तु तत्कथमहो बत नानटीति ।। ४३ ।।

( वसन्ततिलका )

अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकनाट्ये, वर्णादिमान्नटति पुद्गल एव नान्यः ।
रागादिपुद्गलविकारविरुद्धशुद्ध, चैतन्यधातुमयमूर्तिरयं च जीवः ।। ४४ ।।

( मन्दाक्रान्ता )

इत्थं ज्ञानक्रकचकलनापाटनं नाटयित्वा,
जीवाजीवौ स्फुटविघटनं नैव यावत्प्रयातः ।
विश्वं व्याप्य प्रसभविकसद्व्यक्तचिन्मात्रशक्त्या,
ज्ञातृद्रव्यं स्वयमतिरसात्तावदुच्चैश्चकाशे ।। ४५ ।।

जयमाला

( दोहा)

सुनो भव्य ! अधिकार की, महिमा अपरम्पार ।
इसमें सब कुछ आ गया, जिनवाणी का सार ।।१।।
जीवाजीव-अधिकार की, पूजन की सानन्द ।
जयमाला में जान लो, विषय-वस्तु आनन्द ।। २।।

( हरिगीत )

वर्णादि अर रागादि जड़ से, आतमा की भिन्नता।
का विशद वर्णन किया है रे ! इस प्रथम अधिकार में ।।
वर्णादि अर रागादि से, एकत्व और ममत्व को।
छोड़ने को कहा है रे ! युक्ति से विस्तार से ।।३।।
वर्णादि अर रागादि में, एकत्व रे ! जब तक रहे।
अज्ञानी मिथ्यादृष्टि यह जिय, नियम से तब तक रहे ।।
स्वयं में एकत्व, पर से भिन्नता, की बात को।
युक्ति से समझा रहे हैं, आतमा की बात को ।।४।।
न प्रमत्त है नाऽप्रमत्त है, न ज्ञान-दर्शन-चरित है।
न बँधा है न छुआ है, अविशेष और अनन्य है।।
संयोग विरहित एक ज्ञायकभाव आतम जानिये ।
भूतार्थ है परमार्थ उसकी शुद्धता पहिचानिये ।।५।।
धर्मादि ज्ञेयों से तथा, रागादि भावक-भाव से।
निज आतमा की भिन्नता को जानिये निजभाव से ।।
जीव के रस-गन्ध ना, ना रूप है ना शब्द है।
चेतना गुणवान आतम, अरे ! पूर्ण पवित्र है ।।६।।

वर्णादि से गुणथान तक, कोई नहीं इस जीव के।
ज्ञान-दर्शन जीव के, वर्णादि सभी अजीव के।।
यदि चाहते हो आतमा, तो स्वयं को पहिचानिये ।
स्वयं में रम जाइये अर, स्वयं में जम जाइये ।।७।।

(दोहा)

भविजन ! जीवाजीव में, करो भेद-विज्ञान ।
फिर गहराई से करो, आतम की पहिचान ।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंगसमन्वित-
जीवाजीवाधिकाराय जयमाला पूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

जीवाजीवाधिकार में, है आतम की बात।
एक आतमा जानिये, छोड़ जगत् की आश ।।९।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

आत्मा की उपासना का तात्पर्य
यहाँ आत्मा की उपासना करने का तात्पर्य निज आत्मा की पूजा-
भक्ति करने से नहीं है, स्तुति-वंदना करने से भी नहीं है, नमस्कारादि
करने से भी नहीं है; अपितु उसे सही रूप में जानने से है, पहिचानने से
है, उसका अनुभव करने से है; उसी में समा जाने से है, उसी का नित्य
ध्यान करने से है, ध्यान रखने से है; उसको ही सर्वस्व मानने से है;
उसी में पूर्णतः समर्पित हो जाने से है। यही निज भगवान् आत्मा की
उपासना की विधि है, आराधना की विधि है, साधना की विधि है।
तात्पर्य यह है कि निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की प्राप्ति ही
निज भगवान् आत्मा की उपासना है, निज भगवान् आत्मा की आराधना
है, निज भगवान् आत्मा की साधना है, निज भगवान् आत्मा की शरण
में जाना है। – समयसार अनुशीलन भाग-१, पृष्ठ २०६-२०७-२०८

कर्ता-कर्म अधिकार पूजन

स्थापना

( हरिगीत )

वर्णादि अर रागादि का, कर्ता नहीं है आतमा ।
वर्णादि अर रागादि का, भोक्ता नहीं है आतमा ।।
कर्ता नहीं भोक्ता नहीं, स्वामी नहीं यह आतमा।
किसी से लेता नहीं, देता नहीं कुछ आतमा ।।१।।

( दोहा)

आतम आतमभाव का, कर्ता-भोक्ता होय ।
स्व-स्वामी सम्बन्ध भी, अपने में ही होय ।। २।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार! अत्र अवतर-अवतर
संवौषट् ।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार! अत्र मम सन्निहितो
भव-भव वषट् । (इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( अवतार )
जल
उज्ज्वल जल परम पवित्र, मल परिहारक है।
निज के निर्मल परिणाम, आत्म-उद्धारक हैं।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय जन्म-जरा-मत्यु-
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन
चन्दन-सम शीतल शान्त, आतम है मेरा।
रे अचल अनादि-अनन्त, आतम है मेरा ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ता-कर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय संसार-ताप-
विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
निज अक्षत अमल अखण्ड, न पर से खण्डित हैं।
अपनी महिमा से आप, पूर्णतः मण्डित हैं।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अक्षय-पद-प्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
सुमन सुमन से आज, मन मोहित करते।
निर्मल आतम गुणगान, मृदु मन को हरते ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय काम-बाण-विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य
मन-मोहक मृदु मिष्ठान्न, मधुर महिमा मण्डित ।
सर्वांग सरस मिष्ठान्न, करते आकर्षित ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीप
मनहर तमहर परकाश, स्व-पर प्रकाशक है।
सज्ञान प्रतीक प्रदीप, विभरमतम नाशक है।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
यह आतम अलख अनूप, धूम दश धर्मों की ।
रे! धर्मध्यान की धूप, दाहक कर्मों की ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अष्ट-कर्म-दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
माया ममता को छोड़, अरे ! मन को हर लो।
कर फल से पूजा आज, जनम सफल कर लो।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय मोक्ष-फल-प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

जल से फल तक सब अर्घ्य, चढ़ाओ बलिहारी ।
अन-अर्घ्य परमपद प्राप्त, करने की बारी ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अनर्घ्य-पद-
प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अर्ध्यावली

(दोहा)

मैं कर्ता हूँ कर्म का, कर्म है मेरा कर्म।
ऐसी मिथ्या मान्यता, है मिथ्यात्व अधर्म ।।
निज आतम तल्लीनता, सुखमय आतमधर्म ।
श्री जिन जिनवरदेव ने, यह समझाया मर्म ।।
( पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
यहाँ आचार्य अमृतचन्द्रदेव कहते हैं कि अब, ‘जीव-अजीव ही कर्ता-
कर्म के वेश में रंगभूमि में प्रवेश करते हैं’ और वहाँ ‘जीव (अज्ञानी) कहता है
कि मैं (जीव) कर्ता हूँ और क्रोधादि (अजीव) मेरे कर्म हैं।’ ज्ञानियों को इस
‘कर्ता-कर्म सम्बन्धी अज्ञान का शमन करनेवाली ज्ञान-ज्योति’ प्रगट होती है,
अतः उस ज्ञान-ज्योति की महिमा करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रदेव, इस
अधिकार का मंगलाचरण करते हैं; जिसका पद्यानुवाद इसप्रकार है -

( हरिगीत )

मैं एक कर्ता आत्मा, क्रोधादि मेरे कर्म सब ।
है यही कर्ता-कर्म की, है प्रवृत्ति अज्ञानमय ।।
शमन करती इसे प्रगटी, सर्व विश्व-विकाशनी ।
अतिधीर परमोदात्त पावन, ज्ञानज्योति-प्रकाशनी ।। ४६ ।।
ॐ ह्रीं कर्तृकर्माऽज्ञाननिवारक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।। ३६।।
अब, एक कलश के द्वारा ‘आत्मा और आस्रवों के बीच होनेवाले
भेदज्ञान को बन्ध के निरोध का कारण’ बताते हैं -

( मन्दाक्रान्ता )

एकः कर्ता चिदहमिह मे, कर्म कोपादयोऽमी,
इत्यज्ञानां शमयदभितः, कर्तृकर्मप्रवृत्तिम् ।
ज्ञानज्योतिः स्फुरति परमोदात्तमत्यंतधीरं,
साक्षात्कुर्वन्निरुपधिपृथग्द्रव्यनिर्भासि विश्वम् ।।४६ ।।

( हरिगीत )

पर-परिणति को छोड़ती अर, तोड़ती सब भेद-भ्रम।
यह अखण्ड प्रचण्ड प्रगटित, हुई पावन-ज्योति जब ।।
अज्ञानमय इस प्रवृत्ति को, है कहाँ अवकाश तब ?।
अर किसतरह हो कर्मबन्धन ? जगी जगमग ज्योति जब ।।४७।।
ॐ ह्रीं बन्धनिरोधोपायप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३७।।
‘आत्मा और आस्रव में भिन्नता जानने से कर्तृत्व का अज्ञान नष्ट होकर
यह आत्मा ज्ञानी हो गया’ ऐसा भाव आगामी कलश में व्यक्त करते हैं -

( सवैया इकतीसा )

इस प्रकार जान भिन्नता विभाव भाव की,
कर्तृत्व का अहं विलायमान हो रहा।
निज विज्ञानघन भाव गजारूढ़ हो,
निज भगवान् शोभायमान हो रहा ।।
जगत् का साक्षी है पुरुष पुराण यह,
अपने स्वभाव में विकासमान हो रहा।
अहो ! सद्ज्ञानवन्त दृष्टिवन्त यह पुमान,
जग-मग ज्योतिमय प्रकाशमान हो रहा ।। ४८।।
ॐ ह्रीं कर्तृत्वनाशकज्ञानीप्ररूपक - श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३८।।

( मालिनी )

परपरिणतिमुज्झत् खण्डयद्भेदवादानिदमुदितमखण्डं ज्ञानमुच्चण्डमुच्चैः ।
ननु कथमवकाशः कर्तृकर्मप्रवृत्ते रिह भवति कथं वा पौद्रलः कर्मबन्धः।। ४७ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

इत्येवं विरचय्य संप्रति परद्रव्यान्निवृत्तिं परां
स्वं विज्ञानघनस्वभावमभयादास्तिघ्नुवानः परम् ।
अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनात् क्लेशान्निवृत्तः स्वयं
ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगतः साक्षी पुराणः पुमान् ।। ४८ ।।

अब, 'जहाँ व्याप्य-व्यापक भाव होता है, वहीं कर्ता-कर्मभाव होता है

  • यह कलश के माध्यम से कहते हैं -

( सवैया इकतीसा )

तत्स्वरूप भाव में ही व्याप्य-व्यापक बने,
बने न कदापि वह अतत्स्वरूप भाव में।
कर्ता-कर्म भाव का बनना असम्भव है,
व्याप्य-व्यापकभाव सम्बन्ध के अभाव में ।।
इस भाँति प्रबल विवेक दिनकर से ही,
भेद-अन्धकार लीन निज ज्ञान भाव में।
कर्तृत्व भार से शून्य शोभायमान,
पूर्ण निर्धार मगन आनन्द स्वभाव में ।।४९।।

ॐ ह्रीं व्याप्य-व्यापकत्वैव कर्तृ-कर्मभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।३९।।

‘स्व-पर को जाननेवाले जीव व न जाननेवाले अजीव में अत्यन्त भिन्नता
होने से कर्त्ता-कर्मभाव नहीं बन सकता’-यह भाव इस कलश में व्यक्त करते हैं-

( सवैया इकतीसा )

निज-पर-परिणति जानकार जीव यह,
पर-परिणति को करता कभी नहीं।
निज-पर-परिणति अजानकार पुद्गल,
पर-परिणति को करता कभी नहीं।।

( शार्दूलविक्रीडित )

व्याप्य-व्यापकता तदात्मनि भवेत्, नैवातदात्मन्यपि,
व्याप्य-व्यापकभावसम्भवमृते, का कर्तृकर्मस्थितिः।
इत्युद्दाम-विवेक-घस्मरमहो, भारेण भिन्दंस्तमो,
ज्ञानीभूय तदा स एष लसितः, कर्तृत्वशून्यः पुमान् ।। ४९ ।।

नित्य अत्यन्त भेद जीव-पुद्गल में,
करता-करम भाव उनमें बने नहीं।
ऐसो भेदज्ञान जब तक प्रगटे नहीं,
करता-करम की प्रवृत्ति मिटे नहीं ।।५०।।

ॐ ह्रीं स्व-परप्रकाशकजीव-अप्रकाशकाजीवयोर्कर्तृकर्मभावनिषेधक -
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४०।।

अब, चार कलशों में ‘निश्चय कर्ता-कर्म-क्रिया का स्वरूप’ बताते हैं-

( हरिगीत )

कर्ता वही जो परिणमे, परिणाम ही बस कर्म है।
है परिणति ही क्रिया बस ! तीनों अभिन्न अखण्ड हैं।।५१।।
अनेक होकर एक है, हो परिणमित बस ! एक ही।
परिणाम हो बस ! एक का, हो परिणति बस ! एक की।।५२।।
परिणाम दो का एक ना, मिलकर नहीं दो परिणमे।
परिणति दो की एक ना, बस ! क्योंकि दोनों भिन्न हैं।।५३।।

( स्रग्धरा )

ज्ञानी जानन्नपीमां स्वपरपरिणतिं पुद्गलश्चाप्यजानन्
व्याप्तृव्याप्यत्वमंतः कलयितुमसहो नित्यमत्यंतभेदात्।
अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत्
विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवददयं भेदमुत्पाद्य सद्यः।। ५० ।।

( आर्या )
यः परिणमति स कर्ता, यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म।
या परिणतिः क्रिया सा, त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ।। ५१ ।।
एकः परिणमति सदा, परिणामो जायते सदैकस्य।
एकस्य परिणतिः स्यादनेकमप्येकमेव यतः।। ५२ ।।
नोभौ परिणमतः खलु, परिणामो नोभयोः प्रजायेत।
उभयो र्न परिणतिः स्यादनेकमनेकमेव सदा।। ५३ ।।

कर्ता नहीं दो एक के, हों एक के दो कर्म ना।
ना दो क्रियायें एक की हों, क्योंकि एक अनेक ना ।। ५४।।
ॐ ह्रीं निश्चयकर्तृ-कर्म-क्रियास्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।४१।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘यदि यह कर्ता-कर्मसम्बन्धी
अनादिकालीन अज्ञान, एक बार नष्ट हो तो फिर इसका उदय ही न हो’ –

( हरिगीत )

‘पर को करूँ मैं’ – यह अहं, अत्यन्त ही दुर्वार है।
यह है अखण्ड अनादि से, जीवन हुआ दुःस्वार है।।
भूतार्थनय के ग्रहण से यदि, प्रलय को यह प्राप्त हो।
तो ज्ञान के घनपिण्ड आतम, को कभी ना बन्ध हो ।।५५।।

( दोहा )

परभावों को पर करे, आतम आतमभाव ।
आप आपके भाव हैं, पर के हैं परभाव ।।५६।।
ॐ ह्रीं कर्तृ-कर्माऽज्ञाननिषेधक-भूतार्थग्रहणप्रेरक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४२।।
( आर्या)
नैकस्य हि कर्तारौ द्वौ, स्तो द्वे कर्मणी न चैकस्य ।
नैकस्य च क्रिये द्वे, एकमनेकं यतो न स्यात् ।। ५४ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै-
दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तमः।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्
तत्किं ज्ञानघनस्य बंधनमहो भूयो भवेदात्मनः ।। ५५ ।।

( अनुष्टुभ् )

आत्मभावान्करोत्यात्मा, परभावान्सदा परः ।
आत्मैव ह्यात्मनो भावाः, परस्य पर एव ते ।। ५६ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अब, छह कलशों के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि ‘अज्ञान व ज्ञान
से क्या-क्या होता है?’ -

( कुण्डलिया )

नाज सम्मिलित घास को, ज्यों खावे गजराज।
भिन्न स्वाद जाने नहीं, समझे मीठी घास ।।
समझे मीठी घास नाज को न पहिचाने ।
त्यों अज्ञानी जीव निजातम स्वाद न जाने ।।
पुण्य-पाप में धार एकता-शून्य हिया है।
अरे ! शिखरणी पी मानो गो-दूध पिया है।।५७।।

( हरिगीत )

अज्ञान से ही भागते मृग, रेत को जल मानकर ।
अज्ञान से ही डरें तम में, रस्सी विषधर मानकर ।।
ज्ञानमय है जीव पर, अज्ञान के कारण अहो !।
वातोद्वेलित उदधिवत्, कर्ता बने आकुलित हो ।।५८।।
दूध-जल में भेद जाने, ज्ञान से बस ! हंस ज्यों।
सद्ज्ञान से अपना-पराया, भेद जाने जीव त्यों ।।
जानता तो है सभी, करता नहीं कुछ आतमा ।
चैतन्य में आरूढ़ नित ही, यह अचल परमातमा ।।५९।।

( वसन्ततिलका )

अज्ञानतस्तु सतृणाभ्यवहारकारी ज्ञानं स्वयं किल भवन्नपि रज्यते यः ।
पीत्वा दधीक्षुमधुराम्लरसातिगृद्धया गां दोग्धि दुग्धमिव नूनमसौ रसालम् ।। ५७ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

अज्ञानान्मृगतृष्णिकां जलधिया धावंति पातुं मृगा
अज्ञानात्तमसि द्रवंति भुजगाध्यासेन रज्जौ जनाः ।
अज्ञानाच्च विकल्पचक्र करणाद्वातोत्तरंगाब्धिवत्
शुद्धज्ञानमया अपि स्वयममी कर्त्रीभवंत्याकुलाः ।। ५८ ।।

( वसन्ततिलका )

ज्ञानाद्विवेचकतया तु परात्मनोर्यो जानाति हंस इव वाःपयसोर्विशेषम् ।
चैतन्यधातुमचलं स सदाधिरूढो जानीत एव हि करोति न किंचनापि ।। ५९ ।।

( आडिल्ल )
उष्णोदक में उष्णता है अग्नि की।
और शीतलता सहज ही नीर की।।
व्यंजनों में है नमक का क्षारपन।
ज्ञान ही यह जानता है विज्ञजन।।
क्रोधादिक के कर्तापन को छेदता।
अहंबुद्धि के मिथ्यातम को भेदता।।
इसी ज्ञान में प्रगटे निज शुद्धात्मा।
अपने रस से भरा हुआ यह आतमा।।६०।।

( सोरठा )

करे निजातम भाव, ज्ञान और अज्ञानमय।
करे न पर के भाव, ज्ञानस्वभावी आतमा।।६१।।
ज्ञानस्वभावी जीव, करे ज्ञान से भिन्न क्या?।
कर्ता पर का जीव, जगज्जनों का मोह यह।।६२।।
ॐ ह्रीं कर्तृ-कर्मविषये ज्ञानाऽज्ञानयोः फलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४३।।

( मन्दाक्रान्ता )

ज्ञानादेव ज्वलनपयसोरौष्ण्यशैत्यव्यवस्था
ज्ञानादेवोल्लसति लवणस्वादभेदव्युदासः।
ज्ञानादेव स्वरसविकसन्नित्यचैतन्यधातोः
क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिंदती कर्तृभावम्।।६०।।

( अनुष्टुभ् )

अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वन्नात्मानमंजसा।
स्यात्कर्तात्मात्मभावस्य परभावस्य न क्वचित्।।६१।।
आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम्।
परभावस्य कर्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम्।।६२।।

अब, ‘मिथ्यात्वादि चार प्रत्यय अथवा तेरह गुणस्थान, पुद्गल कर्म के
कर्ता हैं’ - यह बताते हैं -

( दोहा )

यदि पुद्गलमय कर्म को, करे न चेतनराय।
कौन करे? अब यह कहें, सुनो! भरम नश जाय।।६३।।
ॐ ह्रीं पुद्गलकर्म-कर्तृत्वनिरूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।४४।।

अब, आगामी दो कलशों में ‘पुद्गल व जीव द्रव्य का परिणमन-
स्वभाव’ सयुक्तिक सिद्ध करते हैं -

( हरिगीत )

सब पुद्गलों में है स्वभाविक, परिणमन की शक्ति जब।
और उनके परिणमन में, है न कोई विघ्न जब।।
क्यों न हो तब स्वयं कर्ता, स्वयं के परिणमन का?।
अर सहज यह नियम जानो, वस्तु के परिणमन का।।६४।।
आत्मा में है स्वभाविक, परिणमन की शक्ति जब।
और उसके परिणमन में, है न कोई विघ्न जब।।
क्यों न हो तब स्वयं कर्ता, स्वयं के परिणमन का?।
अर सहज यह नियम जानो, वस्तु के परिणमन का।।६५।।
ॐ ह्रीं पुद्गलजीवद्रव्ययोः परिणमनस्वभावसाधक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४५।।

( वसन्ततिलका )

जीवः करोति यदि पुद्गलकर्म नैव, कस्तर्हि तत्कुरुत इत्यभिशंकयैव।
एतर्हि तीव्ररयमोहनिवर्हणाय, संकीर्त्यते शृणुत पुद्गलकर्मकर्तृ।।६३।।
( उपजाति )
स्थितेत्यविघ्ना खलु पुद्गलस्य, स्वभावभूता परिणामशक्तिः।
तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यमात्मनस्तस्य स एव कर्ता।।६४।।
स्थितेति जीवस्य निरन्तराया, स्वभावभूता परिणामशक्तिः।
तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यं स्वस्य तस्यैव भवेत्स कर्ता।।६५।।

अब, ‘ज्ञानी के ज्ञानमय और अज्ञानी के अज्ञानमय भाव ही क्यों होते
हैं ?’- यह दो कलशों में दृष्टान्त सहित स्पष्ट कहते हैं -

( रोला )

ज्ञानी के सब भाव शुभाशुभ ज्ञानमयी हैं।
अज्ञानी के वही भाव अज्ञानमयी हैं ।।
ज्ञानी और अज्ञानी में यह अन्तर क्यों है?।
तथा शुभाशुभभावों में भी अन्तर क्यों है ।। ६६ ।।
ज्ञानी के सब भाव ज्ञान से बने हुए हैं।
अज्ञानी के सभी भाव अज्ञानमयी हैं।।
उपादान के ही समान कारज होते हैं।
जौ बौने पर जौ ही तो पैदा होते हैं ।। ६७।।
ॐ ह्रीं ज्ञानी-अज्ञानिनोः ज्ञानाऽज्ञानभावयोः कर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।४६।।
अब, ‘अज्ञानी के अज्ञानमय भाव ही कर्म-बन्धन के निमित्त-कारणरूप
हेतु हैं’ – यह एक कलश से स्पष्ट करते हैं -

(दोहा)

अज्ञानी अज्ञानमय, भावभूमि में व्याप्त ।
इस कारण द्रव्य-बन्ध के, हेतुपने को प्राप्त ।। ६८।।
ॐ ह्रीं अज्ञानिनः अज्ञानमयभावानां कर्मबन्धननिमितत्त्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४७।।
( आर्या )
ज्ञानमय एव भावः, कुतो भवेत् ज्ञानिनो न पुनरन्यः ।
अज्ञानमयः सर्वः, कुतोऽयमज्ञानिनो नाऽन्यः ।। ६६ ।।

( अनुष्टुभ् )

ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः, सर्वे भावा भवन्ति हि ।
सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता, भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते ।। ६७ ।।
अज्ञानमयभावानामज्ञानी व्याप्यभूमिकाम् ।
द्रव्यकर्मनिमित्तानां, भावानामेति हेतुताम् ।। ६८ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अब, ‘जो समस्त नयपक्ष के विकल्पों का अतिक्रम करता है, वही
समयसार को प्राप्त करता है’; अतः आचार्य अमृतचन्द्रदेव, नयपक्ष के त्याग
की भावना वाले २३ कलशरूप काव्य लिखते हैं, जिनका पद्यानुवाद
इसप्रकार है -

( सोरठा )

जो निवसे निज माहि, छोड़ सभी नयपक्ष को।
करे सुधारस पान, निर्विकल्प चित शान्त हो ।। ६९।।

( रोला )

एक कहे ना बँधा, दूसरा कहे बँधा है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७०।।
एक कहे ना मूढ़, दूसरा कहे मूढ़ है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७१।।
एक कहे ना रक्त, दूसरा कहे रक्त है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७२।।

( उपेन्द्रवज्रा )

य एव मुक्त्वा नयपक्षपातं, स्वरूपगुप्ता निवसन्ति नित्यम् ।
विकल्पजालच्युतशान्तचित्ताः, त एव साक्षादमृतं पिबन्ति ।। ६९ ।।
( उपजाति )
एकस्य बद्धो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७० ।।
एकस्य मूढो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७१ ।।
एकस्य रक्तो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७२ ।।

एक कहे ना दुष्ट, दूसरा कहे दुष्ट है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७३।।
एक अकर्ता कहे, दूसरा कर्ता कहता।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है ।। ७४।।
एक अभोक्ता कहे, दूसरा भोक्ता कहता।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७५।।
एक कहे ना जीव, दूसरा कहे जीव है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।। ७६।।
( उपजाति )
एकस्य दुष्टो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७३ ।।
एकस्य कर्ता न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७४ ।।
एकस्य भोक्ता न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७५ ।।
एकस्य जीवो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७६ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
एक कहे ना सूक्ष्म, दूसरा कहे सूक्ष्म है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।। ७७।।
एक कहे ना हेतु, दूसरा कहे हेतु है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७८।।
एक कहे ना कार्य, दूसरा कहे कार्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७९।।
एक कहे ना भाव, दूसरा कहे भाव है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८०।।
( उपजाति)
एकस्य सूक्ष्मो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७७ ।।
एकस्य हेतुर्न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७८ ।।
एकस्य कार्यं न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७९ ।।
एकस्य भावो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८० ।।

एक कहे ना एक, दूसरा कहे एक है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८१।।

एक कहे ना सान्त, दूसरा कहे सान्त है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८२।।

एक कहे ना नित्य, दूसरा कहे नित्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८३।।

एक कहे ना वाच्य, दूसरा कहे वाच्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है ।।८४।।

( उपजाति )
एकस्य चैको न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८१ ।।
एकस्य सांतो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८२ ।।
एकस्य नित्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८३ ।।
एकस्य वाच्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८४ ।।

नाना कहता एक, दूसरा कहे अनाना।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८५।।

एक कहे ना चेत्य, दूसरा कहे चेत्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८६।।

एक कहे ना दृश्य, दूसरा कहे दृश्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८७।।

एक कहे ना वेद्य, दूसरा कहे वेद्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८८।।

( उपजाति )
एकस्य नाना न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८५ ।।
एकस्य चेत्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८६ ।।
एकस्य दृश्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८७ ।।
एकस्य वेद्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८८ ।।

अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार

( रोला )

एक कहे ना भात, दूसरा कहे भात है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८९।।

( हरिगीत )

उठ रहा जिसमें है अनन्ते, विकल्पों का जाल है।
वह वृहद् नय-पक्ष-कक्षा, विकट है विकराल है।।
उल्लंघन कर उसे बुध, अनुभूतिमय निजभाव को।
हो प्राप्त अन्तर्बाह्य से, समरसी एक स्वभाव को ।।९०।।

( दोहा )

इन्द्रजाल से स्फुरें, सब विकल्प के पुंज ।
जो क्षणभर में लय करे, मैं हूँ वह चित्युंज ।। ९१।।
ॐ ह्रीं सकलनयपक्षसंन्यासभावनानर्तक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। ४८ ।।
अब, आगामी कलश में ‘समयसार-स्वरूप भगवान् आत्मा के अनुभव
की प्रेरणा’ देते हैं -
( उपजाति )
एकस्य भातो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८९ ।।

( वसन्ततिलका )

स्वेच्छासमुच्छलदनल्पविकल्पजालामेवं व्यतीत्य महतीं नयपक्षकक्षाम्।
अन्तर्बहिः समरसैकरसस्वभावं, स्वं भावमेकमुपयात्यनुभूतिमात्रम् ।। ९० ।।
( रथोद्धता )
इन्द्रजालमिदमेवमुच्छलत् पुष्कलोच्चलविकल्पवीचिभिः ।
यस्य विस्फुरणमेव तत्क्षणं कृत्स्नमस्यति तदस्मि चिन्महः ।। ९१ ।।
मैं हूँ वह चित्पुंज कि भावाभाव भावमय ।
परमारथ से एक सदा अविचल स्वभावमय ।।
कर्मजनित यह बन्धपद्धति करूँ पार मैं।
नित अनुभव यह करूँ कि चिन्मय समयसार मैं ।। ९२।।
ॐ ह्रीं पक्षातिक्रान्त-समयसारस्वरूप-परमात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४९।।
अब, एक कलश के माध्यम से कहते हैं कि ‘पक्षातिक्रान्त - स्वरूप
समयसार ही सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान है’ -

( हरिगीत )

यह पुण्य-पुरुष-पुराण सब, नयपक्ष बिन भगवान् है।
यह अचल है अविकल्प है, बस यही दर्शन-ज्ञान है।।
निभृतजनों का स्वाद्य है, अर जो समय का सार है।
जो भी हो वह बस ! एक ही, अनुभूति का आधार है।। ९३।।
ॐ ह्रीं ‘पक्षातिक्रान्त-समयसार एव सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानम्’ इतिप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५०।।
अब, आगामी कलश में ‘आत्मानुभव कैसे होता है ?’ यह दृष्टान्तपूर्वक
बताते हैं -
( स्वागता )
चित्स्वभावभरभावितभावाभावभावपरमार्थतयैकम् ।
बंधपद्धतिमपास्य समस्तां चेतये समयसारमपारम् ।। ९२ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

आक्रामन्नविकल्पभावमचलं, पक्षैर्नयानां विना;
सारो यः समयस्य भाति निभृतैरास्वाद्यमानः स्वयम् ।
विज्ञानैकरसः स एष भगवान्पुण्यः पुराणः पुमान्;
ज्ञानं दर्शनमप्ययं किमथवा यत्किंचनैकोऽप्ययम् ।। ९३ ।।

( हरिगीत )

निज औघ से च्युत जिस तरह जल, ढालवाले मार्ग से ।
बलपूर्वक यदि मोड़ दें तो, आ मिले निज औघ से ।।
उस ही तरह यदि मोड़ दें, बलपूर्वक निजभाव को।
निजभाव से च्युत आत्मा, निजभाव में ही आ मिले ।।९४।।
ॐ ह्रीं दृष्टान्तपुरस्सर-स्वानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५१।।

अब, कहते हैं कि विकल्प करनेवाला कर्ता है और मात्र विकल्प ही
उसका कर्म है -

( रोला )

है विकल्प ही कर्म विकल्पक कर्ता होवे।
जो विकल्प को करे वही तो कर्ता होवे ।।
नित अज्ञानी जीव विकल्पों में ही होवे ।
इस विधि कर्ता-कर्मभाव का नाश न होवे ।।९५।।
ॐ ह्रीं ‘विकल्प एव कर्म - विकल्पक एव कर्तृ’ इतिप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५२।।

( शार्दूलविक्रीडित )

दूरं भूरिविकल्पजालगहने, भ्राम्यन्निजौघाच्च्युतो;
दूरादेव विवेकनिम्नगमनान्नीतो निजौघंबलात् ।
विज्ञानैकरसस्तदेकरसिनामात्मानमात्मा हरन् ;
आत्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत् ।। ९४ ।।

( अनुष्टुभ् )

विकल्पकः परं कर्ता, विकल्पः कर्म केवलम् ।
न जातु कर्तृकर्मत्वं, सविकल्पस्य नश्यति ।। ९५ ।।


अब, इस अधिकार का उपसंहार करते हुए अन्तिम चार कलशों में
कहते हैं कि ‘जो कर्ता है, वह ज्ञाता नहीं होता और जो ज्ञाता है, वह कर्ता
नहीं होता’ करने रूप क्रिया में जानना भासित नहीं होता तथा जाननेरूप
क्रिया में करना भासित नहीं होता। कर्म में कर्त्ता नहीं तथा कर्त्ता में कर्म
नहीं; कर्म कर्म में है और ज्ञाता ज्ञाता में है। ऐसा निर्णय होने से कर्त्ता कर्त्ता
नहीं रहा, कर्म कर्म नहीं रहा; मात्र ज्ञानरूप परिणमन से अपार आनन्द
हुआ।’ -

( रोला )

जो करता है वह केवल कर्ता ही होवे।
जो जाने बस ! वह केवल ज्ञाता ही होवे ।।
जो करता वह नहीं जानता कुछ भी भाई ! ।
जो जाने वह करे नहीं कुछ भी हे भाई ! ।।९६।।

( रोला )

करने रूप क्रिया में जानन भासित ना हो।
जानन रूप क्रिया में करना भासित ना हो।।
इसीलिए तो जानन-करना भिन्न-भिन्न हैं।
इसीलिए तो ज्ञाता-कर्ता भिन्न-भिन्न है ।।९७।।
( रथोद्धता )
यः करोति स करोति केवलं, यस्तु वेत्ति स तु वेत्ति केवलम् ।
यः करोति न हि वेत्ति स क्वचित्, यस्तु वेत्ति न करोति स क्वचित् ।। ९६ ।।

( इन्द्रवज्रा )

ज्ञप्तिः करोतौ न हि भासतेऽन्तः, ज्ञप्तौ करोतिश्च न भासतेऽन्तः।
ज्ञप्तिः करोतिश्च ततो विभिन्ने, ज्ञाता न कर्तेति ततः स्थितं च ।। ९७ ।।

( हरिगीत )

कर्म में कर्ता नहीं अर, कर्म कर्ता में नहीं।
इसलिए कर्ता-कर्म की थिति, भी कभी बनती नहीं ।।
कर्म में है कर्म, ज्ञाता में रहा ज्ञाता सदा।
यदि साफ है यह बात तो फिर, मोह है क्यों नाचता ? ।। ९८ ।।

( सवैया इकतीसा )

जगमग जगमग जली ज्ञान-ज्योति जब,
अति गम्भीर चित् शक्तियों के भार से ।।
अद्भुत अनुपम अचल अभेद ज्योति,
व्यक्त धीर-वीर निर्मल आर-पार से।।
तब कर्म कर्म अर कर्ता कर्ता न रहा।
ज्ञान ज्ञानरूप हुआ आनन्द अपार से ।।
और पुद्गलमयी कर्म कर्मरूप हुआ,
ज्ञानी पार हुए भव-सागर अपार से ।।९९।।
ॐ ह्रीं ज्ञातृत्व-कर्तृत्वयोः भेदज्ञानप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।५३।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( शार्दूलविक्रीडित )

कर्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्तरि
द्वंद्वं विप्रतिषिध्यते यदि तदा का कर्तृकर्मस्थितिः ।
ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थिति-
र्नेपथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथात्येष किम् ।। ९८ ।।
( मन्द्राक्रान्ता )
कर्ता कर्ता भवति न यथा कर्म कर्मापि नैव
ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा पुद्गलः पुद्गलोऽपि ।
ज्ञानज्योतिज्वलितमचलं व्यक्तमंतस्तथोच्चै –
श्चिच्छक्तीनां निकरभरतोऽत्यंतगंभीरमेतत् ।। ९९ ।।

अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार (जयमाला)

जयमाला

( दोहा )

अरे ! विगत अधिकार में, परद्रव्यों के साथ।
रे एकत्व-ममत्व को, छुड़वाया हे नाथ! ।।१।।
अब इस अधिकार में, कर्ता-भोक्ता भाव ।
को छुड़वाते भव्यजन ! इनका करो अभाव ।।२।।
वर्णादि रागादि को, करे न भोगे जीव ।
ज्ञाता-दृष्टा ही रहे, निज में रमे सदीव ।।३।।

( रोला )

रे! एकत्व-ममत्व और कर्ता-भोक्तापन ।
यदि होवे पर में तो मिथ्यादर्श कहा है।।
अरे ! नहीं है कोई भी परद्रव्य किसी का।
और नहीं है कोई किसी का कर्ता-भोक्ता ।।४।।
सब अपने-अपने में ही परिपूर्ण तत्त्व हैं।
कर्ता-भोक्ता भी सब अपने-अपने ही हैं।।
दो द्रव्यों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है।
सब अपने-अपने में ही शोभित होते हैं।।५।।
इस जग का कर्ता कोई भगवान् नहीं है।
सुनो भव्य ! यह बात मात्र इतनी ही नहीं है।।
एक द्रव्य है नहीं अन्य का कर्ता-धर्ता ।
मूल बात तो यह है इसे ध्यान से जानों ।।६।।

इसे भूलकर जो पर के कर्ता बनते हैं।
वे अज्ञानी जीव चतुर्गति भ्रमण करेंगे ।।
उनके भव का अन्त नहीं है दूर-दूर तक ।
वे चौरासी लाख योनियों में घूमेंगे ।।७।।

है विकल्प ही कर्म विकल्पक कर्ता होवे।
जो विकल्प को करे वही तो कर्ता होवे।।
नित अज्ञानी जीव विकल्पों में ही होवे।
इस विधि कर्ता-कर्मभाव का नाश न होवे ।।८।।

जो करता है वह केवल कर्ता ही होवे।
जो जाने बस ! वह केवल ज्ञाता ही होवे ।।
जो करता वह नहीं जानता कुछ भी भाई !।
जो जाने वह करे नहीं कुछ भी हे भाई ! ।।९।।

करने रूप क्रिया में जानन भासित ना हो।
जानन रूप क्रिया में करना भासित ना हो।।
इसीलिए तो जानन करना भिन्न-भिन्न है।
इसीलिए तो ज्ञाता-कर्ता भिन्न-भिन्न हैं।।१०।।

(दोहा)

ज्ञाता बनना इष्ट है, कर्ता-भाव अनिष्ट ।
कर्ता-भाव विनाश कर, ज्ञाताभाव-प्रविष्ट ।।११।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-कर्ताकर्माधिकाराय जयमाला पूर्णार्थ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

कर्ता-कर्म विभाव की, चर्चा हुई समाप्त।
अब होगी रे भव्यजन ! पुण्य-पाप की बात ।।१२।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

प्रूफरीडिंग बाकी है

पुण्य-पाप अधिकार पूजन

स्थापना

(दोहा)

पुण्य-पाप दोनों करम, शिवमग-रोकनहार।
पुण्य-पाप से पार है, आतम धरम अपार ।। १।।
शुभभावों से जो बँधे, पुण्य करम है सोय ।
अशुभभाव से बंधे जो, पाप करम वह होय ।। २।।

(सोरठा )

करम-बन्ध न होय, जिन भावों से जगत् में।
धरम रूप हैं सोय, शुद्धभाव उनको कहें ।। ३।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकार! अत्र अवतर-अवतर
संवौषट् ।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकार ! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकार ! अत्र मम सन्निहितो
भव-भव वषट् ।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

(रोला)

जल
मोहभाव का मल हर लेता यह निर्मल जल ।
राग-द्वेष के मलिन भाव धो देता यह जल ।।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें ।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय जन्मजरामत्युविनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन
दीप
चन्दन सम शीतल शुद्धभाव को मेरा वन्दन ।
रतनत्रयी दीप की ज्योति अखण्डित होती।
भव-भव का भवताप शान्त कर देता चन्दन ।।
स्वपरप्रकाशक भव्यभाव से मण्डित होती ।।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय संसारतापविनाशनाय
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय मोहान्धकार -
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षत
धूप
अचल अखण्डित अक्षत शुद्धभावमय जानो ।
दश धर्मों से सहित दशांगी धर्म धरोहर ।
अमलानन्दमयी अद्भुत निज आतम मानो ।।
दश द्रव्यों से बनी दशांगी धूप मनोहर ।।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय अष्टकर्मदहनाय धूपं..।
निर्वपामीति स्वाहा ।

फल
पुष्प
अनुपम फल यह मधुर मिष्ट आनन्दमयी है।
परम सुगन्धित पुष्प गन्ध विरहित आतम को ।
अपना आतमराम स्वयं आनन्दमयी है।।
परम शान्ति कैसे दें सुखमय परमातम को ।।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय मोक्षफलप्राप्तये फलं … ।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय कामबाणविध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

यह अनर्घ्य है अर्घ्य आपको अर्पित है यह।
नैवेद्य
पुण्य-पाप के ज्ञाताजन को अर्पित है यह।।
सरस सुगन्धित नेवज विषयानन्दमयी हैं।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें।
अपने रस से भरा हुआ अपना आतम है।।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
पुण्य-पाप के भाव चतुर्गति-भ्रमण करावें ।
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य.. ।
समतारसमय शुद्धभाव शिवपुर पहुँचावे ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
ॐ ह्रीं पुण्यपापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापाधिकाराय क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावली

( दोहा )

पुण्य-पाप दोऊ करम, शिवमग रोकनहार।
पुण्य-पाप से पार है, आतम धरम अपार ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार में सर्वप्रथम आचार्य अमृतचन्द्रदेव, आत्मख्याति टीका
के रंगमंच पर एक ही कर्म को दो पात्रों के माध्यम से पुण्य और पाप - ऐसे
दो रूपों में प्रस्तुत करके दोनों के एकत्व को जाननेवाले ज्ञान की महिमा
करते हैं -

( हरिगीत )

शुभ अर अशुभ के भेद से, जो दोपने को प्राप्त हो।
वह कर्म भी जिसके उदय से, एकता को प्राप्त हो ।।
जब मोहरज का नाश कर, सम्यक् सहित वह स्वयं ही।
जग में उदय को प्राप्त हो, वह सुधा-निर्झर ज्ञान ही ।। १००।।
ॐ ह्रीं पुण्यपाप-शुभाशुभकर्म-एकत्वप्रकाशक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।।५४।।
अब, आगामी कलश में ‘शूद्र के जुड़वा बेटों के उदाहरण के माध्यम
से पुण्य-पाप की एकता’ को समझाते हैं -

( रोला )

दोनों जन्मे एक साथ, शूद्रा के घर में;
एक पला बामन के घर, दूजा निज घर में।
एक छुए ना मद्य, ब्राह्मणत्वाऽभिमान से;
दूजा डूबा रहे, उसी में शूद्रभाव से ।।

( द्रुतविलम्बित )

तदथ कर्म शुभाशुभभेदतो द्वितयतां गतमैक्यमुपानयन् ।
ग्लपितनिर्भरमोहरजा अयं स्वयमुदेत्यवबोधसुधाप्लवः ।। १०० ।।
अर्ध्यावली : पुण्य-पाप अधिकार
जातिभेद के भ्रम से ही, यह अन्तर आया;
इस कारण अज्ञानी ने, पहिचान न पाया।
पुण्य-पाप भी कर्म-जाति के जुड़वा भाई !।
दोनों ही हैं हेय, मुक्ति-मारग में भाई ! ।। १०१।।
ॐ ह्रीं दृष्टान्तपुरस्सर पुण्य-पापैकत्वप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।५५।।
अब, आगामी कलश के द्वारा ‘पुण्य-पाप में एकत्व का हेतु’ बताते हैं -

( रोला )

अरे ! पुण्य अर पाप कर्म का हेतु एक है;
आश्रय अनुभव अर स्वभाव भी सदा एक है।
अतः कर्म को एक मानना ही अभीष्ट है;
भले-बुरे का भेद जानना ठीक नहीं है ।। १०२।।
ॐ ह्रीं पुण्य-पापैकत्वहेतुप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।५६।।

( मन्दाक्रान्ता )

एको दूरात्त्यजति मदिरां, ब्राह्मणत्वाभिमाना-
दन्यः शूद्रः स्वयमहमिति, स्नाति नित्यं तयैव ।
द्वावप्येतौ युगपदुदरात्, निर्गतौ शूद्रिकायाः;
शूद्रौ साक्षादपि च चरतो, जातिभेदभ्रमेण ।। १०१ ।।
( उपजाति )
हेतुस्वभावानुभवाश्रयाणां सदाप्यभेदान्न हि कर्मभेदः ।
तबंधमार्गाश्रितमेकमिष्टं स्वयं समस्तं खलु बंधहेतुः ।। १०२ ।।

अब, एक कलश में कहते हैं कि ‘शुभ और अशुभ दोनों ही कर्मबन्ध
के कारण होने से समानरूप से हेय हैं’ -

( दोहा )

जिनवाणी का मर्म यह, बन्ध करें सब कर्म।
मुक्ति-हेतु बस ! एक ही, आत्मज्ञानमय धर्म ।। १०३।।
ॐ ह्रीं शुभाशुभकर्म-समानबन्धहेतुत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५७।।
अब, आगामी कलश में यह कहते हैं कि ‘शुभाशुभकर्म दोनों का निषेध
कर देने से मुनिजन अशरण नहीं होंगे, अपितु उनके लिए उनका ज्ञानस्वभावी
आत्मा स्वयं परम शरणभूत है’ -

( रोला )

सभी शुभाशुभभावों के निषेध होने से।
अशरण होंगे नहीं रमेंगे निज स्वभाव में।।
अरे ! मुनीश्वर तो निश-दिन निज में ही रहते।
निजानन्द के परमामृत में ही नित रमते ।। १०४।।
ॐ ह्रीं ज्ञानात्मक -शरणप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।५८।।
( स्वागता )
कर्म सर्वमपि सर्वविदो यद् बंधसाधनमुशन्त्यविशेषात् ।
तेन सर्वमपि तत्प्रतिषिद्धं ज्ञानमेव विहितं शिवहेतुः ।। १०३ ।।

( शिखरिणी)

निषिद्धे सर्वस्मिन्, सुकृतदुरिते कर्मणि किल;
प्रवृत्ते नैष्कर्ये, न खलु मुनयः सन्त्यशरणाः ।
तदा ज्ञाने ज्ञानं, प्रतिचरितमेषां हि शरणं;
स्वयं विन्दन्त्येते, परमममृतं तत्र
निरताः ।। १०४ ।।

अर्ध्यावली : पुण्य-पाप अधिकार ७९
अब, ‘ज्ञानस्वरूपी आत्मा का अनुभव ही मोक्ष का हेतु हैं, अतः उसी
के अनुभव की प्रेरणा’ आगामी कलश में देते हैं -

( रोला )

ज्ञानरूप ध्रुव अचल आतमा का ही अनुभव ।
मोक्षरूप है स्वयं अतः वह मोक्षहेतु है।।
शेष भाव सब बन्धरूप हैं बन्धहेतु हैं।
इसीलिए तो अनुभव करने का विधान है ।। १०५।।
ॐ ह्रीं मोक्षहेतुभूत-ज्ञानस्वरूपाऽऽत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५९।।
अब, आगे तीन कलशों में युक्ति सहित ‘ज्ञानस्वभावरूप परिणमन को
ही मोक्ष का कारण और शुभाशुभभावरूप परिणमन को बन्ध का कारण’,
सिद्ध करते हुए कर्म का निषेध करते हैं -

( दोहा )

ज्ञानभाव का परिणमन, ज्ञानभावमय होय ।
एकद्रव्य-स्वभाव यह, हेतु मुक्ति का होय ।। १०६।।
कर्मभाव का परिणमन, ज्ञानरूप ना होय।
द्रव्यान्तर-स्वभाव यह, इससे मुकति न होय ।। १०७।।

( शिखरिणी)

यदेतद् ज्ञानात्मा ध्रुवमचलमाभाति भवनं
शिवस्यायं हेतुः स्वयमपि यतस्तच्छिव इति ।
अतोऽन्यद्बंधस्य स्वयमपि यतो बंध इति तत्
ततो ज्ञानात्मत्वं भवनमनुभूतिर्हि विहितम् ।। १०५ ।।

( अनुष्टुभ् )

वृत्तं ज्ञानस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं सदा।
एकद्रव्यस्वभावत्वान्मोक्षहेतुस्तदेव तत् ।। १०६ ।।
वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि ।
द्रव्यांतरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत् ।। १०७ ।।

बन्धस्वरूपी कर्म यह, शिवमग-रोकनहार ।
इसीलिए अध्यात्म में, है निषिद्ध शत वार ।। १०८।।
ॐ ह्रीं मोक्षमार्गतिरोधायीकर्मनिषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।६०।।

अब, कहते हैं कि ‘जब समस्त कर्म त्याग करने योग्य ही है, तब उनमें
पुण्य-पाप का भेद करना उचित ही नहीं है’ –

( हरिगीत )

त्याज्य ही हैं जब, मुमुक्षु के लिए सब कर्म ये।
तब पुण्य एवं पाप की, यह बात करनी किसलिए ?।।
निज आतमा के लक्ष्य से, जब परिणमन हो जाएगा।
निष्कर्म में ही रस जगे, तब ज्ञान दौड़ा आयगा ।।१०९।।
ॐ ह्रीं पुण्यपापयोः समानहेयत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। ६१।।

अब, आगामी दो कलशों में यह कहते हैं कि ‘यद्यपि पुण्यभाव रूप
कर्म भी मुक्तिमार्ग का विरोधी भाव है, तथापि जब तक पूर्ण कर्मविरति नहीं
होती है, तब तक ज्ञानधारा और कर्मधारा एक साथ रहने में कोई विरोध
नहीं है’ –

( हरिगीत )

यह कर्म-विरति जब तलक, ना पूर्णता को प्राप्त हो ।
हाँ, तब तलक यह, कर्मधारा-ज्ञानधारा साथ हो ।।

( अनुष्टुभ् )

मोक्षहेतुतिरोधानाद्बन्धत्वात्स्वयमेव च ।
मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्तन्निषिध्यते ।। १०८ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

संन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि तत्, कर्मैव मोक्षार्थिना;
संन्यस्ते सति तत्र का किल कथा, पुण्यस्य पापस्य वा।
सम्यक्त्वादिनिजस्वभावभवनात्, मोक्षस्य हेतुर्भवन्;
नैष्कर्म्यप्रतिबद्धमुद्धतरसं, ज्ञानं स्वयं धावति ।। १०९ ।।

अर्ध्यावली : पुण्य-पाप अधिकार
अवरोध इसमें है नहीं, पर कर्मधारा बन्धमय ।
मुक्ति-मारग एक ही है, ज्ञानधारा मुक्तिमय ।। ११०।।
कर्मनय के पक्षपाती, ज्ञान से अनभिज्ञ हों।
ज्ञाननय के पक्षपाती, आलसी स्वच्छन्द हों ।।
जो ज्ञानमय हों परिणमित, परमाद के वश में न हों।
कर्म-विरहित जीव वे, संसार-सागर पार हों ।।१११।।
ॐ ह्रीं कर्मनय-ज्ञाननय-एकान्तनिषेधप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।६२।।

अब, इस अधिकार के अन्त में आचार्य श्री अमृतचन्द्रदेव, ‘शुभ-
अशुभ के भेद को दूर करनेवाले सम्यग्ज्ञान की महिमा’ करते हैं –

( हरिगीत )

जग शुभ-अशुभ में भेद माने मोह-मदिरा-पान से।
पर भेद इनमें है नहीं, जाना है सम्यग्ज्ञान से ।।
यह ज्ञानज्योति तम-विरोधी, खेले केवलज्ञान से।
जयवन्त हो इस जगत् में, जगमगै आतमज्ञान से ।।११२।।
ॐ ह्रीं शुभाशुभभेदनिषेधक-श्रीसम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।६३।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( शार्दूलविक्रीडित )

यावत्पाकमुपैति र्मविरतिः, ज्ञानस्य सम्यङ् न सा;
कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितः, तावन्न काचित्क्षतिः ।
किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो, यत्कर्म बन्धाय तत्;
मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं, ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ।। ११० ।।
मग्नाः कर्मनयावलम्बनपरा, ज्ञानं न जानन्ति यत्;
मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि यदतिस्वच्छन्दमन्दोद्यमाः ।
विश्वस्योपरि ते तरन्ति सततं, ज्ञानं भवन्तः स्वयं;
ये कुर्वन्ति न कर्म जातु न वशं, यान्ति प्रमादस्य च ।। १११ ।।

( मन्दाक्रान्ता )

भेदोन्मादं भ्रमरसभरान्नाटयत्पीतमोहं
मूलोन्मूलं सकलमपि तत्कर्म कृत्वा बलेन ।
हेलोन्मीलत्परमकलया सार्धमारब्धकेलि
ज्ञानज्योतिः कवलिततमः प्रोज्जजृम्भे भरेण ।। ११२ ।।

जयमाला

( दोहा )

कर्ता-कर्म विभाव की, चर्चा के उपरान्त ।
पुण्य-पाप की एकता, का करते व्याख्यान ।।१।।
पापकर्म ज्यों कर्म है, पुण्यकर्म भी कर्म।
दोनों ही तो कर्म हैं, इनमें कोइ न धर्म ।। २।।

( रोला )

पुण्य भला अर पाप बुरा सारा जग कहता।
पर निश्चय से इनमें कोई भेद नहीं है।।
कर्मबन्ध के कारण तो दोनों ही होते ।
कर्मबन्ध कटने का कारण कोई नहीं है।।३।।
सोने की बेड़ी पुण्य, पाप लोहे की बेड़ी।
पर दोनों बन्धन का कारण ही होती हैं।।
दोनों में से कोई नहीं मुक्ति का कारण।
परम सत्य का उद्घाटन जिनवाणी करती ।।४।।
पुण्योदय से मिलती हमें भोग सामग्री ।
उसे भोगने से बँधता है पाप निरन्तर ।।
पापोदय से सभी भयंकर दुख को भोगें।
इस तरह पुण्य भी हो जाता दुखों का कारण ।।५।।
पुण्य-पाप है कर्म जाति के जुड़वा भाई।
दोनों से ही कर्मबन्ध निश्चित होता है।।
अरे ! धर्म तो है अबन्ध का कारण भाई।
पुण्य धर्म कैसे हो सकता बोलो भाई ।।६।।
अर्ध्यावली : पुण्य-पाप अधिकार
अरे ! पुण्य जो कर्म आज वह धर्म बन रहा।
जो है पूरण हेय किन्तु आदेय बन रहा ।।
उपादेय तो एकमात्र बस ! वीतरागता ।
परम धरम है एकमात्र यह वीतरागता ।। ७ ।।
रागभाव में धर्म नहीं है निश्चित जानो ।
रागभाव तो भव का कारण निश्चित मानो ।।
करो राग का त्याग राग है अपना वैरी।
परमधर्म है वीतरागता भव की वैरी ।। ८ ।।

( दोहा )

पुण्य-पाप को त्याग कर, धारो अपना भाव ।
पुण्य-पाप अधिकार का, इतना ही है सार ।। ९ ।।
ॐ ह्रीं समयसारकलशपरमागमे पुण्य-पापैकत्वप्रतिपादक-श्रीपुण्यपापा-
धिकाराय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुण्य-पाप के त्याग की, महिमा अपरम्पार ।
पुण्य-पाप को त्याग कर, हो जावो भव-पार ।। १०।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
पुण्य-पाप दोनों दुःखरूप हैं
भाई! तू पाप-पुण्य में हेयापादेयपना मानकर अर्थात् पुण्य को भला
व पाप को बुरा मानकर दुःख के पहाड़ के तले दब गया है। प्रभु ! पुण्य-
पाप के दोनों ही भाव स्वयं दुःखरूप हैं तथा दुःख के कारण हैं,
आकुलतामय हैं; क्योंकि दोनों ही भाव स्वभाव से विरुद्धभाव हैं। ऐसे
स्वभावविरुद्धभावों में जो भेद न देखकर एक कर्मरूप ही मानता है, उसे
पर की अपेक्षा बिना स्वतः सम्यग्ज्ञानरूप चन्द्रमा उदित होता है।

  • प्रवचनरत्नाकर भाग-५, पृष्ठ-४

आस्रव-संवर अधिकार पूजन

स्थापना

( दोहा )

पुण्य-पाप के भाव सब, हैं आस्रव दुखकार।
यह आतम आस्रव रहित, परम धरम सुखकार ।। १।।
अपनापन शुद्धात्म में, अपने में ही लीन।
होना ही संवर कहा, जिनवर परम प्रवीण।। २।।
मुक्तिमूल संवर कहा, आस्रव है भवमूल।
संवर को अपनाइये, जो चाहो भवकूल ।। ३।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकारौ अत्र अवतरत-
अवतरत संवौषट् ।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकारौ अत्र तिष्ठत-तिष्ठत
ठः ठः ।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकारौ अत्र मम सन्निहितो
भवत-भवत वषट् । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( रोला )

जल
यह जल परम पवित्र, आतमा को धोता है।
निर्मल जल से आत्मभाव, निर्मल होता है।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक -आस्रव-संवराधिकाराभ्यां जन्मजरामत्यु
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

आस्रव-संवर अधिकार पूजन ८५

चन्दन
अरे! आतमा चन्दन-सम शीतल होता है।
भव-भव का भवताप-हरण मंगल होता है ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक -आस्रव-संवराधिकाराभ्यां संसारताप
विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
अरे! आतमा अक्षत-सा अक्षत होता है।
अक्षत पद की प्राप्ति हेतु अक्षत होता है ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रवसंवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रवसंवराधिकाराभ्यां अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं…।
पुष्प
सुर-तरु पुष्पों के समान जो सुन्दरतम है।
पावन आतमराम परम पावन मनहर है।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक -आस्रव-संवराधिकाराभ्यां कामबाण
विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य
नानाविध नैवेद्य सरस अपने भावों के ।
विध-विध के पकवान बनाये निजभावों के ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकाराभ्यां क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीप
स्वपरप्रकाशक दीप विविध रत्नों की रचना ।
मोह तिमिर का सर्वनाश करने को अपना ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक -आस्रव-संवराधिकाराभ्यां मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
दशधर्मों की धूप दशांगी लेकर आया।
धूपायन में अरे ! जला कर्मों को लाया ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुखस्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकाराभ्यां अष्ट-कर्म-दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
उत्तम फल पाने को उत्तम फल ले आया।
अनुपम अद्भुत शान्तिरूप उत्तम फल पाया ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुखस्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रवसंवराधिकाराभ्यां मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

संवरमय अर्घ्य अनर्घ्य निरोधक राग-द्वेष का।
रुक जाता है स्वयं अरे ! कर्मों का आस्रव ।।
छोड़ दीजिये दुःखरूप आस्रव भावों को।
ग्रहण कीजिये सुख स्वरूप संवर भावों को ।।
ॐ ह्रीं आस्रव-संवरतत्त्वप्ररूपक-आस्रव-संवराधिकाराभ्यां अनर्घ्यपद-
प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली : आस्रव अधिकार
अर्ध्यावली
।। आस्रव अधिकार ।।

(दोहा)

पुण्य-पाप के भाव सब, हैं आस्रव दुःखकार ।
यह आतम आस्रव रहित, परम धरम सुखकार।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के आरम्भ में आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ‘आस्रव को रंगमंच पर प्रवेश
करा कर, आस्रवभाव को परास्त करनेवाले सम्यग्ज्ञान की महिमा’ करते हैं –

( हरिगीत )

सारे जगत् को मथ रहा, उन्मत्त आस्रवभाव यह।
समरांगण में समागत, मदमत्त आस्रवभाव यह।।
मर्दन किया रणभूमि में, इस भाव को जिस ज्ञान ने ।
वह धीर है गम्भीर है, हम रमें नित उस ज्ञान में ।। ११३।।
ॐ ह्रीं आस्रवभावनिरोधक-श्रीसम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।। ६४।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘ज्ञानमय भाव, सर्व भावास्रवों के
अभाव स्वरूप’ होते हैं –

( हरिगीत )

इन द्रव्य कर्मों के पहाड़ों के निरोधक भाव जो।
हैं राग-द्वेष-विमोह बिन, सज्ञान निर्मित भाव जो।।
भावास्रवों से रहित, इस जीव के निजभाव हैं।
वे ज्ञानमय शुद्धात्ममय, निज आत्मा के भाव हैं।।११४।।
ॐ ह्रीं श्री भावाऽऽस्रवाऽभावरूप-ज्ञानमयभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। ६५ ।।
( द्रुतविलंबित )
अथ महामदनिर्भरमंथरं समररंगपरागतमास्रवम् ।
अयमुदारगंभीरमहोदयो जयति दुर्जयबोधधनुर्धरः ।। ११३ ।।
( शालिनी )
भावो रागद्वेषमोहैर्विना यो जीवस्य स्याद् ज्ञाननिर्वृत्त एव ।
रुन्धन् सर्वान् द्रव्यकर्मास्रवौघान् एषोऽभावः सर्वभावास्रवाणाम् ।। ११४ ।।

अब, ‘ज्ञानी जीवों के आस्रवभावों का अभाव है’, यह बात आगामी
कलश’ में कहते हैं -

( दोहा )

द्रव्यास्रव से भिन्न है, भावास्रव को नाश।
सदा ज्ञानमय निरास्रव, ज्ञायकभाव प्रकाश ।। ११५।।
ॐ ह्रीं ज्ञानिनः आस्रवभावाभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६६।।
अब, ‘बन्धनबद्ध ज्ञानी निरास्रव कैसे हो सकता है?’ इस प्रश्न का उत्तर
कलश में देते हैं -

( कुण्डलिया )

स्वयं सहज परिणाम से, कर दीना परित्याग।
सम्यग्ज्ञानी जीव ने, बुद्धिपूर्वक राग ।।
बुद्धिपूर्वक राग, त्याग दीना है जिसने ।
और अबुद्धिक राग, त्याग करने को जिसने ।।
निज-शक्ति-स्पर्श, प्राप्त कर पूर्णभाव को।
रहे निरास्रव सदा, उखाड़े परपरिणति को ।।११६।।
ॐ ह्रीं ज्ञानिनः निराऽऽस्रवत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६७।।
( उपजाति )
भावास्रवाभावमयं प्रपन्नो द्रव्यास्रवेभ्यः स्वत एव भिन्नः ।
ज्ञानी सदा ज्ञानमयैकभावो निरास्रवो ज्ञायक एक एव ।। ११५ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

संन्यस्यन्निजबुद्धिपूर्वमनिशं, रागं समग्रं स्वयं;
वारंवारमबुद्धिपूर्वमपि तं, जेतुं स्वशक्तिं स्पृशन् ।
उच्छिंदन्परवृत्तिमेव सकलां, ज्ञानस्य पूर्णो भवन्;
आत्मा नित्यनिरास्रवो भवति हि ज्ञानी यदा स्यात्तदा ।। ११६।।
अर्ध्यावली : आस्रव अधिकार
अब, ‘समस्त द्रव्यास्रवों की सन्तति विद्यमान होने पर भी ज्ञानी निरास्रव
कैसे हो सकता है?’ – ऐसा प्रश्न, एक कलश के माध्यम से उठाते हुए आगामी
कलश के द्वारा इसका उत्तर देते हैं -

( दोहा )

द्रव्यास्रव की सन्तति, विद्यमान सम्पूर्ण ।
फिर भी ज्ञानी निरास्रव, कैसे हो परिपूर्ण ? ।।११७।।

( हरिगीत )

पूर्व में जो द्रव्य प्रत्यय बँधे थे अब वे सभी।
निजकाल पाकर उदित होंगे, सुप्त सत्ता में अभी ।।
यद्यपि वे हैं अभी पर, राग-द्वेषाभाव से ।
अन्तर अमोही ज्ञानियों को, बन्ध होता है नहीं ।। ११८।।
ॐ ह्रीं द्रव्यप्रत्यय-सन्ततौ अपि ज्ञानिनः निराऽऽस्रवत्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६८।।
अब, ‘ज्ञानी के मोह-राग-द्वेष नहीं होने से वह अबन्धक है’, यह एक
कलश में कहते हैं -

(दोहा)

राग-द्वेष अर मोह ही, केवल बन्धक भाव ।
ज्ञानी के ये हैं नहीं, तातैं बन्ध अभाव ।। ११९।।
ॐ ह्रीं मोह-राग-द्वेषाभावे ज्ञानिनः अबन्धप्ररूपक -श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६९।।

( अनुष्टुभ् )

सर्वस्यामेव जीवंत्यां, द्रव्यप्रत्ययसन्ततौ ।
कुतो निरास्रवो ज्ञानी, नित्यमेवेति चेन्मतिः ।। ११७ ।।

( मालिनी)

विजहति न हि सत्तां प्रत्ययाः पूर्वबद्धाः, समयमनुसरन्तो यद्यपि द्रव्यरूपाः।
तदपि सकलरागद्वेषमोहव्युदासादवतरति न जातु ज्ञानिनः कर्मबन्धः ।। ११८ ।।

( अनुष्टुभ् )

राग-द्वेष-विमोहानां, ज्ञानिनो यदसम्भवः ।
तत एव न बन्धोऽस्य, ते हि बन्धस्य कारणम् ।। ११९ ।।

अब, आगामी दो कलशों में ‘शुद्धनय के ग्रहण से लाभ एवं उसके त्याग
से होनेवाली हानि से परिचित कराते हैं’ -

( हरिगीत )

सदा उद्धत चिह्न वाले, शुद्धनय अभ्यास से ।
निज आत्म की एकाग्रता के, ही सतत अभ्यास से ।।
रागादि विरहित चित्तवाले, आत्मकेन्द्रित ज्ञानिजन ।
बन्ध विरहित अर अखण्डित, आत्मा को देखते ।।१२०।।
च्युत हुए जो शुद्धनय से, बोध विरहित जीव वे।
पहले बँधे द्रव्यकर्म से, रागादि में उपयुक्त हो।।
अरे! विचित्र विकल्पवाले, और विविध प्रकार के।
विपरीतता से भरे विध विध, कर्म का बन्धन करें ।।१२१।।
ॐ ह्रीं शुद्धनयस्य ग्रहण-त्यागयोः लाभ-हानिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।। ७०।।
अब, इस अधिकार का उपसंहार करते हुए आगामी दो कलशों में
‘शुद्धनय के विषयभूत आत्मा के आश्रय की प्रेरणा’ देते हैं -

( हरिगीत )

इस कथन का सार यह, कि शुद्धनय उपादेय है।
अर शुद्धनय द्वारा निरूपित, आत्मा ही ध्येय है।।

( वसन्ततिलका )

अध्यास्य शुद्धनयमुद्धतबोधचिह्नमैकाग्र्यमेव कलयंति सदैव ये ते।
रागादिमुक्तमनसः सततं भवंतः पश्यंति बंधविधुरं समयस्य सारम् ।। १२० ।।
प्रच्युत्य शुद्धनयतः पुनरेव ये तु रागादियोगमुपयांति विमुक्तबोधाः ।
ते कर्मबन्धमिह बिभ्रति पूर्वबद्धद्रव्यास्रवैः कृतविचित्रविकल्पजालम् ।। १२१ ।।
अर्ध्यावली : आस्रव अधिकार
क्योंकि इसके त्याग से ही, बन्ध और अशान्ति है।
इसके ग्रहण में आत्मा की मुक्ति एवं शान्ति है।। १२२।।
धीर और उदार महिमा, युत अनादि-अनन्त जो।
उस ज्ञान में थिरता करे, अर कर्मनाशक भाव जो।।
सद्धानियों को कभी भी, वह शुद्धनय ना हेय है।
विज्ञानघन इक अचल आतम, ज्ञानियों का ज्ञेय है।। १२३।।
ॐ ह्रीं शुद्धनयप्रयोजक-आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।७१।।
अब, आस्रव अधिकार का समापन करते हुए पुनः श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव,
‘सम्यग्ज्ञानियों की महिमा’ करते हैं -

( हरिगीत )

निज आतमा जो परम वस्तु, उसे जो पहिचानते।
अर उसी में जो नित रमें अर, उसे ही जो जानते।।
वे आस्रवों का नाश कर, नित रहें आतम ध्यान में।
वे रहें निज में किन्तु, लोकालोक उनके ज्ञान में ।। १२४।।
ॐ ह्रीं सम्यग्ज्ञानीमहिमाप्ररूपक - श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।।७२।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( अनुष्टुभ् )

इदमेवात्र तात्पर्यं, हेयः शुद्धनयो न हि ।
नास्ति बन्धस्तदत्यागात्तत्त्यागाद् बन्ध एव हि ।। १२२ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

धीरोदारमहिम्न्यनादिनिधने बोधे निबध्नन्धृतिं
त्याज्यः शुद्धनयो न जातु कृतिभिः सर्वंकषः कर्मणाम् ।
तत्रस्थाः स्वमरीचिचक्रमचिरात्संहृत्य निर्यद्बहिः
पूर्ण ज्ञानघनौघमेकमचलं पश्यंति शांतं महः ।। १२३ ।।

(मन्दाक्रान्ता)

रागादीनां झगिति विगमात्सर्वतोऽप्यास्त्रवाणां
नित्योद्योतं किमपि परमं वस्तु संपश्यतोऽन्तः ।
स्फारस्फारैः स्वरसविसरैः प्लावयत्सर्वभावा-
नालोकांतादचलमतुलं
ज्ञानमुन्मग्नमेतत् ।। १२४ ।।

।। संवर अधिकार ।।

( दोहा )

अपनापन शुद्धात्म में, अपने में ही लीन।
होना ही संवर कहा, जिनवर परम प्रवीण ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के प्रारम्भ में आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ‘आस्रव को परास्त
करके संवर को रंगमंच पर प्रस्तुत करके उसकी महिमा’ करते हैं -

( हरिगीत )

संवरजयी मद-मत्त आस्रव, भाव का अपलाप कर।
व्यावृत्य हो पररूप से, सद्बोध संवर भास्कर ।।
प्रगटा परम आनन्दमय, निज आत्म के आधार से।
सद्ज्ञानमय उज्ज्वल धवल, परिपूर्ण निजरस-भार से ।।१२५।।
ॐ ह्रीं आस्रवं विजित्य संवरप्रापक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।७३।।
अब, आगामी कलश में ‘राग और ज्ञान में भेदविज्ञान’ कराते हैं -

( हरिगीत )

यह ज्ञान है चिद्रूप, किन्तु राग तो जड़रूप है।
मैं ज्ञानमय आनन्दमय, पर राग तो पररूप है।।
इस तरह के अभ्यास से, जब भेदज्ञान उदित हुआ।
आनन्दमय रसपान से, तब मनोभाव मुदित हुआ ।।१२६।।
ॐ ह्रीं ज्ञानरागयोः भेदविज्ञानकारक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।७४।।

( शार्दूलविक्रीडित )

आसंसार-विरोधि-संवर-जयैकांतावलिप्तास्रव-
न्यक्कारात्प्रतिलब्धनित्यविजयं संपादयत्संवरम् ।
व्यावृत्तं पररूपतो नियमितं सम्यक्स्वरूपेस्फुर-
ज्योतिश्चिन्मयमुज्ज्वलं निजरसप्राग्भारमुज्जृम्भते ।। १२५ ।।
चैद्रूप्यं जडरूपतां च दधतोः, कृत्वा विभागं द्वयोः;
अन्तर्दारुणदारणेन परितो, ज्ञानस्य रागस्य च।
भेदज्ञानमुदेति निर्मलमिदं, मोदध्वमध्यासिताः;
शुद्धज्ञानघनौघमेकमधुना, सन्तो द्वितीयच्युताः ।। १२६ ।।
अर्ध्यावली : संवर अधिकार
अब, ‘शुद्धात्मा की उपलब्धि से ही संवर किसप्रकार होता है’, यह एक
कलश में कहते हैं -

( रोला )

भेदज्ञान के इस अविरल धारा-प्रवाह से।
कैसे भी कर प्राप्त करे जो शुद्धातम को ।।
और निरन्तर उसमें ही थिर होता जावे।
पर परिणति को त्याग निरन्तर शुध हो जावे ।। १२७ ।।
ॐ ह्रीं शुद्धात्मोपलम्भादेव संवरप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।७५।।
अब, ‘संवर किसप्रकार होता है’ यह बताते हैं -

( रोला )

भेदज्ञान की शक्ति से निजमहिमा रत को।
शुद्धतत्त्व की उपलब्धि निश्चित हो जावे ।।
शुद्धतत्त्व की उपलब्धि होने पर उसके ।
अतिशीघ्र ही सब कर्मों का क्षय हो जावे ।। १२८।।
ॐ ह्रीं श्री संवरविधिप्ररूपक - श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ७६।।
अब, इस संवर अधिकार के अन्त में उपसंहार करते हुए आचार्य श्री
अमृतचन्द्रदेव, चार कलशों में ‘भेदज्ञान की महिमा’ करते हैं -

( रोला )

आत्मतत्त्व की उपलब्धि हो भेदज्ञान से,
आत्मतत्त्व की उपलब्धि से संवर होता ।।

(मालिनी)

यदि कथमपि धारावाहिना बोधनेन ध्रुवमुपलभमानः शुद्धमात्मानमास्ते ।
तदयमुदयदात्माराममात्मानमात्मा परपरिणतिरोधाच्छुद्धमेवाभ्युपैति ।। १२७ ।।
निजमहिमरतानां भेदविज्ञानशक्त्या भवति नियतमेषां शुद्धतत्त्वोपलंभः ।
अचलितमखिलान्यद्रव्यदूरेस्थितानां भवति सति च तस्मिन्नक्षयः कर्ममोक्षः ।। १२८ ।।

इसीलिए तो सच्चे दिल से नितप्रति करना ।
अरे भव्यजन ! भव्यभावना भेदज्ञान की ।।१२९।।

अरे भव्यजन ! भव्यभावना भेदज्ञान की।
सच्चे मन से बिन विराम के तबतक भाना ।।
जबतक पर से हो विरक्त यह ज्ञान ज्ञान में।
ही थिर न हो जाय अधिक क्या कहें जिनेश्वर ।।१३०।।

अबतक जो भी हुए सिद्ध या आगे होंगे।
महिमा जानो एक मात्र सब भेदज्ञान की ।।
और जीव जो भटक रहे हैं भवसागर में।
भेदज्ञान के ही अभाव से भटक रहे हैं ।।१३१।।

भेदज्ञान से शुद्धतत्त्व की उपलब्धि हो ।
शुद्धतत्त्व की उपलब्धि से रागनाश हो ।।
रागनाश से कर्मनाश अर कर्मनाश से ।
ज्ञान ज्ञान में थिर होकर शाश्वत हो जावे ।। १३२।।

ॐ ह्रीं भेदविज्ञानमहिमाप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।७७।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( उपजाति )
सम्पद्यते संवर एष साक्षात्, शुद्धात्मतत्त्वस्य किलोपलम्भात् ।
स भेदविज्ञानत एव तस्मात्, तद्भेदविज्ञानमतीव भाव्यम् ।। १२९ ।।

( अनुष्टुभ् )

भावयेद्भेदविज्ञान - मिदमच्छिन्नधारया ।
तावद्यावत्पराच्च्युत्वा, ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते ।। १३० ।।
भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन ।
अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन ।। १३१ ।।

( मन्दाक्रान्ता )

भेदज्ञानोच्छलनकलनाच्छुद्धतत्त्वोपलंभा-
द्रागग्रामप्रलयकरणात्कर्मणां संवरेण ।
बिभ्रत्तोषं परमममलालोकमम्लानमेकं
ज्ञानं ज्ञाने नियतमुदितं शाश्वतोद्योतमेतत् ।। १३२ ।।

जयमाला

( दोहा )

आस्रवभाव अभाव कर, प्रगटे संवरभाव ।
आस्रवभाव विभाव है, संवरभाव स्वभाव ।। १।।

( हरिगीत )

मिथ्यात्व अविरति योग और कषाय के परिणाम हैं।
ये सभी कारण बन्ध के हैं, सभी आस्रवभाव हैं।।
बन्ध रुकना इन सभी का, अरे ! संवर जानना ।
और होना इन सभी का, आस्रव ही मानना ।। २ ।।

हैं हेय आस्रवभाव सब, उपादेय संवर जानना ।
ज्ञेय लोकालोक हैं अर, ध्येय निज शुद्धातमा ।।
आस्रवों को छोड़ संवर भाव को अपनाइये ।
जान लोकालोक को निज आतमा को ध्याइये ।। ३।।

निज आतमा को ध्याइये, निज आत्म में रम जाइये।
निज आतमा में लीन हो निज आत्म में जम जाइये ।।
निज आत्म में जम जाइये, निज आत्म में रम जाइये।
निज आत्मा में समाकर, निज आत्ममय हो जाइये ।। ४ ।।

(दोहा)

आतम अपना भाव है, आतम में रम जाँय ।
आतम आतम जपत ही, आतम में जम जाँय ।।५।।

ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे आस्रव-संवराधिकाराभ्यां जयमाला पूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

देखें आतमराम को, जानो आतमराम ।
आतम का अनुभव करो, ध्यावो आतमराम ।।६।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

निर्जरा अधिकार पूजन

स्थापना

(दोहा)

शुद्धातम में रत रहो, यही श्रेष्ठ आचार।
शुद्धातम की साधना, कही निर्जरा सार ।। १।।

( हरिगीत )

शुद्धात्मा की रुचि संवर, साधना है निर्जरा ।
ध्रुवधाम निज भगवान् की, आराधना है निर्जरा ।।
निर्भय दशा है निर्जरा, निर्मल दशा है निर्जरा।
निज आतमा की ओर बढ़ती, भावना है निर्जरा ।।२।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकार! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकार ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक -निर्जराधिकार ! अत्र मम सन्निहितो भव-
भव वषट् । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

(वीर )

जल
जल का स्वभाव इस दुनिया में, मिथ्यामल धोनेवाला है।
निर्जरा शरण में यह बालक, मिथ्यामल धोने आया है।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन
निर्जरा ताप हरने वाली, भवतपहर चन्दन शीतल है।
भवताप शान्त करने को प्रभु ! चरणों में आज महीतल है।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक - निर्जराधिकाराय संसारतापविनाशनाय चन्दनं
निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
भगवान् आतमा अक्षत है, अक्षत पर्याय प्रगट होगी।
और मोक्ष के पहले तो, निर्जर पर्याय प्रगट होगी ।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक -निर्जराधिकाराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
पुष्प
यह काम कामना का प्रतीक, यह पुष्प-बाण अर्पण करके ।
सम्पूर्ण कामनाओं को मैं, समभावों से तर्पण करके ।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
नैवेद्य
यह क्षुधा-वेदना का प्रतीक, नैवेद्य सरस अर्पण करके।
अब तो शिवपुर को जाऊँ मैं, चरणों में यह अर्पण करके ।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप
यह ज्ञान-प्रदीप आज लाया, मोहान्धकार हो नाश प्रभो।
हो केवलज्ञान-प्रकाश मुझे, जीवन में अब अज्ञान न हो।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय मोहान्धकारविनाशयनाय दीपं…।
धूप
रे! स्वयं जले यह धूप, स्वयं जलने से न बच पायेगी।
कर्म जलेंगे तभी प्रभो, जब आतम में रम जायेंगे ।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।
फल
शिवफल तो तभी मिलेगा प्रभु, जब जगफल की वांछा न रहे।
यदि शिवफल चाहो तो भाई, जगफल की वांछा नहीं करो।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
------निर्जा परम उपयेोगी है यह मुक्ति दिलाने वाली है।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं…।

अर्घ्य

सबसे अनर्घ्य है मुक्तिरमा, निज में रमने से मिलती है।
पर में ही निशदिन रमे रहें, उनको मुक्ति ना मिलती है।।
यह आतम की परिशुद्ध दशा, यह अद्भुत महिमाशाली है।
निर्जरा परम उपयोगी है, यह मुक्ति दिलाने वाली है।।
ॐ ह्रीं निर्जरातत्त्वप्रतिपादक - निर्जराधिकाराय अनर्घ्यपदप्राप्तयेऽर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार
अर्ध्यावली

( दोहा)

शुद्धातम में रत रहो, यही श्रेष्ठ आचार ।
शुद्धातम की साधना, कही निर्जरा सार ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अब, आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ‘संवर के बाद निर्जरा को रंगभूमि में
प्रवेश’ कराते हैं और ज्ञानज्योति की महिमा करते हैं’ -

( हरिगीत )

आगामी बन्धन रोकने, संवर सजग सन्नद्ध हो।
रागादि के अवरोध से जब, कमर कस के खड़ा हो।।
अर पूर्वबद्ध करम-दहन को निरजरा तैयार हो।
तब ज्ञानज्योति यह अरे ! नित ही अमूर्छित क्यों न हो।। १३३।।
ॐ ह्रीं संवरपूर्वकनिर्जराप्रापक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।। ७८ ।।
अब, एक कलश में बताते हैं कि ‘सम्यग्दृष्टि ज्ञानी जीव, कर्मों को
भोगते हुए भी कर्मों से बँधते नहीं, यह उनके ज्ञान और वैराग्य की महिमा है’ -

( हरिगीत )

ज्ञानी बँधे ना कर्म से, सब कर्म करते-भोगते ।
यह ज्ञान की सामर्थ्य अर, वैराग्य का बल जानिये ।। १३४।।
ॐ ह्रीं ज्ञान-वैराग्यसामर्थ्यनिरूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ७९।।

( शार्दूलविक्रीडित )

रागाद्यास्रवरोधतो निजधुरां, धृत्वा परः संवरः,
कर्मागामि समस्तमेव भरतो, दूरान्निरुन्धन् स्थितः ।
प्राग्बद्धं तु तदेव दग्धुमधुना, व्याजृम्भते निर्जरा,
ज्ञानज्योतिरपावृतं न हि यतो, रागादिभिर्मूच्र्छति ।। १३३ ।।

( अनुष्टुभ् )

तज्ज्ञानस्यैव सामर्थ्यं विरागस्यैव वा किल ।
यत्कोऽपि कर्मभिः कर्म भुंजानोऽपि न बध्यते ।। १३४ ।।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार
अब एक कलश में यह कहते हैं कि ‘वैराग्य के बल से ज्ञानी विषय-
सेवन करते हुए भी उनका असेवक’ ही है -

( दोहा )

बँधे न ज्ञानी कर्म से, बल विराग अर ज्ञान।
यद्यपि सेवें विषय को, तदपि असेवक जान ।। १३५।।
ॐ ह्रीं ज्ञान-वैराग्यबलात् ज्ञानिनः विषयसेवनेऽपि असेवकप्ररूपक -
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।८०।।
अब, आगामी कलश में यह कहते हैं कि ‘ज्ञानी को नियम से ज्ञान व
वैराग्य का बल’ होता है -

( हरिगीत )

निजभाव को निज जान, अपनापन करे जो आतमा ।
परभाव से हो भिन्न नित, निज में रमे जो आतमा ।।
वे आतमा सदृष्टि उनके, ज्ञान अर वैराग्य बल।
हो नियम से यह जानिये, पहिचानिये निज आत्मबल ।।१३६।।
ॐ ह्रीं श्रीसम्यग्दृष्टेः नियतं ज्ञान-वैराग्यशक्तिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।८१।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘सम्यग्दर्शन के बिना सच्चे
अणुव्रत-महाव्रत भी नहीं होते, सच्ची समितियाँ भी नहीं होती’ -
( रथोद्धता )
नाश्नुते विषयसेवनेऽपि यत् स्वं फलं विषयसेवनस्य ना।
ज्ञानवैभवविरागताबलात्सेवकोऽपि तदसावसेवकः ।। १३५ ।।

(मन्दाक्रान्ता )

सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं, ज्ञान-वैराग्य-शक्तिः,
स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं, स्वान्यरूपाप्तिमुक्त्या ।
यस्माज्ज्ञात्वा व्यतिकरमिदं, तत्त्वतः स्वं परं च,
स्वस्मिन्नास्ते विरमति परात्, सर्वतो रागयोगात् ।। १३६ ।।

( हरिगीत )

मैं स्वयं सम्यग्दृष्टि हूँ, हूँ बन्ध से विरहित सदा।
यह मानकर अभिमान में, पुलकित वदन मस्तक उठा ।।
जो समिति आलम्बे, महाव्रत आचरें पर पापमय।
दिग्मूढ़ जीवों का अरे ! जीवन नहीं अध्यात्ममय ।।१३७।।
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनाऽभावे महाव्रतादीनां निरर्थकत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।८२।।
अब, आगामी कलश में आचार्य, ‘अनादिकाल से मोहनींद में सोये हुये
जीवों को निजपद के अनुभव की प्रेरणा’ देते हैं –

( हरिगीत )

अपदपद में मत्त नित, अन्धे जगत् के प्राणियों !।
यह पद तुम्हारा पद नहीं, निज जानकर क्यों सो रहे ? ।।
जागो, इधर आओ, रहो नित, मगन परमानन्द में।
हो परमपदमय तुम स्वयं, तुम स्वयं हो चैतन्यमय ।।१३८ ।।
ॐ ह्रीं अनादिमोहोपशान्त्यर्थं निजपदानुभवप्रेरक -श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।८३।।

( मन्दाक्रान्ता )

सम्यग्दृष्टिः, स्वयमयमहं, जातु बन्धो न मे स्या-
दित्युत्तानोत्, पुलकवदना रागिणोऽप्याचरन्तु।
आलम्बन्तां, समितिपरतां, ते यतोऽद्यापि पापा,
आत्माऽनात्माऽवगमविरहात्, सन्ति सम्यक्त्वरिक्ताः।। १३७ ।।
आसंसारात्प्रतिपदममी, रागिणो नित्यमत्ताः,
सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं, तद्विबुध्यध्वमन्धाः।
एतैतेतः पदमिदमिदं, यत्र चैतन्यधातुः;
शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः, स्थायिभावत्वमेति ।। १३८ ।।

अब यहाँ आचार्यदेव, ‘वह निजपद क्या है?’ यह एक कलश में
बताते हैं –

( हरिगीत )

अरे! जिसके सामने हों, सभी पद भासित अपद।
सब आपदाओं से रहित, आराध्य है वह ज्ञान पद।।१३९।।

ॐ ह्रीं स्वानुभूतिगम्य-निजपदप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८४।।

अब, ‘ज्ञानस्वरूप निजपद ही निर्वाण का कारण है; अतः उसी के
अनुभव की प्रेरणा’ एक कलश में देते हैं –

( हरिगीत )

उस ज्ञान के आस्वाद में ही, नित रमे जो आतमा।
अर द्वन्द्वमय आस्वाद में, असमर्थ है जो आतमा।।
आत्मानुभव के स्वाद में ही, मगन है जो आतमा।
सामान्यमय एकत्व को, धारण करे वह आतमा।।१४०।।

ॐ ह्रीं ज्ञानस्वरूप-निजपदानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८५।।

अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘चैतन्य-रत्नाकर एक होने पर भी
अनेक होकर उछलता है’ –

( अनुष्टुभ् )

एकमेव हि तत्स्वाद्यं, विपदामपदं पदम्।
अपदान्येव भासन्ते, पदान्यन्यानि यत्पुरः।। १३९ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

एकज्ञायकभावनिर्भरमहास्वादं समासादयन्
स्वादं द्वन्द्वमयं विधातुमसहः स्वां वस्तुवृत्तिं विदन्।
आत्मात्मानुभवानुभावविवशो भ्रश्यद्विशेषोदयं
सामान्यं कलयन् किलैष सकलं ज्ञानं नयत्येकताम्।। १४० ।।

( हरिगीत )

सब भाव पी संवेदनाएँ, मत्त होकर स्वयं ही।
हों उछलती जिस भाव में, अद्भुत निधि वह आतमा।।
भगवान् वह चैतन्य-रत्नाकर सदा ही एक है।
फिर भी अनेकाकार होकर, स्वयं में ही उछलता।।१४१।।

ॐ ह्रीं श्री एकानेकस्वरूप-चैतन्यरत्नाकरप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८६।।

अब, ‘मोक्षपद की प्राप्ति ज्ञान से ही सम्भव है, किसी क्रियाकाण्ड से
नहीं,’ यह बात दो कलश में कहते हैं –

( हरिगीत )

पंचाग्नि तप या महाव्रत, कुछ भी करो सिद्धि नहीं।
जाने बिना निज आतमा, जिनवर कहैं सब व्यर्थ हैं।।
मोक्षमय जो ज्ञानपद वह, ज्ञान से ही प्राप्त हो।
निज ज्ञानगुण के बिना, उसको कोई पा सकता नहीं।।१४२।।

( शार्दूलविक्रीडित )

अच्छाच्छाः स्वयमुच्छलंति यदिमाः संवेदनव्यक्तयो
निष्पीताखिलभावमंडलरसप्राग्भारमत्ता इव।
यस्याभिन्नरसः स एष भगवानेकोऽप्यनेकीभवन्
वल्गत्युत्कलिकाभिरद्भुतनिधिश्चैतन्यरत्नाकरः।। १४१ ।।

क्लिश्यन्तां स्वयमेव दुष्करतरैः, मोक्षोन्मुखैः कर्मभिः,
क्लिश्यन्तां च परे महाव्रततपो, भारेण भग्नाश्चिरम्।
साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं, संवेद्यमानं स्वयं,
ज्ञानं ज्ञानगुणं विना कथमपि प्राप्तुं, क्षमन्ते न हि।। १४२ ।।

( दोहा )

क्रियाकाण्ड से ना मिले, यह आतम अभिराम।
ज्ञानकला से सहज ही, सुलभ आतमाराम ।।
अतः जगत् के प्राणियों ! छोड़ जगत् की आश।
ज्ञानकला का ही अरे! करो नित्य अभ्यास ।।१४३।।
ॐ ह्रीं श्री ज्ञानेनैव मोक्षप्राप्तिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।८७।।
‘जो ज्ञानी, स्वयं को अचिन्त्यशक्ति चिन्मात्र चिन्तामणिरूप देव अनुभव
करता है, वह कोई भी परिग्रह नहीं चाहता है;’ यह कलश द्वारा कहते हैं -

( दोहा )

अचिन्त्यशक्ति धारक अरे ! चिन्तामणि चैतन्य ।
सिद्धारथ यह आतमा, ही है कोई न अन्य ।।
सभी प्रयोजन सिद्ध हैं, फिर क्यों पर की आश।
ज्ञानी जाने यह रहस करे न पर की आश ।। १४४।।
ॐ ह्रीं अचिन्त्यात्ममहिमाप्रकाशक -श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।।८८।।
अब, ‘ज्ञानी, किसी परिग्रह को नहीं चाहता है,’ यह दो कलश में कहते
हैं -

(सोरठा )

सभी परिग्रह-त्याग, इसप्रकार सामान्य से।
विविध वस्तु परित्याग, अब आगे विस्तार से ।। १४५।।
( द्रुतविलंबित )
पदमिदं ननु कर्मदुरासदं सहजबोधकलासुलभं किल ।
तत इदं निजबोधकलाबलात् कलयितुं यततां सततं जगत् ।। १४३ ।।
( उपजाति )
अचिन्त्यशक्तिः स्वयमेव देवः, चिन्मात्रचिन्तामणिरेष यस्मात्।
सर्वार्थसिद्धात्मतया विधत्ते, ज्ञानी किमन्यस्य परिग्रहेण ? ।। १४४ ।।

( वसन्ततिलका )

इत्थं परिग्रहमपास्य समस्तमेव सामान्यतः स्वपरयोरविवेकहेतुम् ।
अज्ञानमुज्झितुमना अधुना विशेषाद् भूयस्तमेव परिहर्तुमयं प्रवृत्तः ।। १४५ ।।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार
होंय कर्म के उदय से, ज्ञानी के जो भोग।
परिग्रहत्व पावे नहीं, क्योंकि राग-वियोग ।। १४६।।
ॐ ह्रीं समस्तपरिग्रह-अवाञ्छकज्ञानिनः स्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।८९।।
अब, ‘ज्ञानी तीनों काल के भोगों की वांछा क्यों नहीं करता?’ इसका
समाधान, एक कलश में करते हैं -

( हरिगीत )

हम जिन्हें चाहें अरे ! उनका, भोग हो सकता नहीं।
क्योंकि पल-पल प्रलय पावें, वेद्य-वेदक भाव सब ।।
बस ! इसलिए सबके प्रति, अति ही विरक्त रहें सदा।
चाहें न कुछ भी जगत् में, निजतत्त्वविद् विद्वानजन ।। १४७।।
ॐ ह्रीं वेद्य-वेदकभावाऽभावे निर्वाञ्छकज्ञानिनः स्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९०।।
अब, आगामी दो कलशों में दृष्टान्त सहित यह कहते हैं कि ‘राग के
अभाव के कारण ज्ञानी, कर्म करते हुए भी बँधते नहीं हैं’ -

( हरिगीत )

जबतक कषायित न करें, सर्वांग फिटकरि आदि से।
तबतलक सूती वस्त्र पर, सर्वांग रंग चढ़ता नहीं ।।
बस ! उसतरह ही रागरस से, रिक्त सम्यग्ज्ञानिजन ।
सब कर्म करते पर परीग्रह-भाव को ना प्राप्त हों ।। १४८।।
( स्वागता )
पूर्वबद्धकर्मविपाकात् ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः ।
तद्भवत्वथ च रागवियोगात् नूनमेति न परिग्रहभावम् ।। १४६ ।।
वेद्यवेदकविभावचलत्वाद् वेद्यते न खलु कांक्षितमेव ।
तेन कांक्षति न किञ्चन विद्वान् सर्वतोऽप्यतिविरक्तिमुपैति ।। १४७ ।।
ज्ञानिनो न हि परिग्रहभावं कर्म रागरसरिक्ततयैति ।
रंगयुक्तिरकषायितवस्त्रे स्वीकृतैव हि बहिर्लुठतीह ।। १४८ ।।

रागरस से रहित ज्ञानी, जीव इस भूलोक में।
कर्मस्थ हों पर कर्मरज से, लिप्त होते हैं नहीं ।। १४९।।
ॐ ह्रीं रागाऽभावे अबन्धकज्ञानिनः स्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। ९१।।
अब, ‘भोग-भोगते हुए भी ज्ञानी क्यों नहीं बँधते?’ यह एक कलश में
उदाहरण सहित कहते हैं -

( हरिगीत )

स्वयं ही हों परिणमित, स्वाधीन हैं सब वस्तुयें।
अर अन्य के द्वारा कभी, वे नहीं बदली जा सकें ।।
जिम परजनित अपराध से, बँधते नहीं जन जगत् में।
तिम भोग भोगें किन्तु ज्ञानीजन कभी बँधते नहीं ।। १५० ।।
ॐ ह्रीं कर्मोदयनिमित्तक-भोगसद्भावेऽपि निर्जराभावप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९२।।
अब, आचार्य कहते हैं कि ‘भोगों से बन्ध नहीं होता, पर भोगने के भाव
से तो होता है, अतः इन सबसे विरक्त होकर आत्मा में रत रहो’ -

( हरिगीत )

कर्म करना ज्ञानियों को, उचित हो सकता नहीं।
फिर भी भोगासक्त जो, दुर्भुक्त ही वे जानिये ।।

( स्वागता )
ज्ञानवान् स्वरसतोऽपि यतः स्यात् सर्वरागरसवर्जनशीलः ।
लिप्यते सकलकर्मभिरेषः कर्ममध्यपतितोऽपि ततो न ।। १४९ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

यादृक् तादृगिहास्ति तस्य वशतो यस्य स्वभावो हि यः
कर्तुं नैष कथंचनापि हि परैरन्यादृशः शक्यते ।
अज्ञानं न कदाचनापि हि भवेज्ज्ञानं भवत्संततं
ज्ञानिन् भुंक्ष्य परापराधजनितो नास्तीह बंधस्तव ।। १५० ।।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार
हो भोगने से बन्ध ना, पर भोगने के भाव से।
तो बन्ध है बस ! इसलिए, निज आतमा में रत रहो ।। १५१।।
ॐ ह्रीं भोगभावमुक्त-आत्मानुभवप्रेरक - श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। ९३।।
‘फल के अभिलाषी अज्ञानी बँधते हैं और फलाभिलाषा से रहित ज्ञानी
बँधते नहीं हैं,’ यह दो कलशों में दृष्टान्त सहित बताते हैं -

( हरिगीत )

तू भोग मुझको ना कहे, यह कर्म निज करतार को।
फलाभिलाषी जीव ही, नित कर्मफल को भोगता ।।
फलाभिलाषाविरत मुनिजन, ज्ञानमय वर्तन करें।
सब कर्म करते हुए भी, वे कर्मबन्धन ना करें ।। १५२।।
जिसे फल की चाह ना, वह करे – यह जँचता नहीं।
यदि विवशता वश आ पड़े तो, बात ही कुछ और है।।
अकम्प ज्ञान-स्वभाव में, थिर रहें जो वे ज्ञानिजन।
सब कर्म करते या नहीं - यह कौन जाने विज्ञजन ।। १५३।।
ॐ ह्रीं फलाभिलाषाऽभावे ज्ञानिनः अबन्धकस्वरूपप्ररूपक - श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९४।।

( शार्दूलविक्रीडित )

ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तुमुचितं किंचित्तथाप्युच्यते
भुंक्षे हंत न जातु मे यदि परं दुर्भुक्त एवासि भोः ।
बंधः स्यादुपभोगतो यदि न तत्किं कामचारोऽस्ति ते
ज्ञानं सन्वस बंधमेष्यपरथा स्वस्यापराधाद्ध्वम् ।। १५१ ।।
कर्तारं स्वफलेन यत्किल बलात्कर्मैव नो योजयेत्
कुर्वाणः फललिप्सुरेव हि फलं प्राप्नोति यत्कर्मणः।
ज्ञानं संस्तदपास्तरागरचनो नो बध्यते कर्मणा
कुर्वाणोऽपि हि कर्म तत्फलपरित्यागैकशीलो मुनिः ।। १५२ ।।
त्यक्तं येन फलं स कर्म कुरुते नेति प्रतीमो वयं
किंत्वस्यापि कुतोऽपि किंचिदपि तत्कर्मावशेनापतेत् ।
तस्मिन्नापतिते त्वकम्पपरमज्ञानस्वभावे स्थितो
ज्ञानी किं कुरुतेऽथ किं न कुरुते कर्मेति जानाति कः ।। १५३ ।।

अब, आचार्यदेव, ‘सम्यग्दर्शन के आठ अंगों का वर्णन’ प्रारम्भ करते
हैं। वहाँ सर्वप्रथम ‘निःशंकित अंग’ सम्बन्धी कलश लिखते हुए उसकी
प्रशंसा करते हैं -

( हरिगीत )

वज्र का हो पात जो, त्रैलोक्य को विह्वल करे।
फिर भी अरे ! अति साहसी, सदृष्टिजन निश्चल रहें।।
निश्चल रहें निर्भय रहें, निशंक निज में ही रहें -।
निःसर्ग ही निज बोध-वपु, निज बोध से अच्युत रहें ।। १५४।।
ॐ ह्रीं निःशंकसम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ९५।।

अब आचार्य अमृतचन्द्रदेव, क्रमशः ‘सप्त भयों से रहित सम्यग्दृष्टि का
निरूपण’ आगामी छह कलशों में करते हैं; सर्व प्रथम 'सम्यग्दृष्टि के इहलोक

  • परलोकभय का अभाव’ प्रदर्शित करते हुए वे लिखते हैं -

( हरिगीत )

इहलोक अर परलोक से, मेरा न कुछ सम्बन्ध है।
अर भिन्न पर से एक यह, चिल्लोक ही मम लोक है।।
जब जानते यह ज्ञानिजन, तब होंय क्यों भयभीत वे ? ।
वे तो सतत निःशंक हो, निजज्ञान का अनुभव करें ।। १५५।।
ॐ ह्रीं इहलोक-परलोकभयरहित सम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक -श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९६।।

( शार्दूलविक्रीडित )

सम्यग्दृष्टय एव साहसमिदं, कर्तुं क्षमन्ते परं;
यद्वज्रेऽपि पतत्यमी भयचलत्, त्रैलोक्यमुक्ताध्वनिः ।
सर्वामेव निसर्गनिर्भयतया, शंकां विहाय स्वयं,
जानन्तः स्वमवध्यबोधवपुषं, बोधाच्च्यवन्ते न हि ।। १५४ ।।
लोकः शाश्वत एक एष सकल-व्यक्तो विविक्तात्मनः,
चिल्लोकं स्वयमेव केवलमयं, यल्लोकयत्येककः ।
लोकोऽयं न तवापरस्तदपरः, तस्यास्ति तद्भीः कुतो ?,
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं, ज्ञानं सदा विन्दति ।। १५५ ।।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार

अब, ‘सम्यग्दृष्टि के वेदनाभय का अभाव’ बताते हुए लिखते हैं -

( हरिगीत )

चूंकि एक-अभेद में ही, वेद्य-वेदक भाव हो।
अतएव ज्ञानी नित्य ही निजज्ञान का अनुभव करें।।
अन्य वेदना कोइ है नहीं, तब होंय क्यों भयभीत वे ? ।
वे तो सतत निःशंक हो, निजज्ञान का अनुभव करें ।। १५६ ।।
ॐ ह्रीं वेदनाभयरहित सम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९७।।

अब, ‘सम्यग्दृष्टि के अरक्षाभय का अभाव’ प्रदर्शित करते हुए लिखते हैं -

( हरिगीत )

निज आतमा सत् और, सत् का नाश हो सकता नहीं।
है सदा रक्षित सत्, अरक्षाभाव हो सकता नहीं ?।।
जब जानते यह ज्ञानिजन, तब होय क्यों भयभीत वें ? ।
वे तो सतत निःशंक हो, निजज्ञान का अनुभव करें ।। १५७।।
ॐ ह्रीं अरक्षाभयरहित सम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९८।।

( शार्दूलविक्रीडित )

एषैकैव हि वेदना यदचलं ज्ञानं स्वयं वेद्यते
निर्भेदोदितवेद्यवेदकबलादेकं सदानाकुलैः ।
नैवान्यागतवेदनैव हि भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ।। १५६ ।।
यत्सन्नाशमुपैति तन्न नियतं व्यक्तेति वस्तुस्थिति -
र्ज्ञानं सत्स्वयमेव तत्किल ततस्त्रातं किमस्यापरैः ।
अस्यात्राणमतो न किंचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ।। १५७ ।।

अब, सम्यग्दृष्टि के अगुप्तिभय का अभाव प्रदर्शित करते हुए लिखते हैं-

( हरिगीत )

कोई किसी का कुछ करे, यह बात सम्भव है नहीं।
सब हैं सुरक्षित स्वयं में, अगुप्ति का भय है नहीं ।।
जब जानते यह ज्ञानिजन, तब होंय क्यों भयभीत वे?।
वे तो सतत निःशंक हो निजज्ञान का अनुभव करें।।१५८।।
ॐ ह्रीं अगुप्तिभयरहितसम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।९९।।
अब ‘सम्यग्दृष्टि के मरणभय का अभाव’ प्रदर्शित करते हुए लिखते हैं -

( हरिगीत )

मृत्यु कहे सारा जगत् बस ! प्राण के उच्छेद को।
ज्ञान ही है प्राण मम, उसका नहीं विच्छेद हो।।
तब मरणभय हो किसतरह, हों ज्ञानिजन भयभीत क्यों ?।
वे तो सतत निःशंक हो, निज ज्ञान का अनुभव करें ।। १५९।।
ॐ ह्रीं मरणभयरहित सम्यग्दृष्टिस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१००।।
अब, ‘सम्यग्दृष्टि के आकस्मिकभय का अभाव’ प्रदर्शित करते हुए
लिखते हैं -

( हरिगीत )

इसमें अचानक कुछ नहीं, यह ज्ञान निश्चल एक है।
यह है सदा ही एक-सा, एवं अनादि अनंत है।।

( शार्दूलविक्रीडित )

स्वं रूपं किल वस्तुनोऽस्ति परमा गुप्तिः स्वरूपे नय-
च्छक्तः कोऽपि परः प्रवेष्टुमकृतं ज्ञानं स्वरूपं च नुः।
अस्यागुप्तिरतो न काचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ।। १५८ ।।
प्राणोच्छेदमुदाहरंति मरणं प्राणाः किलास्यात्मनो
ज्ञानं तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित् ।
तस्यातो मरणं न किंचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ।। १५९ ।।

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार
जब जानते यह ज्ञानिजन, तब होंय क्यों भयभीत वे ? ।
वे तो सतत निःशंक हो निज ज्ञान का अनुभव करें ।।१६०।।
ॐ ह्रीं आकस्मिकभयरहित स्वरूपसम्यग्दृष्टिप्ररूपक - श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १०१ ।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘सम्यग्दृष्टि को सतत निर्जरा’ होती
रहती है -

( दोहा )

नित निःशंक सदृष्टि को, कर्मबन्ध न होय ।
पूर्वोदय को भोगते, सतत निर्जरा होय ।। १६१।।
ॐ ह्रीं सम्यग्दृष्टिने सतत निर्जराप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०२।।
अब, अन्त में उपसंहार करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रदेव सम्यग्ज्ञान की
महिमा करते हैं -

( दोहा )

बन्ध न हो नव कर्म का, पूर्व कर्म का नाश।
नृत्य करें अष्टांग में, सम्यग्ज्ञान प्रकाश ।। १६२।।
ॐ ह्रीं निर्जराकारक-श्रीसम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १०३।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
एकं ज्ञानमनाद्यनंतमचलं सिद्धं किलैतत्स्वतो
यावत्तावदिदं सदैव हि भवेन्नात्र द्वितीयोदयः ।
तन्नाकस्मिकमत्र किंचन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो
निश्शंकः सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ।। १६० ।।

( मन्दाक्रान्ता )

टंकोत्कीर्ण-स्वरस-निचितज्ञान-सर्वस्वभाजः
सम्यग्दृष्टेर्यदिह सकलं घ्नंति लक्ष्माणि कर्म।
तत्तस्यास्मिन्पुनरपि मनाक्कर्मणो नास्ति बंधः
पूर्वापात्तं तदनुभवतो निश्चितं निर्जरैव ।। १६१ ।।
रुंधन् बंधं नवमिति निजैः संगतोऽष्टाभिरंगैः
प्राग्बद्धं तु क्षयमुपनयन् निर्जरोज्जृम्भणेन ।
सम्यग्दृष्टिः स्वयमतिरसादादिमध्यांतमुक्तं ज्ञानं
भूत्वा नटति गगनाभोगरंगं विगाह्य ।। १६२ ।।

जयमाला

( दोहा )

है निर्जरा अधिकार की, महिमा अगम अनूप ।
करने से आराधना, पावे अद्भुत रूप ।।१।।

( मानव¹ )

ज्ञानी विषयों को भोगें, पर बन्ध नहीं होता है।
निर्जरा सहज ही होती, आतम निर्मल होता है।।
सामर्थ्य ज्ञान की जानों, एवं विराग बल देखो।
इस अद्भुत अचरजकारी, घटना को जानो देखो।।२।।
खाते हुये जहर को, विष-वैद्य मरण न हो ज्यों।
भोगों को भोगे फिर भी, ज्ञानी को बन्ध न हो त्यों ।।
ज्यों मदिरा पीवें मद्यप², मदिरा का असर न होवे।
त्यों ही विरागयुत ज्ञानी पर जग का असर न होवे ।।३।।
है बात वस्तुतः ऐसी, ज्ञानी विषयों का सेवन ।
अत्यन्त अरुचि से करते, अन्दर से करें न सेवन ।।
सामर्थ्य ज्ञान की ऐसी, एवं विराग-बल ऐसा।
उनको अन्तर से उनसे, अति ही विरक्त रखता है।।४।।
ज्ञानी के होती ऐसी, रे! ज्ञान-वैराग्य-शक्ति ।
उस शक्ति की महिमा है, छोड़ो न उनमें भक्ति।।
पर सम्यग्दृष्टि ज्ञानी, स्वच्छन्द नहीं हैं होते।
उनका चरित्र अति निर्मल, वे अति सज्जनतम होते ।।५।।
१. तर्ज – ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी
२. शराब पीने वाला

अर्ध्यावली : निर्जरा अधिकार (जयमाला)
ज्यों कीचड़ में सोना हो, त्यों कर्मों में ज्ञानीजन ।
सोना निर्मल ही रहता, ज्ञानीजन निर्मल रहते ।।
ज्यों कीचड़ में लोहा हो, त्यों कीचड़ में अज्ञानी।
लोहे में जंग लग जाती, त्यों अज्ञ कर्म से लिपटे ।।६।।
जो फल ना चाहे भाई, वह कुछ करता ही नहीं है।
यदि करना पड़े विवश हो, तो अन्य बात कुछ होगी।।
बाहर से करते दिखते, अन्दर विरक्त रहते हैं।
ज्ञानी ज्ञानी की जानें, हम नहीं जानते कुछ भी।।७।।
इन प्रश्नों के उत्तर, यदि आप जानना चाहें।
इनकी गहराई भाई, यदि आप नापना चाहें ।।
निर्जराधिकार अनुशीलन, इकदम अच्छे से पढ़िये।
इसमें आगत चर्चा के, अन्तर में जरा उतरिये ।।८।।
छोड़ उपेक्षा भाई ! अन्तर्मन से आदरिये।
गहराई में जा-जाकर, अन्तर में जरा उतरिये ।।
कीजिए मनन अर चिन्तन, एवं अनुशीलन करिये।
रे! अधिक कहें क्या भाई, तद्रूप परिणमन करिये।।९।।

(दोहा)

करो करम की निर्जरा, कर परिणमन विशुद्ध ।
हो जावेगा आतमा, अहो एकदम शुद्ध ।। १०।।
ॐ ह्रीं श्री निर्जरातत्त्वप्रतिपादक-निर्जराधिकाराय जयमाला पूर्णार्थ्यं नि. स्वाहा।

( दोहा )

अब समाप्त ही हो रहा, यह अधिकार महान् ।
भव्य निर्जरा प्राप्त कर, शीघ्र बनो भगवान् ।। ११ ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

बन्ध-मोक्ष अधिकार पूजन

स्थापना

( दोहा )

रागभाव तो बन्ध है, वीतरागता मोक्ष ।
एवं आत्मस्वभाव में, नहीं बन्ध ना मोक्ष ।।१।।
बन्धकथा से कभी न, होय बन्ध का नाश।
आत्मसाधना से सदा, हो शिवसुख अविनाश ।।२।।
अष्ट द्रव्य से कर रहा, पूजन अगम अनूप ।
बन्ध-मोक्ष अधिकार की, समयसार शिवभूप ।।३।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकारौ! अत्र अवतर-अवतर
संवौषट् ।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकारौ! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकारौ! अत्र मम सन्निहितो
भव-भव वषट् । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( मानव )

जल
आतम-स्वभाव के जल से, रागादिक मल धो-धोकर ।
अन्तर से बाहर निकलें, निर्मद निर्मल हो-होकर ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां जन्मजरामृत्यु-
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चन्दन
सन्तप्त जगत् में आतम, भव-ताप में व्याकुल होवे।
शीतल स्वभाव में रमकर, चन्दन-सा शीतल होवे ।।

रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां संसारताप-
विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षत
क्षत में क्षत-विक्षत होकर, अक्षत न अभी तक पाया।
अक्षत अविनाशी आतम, की शरणा में अब आया ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

पुष्प
भक्ति के पुष्प मनोहर, चरणों में लेकर आया।
दुर्भावों से बच-बचकर, तेरी शरणा में आया ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां कामबाण-
विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

नैवेद्य
कितने ही व्यंजन खाओ, पर जग में भूख मिटे ना।
जो शरण आपकी आवै, उसको तो भूख लगे ना।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीप
जग का यह दीपक जग को, ना पूर्ण प्रकाशित करता।
पर ज्ञानदीप इस जग को, परिपूर्ण प्रकाशित करता ।।

अर्ध्यावली : बन्ध अधिकार
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां मोहान्धकार-
विनाशयनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
यह धूप दशांगी जग में, कर्मों को नहीं जलाती।
पर गन्ध आत्मा की तो, रे उन्हें भस्म कर जाती ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां अष्टकर्मदहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
मुक्ति का अनुपम फल तो, ये कभी नहीं दे सकते।
मुक्तिफल तो सबको ही, अपने आतम से मिलते ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं श्री बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

यह अर्घ्य आतमा को तो, सुख-शान्ति नहीं दे सकता।
सुख-शान्ति मिले अपने में, कोई और नहीं दे सकता ।।
रे! राग भाव में फँस कर, अब तक अनन्त दुख पाये।
रे! मोक्षमार्ग में चल कर, अब तो अनन्त सुख पायें ।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्ध-मोक्षाधिकाराभ्यां अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली
।। बन्ध अधिकार ।।

( दोहा )

करम-योग-हिंसा-विषय, न कर्मबन्ध के हेतु ।
मोह, राग अर द्वेष हैं, कर्मबन्ध के हेतु ।।
( पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के प्रारम्भ में टीकाकार आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ‘रंगमंच
पर बन्ध का प्रवेश कराते हैं और उसी बन्ध का नाश करनेवाले सम्यग्ज्ञान की
महिमा’ करते हैं -

( हरिगीत )

मदमत्त हो मदमोह में, इस बन्ध ने नर्तन किया।
रसराग के उद्‌गार से सब, जगत् को पागल किया।।
उदार अर आनन्दभोजी, धीर निरुपधि ज्ञान ने।
अति ही अनाकुलभाव से, उस बन्ध का मर्दन किया ।। १६३।।
ॐ ह्रीं बन्धनाशक-श्रीसम्यग्ज्ञानाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।१०४।।
यहाँ सर्वप्रथम, ‘अज्ञानी जीव, रागादि से लिप्त होने के कारण ही बन्ध
को प्राप्त होता है,’ यह बात एक कलश के द्वारा समझाते हैं

( हरिगीत )

कर्म की ये वर्गणाएँ, बन्ध का कारण नहीं।
अत्यन्त चंचल योग भी है, बन्ध के कारण नहीं ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

रागोद्‌गारमहारसेन सकलं, कृत्वा प्रमत्तं जगत् ;
क्रीडंतं रसभावनिर्भरमहा-नाट्येन बन्धं धुनत् ।
आनन्दामृतनित्यभोजि सहजावस्थां स्फुटं नाटयद्-;
धीरोदारमनाकुलं निरुपधि, ज्ञानं समुन्मज्जति ।। १६३ ।।

करण कारण हैं नहीं, चिद्-अचिद् हिंसा भी नहीं।
बस ! बन्ध के कारण कहे, अज्ञानमय रागादि ही ।।१६४।।
ॐ ह्रीं अज्ञानमय-रागादिभ्यः बन्धप्ररूपक -श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१०५।।

अब, आगामी एक कलश में यह स्पष्ट करते हैं कि ‘मिथ्यात्व सहित
रागादि भावों के अभाव के कारण सम्यग्दृष्टियों को बन्ध नहीं होता’ -

( हरिगीत )

भले ही सब कर्मपुद्गल, से भरा यह लोक हो।
भले ही मन-वचन-तन, परिस्पन्दमय यह योग हो।।
चिद्-अचिद् का घात एवं, करण का उपभोग हो।
फिर भी नहीं रागादि-विरहित, ज्ञानियों को बन्ध हो ।। १६५।।
ॐ ह्रीं अज्ञानमयरागाभावे ज्ञानिनः बन्धाऽभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १०६।।

अब, आगामी कलश में सावधान करते हुए कहते हैं कि ‘यद्यपि कार्मण
-वर्गणा, मन-वचन-कायरूप योग, चेतन-अचेतन की हिंसा और पंचेन्द्रियों
के भोग; इनमें से किसी से भी बन्ध नहीं होता; तथापि ज्ञानियों को निरर्गल
प्रवृत्ति उचित नहीं है’ -

(पृथ्वी)
न कर्मबहुलं जगन्न चलनात्मकं कर्म वा
न नैककरणानि वा न चिदचिद्वधो बंधकृत् ।
यदैक्यमुपयोगमभूः समुपयाति रागादिभिः
स एव किल केवलं भवति बंधहेतुर्नृणाम् ।। १६४ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

लोकः कर्मततोऽस्तु सोऽस्तु च परिस्पन्दात्मकं कर्म तत्
तान्यस्मिन्करणानि संतु चिदचिद्व्यापादनं चास्तु तत् ।
रागादीनुपयोगभूमिमनयन् ज्ञानं भवन्केवलं
बंधं नैव कुतोऽप्युपैत्ययमहो सम्यग्दृगात्मा ध्रुवम् ।। १६५ ।।
अर्ध्यावली : बन्ध अधिकार

( हरिगीत )

तो भी निरर्गल प्रवर्तन तो, ज्ञानियों को वर्ज्य है।
क्योंकि निरर्गल प्रवर्तन, तो बन्ध का स्थान है।।
वांछारहित जो प्रवर्तन वह, बन्ध विरहित जानिये ।
जानना करना परस्पर-विरोधी ही मानिये ।। १६६ ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानिनः निरर्गलप्रवृत्तिनिषेधक -श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१०७।।

अब, आगामी कलश में ‘कर्तृत्व सम्बन्धी अज्ञानमय अध्यवसान ही
बन्ध का कारण है’, यह कहते हैं -

( हरिगीत )

जो ज्ञानीजन हैं जानते वे, कभी भी करते नहीं।
करना तो बस ! राग ही, जो करें वे जाने नहीं।।
अज्ञानमय यह राग तो है, भाव अध्यवसान ही।
बन्ध-कारण कहें ये, अज्ञानियों के भाव ही ।।१६७।।
ॐ ह्रीं कर्तृत्वसम्बन्धी-अज्ञानमय-अध्यवसान एव बन्धकारणप्ररूपक -
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१०८।।

अब, आगामी दो कलशों में जीवन-मरण, सुख-दुःखादि सभी कार्यो
का मूल कारण अपने अपने कर्म को बताते हुए अन्य को कारण मानना
मिथ्या बताते हैं -

(पृथ्वी)
तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां,
तदायतनमेव सा किल निरर्गला व्यापृतिः।
अकामकृतकर्म तन्मतमकारणं ज्ञानिनां,
द्वयं न हि विरुद्धयते किमु करोति जानाति च ।। १६६ ।।

( वसन्ततिलका )

जानाति यः स न करोति करोति यस्तु, जानात्ययं न खलु तत्किल कर्मरागः ।
रागं त्वबोधमयमध्यवसायमाहुः, मिथ्यादृशः स नियतं स च बन्धहेतुः ।। १६७ ।।

( हरिगीत )

जीवन-मरण अर दुःख-सुख सब, प्राणियों के सदा ही।
अपने कर्म के उदय के, अनुसार ही हों नियम से ।।
करे कोई किसी के जीवन-मरण अर दुक्ख-सुख ।
विविध भूलों से भरी यह, मान्यता अज्ञान है।। १६८।।

( हरिगीत )

करे कोई किसी के जीवन-मरण अर दुक्ख-सुख।
मानते हैं जो पुरुष, अज्ञानमय इस बात को ।।
कर्तृत्व रस से लबालब हैं, अहंकारी वे पुरुष ।
भव-भव भ्रमें मिथ्यामती, अर आत्मघाती वे पुरुष ।। १६९।।
ॐ ह्रीं कर्मोदयानुसारी-जीवन-मरण-सुख-दुःखानां कर्तृत्वाऽध्यवसायान्
अज्ञानप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।१०९।।
अब, एक कलश द्वारा यह कहते हैं कि ‘मिथ्या अध्यवसाय ही बन्ध का
कारण है, कोई बाह्य क्रिया नहीं’

(दोहा)

विविध कर्म बन्धन करें, जो मिथ्याध्यवसाय ।
मिथ्यामति निशदिन करें, वे मिथ्याध्यवसाय ।।१७०।।
ॐ ह्रीं मिथ्याध्यवसायबन्धकारणप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।११०।।

( वसन्ततिलका )

सर्वं सदैव नियतं भवति स्वकीय-, कर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।
अज्ञानमेतदिह यत्तु परः परस्य, कुर्यात्पुमान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।। १६८ ।।
अज्ञानमेतदधिगम्य परात्परस्य, पश्यन्ति ये मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।
कर्माण्यहंकृतिरसेन चिकिर्षवस्ते, मिथ्यादृशो नियतमात्महनो भवन्ति ।। १६९ ।।

( अनुष्टुभ् )

मिथ्यादृष्टेः स एवास्य बंधहेतुर्विपर्ययात् ।
य एवाध्यवसायोऽयमज्ञानात्माऽस्य दृश्यते ।। १७० ।।
अर्ध्यावली : बन्ध अधिकार
अब, ‘निरर्थक अध्यवसानादि भावों से यह जीव, पर को निजरूप और
निज को पररूप करता है अर्थात् ऐसा मानता है,’ यह एक कलश में कहते हैं -

( दोहा )

निष्फल अध्यवसान में, मोहित हो यह जीव ।
सर्वरूप निज को करे, जाने सब निजरूप ।। १७१।।
ॐ ह्रीं अध्यवसानादिभावानां निरर्थकत्वप्ररूपक - श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १११।।
अब, आगामी कलश में ‘अध्यवसानादि भाव रहित मुनिराजों की प्रशंसा
करते हुए वे कर्म से लिप्त नहीं होते हैं,’ यह कहते हैं -

(रोला)

यद्यपि चेतन पूर्ण विश्व से भिन्न सदा है,
फिर भी निज को करे विश्वमय जिसके कारण।
मोहमूल वह अधवसाय ही जिसके न हो,
परम प्रतापी दृष्टिवन्त वे ही मुनिवर हैं ।। १७२।।
ॐ ह्रीं अध्यवसानादिभावरहितमुनीनां स्वरूपनिरूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। ११२।।
इस प्रकार ‘अध्यवसान त्याज्य हैं अर्थात् पराश्रित सम्पूर्ण व्यवहार ही
त्याज्य है,’ यह एक कलश द्वारा कहते हैं

( अडिल्ल )

सब ही अध्यवसान त्यागने योग्य हैं,
यह जो बात विशेष जिनेश्वर ने कही।
इस का तो स्पष्ट अर्थ यह जानिये,
अन्याश्रित व्यवहार त्यागने योग्य है।।

( अनुष्टुभ् )

अनेनाध्यवसायेन निष्फलेन विमोहितः ।
तत्किंचनापि नैवास्ति नात्मात्मानं करोति यत् ।। १७१ ।।

(इन्द्रवज्रा )

विश्वाद्विभक्तोऽपि हि यत्प्रभावादात्मानमात्मा विदधाति विश्वम् ।
मोहैककंदोऽध्यवसाय एष नास्तीह येषां यतयस्त एव ।। १७२ ।।

परमशुद्धनिश्चयनय का जो ज्ञेय है,
शुद्ध निजातमराम एक ही ध्येय है।
यदि ऐसी है बात तो मुनिजन क्यों नहीं ?
शुद्धज्ञानघन आतम में निश्चल रहें ।। १७३।।
ॐ ह्रीं पराश्रितव्यवहारनिषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। ११३।।
अब, ‘कर्मबन्ध के कारण रागादि भावों का निमित्त कौन है?’ - ऐसा प्रश्न
एक कलश के माध्यम से प्रस्तुत करके उसका समाधान एक कलश में
करते हैं -

( सोरठा )

कहे जिनागम माँहि, शुद्धातम से भिन्न जो।
रागादिक परिणाम, कर्मबन्ध के हेतु वे ।।
यहाँ प्रश्न अब एक, उन रागादिक भाव का ।
यह आतम या अन्य, कौन हेतु है अब कहैं ।। १७४।।

( सोरठा )

अग्निरूप न होय, सूर्यकान्तमणि सूर्य बिन ।
रागरूप न होय, यह आतम परसंग बिन ।।१७५।।
ॐ ह्रीं रागादिसद्भावे परद्रव्यनिमित्तत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।११४।।

( शार्दूलविक्रीडित )

सर्वत्राऽध्यवसानमेवमखिलं, त्याज्यं यदुक्तं जिनैः;
स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजितः ।
सम्यङ्निश्चयमेकमेव तदमी, निष्कम्पमाक्रम्य किं?;
शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे, बध्नन्ति सन्तो धृतिम् ।। १७३ ।।
( उपजाति)
रागादयो बन्धनिदानमुक्तास्ते, शुद्धचिन्मात्रमहोऽतिरिक्ताः।
आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुन्नाः पुनरेवमाहुः ।। १७४ ।।
न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककांतः ।
तस्मिन्निमित्तं परसंग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ।। १७५ ।।
अर्ध्यावली : बन्ध अधिकार १२३
अब, एक कलश में यह कहते हैं कि 'वस्तु-स्वरूप के ज्ञाता ज्ञानी, राग
के अकर्ता हैं -

( दोहा )

ऐसे वस्तुस्वभाव को, जाने विज्ञ सदीव ।
अपनापन ना राग में, अतः अकारक जीव ।। १७६ ।।
ॐ ह्रीं ज्ञानिनः रागादीनामकारकत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।११५।।
अब, यहाँ एक कलश में यह कहते हैं कि ‘अज्ञानी, वस्तु-स्वरूप को
नहीं जानते हैं, अतः वे राग के कर्ता बनते हैं’ -

( दोहा )

ऐसे वस्तुस्वभाव को, ना जाने अल्पज्ञ ।
धरे एकता राग में, नहीं अकारक अज्ञ ।। १७७।।
ॐ ह्रीं अज्ञानिनः रागादिकारकत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।११६।।
अब, ‘वस्तु-स्वरूप और बन्ध की प्रक्रिया जाननेवाले ज्ञानी, बन्ध को
उखाड़ कर, आत्मा को प्राप्त करते हैं’, यह कलश द्वारा कहते हैं -

( सवैया इकतीसा )

परद्रव्य हैं निमित्त परभाव नैमित्तिक,
नैमित्तिक भावों से कषायवान् हो रहा।
भावीकर्मबन्धन हो इन कषायभावों से,
बन्धन में आतमा विलायमान हो रहा ।।

( अनुष्टुभ् )

इति वस्तुस्वभावं स्वं ज्ञानी जानाति तेन सः ।
रागादीन्नात्मनः कुर्यान्नातो भवति कारकः ।। १७६ ।।
इति वस्तुस्वभावं, स्वं नाज्ञानी वेत्ति तेन सः ।
रागादीनात्मनः कुर्यादतो भवति कारकः ।। १७७ ।।

इसप्रकार जान परभावों की सन्तति को,
जड़ से उखाड़ स्फुरायमान हो रहा।
आनन्दकन्द निज-आतम के वेदन में,
निज भगवान् शोभायमान हो रहा।।१७८।।
ॐ ह्रीं बन्धप्रहारकसम्यग्ज्ञानिनः प्रशंसक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।११७।।

अब, आगामी कलश में ‘बन्ध को जड-मूल से उखाडनेवाली दिव्य
ज्ञान-ज्योति की प्रशंसा’ वीररस के माध्यम से करते हैं -

( सवैया इकतीसा )

बन्ध के जो मूल उन रागादिक भावों को,
जड़ से उखाड़ने उदीयमान हो रही।
जिसके उदय से चिन्मय-लोक की,
यह कर्म-कालिमा विलीयमान हो रही।।
जिसके उदय को कोई नहीं रोक सके,
अद्भुत शौर्य से विकासमान हो रही।
कमर कसे हुए धीर-वीर-गम्भीर,
ऐसी दिव्यज्योति प्रकाशमान हो रही।।१७९।।
ॐ ह्रीं बन्धनाशक-श्रीसम्यग्ज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा।।११८।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( शार्दूलविक्रीडित )

इत्यालोच्य विवेच्य तत्किल परद्रव्यं समग्रं बलात्
तन्मूलां बहुभावसंततिमिमामुद्धर्तुकामः समम् ।
आत्मानं समुपैति निर्भरवहत्पूर्णैकसंविद्युतं
येनोन्मूलितबंध एष भगवानात्मात्मनि स्फूर्जति।।१७८।।

( मन्दाक्रान्ता )

रागादीनामुदयमदयं, दारयत्कारणानां,
कार्यं बन्धं विविधमधुना सद्य एव प्रणुद्य ।
ज्ञानज्योतिः क्षपिततिमिरं साधु सन्नद्धमेतत्,
तद्वद्यद्वत्प्रसरमपरः, कोऽपि नास्यावृणोति।।१७९।।

।। मोक्ष अधिकार ।।

( दोहा )

बन्धकथा से कभी ना, होय बन्ध का नाश।
आत्म-साधना से सदा, हो शिव-सुख अविनाश।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

अब, मोक्ष अधिकार के प्रारम्भ में आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ‘मोक्ष को
रंगभूमि में प्रवेश कराते हुए प्रज्ञाछैनी से आत्मा और बन्ध को भिन्न-भिन्न
करनेवाली ज्ञान-ज्योति का स्मरण’ करते हैं –

( हरिगीत )

निज आतमा अर बन्ध को, कर पृथक् प्रज्ञाछैनी से।
सद्ज्ञानमय निज आत्म को, कर सरस परमानन्द से।।
उत्कृष्ट है कृतकृत्य है, परिपूर्णता को प्राप्त है।
प्रगटित हुई वह ज्ञानज्योति, जो स्वयं में व्याप्त है।।१८०।।
ॐ ह्रीं आत्म-बन्धविभेदक-श्रीसम्यग्ज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं…।।११९।।

अब, एक कलश द्वारा ‘आत्मा और बन्ध में भेदविज्ञान करनेवाले
ज्ञानीजन, किस प्रकार भेदज्ञान का पुरुषार्थ करते हैं?’ यह बताते हैं -

( हरिगीत )

सूक्ष्म अन्तःसन्धि में, अति तीक्ष्ण प्रज्ञाछैनी को।
अतिनिपुणता से डालकर, अतिनिपुणजन ने बन्ध को।।

( शिखरिणी )

द्विधाकृत्य प्रज्ञाक्रकचदलनाद् बन्धपुरुषौ, नयन्मोक्षं साक्षात्पुरुषमुपलम्भैकनियतम्।
इदानीमुन्मज्जत्सहजपरमानन्दसरसं, परं पूर्णं ज्ञानं कृतसकलकृत्यं विजयते।।१८०।।

अति भिन्न करके आतमा से, आतमा में जम गये।
वे ही विवेकी धन्य हैं, जो भव-जलधि से तिर गये ।।१८१।।
ॐ ह्रीं आत्म-बन्धद्विधाकारक-सम्यग्ज्ञानिनः महिमाप्रतिपादक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१२०।।
अब, ‘सामान्य चेतनास्वरूप एवं उनके भेदरूप दर्शन-ज्ञानचेतनास्वरूप
आत्मा के ग्रहण करने का उपदेश’, एक कलश में देते हैं-

( हरिगीत )

स्वलक्षणों के प्रबल बल से, भेदकर परभाव को।
चिद्भक्षणों से ग्रहण कर, चैतन्यमय निजभाव को ।।
यदि भेद को भी प्राप्त हो, गुण धर्म कारक आदि से।
तो भले हो पर मैं तो केवल, शुद्ध चिन्मय मात्र हूँ।।१८२।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञयैव चेतक-दृष्टा-ज्ञातास्वरूपाऽऽत्मग्राहक -श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १२१ ।।
अब, ‘चेतना के द्वैत-अद्वैत से ही आत्मस्वरूप की सिद्धि होती है’ - यह
बताते हुए चेतना के ग्रहण की प्रेरणा, एक कलश द्वारा देते हैं -

( स्रग्धरा )

प्रज्ञाछेत्री शितेयं कथमपि निपुणैः पातिता सावधानैः,
सूक्ष्मेऽन्तः सन्धिबन्धे निपतति रभसादात्मकर्मोभयस्य ।
आत्मानं मग्नमन्तःस्थिरविशदलसद्धाम्नि चैतन्यपूरे,
बन्धं चाज्ञानभावे नियमितमभितः कुर्वती भिन्नभिन्नौ ।। १८१ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

भित्त्वा सर्वमपि स्वलक्षणबलाद्भेत्तुं हि यच्छक्यते
चिन्मुद्रांकितनिर्विभागमहिमा शुद्धश्चिदेवास्म्यहम् ।
भिद्यन्ते यदि कारकाणि यदि वा धर्मा गुणा वा यदि
भिद्यन्तां न भिदास्ति काचन विभौ भावे विशुद्धे चिति ।। १८२ ।।
अर्ध्यावली : मोक्ष अधिकार

( हरिगीत )

है यद्यपि अद्वैत ही यह, चेतना इस जगत् में।
किन्तु फिर भी ज्ञान-दर्शन, भेद से दो रूप है।।
यह चेतना-दर्शन सदा, सामान्य अवलोकन करे।
पर ज्ञान जाने सब विशेषों, को तदपि निज में रहे।।
अस्तित्व ही ना रहे इनके, बिना चेतन द्रव्य का।
चेतना के बिना चेतन द्रव्य का अस्तित्व क्या?।।
चेतन नहीं बिन चेतना, चेतन बिना ना चेतना।
बस ! इसलिए हे आत्मन् ! इनमें सदा ही चेत ना ।।१८३।।
ॐ ह्रीं द्वैताद्वैतस्वरूपचेतनायाः ग्रहणग्राहणप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १२२।।
अब, ‘स्व-पर का भेद जाननेवाला ज्ञानी, पर को नहीं अपनाता है,’ -
यह एक कलश द्वारा कहते हैं -

(दोहा)

चिन्मय चेतनभाव है, पर हैं पर के भाव।
उपादेय चिद्भाव है, हेय सभी परभाव ।। १८४।।
ॐ ह्रीं परभावममत्वनिवारक -श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। १२३।।

( शार्दूलविक्रीडित )

अद्वैतापि हि चेतना जगति चेद् दृग्ज्ञप्तिरूपं त्यजेत्
तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्साऽस्तित्वमेव त्यजेत् ।
तत्त्यागे जडता चितोऽपि भवति व्याप्यो विना व्यापका-
दात्मा चान्तमुपैति तेन नियतं दृग्ज्ञप्तिरूपास्तु चित् ।। १८३ ।।

( इन्द्रवज्रा )

एकश्चितश्चिन्मय एव भावो, भावाः परे ये किल ते परेषाम् ।
ग्राह्यस्ततश्चिन्मय एव भावो, भावाः परे सर्वत एव हेयाः ।। १८४ ।।

अब, ‘मुमुक्षुओं को मोक्ष-प्रदायक किस सिद्धान्त का सेवन करना
चाहिए,’ यह कलश द्वारा कहते हैं -

( हरिगीत )

मैं तो सदा ही शुद्ध परमानन्द चिन्मयज्योति हूँ।
सेवन करें सिद्धान्त यह सब ही मुमुक्षु बन्धुजन ।।
जो विविध परभाव मुझमें दिखें वे मुझ से पृथक्।
वे मैं नहीं हूँ क्योंकि वे मेरे लिए परद्रव्य हैं ।। १८५।।
ॐ ह्रीं मोक्षप्रदायकसिद्धान्तप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। १२४।।
अब, ‘पर को ग्रहण करनेवाले अपराधी हैं, वे कर्म से बँधते हैं तथा
स्वद्रव्य में रत निरपराधी हैं, वे कर्म से नहीं बँधते हैं,’ - यह एक कलश में
कहते हैं -

( दोहा )

परग्राही अपराधिजन, बाँधे कर्म सदीव ।
स्व में ही संवृत्त जो, वे ना बँधे कदीव ।। १८६ ।।
ॐ ह्रीं परग्राही-अपराधी-बन्धकः स्वग्राही-निरपराधी-अबन्धकः इति प्ररूपक
-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १ २५ ।।
अब, आगामी कलश में ‘अपराध व निरपराध का फल’ बताते हैं -

( शार्दूलविक्रीडित )

सिद्धान्तोऽयमुदात्तचित्तचरितैः, मोक्षार्थिभिः सेव्यतां,
शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं, ज्योतिः सदैवास्म्यहम्।
एते ये तु समुल्लसन्ति विविधा, भावाः पृथग्लक्षणाः,
तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम पर-द्रव्यं समग्रा अपि ।। १८५ ।।

( अनुष्टुभ् )

परद्रव्यग्रहं कुर्वन्, बध्येतैवाऽपराधवान्।
बध्येताऽनपराधो न, स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ।। १८६ ।।
अर्ध्यावली : मोक्ष अधिकार

( हरिगीत )

जो सापराधी निरन्तर वे, कर्म-बन्धन कर रहे।
जो निरपराधी वे कभी भी, कर्म-बन्धन ना करें ।।
अशुद्ध जाने आतमा को, सापराधी जन सदा।
शुद्धात्म-सेवी निरपराधी, शान्ति सेवें सर्वदा ।।१८७।।
ॐ ह्रीं अपराध-निरपराधफलनिरूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।१२६।।
अब, ‘व्यवहार-प्रतिक्रमण की हेयता जानकर प्रमादी न होते हुए
आत्मध्यान में रत रहने की प्रेरणा’, आगामी कलश में आचार्यदेव देते हैं -

( हरिगीत )

अरे ! मुक्तिमार्ग में, चापल्य अर परमाद को ।
है नहीं कोई जगह, कोई और आलम्बन नहीं ।।
बस ! इसलिए ही जब तलक, आनन्दघन निज आतमा ।
की प्राप्ति न हो तब तलक तुम, नित्य ध्यावो आतमा ।। १८८।।
ॐ ह्रीं निष्प्रमादतया-आत्मध्यानप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १२७।।
अब आगामी तीन कलशों में कहते हैं कि ‘प्रमाद छोड़कर आत्म-लीन
ही रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करनेवाले मुनिवर ही बन्ध-मुक्त होते हैं’ -

( मालिनी )

अनवरतमनैस्तैर्बध्यते सापराधः
स्पृशति निरपराधो बन्धनं नैव जातु ।
नियतमयमशुद्धं स्वं भजन्सापराधो
भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी ।। १८७ ।।
( अज्ञात छन्द )
अतो हताः प्रमादिनो गताः सुखासीनतां,
प्रलीनं चापलमुन्मूलितमालम्बनम् ।
आत्मन्येवालानितं च चित्तमा-
सम्पूर्णविज्ञानघनोपलब्धेः ।। १८८ ।।

( रोला )

प्रतिक्रमण भी अरे ! जहाँ विष-जहर कहा हो।
अमृत कैसे कहें वहाँ अप्रतिक्रमण को ।।
अरे ! प्रमादी लोग अधोऽधः क्यों जाते हैं?।
इस प्रमाद को त्याग ऊर्ध्व में क्यों नहीं जाते?।।१८९।।

कषायभाव से आलस करना ही प्रमाद है।
यह प्रमाद का भाव शुद्ध कैसे हो सकता?।।
निजरस से परिपूर्ण भाव में अचल रहें जो।
अल्पकाल में वे मुनिवर ही बन्ध-मुक्त हों।।१९०।।

अरे ! अशुद्धता करनेवाले परद्रव्यों को।
अतः दूर से त्याग स्वयं में लीन रहें जो।।
अपराधों से दूर बन्ध का नाश करें वे।
शुद्धभाव को प्राप्त मुक्त हो जाते हैं वे।।१९१।।

ॐ ह्रीं निष्प्रमादतया स्वरसनिर्भरमुनय एव मुक्तिपात्राः इति प्ररूपक-श्रीसमयसार
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१२८।।

( वसन्ततिलका )

यत्र प्रतिक्रमणमेव विषं प्रणीतं, तत्राऽप्रतिक्रमणमेव सुधा कुतः स्यात् ।
तत्किं प्रमाद्यति जनः प्रपतन्नधोऽधः, किं नोर्ध्वमूर्ध्वमधिरोहति निष्प्रमादः ।। १८९ ।।

(पृथ्वी)
प्रमादकलितः कथं भवति शुद्धभावोऽलसः
कषायभरगौरवादलसता प्रमादो यतः ।
अतः स्वरसनिर्भरे नियमितः स्वभावे भवन्
मुनिः परमशुद्धतां व्रजति मुच्यते वाऽचिरात् ।। १९० ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

त्यक्त्वाऽशुद्धिविधायि तत्किल परद्रव्यं समग्रं स्वयं
स्वद्रव्ये रतिमेति यः स नियतं सर्वापराधच्युतः ।
बंधध्वंसमुपेत्य नित्यमुदितः स्वज्योतिरच्छोच्छल-
च्चैतन्यामृतपूरपूर्णमहिमा शुद्धो भवन्मुच्यते ।। १९१ ।।

अर्ध्यावली : मोक्ष अधिकार (जयमाला)
अब, पुनः अधिकार के अन्त में ‘बन्ध को छेद कर, मुक्ति का अनुभव
करनेवाले ज्ञान की महिमा’ करके उसकी स्तुति करते हैं -

( रोला )

बन्ध-छेद से मुक्त हुआ यह शुद्ध आतमा।
निजरस से गम्भीर धीर परिपूर्ण ज्ञानमय।।
उदित हुआ है अपनी महिमा में महिमामय।
अचल अनाकुल अज अखण्ड यह ज्ञानदिवाकर।।१९२।।

ॐ ह्रीं मोक्षप्रदायक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१२९।।

जयमाला

(दोहा)

बन्ध-मोक्ष अधिकार की, पूजन हुई पवित्र।
शान्ति प्राप्त सबको हुई, थे जितने भी भव्य।।१।।

( मानव )

कर्मों से नहीं बँधा मैं, न हिंसा से चेतन की।
तन-मन-वचनों से भी मैं, अब तक तो नहीं बँधा हूँ।।
पंचेन्द्रिय के भोगों से, बन्धन में नहीं पड़ा हूँ।
रागादिक भावों से ही, बन्धन में यहाँ पड़ा हूँ।।२।।

( मन्दाक्रान्ता )

बंधच्छेदात्कलयदतुलं मोक्षमक्षय्यमेत-
न्नित्योद्योतस्फुटितसहजावस्थमेकांतशुद्धम् ।
एकाकार-स्व-रस-भरतो ऽत्यंत गंभीर-धीरं
पूर्णं ज्ञानं ज्वलितमचले स्वस्य लीनं महिम्नि ।। १९२ ।।

यद्यपि यह सारी दुनिया, कर्मों से भरी हुई है।
केवलि का योग जगत् में, सबसे ज्यादा चलता है।।
जीवों का मरण जगत् में, तो होता ही रहता है।
भोगों को भी रागीजन, दिन-रात भोगते रहते ।।३।।
उनके कारण ज्ञानी को, रे ! बन्ध नहीं होता है।
रे ! राग-द्वेष से बँधते, सारे अज्ञानी जग में ।।
सारे संयोग मिलें पर, यदि राग-द्वेष ही ना हो।
तो बन्ध नहीं होता है, निर्बन्ध सदा वे रहते ।।४।।
अज्ञानी मिथ्यादृष्टि, भोगों में नहीं दिखे पर।
वे रागादिक होने से, बँधते हैं अरे ! निरन्तर ।।
कर्मादिक से ना बँधते, ना क्रियाकाण्ड से छूटें।
रागादिक से बँधते हैं, वैराग्यभाव से छूटें ।।५।।
यह निश्चित जानो भाई ! ना मारे कोई किसी को।
मरते हैं सभी समय पर, जीवित रहते जीवन भर ।।
रे ! आयुकर्म के क्षय से, मरते हैं सभी जनावर ।
अर आयुकर्म - उदय से, जीवित रहते हैं वे सब ।।६।।
सुख-दुःख अर जीना-मरना, करते हैं अपना-अपना ।
नहिं कोई किसी का करता, करते सब अपना-अपना ।।
अपने भावों की कर्ता-भोक्ता है सारी दुनिया।
अपने भावों के फल को, चखती है सारी दुनिया ।। ७।।
अर्ध्यावली : मोक्ष अधिकार (जयमाला)
यद्यपि यह बात सही है, कि कर्मोदय होता है।
अनुरूप उसी के सबका, परिणमन सदा होता है।।
यह बात भले हो लेकिन, अनुरूप परिणमन होता।
अनुरूप भले हो भाई, कर्मोदय कुछ नहिं करता ।।८।।
कर्मोदय कुछ नहीं करता, ना कर्मों से कुछ होता।
बस ! बात मात्र इतनी है, जब कार्य स्वयं है होता।।
उसके अनुकूल सदा ही, कर्मोदय भी है होता।
जब कार्य स्वयं होता तब, अनुकूल निमित भी होता ।।९।।
हों बन्ध-मोक्ष अपने से, कर्मों से कभी न होंगे।
हम पूरे उत्तरदायी, यह बात समझना भाई ! ।।
यह समझा करके सबको, अपनाना भी है भाई !।
हम पूरे उत्तरदायी, अब अधिक कहें क्या भाई !।।१०।।

(दोहा)

बन्धन का कारण अरे ! एकमात्र है राग।
राग-आग को त्याग कर, निज को निज में पाग।।११।।
ॐ ह्रीं बन्ध-मोक्षस्वरूपप्ररूपक-बन्धमोक्षाधिकारराभ्यां जयमाला पूर्णार्थ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

(दोहा)

इसप्रकार पूरण हुआ, बन्ध-मोक्ष अधिकार।
अब अगले अधिकार में, सर्वविशुद्धिद्वार ।।१२।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

प्रूफरीडिंग बाकी है

सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार पूजन

स्थापना

(दोहा)

उक्त भाव हैं स्वांग सब, सर्वविशुद्ध स्वभाव ।
स्वांग नहीं वह मूलतः, आतम-वस्तु स्वभाव ।।१।।
शुद्ध-बुद्ध चैतन्यघन, सब द्रव्यों से भिन्न ।
ज्ञान-स्वभावी आतमा, ही है सर्वविशुद्ध ।।२।।
स्वामी-कर्ता-भोक्ता, कोई भी सम्बन्ध ।
नहीं किसी से रंच भी, इसका नाम विशुद्ध ।।३।।
सर्वविशुद्ध इस ज्ञान की, महिमा अपरम्पार ।
यह आतम का रूप निज, इसका आर न पार ।।४।।
यही परम परमात्मा, यह देवन का देव।
इसकी महिमा अगम हम, करते इसकी सेव ।।५।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार! अत्र अवतर-
अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार !! अत्र तिष्ठ-
तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार !!! अत्र मम
सन्निहितो भव-भव वषट् । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

(वीर)

जल
यह जल मल-शोधक है प्रसिद्ध, यह अपना काम करेगा ही।
इससे क्या हम अभिलाष करें, जो होता है वह होगा ही ।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का ।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय जन्मजरामृत्यु
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन
शीतल चन्दन भव ताप हरे चन्दन सा शान्त आतमा है।
निज आतम का जो ध्यान धरे यह भी भव का संताप हरे ।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का ।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय संसारताप
विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
अक्षत अक्षतसम यह आतम, यह अज अखण्ड अविनाशी है।
इसके आश्रय से सुनो भव्य, पर्यय अक्षत हो जाती है।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
सुरतरु के पुष्पों के समान, यह आतम परम अहिंसक है।
इसके आश्रय से सुनो भव्य, होती पर्याय अहिंसक है।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय कामबाण
विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
नैवेद्य
मीठे पकवानों-सा मीठा यह, अरस आतमा रसमय है।
इस आतम के रस से अपना, जीवन हो जाता रसमय है।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय क्षुधारोग
विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दीप
ज्यों स्वपरप्रकाशक दीपक है, त्यों स्वपरप्रकाशक आतम है।
जो करे प्रकाश निजातम का, ऐसा आतम परमातम है।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय मोहान्धकार
विनाशयनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
कर्मों की दाहक इस दशांग से कर्म आज तक जले नहीं।
पर ध्यान-अग्नि से कर्मों की राशी जलने लग जाती है।।
यह सार समयसार का है यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय अष्टकर्म
दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
पुण्य-पाप का फल तो हरदम, जग में मिलता रहता है।
पुण्य-पाप से पार धर्म का फल, मुक्ति में मिलता है।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य

अष्टद्रव्यमय अर्घ्य अरे ! चरणों में अर्पण करता हूँ।
जो कुछ है मेरे पास प्रभो ! सब यहीं समर्पण करता हूँ।।
यह सार समयसार का है, यह है स्वभाव परमातम का।
सर्वविशुद्धज्ञान है यह, यह है स्वभाव निज आतम का ।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानस्वरूपप्ररूपक-सर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय अनर्घ्यपद
प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
अर्ध्यावली

( दोहा)

उक्त भाव हैं स्वांग सब, सर्वविशुद्धस्वभाव ।
स्वांग नहीं वह मूलतः, आतम-वस्तु स्वभाव ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के प्रारम्भ में आचार्य अमृतचन्द्रदेव, सर्वविशुद्धज्ञान को
रंगमंच पर प्रवेश कराके शुद्धात्मा की महिमास्वरूप मंगलाचरण करते हैं –

(रोला)

जिसने कर्तृ-भोक्तृभाव सब नष्ट कर दिये,
बन्ध-मोक्ष की रचना से जो सदा दूर है।
है अपार महिमा जिसकी टंकोत्कीर्ण जो;
ज्ञानपुंज वह शुद्धातम शोभायमान है ।।१९३।।
ॐ ह्रीं सर्वविशुद्धज्ञानपुंजस्वरूप-शुद्धात्मने नमः अर्घ्य… ।।१३०।।
सर्वप्रथम, ‘आत्मा का अकर्तृत्व-स्वभाव’, एक कलश में स्पष्ट करते
हैं -

(दोहा )

जैसे भोक्तृस्वभाव नहीं, वैसे कर्तृस्वभाव ।
कर्तापन अज्ञान से, ज्ञान अकारकभाव ।। १९४।।
ॐ ह्रीं आत्मनोऽकर्तृत्वस्वभावप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।१३१।।

( मन्दाक्रान्ता )

नीत्वा सम्यक् प्रलयमखिलान् कर्तृभोक्त्रादिभावान्
दूरीभूतः प्रतिपदमयं बंधमोक्षप्रक्लृप्तेः ।
शुद्धः शुद्धः स्वरसविसरापूर्णपुण्याचलार्चि-
ष्टंकोत्कीर्णप्रकटमहिमा स्फूर्जति ज्ञानपुंजः ।।१९३।।

( अनुष्टुभ् )

कर्तृत्वं न स्वभावोऽस्य, चितो वेदयितृत्ववत् ।
अज्ञानादेव कर्ताऽयं, तदभावादकारकाः ।। १९४ ।।

अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘यद्यपि आत्मा अकर्ता है, फिर
भी उसे बन्ध हो रहा है, यह अज्ञान की ही महिमा है’ -

( रोला )

निजरस से सुविशुद्ध जीव शोभायमान है।
झलके लोकालोक ज्योति स्फुरायमान है।।
अहो ! अकर्ता आतम फिर भी बन्ध हो रहा।
यह अपार महिमा जानो अज्ञानभाव की ।।१९५।।
ॐ ह्रीं अज्ञानमहिमाप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। १३२।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘आत्मा, अज्ञान से भोक्ता बनता
है, ज्ञान से अभोक्ता ही है’ -

( दोहा )

जैसे कर्तृस्वभाव नहीं, वैसे भोक्तृस्वभाव ।
भोक्तापन अज्ञान से, ज्ञान अभोक्ताभाव ।।१९६ ।।
ॐ ह्रीं अभोक्तास्वभावप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। १३३।।
आगामी एक कलश में कहते हैं कि 'प्रकृति-स्वभाव-स्थित अज्ञानी
भोक्ता है और प्रकृति-स्वभाव-विरत ज्ञानी अभोक्ता है; अतः अज्ञानभाव
छोड़कर शुद्धात्ममय ज्ञानभाव को अपनाने की प्रेरणा देते हैं -

( शिखरिणी )

अकर्ता जीवोऽयं स्थित इति विशुद्धः स्वरसतः
स्फुरच्चिज्ज्योतिर्भिश्छुरितभुवनाभोगभवनः ।
तथाप्यस्यासौ स्याद्यदिह किल बंधः प्रकृतिभिः
स खल्वज्ञानस्य स्फुरति महिमा कोऽपि गहनः ।। १९५ ।।

( अनुष्टुभ् )

भोक्तृत्वं न स्वभावोऽस्य, स्मृतः कर्तृत्ववच्चितः ।
अज्ञानादेव भोक्ताऽयं, तदभावादवेदकः ।। १९६।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार

( रोला )

प्रकृतिस्वभावरत अज्ञानी हैं सदा भोगते ।
प्रकृतिस्वभाव से विरत ज्ञानिजन कभी न भोगें ।।
निपुणजनों ! निजशुद्धातममय ज्ञानभाव को ।
अपनाओ तुम सदा, त्याग अज्ञानभाव को ।।१९७।।
ॐ ह्रीं शुद्धात्ममयज्ञानभावप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १३४।।
अब एक कलश में यह सुनिश्चित करते हैं कि ‘अज्ञानी विषय-भोगों
का भोक्ता है और ज्ञानी भोक्ता नहीं है, अभोक्ता ही है’ -

( सोरठा )

निश्चल शुद्धस्वभाव, ज्ञानी करे न भोगवे ।
जाने कर्मस्वभाव, इस कारण वह मुक्त है ।। १९८।।
ॐ ह्रीं अज्ञानिनः वेदकः - ज्ञानिनोऽवेदकश्चेति-स्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१३५।।
अब, एक कलश में यह कहते हैं कि ‘कर्तृत्व के अज्ञान सहित
मुमुक्षुओं को भी सामान्यजनों की तरह मोक्ष नहीं होता’ -

( हरिगीत )

निज आतमा ही करे सबकुछ, मानते अज्ञान से।
हों यद्यपि वे मुमुक्षु पर, रहित आतमज्ञान से ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

अज्ञानी प्रकृतिस्व भावनिरतो नित्यं भवेद्वेदको;
ज्ञानी तु प्रकृतिस्व भावविरतो नो जातुचिद्वेदकः ।
इत्येवं नियमं निरूप्य निपुणैरज्ञानिता त्यज्यतां,
शुद्धैकात्ममये महस्यचलितैरासेव्यतां ज्ञानिता ।। १९७ ।।

( वसन्ततिलका )

ज्ञानी करोति न न वेदयते च कर्म; जानाति केवलमयं किल तत्स्वभावम्।
जानन्परं करणवेदनयोरभावात्, शुद्धस्वभावनियतः स हि मुक्त एव ।। १९८ ।।

अध्ययन करें, चारित्र पालें, और भक्ति करें पर।
लौकिकजनों वत् उन्हें भी तो, मुक्ति की प्राप्ति न हो ।।१९९।।
ॐ ह्रीं परकर्तृत्वसद्भावे मुमुक्षुणामपि मोक्षाऽभावप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१३६।।
अब ‘आत्मा, परद्रव्यों का कर्ता क्यों नहीं है?’ यह एक कलश में
सतर्क सिद्ध करते हैं -

( दोहा )

जब कोई सम्बन्ध ना, पर अरु आतम माँहि ।
तब कर्ता परद्रव्य का, किसविध आत्म कहाँहि ।। २००।।
ॐ ह्रीं परद्रव्याऽऽत्मत्त्वयोः सर्वसम्बन्धप्रतिषेधक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १३७।।
अब, पुनः कहते हैं कि ‘जब दो द्रव्यों के बीच कोई सम्बन्ध ही नहीं है
तो कर्ता-कर्मभाव कैसे हो सकता है? अतः अपने को अकर्ता ही जानें’ -

( रोला )

जब कोई सम्बन्ध नहीं है दो द्रव्यों में।
तब फिर कर्ता-कर्मभाव भी कैसे होगा?।।
इसीलिए तो मैं कहता हूँ निज को जानो।
सदा अकर्ता अरे जगतजन ! अरे मुनिजन !!।। २०१।।
ॐ ह्रीं सर्वजन-अकर्तृत्वप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।। १३८ ।।

( अनुष्टुभ् )

ये तु कर्तारमात्मानं, पश्यन्ति तमसा तताः ।
सामान्यजनवत्तेषां, न मोक्षोऽपि मुमुक्षुताम् ।। १९९ ।।

( अनुष्टुभ् )

नास्ति सर्वोऽपि सम्बन्धः, परद्रव्यात्मतत्त्वयोः ।
कर्तृकर्मत्वसम्बन्धाऽभावे तत्कर्तृता कुतः ।। २००।।

( वसन्ततिलका )

एकस्य वस्तुन इहाऽन्यतरेण सार्धं, सम्बन्ध एव सकलोऽपि यतो निषिद्धः।
तत्कर्तृकर्मघटनास्ति न वस्तुभेदे, पश्यन्त्वकर्तृ मुनयश्च जनाश्च तत्त्वम्।। २०१ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
अब, ‘वस्तु-स्वभाव को नहीं जाननेवाले अज्ञानी ही भावकर्म के कर्ता
होते हैं,’ ऐसा एक कलश द्वारा कहते हैं -

( रोला )

इस स्वभाव के सहज नियम जो नहीं जानते,
अरे बिचारे ! वे तो डूबे भवसागर में।
विविध कर्म को करते हैं बस इसीलिए वे,
भावकर्म के कर्ता होते अन्य कोई ना ।। २०२।।
ॐ ह्रीं वस्तुस्वभावाऽज्ञायकानामेव भावकर्मकर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१३९।।
आगामी एक कलश में सतर्क यह सिद्ध करते हैं कि ‘जीव के भावकर्मों
का कर्ता जीव ही है, अचेतन-कर्म-प्रकृति नहीं’ -

( रोला )

अरे ! कार्य कर्ता के बिन नहीं हो सकता।
भावकर्म भी एक कार्य है सब जग जाने।।
और पौद्गलिक प्रकृति सदा ही रही अचेतन ।
वह कैसे कर सकती चेतन भावकर्म को ?।।
प्रकृति-जीव दोनों ही मिलकर उसे करें यदि।
तो फिर दोनों मिलकर ही फल क्यों ना भोगें ? ।।
भावकर्म तो चेतन का ही करे अनुसरण।
इसकारण यह जीव कहा है उनका कर्ता ।। २०३।।
ॐ ह्रीं जीवस्य भावकर्मकर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१४०।।

( वसन्ततिलका )

ये तु स्वभावनियमं कलयन्ति नेम-, मज्ञान-मग्नमहसो बत ते वराकाः ।
कुर्वन्ति कर्म तत एव हि भावकर्म, कर्ता स्वयं भवति चेतन एव नान्यः ।। २०२ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

कार्यत्वादकृतं न कर्म न च तज्जीवप्रकृत्योर्द्वयो-
रज्ञायाः प्रकृतेः स्वकार्यफलभुग्भावानुषंगात्कृतिः ।
नैकस्याः प्रकृतेरचित्त्वलसनाज्जीवोऽस्य कर्ता ततो
जीवस्यैव च कर्म तच्चिदनुगं ज्ञाता न यत्पुद्गलः ।। २०३ ।।

अब, ‘सांख्यमत के समान, आत्मा को सर्वथा अकर्ता माननेवालों को
कर्तृत्व के सम्बन्ध में जैनदर्शन के स्याद्वाद का स्पष्टीकरण’ एक कलश में
करते हैं -

( रोला )

कोई कर्ता मान कर्म को भावकर्म का,
आतम का कर्तृत्व उड़ाकर अरे ! सर्वथा ।
और कथंचित् कर्ता आतम कहनेवाली;
स्याद्वादमय जिनवाणी को कोपित करते ।।
उन्हीं मोहमोहितमतिवाले अल्पज्ञों के,
सम्बोधन के लिए सहेतुक स्याद्वादमय ।
वस्तु का स्वरूप समझाते अरे ! भव्यजन !,
अब आगे की गाथाओं में कुन्दकुन्द मुनि ।। २०४।।
ॐ ह्रीं जीवस्य कथञ्चित् कर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।१४१।।
अब, पुनः ‘कर्तृत्व के सम्बन्ध में स्याद्वाद का अनुसरण करने की
प्रेरणा’ कलश द्वारा देते हैं -

( रोला )

अरे ! जैन होकर भी सांख्यों के समान ही,
इस आतम को सदा अकर्ता तुम मत मानो ।
भेदज्ञान के पूर्व राग का कर्ता आतम;
भेदज्ञान होने पर सदा अकर्ता जानो ।। २०५।।
ॐ ह्रीं कर्तृत्वसम्बन्धी-स्याद्वादग्रहणप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।१४२।।

( शार्दूलविक्रीडित )

कर्मैव प्रवितर्क्स कर्तृ हतकैः क्षिप्त्वात्मनः कर्तृतां
कर्तात्मैष कथंचिदित्यचलिता कैश्चिच्छ्रुतिः कोपिता ।
तेषामुद्धतमोहमुद्रितधियां बोधस्य संशुद्धये
स्याद्वादप्रतिबंधलब्धविजया वस्तुस्थितिः स्तूयते ।। २०४ ।।
माऽकर्तारममी स्पृशन्तु पुरुषं सांख्या इवाप्यार्हताः
कर्तारं कलयंतु तं किल सदा भेदावबोधादधः ।
ऊर्ध्वं तूद्धतबोधधामनियतं प्रत्यक्षमेनं स्वयं
पश्यन्तु च्युतकर्तृभावमचलं ज्ञातारमेकं परम् ।। २०५ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
अब, ‘बौद्धमत के समान आत्मा को सर्वथा क्षणिक मानकर, स्वकर्तृत्व
स्वीकार करते हुए भी स्वभोक्तृत्व नकारने वाले अज्ञानियों को’ दो कलशों
में समझाते हैं -

( रोला )

जो कर्ता वह नहीं भोगता इस जगती में,
ऐसा कहते कोई आत्मा क्षणिक मानकर ।
नित्यरूप से सदा प्रकाशित स्वयं आतमा,
मानो उनका मोह निवारण स्वयं कर रहा ।। २०६।।

( सोरठा )

वृत्तिमान हो नष्ट, वृत्त्यंशों के भेद से।
कर्ता-भोक्ता भिन्न, इस भय से मानो नहीं ।। २०७।।
ॐ ह्रीं कर्तृत्व-भोक्तृत्वसम्बन्धी-अन्यत्वाऽनन्यत्वाऽनेकान्तप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १४३।।
अब, आत्मा को सर्वथा क्षणिक न मानकर, अभेद आत्मा के अनुभव
की प्रेरणा देते हैं -

( रोला )

यह आतम है क्षणिक क्योंकि यह परमशुद्ध है।
जहाँ काल की भी उपाधि की नहीं अशुद्धि ।।

(मालिनी )

क्षणिकमिदमिहैकः कल्पयित्वात्मतत्त्वं
निजमनसि विधत्ते कर्तृभोक्त्रोर्विभेदम् ।
अपहरति विमोहं तस्य नित्यामृतौघैः
स्वयमयमभिषिंचश्चिच्चमत्कार एव ।। २०६ ।।

( अनुष्टुभ् )

वृत्त्यंशभेदतोऽत्यंतं वृत्तिमन्नाशकल्पनात् ।
अन्यः करोति भुंक्तेऽन्य इत्येकांतश्चकास्तु मा ।। २०७ ।।

इसी धारणा से छूटा त्यों नित्य आतमा ।
ज्यों डोरा बिन मुक्तामणि से हार न बनता ।।२०८।।
कर्ता-भोक्ता में अभेद हो युक्तिवश से,
भले भेद हो अथवा दोनों ही न होवें।
ज्यों मणियों की माला भेदी नहीं जा सके,
त्यों अभेद आतम का अनुभव हमें सदा हो ।।२०९।।
ॐ ह्रीं अभेद-आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।१४४।।
अब, दो कलशों और में कहते हैं कि ‘दो भिन्न द्रव्यों के बीच कर्ता-
कर्मपना व भोक्ता-भोग्यपना मात्र व्यवहार से ही कहा जाता है; निश्चय से तो
यह सब एक द्रव्य में ही होता है’ -

( दोहा )

अरे ! मात्र व्यवहार से, कर्म रु कर्ता भिन्न ।
निश्चयनय से देखिये, दोनों सदा अभिन्न ।।२१०।।
अरे ! कभी होता नहीं, कर्ता के बिन कर्म।
निश्चय से परिणाम ही, परिणामी का कर्म।।

( शार्दूलविक्रीडित )

आत्मानं परिशुद्धमीप्सुभिरतिव्याप्तिं प्रपद्यान्धकैः
कालोपाधिबलादशुद्धिमधिकां तत्रापि मत्वा परैः ।
चैतन्यं क्षणिकं प्रकल्प्य प्रथुकैः शुद्धर्जुसूत्रे रतै-
रात्मा व्युज्झित एष हारवदहो निःसूत्रमुक्तेक्षिभिः ।। २०८ ।।
कर्तुर्वेदयितुश्च युक्तिवशतो भेदोऽस्त्वभेदोऽपि वा
कर्ता वेदयिता च मा भवतु वा वस्त्वेव संचिन्त्यताम् ।
प्रोता सूत्र इवात्मनीह निपुणैर्भेत्तुं न शक्या क्वचि-
च्चिच्चन्तामणिमालिकेयमभितोऽप्येका चकास्त्वेव नः ।। २०९ ।।
( रथोद्धता )
व्यावहारिकदृशैव केवलं कर्तृ कर्म च विभिन्नमिष्यते ।
निश्चयेन यदि वस्तु चिंत्यते कर्तृ कर्म च सदैकमिष्यते ।। २१० ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
सदा बदलता ही रहे, यह परिणामी द्रव्य ।
एकरूप रहती नहीं, वस्तु की थिति नित्य ।।२११।।
ॐ ह्रीं कर्तृ-कर्म-भोक्तृ-भोग्य-भेदाऽभेदप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १४५।।
‘निश्चयनय का यह कथन परम सत्य है कि कोई भी वस्तु अन्य वस्तु
की कर्ता-भोक्ता नहीं है,’ ऐसा सतर्क तीन कलशों में कहते हैं -

( रोला )

यद्यपि आतमराम शक्तियों से है शोभित ।
और लोटता बाहर-बाहर परद्रव्यों के ।।
पर प्रवेश पा नहीं सकेगा उन द्रव्यों में।
फिर भी आकुल-व्याकुल होकर क्लेश पा रहा।। २१२।।
एक वस्तु हो नहीं कभी भी अन्य वस्तु की।
वस्तु वस्तु की ही है - ऐसा निश्चित जानो ।।
ऐसा है तो अन्य वस्तु यदि बाहर लोटे।
तो फिर वह क्या कर सकती है अन्य वस्तु का ।। २१३।।
स्वयं परिणमित एक वस्तु यदि परवस्तु का।
कुछ करती है - ऐसा जो माना जाता है।।
(नर्दटक)
ननु परिणाम एव किल कर्म विनिश्चयतः
स भवति नापरस्य परिणामिन एव भवेत् ।
न भवति कर्तृशून्यमिह कर्म न चैकतया
स्थितिरिह वस्तुनो भवतु कर्तृ तदेव ततः ।। २११ ।।
(पृथ्वी)
बहिर्लुठति यद्यपि स्फुटदनंतशक्तिः स्वयं
तथाप्यपरवस्तुनो विशति नान्यवस्त्वन्तरम् ।
स्वभावनियतं यतः सकलमेव वस्त्विष्यते
स्वभावचलनाकुलः किमिह मोहितः क्लिश्यते ।। २१२ ।।
( रथोद्धता )
वस्तु चैकमिह नान्यवस्तुनो येन तेन खलु वस्तु वस्तु तत् ।
निश्चयोऽयमपरोऽपरस्य कः किं करोति हि बहिर्लुठन्नपि ।। २१३ ।।

वह केवल व्यवहार कथन है निश्चय से तो।
एक दूसरे का कुछ करना शक्य नहीं है ।। २१४।।
ॐ ह्रीं निश्चयतः परवस्तुनोऽकर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १४६ ।।

इसप्रकार ‘कर्ता-कर्म और भोक्ता-भोग्य सम्बन्धी व्यवहार का निषेध’
करने के बाद, अब दो कलशों में ‘ज्ञाता-ज्ञेय सम्बन्धी व्यवहार का भी
निषेध’ करते हैं

(रोला)

एक द्रव्य में अन्य द्रव्य रहता हो - ऐसा;
भासित कभी नहीं होता है ज्ञानीजन को ।।
शुद्धभाव का उदय ज्ञेय का ज्ञान, न जाने।
फिर भी क्यों अज्ञानीजन आकुल होते हैं ? ।। २१५।।

शुद्धद्रव्य का निजरसरूप परिणमन होता।
वह पररूप या पर उसरूप नहीं हो सकते ।।
अरे ! चाँदनी की ज्यों भूमि नहीं हो सकती।
त्यों ही कभी नहीं हो सकते ज्ञेय ज्ञान के ।।२१६।।
ॐ ह्रीं ज्ञाता-ज्ञेय-व्यवहारनिषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।। १४७।।

( रथोद्धता )
यत्तु वस्तु कुरुतेऽन्यवस्तुनः किंचनापि परिणामिनः स्वयम् ।
व्यावहारिकदृशैव तन्मतं नान्यदस्ति किमपीह निश्चयात् ।। २१४ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

शुद्धद्रव्यनिरूपणार्पितमतेस्तत्त्वं समुत्पश्यतो,
नैकद्रव्यगतं चकास्ति किमपि द्रव्यान्तरं जातुचित् ।
ज्ञानं ज्ञेयमवैति यत्तु तदयं शुद्धस्वभावोदयः,
किं द्रव्यांतरचुंबनाकुलधियस्तत्त्वाच्च्यवंते जनाः ।। २१५ ।।

( मन्दाक्रान्ता )

शुद्धद्रव्यस्वरसभवनात्किं स्वभावस्य शेष-
मन्यद्धव्यं भवति यदि वा तस्य किं स्यात्स्वभावः।
ज्योत्सनारूपं स्नपयति भुवं नैव तस्यास्ति भूमि
र्ज्ञानं ज्ञेयं कलयति सदा ज्ञेयमस्यास्ति नैव ।। २१६ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
अब, 'ज्ञान-ज्ञेय का भेद जानकर, राग-द्वेष का नाश करके पूर्ण ज्ञान-
मय होने की प्रेरणा देते हुए कलश कहते हैं -

( रोला )

तबतक राग-द्वेष होते हैं जबतक भाई !
ज्ञान-ज्ञेय का भेद ज्ञान में उदित नहीं हो।।
ज्ञान-ज्ञेय का भेद समझकर राग-द्वेष को,
मेट पूर्णतः पूर्ण ज्ञानमय तुम हो जावो ।। २१७।।
ॐ ह्रीं ज्ञान-ज्ञेय-भेदज्ञानप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।१४८।।

‘तत्त्वदृष्टि से देखा जाए तो राग-द्वेषादि भाव, अज्ञान के अतिरिक्त कुछ
भी नहीं हैं, अतः उनका क्षय करने की प्रेरणा’ कलश द्वारा देते हैं -

( रोला )

यही ज्ञान अज्ञानभाव से राग-द्वेषमय ।
हो जाता पर तत्त्वदृष्टि से वस्तु नहीं ये ।।
तत्त्वदृष्टि के बल से क्षयकर इन भावों को।
हो जाती है अचल सहज यह ज्योति प्रकाशित ।। २१८।।
ॐ ह्रीं तत्त्वदृष्ट्या राग-द्वेष-क्षपणप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।। १४९।।

(मन्दाक्रान्ता)

रागद्वेषद्वयमुदयते तावदेतत्र यावत्
ज्ञानं ज्ञानं भवति न पुनर्बोध्यतां याति बोध्यम् ।
ज्ञानं ज्ञानं भवतु तदिदं न्यक्कृताज्ञानभावं
भावाभावौ भवति तिरयन् येन पूर्णस्वभावः ।। २१७ ।।

रागद्वेषाविह हि भवति ज्ञानमज्ञानभावात्
तौ वस्तुत्वप्रणिहितदृशा दृश्यमानौ न किंचित् ।
सम्यग्दृष्टिः क्षपयतु ततस्तत्त्वदृष्ट्या स्फुटं तौ
ज्ञानज्योतिज्वलति सहजं येन पूर्णाचलार्चिः ।। २१८ ।।

अब, आगामी एक कलश में यह कहते हैं कि ‘राग-द्वेष आदि भावों का
कर्ता, अन्य द्रव्य नहीं हो सकता’ -

( रोला )

तत्त्वदृष्टि से राग-द्वेष भावों का भाई।
कर्ता-धर्ता कोई अन्य नहीं हो सकता ।।
क्योंकि है अत्यन्त प्रगट यह बात जगत् में।
द्रव्यों का उत्पाद स्वयं से ही होता है।।२१९।।
ॐ ह्रीं रागादीनामुत्पादकं परद्रव्यं नास्तीतिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१५०।।
‘जो रागादि की उत्पत्ति में परद्रव्यों का ही दोष देखते हैं, वे अज्ञानी मोह
-नदी को पार नहीं करते’; यह बात आगामी दो कलशों में कहते हैं -

(रोला)

राग-द्वेष पैदा होते हैं इस आतम में।
उसमें परद्रव्यों का कोई दोष नहीं है।।
यह अज्ञानी अपराधी है इनका कर्ता ।
यह अबोध हो नष्ट कि मैं तो स्वयं ज्ञान हूँ।। २२०।।
अरे राग की उत्पत्ति में परद्रव्यों को ।
एकमात्र कारण बतलाते जो अज्ञानी ।।
( शालिनी )
रागद्वेषोत्पादकं तत्त्वदृष्ट्या नान्यद्रव्यं वीक्ष्यते किंचनापि ।
सर्वद्रव्योत्पत्तिरन्तश्चकास्ति व्यक्तात्यंतं स्वस्वभावेन यस्मात् ।। २१९ ।।

( मालिनी )

यदिह भवति रागद्वेषप्रसूतिः
कतरदपि परेषां दूषणं नास्ति तत्र ।
स्वयमयमपराधी तत्र सर्पत्यबोधा
भवतु विदितमस्तं यात्वबोधोऽस्मि बोधः ।। २२० ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
शुद्धबोध से विरहित वे अन्धे जन जग में।
अरे ! कभी भी मोहनदी से पार न होंगे ।। २२१।।
ॐ ह्रीं रागाद्युत्पत्तौ परद्रव्यदूषण-निषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। १५१।।
अब, एक कलश में ‘परज्ञेयों को जानने व नहीं जानने, इन दोनों
स्थितियों में सहजता धारण करने की तर्कसहित प्रेरणा’ देते हैं -

( रोला )

जैसे दीपक दीप्य वस्तुओं से अप्रभावित ।
वैसे ही ज्ञायक ज्ञेयों से विकृत न हो ।।
फिर भी अज्ञानीजन क्यों असहज होते हैं ?।
न जाने क्यों व्याकुल हो विचलित होते हैं ।। २२२।।
ॐ ह्रीं परज्ञेयप्रति-सहजज्ञातृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। १५२।।
‘अपने स्वभाव का नित्य स्पर्श करनेवाले ज्ञानी, चारित्र के बल से कर्म-
चेतना व कर्मफल-चेतना से रहित होकर, ज्ञान-चेतना को प्राप्त होते हैं’, यह
आगामी कलश में कहते हैं -
( रथोद्धता )
रागजन्मनि निमित्ततां परद्रव्यमेव कलयंति ये तु ते।
उत्तरंति न हि मोहवाहिनीं शुद्धबोधविधुरांधबुद्धयः ।। २२१ ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

पूर्णैकाच्युतशुद्धबोधमहिमा बोधो न बोध्यादयं
यायात्कामपि विक्रियां तत इतो दीपः प्रकाश्यादिव ।
तद्वस्तुस्थितिबोधवंध्यधिषणा एते किमज्ञानिनो
रागद्वेषमयी भवंति सहजां मुंचन्त्युदासीनताम् ।। २२२ ।।

( रोला )

राग-द्वेष से रहित भूत-भावी कर्मों से।
मुक्त स्वयं को वे नित ही अनुभव करते हैं।।
और स्वयं में रत रह ज्ञानमयी चेतनता ।
को धारण कर निज में नित्य मगन रहते हैं।। २२३।।
ॐ ह्रीं कर्मचेतना-कर्मफलचेतना-रहित-ज्ञानचेतनाप्रेरक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १५३।।
‘अज्ञान-चेतना बन्ध की कर्ता होने से हेय है, अतः ज्ञान-चेतना का ही
अनुसरण करने की प्रेरणा’ इस कलश में दे रहे हैं -

(रोला)

ज्ञान-चेतना शुद्ध ज्ञान को करे प्रकाशित ।
शुद्ध ज्ञान को रोके नित अज्ञान-चेतना ।।
और बन्ध की कर्ता यह अज्ञान-चेतना ।
यही जान, चेतो आतम नित ज्ञान-चेतना ।। २२४।।
ॐ ह्रीं अज्ञानचेतना-रहित-ज्ञानचेतनाप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १५४।।
अब, ‘भूत-वर्तमान-भविष्य के सभी कर्मों से संन्यास की भावना हेतु
निश्चयप्रतिक्रमण-आलोचना-प्रत्याख्यानपूर्वक परमशुद्धनिश्चयनय के
विषयभूत शुद्ध-बुद्ध-चैतन्यमय आत्मा में ही रमण करने की भावना’ पाँच
कलशों में भाते हैं -

( शार्दूलविक्रीडित )

रागद्वेषविभावमुक्तमहसो नित्यं स्वभावस्पृशः
पूर्वागामिसमस्तकर्मविकला भिन्नास्तदात्वोदयात् ।
दूरा-रूढ-चरित्र-वैभव-बला-च्चंचच्चि दर्चिमयीं
विंदन्ति स्वरसाभिषिक्तभुवनां ज्ञानस्य संचेतनाम् ।। २२३ ।।
( उपजाति )
ज्ञानस्य संचेतनयैव नित्यं, प्रकाशते ज्ञानमतीव शुद्धम् ।
अज्ञानसंचेतनया तु धावन्, बोधस्य शुद्धिं निरुणद्धि बन्धः ।। २२४ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार

( रोला )

भूत भविष्यत् वर्तमान के सभी कर्म कृत- ।
कारित अर अनुमोदनादि मैं सभी ओर से ।।
सबका कर परित्याग हृदय से वचन-काय से।
अवलम्बन लेता हूँ परम निष्कर्मभाव से ।। २२५।।
मोहभाव से भूतकाल में कर्म किये जो।
उन सबका ही प्रतिक्रमण करके अब मैं तो ।।
वर्त रहा हूँ अरे ! निरन्तर स्वयं स्वयं के।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य परम निष्कर्म आत्म में ।। २२६ ।।
मोहभाव से वर्तमान में कर्म किये जो।
उन सबका आलोचन करके ही अब मैं तो ।।
वर्त रहा हूँ अरे ! निरन्तर स्वयं स्वयं के।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य परम निष्कर्म आत्म में ।। २२७।।
नष्ट हो गया मोहभाव जिसका ऐसा मैं।
करके प्रत्याख्यान भाविकर्मों का अब तो ।।
वर्त रहा हूँ अरे ! निरन्तर स्वयं स्वयं के।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य परम निष्कर्म आत्म में ।। २२८।।
( आर्या )
कृतकारितानुमननैस्त्रिकालविषयं मनोवचनकायैः ।
परिहृत्य कर्म सर्वं परमं नैष्कर्म्यमवलम्बे ।। २२५ ।।
मोहाद्यदहमकार्षं समस्तमपि कर्म तत्प्रतिक्रम्य ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।। २२६ ।।
मोहविलासविजृम्भितमिदमुदयत्कर्म सकलमालोच्य ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।। २२७ ।।
प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्म समस्तं निरस्तसंमोहः ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।। २२८ ।।

तीन काल के सब कर्मों को छोड़ इसतरह ।
परमशुद्धनिश्चयनय का अवलम्बन लेकर ।।
निर्मोही हो वर्त रहा हूँ स्वयं स्वयं के।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य परम निष्कर्म आत्म में ।। २२९।।
ॐ ह्रीं सकलकर्मसंन्यासहेतु-शुद्धबुद्धचैतन्याऽऽत्मावलम्बनप्रेरक-श्रीसमयसार
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१५५।।
अब, ‘कर्मफल के संन्यास की भावना’ चार कलशों में भाते हैं

( रोला )

कर्म वृक्ष के विषफल मेरे बिन भोगे ही।
खिर जायें बस ! यही भावना भाता हूँ मैं ।।
क्योंकि मैं तो वर्त रहा हूँ स्वयं स्वयं के।
शुद्ध बुद्ध चैतन्य परम निष्कर्म आत्म में ।। २३०।।
सब कर्मों के फल से संन्यासी होने से।
आतम से अतिरिक्त प्रवृत्ति से निवृत्त होकर ।।
चिद्भक्षण आतम को अतिशय भोग रहा हूँ।
यह प्रवृत्ति ही बनी रहे बस ! अमितकाल तक ।। २३१।।

( वसन्ततिलका )

रे ! पूर्वभावकृत कर्म-जहर-तरु के।
अज्ञानमय फल नहीं जो भोगते हैं ।।
( उपजाति)
समस्तमित्येवमपास्य कर्म त्रैकालिकं शुद्धनयावलंबी ।
विलीनमोहो रहितं विकारैश्चिन्मात्रमात्मानमथावलंबे ।। २२९ ।।
( आर्या)
विगलन्तु कर्मविषतरुफलानि मम भुक्तिमन्तरेणैव ।
संचेतयेऽहमचलं, चैतन्यात्मानमात्मानम् ।। २३०।।

( वसंततिलका )

निःशेषकर्मफलसंन्यसनान्ममैवं सर्वक्रियांतरविहारनिवृत्तवृत्तेः ।
चैतन्यलक्ष्म भजतो भृशमात्मतत्त्वं कालावलीयमचलस्य वहत्वनंता ।। २३१ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
अर तृप्त स्वयं में चिरकाल तक वे।
निष्कर्म सुखमय दशा को भोगते हैं ।। २३२।।
रे ! कर्मफल से संन्यास लेकर ।
सद्ज्ञान-चेतना को निज में नचाओ ।।
प्याला पियो नित प्रशमरस का निरन्तर ।
सुख में रहो अभी से चिरकाल तक तुम ।। २३३।।
ॐ ह्रीं सकलकर्मफलसंन्यासहेतु-ज्ञानचेतनाप्रेरक-श्रीसमयसारकलश
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १५६।।
अब ज्ञेय पदार्थों से एकत्व-ममत्व का निषेध’, एक कलश में करते हैं

( दोहा )

अपने में ही मगन है, अचल अनाकुल ज्ञान।
यद्यपि जाने ज्ञेय को, तदपि भिन्न ही जान ।। २३४।।
ॐ ह्रीं सकलज्ञेयपदार्थ-भेदविज्ञानप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १५७।।
‘आत्मा, त्यागोपादानशून्यत्वशक्ति से सम्पन्न होने के कारण, वास्तव में
पर का ग्रहण और त्याग तो करता ही नहीं है; अतः स्वयं में जमने-रमनेरूप
शुद्धोपयोग ही निश्चय प्रतिक्रमणादि हैं’, ऐसा दो कलशों में कहते हैं

( वसंततिलका )

यः पूर्वभावकृतकर्मविषद्रुमाणां भुंक्ते फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः ।
आपातकालरमणीयमुदर्करम्यं निष्कर्मशर्ममयमेति दशांतरं सः ।। २३२ ।।

( स्रग्धरा )

अत्यंतं भावयित्वा विरतिमविरतं कर्मणस्तत्फलाच्च
प्रस्पष्टं नाटयित्वा प्रलयनमखिलाज्ञानसंचेतनायाः ।
पूर्णं कृत्वा स्वभावं स्वरसपरिगतं ज्ञानसंचेतनां स्वां
सानंदं नाटयंतः प्रशमरसमितः सर्वकालं पिबंतु ।। २३३ ।।
( वंशस्थ )
इतः पदार्थप्रथनावगुंठनाद् विना कृतेरेकमनाकुलं ज्वलत् ।
समस्तवस्तुव्यतिरेकनिश्चयाद्विवेचितं ज्ञानमिहावतिष्ठते ।। २३४ ।।

( हरिगीत )

है अन्य द्रव्यों से पृथक्, विरहित ग्रहण अर त्याग से।
यह ज्ञाननिधि निज में नियत, वस्तुत्व को धारण किये।।
है आदि-अन्त विभाग-विरहित, विस्फुरित आनन्दघन ।
हो सहज महिमा प्रभाभास्वर, शुद्ध अनुपम ज्ञानघन ।। २३५।।
जिनने समेटा स्वयं ही, सब शक्तियों को स्वयं में।
सब ओर से धारण किया हो, स्वयं को ही स्वयं में ।।
मानो उन्हीं ने त्यागने के, योग्य जो वह तज दिया।
अर जो ग्रहण के योग्य वह सब, भी उन्हीं ने पा लिया ।। २३६ ।।
ॐ ह्रीं त्यागोपादानशून्यत्वशक्तिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। १५८।।
अब, एक कलश में यह कहते हैं कि ‘अमूर्तिक आत्मा, पुद्गलमयी
मूर्तिक आहार ग्रहण नहीं कर सकता है’

( सोरठा )

ज्ञानस्वभावी जीव परद्रव्यों से भिन्न ही।
कैसे कहें सदेह जब आहारक ही नहीं ।। २३७।।
ॐ ह्रीं आत्मनोऽनाहारकत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १५९।।

( शार्दूलविक्रीडित )

अन्येभ्यो व्यतिरिक्तमात्मनियतं विभ्रत्पृथग्वस्तुता-
मादानोज्झनशून्यमेतदमलं ज्ञानं तथावस्थितम् ।
मध्याद्यन्तविभागमुक्त सहजस्फारप्रभाभासुरः
शुद्धज्ञानघनो यथाऽस्य महिमा नित्योदितस्तिष्ठति ।। २३५ ।।
( उपजाति )
उन्मुक्तमुन्मोच्यमशेषतस्तत् तथात्तमादेयमशेषतस्तत् ।
यदात्मनः संहृतसर्वशक्तेः पूर्णस्य संधारणमात्मनीह ।। २३६ ।।

(अनुष्टुभ्)

व्यतिरिक्तं परद्रव्यादेवं ज्ञानमवस्थितम् ।
कथमाहारकं तत्स्याद्येन देहोऽस्य शंक्यते ।। २३७ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
'यदि ज्ञानस्वरूपी आत्मा के देह ही नहीं है, तो फिर नग्न दिगम्बर
दशारूप द्रव्यलिंग भी मोक्षमार्ग कैसे हो सकता है? यह बात एक कलश में
कहते हैं -

( सोरठा )

शुद्धज्ञानमय जीव, के जब देह नहीं कही।
तब फिर यह द्रवलिंग, शिवमग कैसे हो सके ।। २३८ ।।
ॐ ह्रीं देहरूपद्रव्यलिंगं निषिध्य निश्चयरत्नत्रयस्वरूपभावलिंग एव मोक्षमार्ग-
प्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १६०।।
अब, ‘निश्चय रत्नत्रय ही सच्चा मोक्षमार्ग है, अतः उसी के सेवन की
प्रेरणा’ आगामी कलश में देते हैं -

( दोहा )

मोक्षमार्ग बस एक ही, रत्नत्रयमय होय ।
अतः मुमुक्षु के लिए, वह ही सेवन योग्य ।। २३९।।
ॐ ह्रीं निश्चयरत्नत्रयधारणाय प्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १६१ ।।
अब, ‘समयसार को कौन प्राप्त करते हैं?’ यह कलश द्वारा कहते हैं -

( हरिगीत )

दृग्-ज्ञानमय वृत्त्यात्मक यह, एक ही है मोक्षपथ ।
थित रहें, अनुभव करें अर, ध्यावें अहिर्निश जो पुरुष ।।

( अनुष्टुभ्)

एवं ज्ञानस्य शुद्धस्य, देह एव न विद्यते ।
ततो देहमयं ज्ञातुः, न लिंगं मोक्षकारणम् ।। २३८ ।।

( अनुष्टुभ् )

दर्शन-ज्ञान-चारित्र-त्रयात्मा तत्त्वमात्मनः ।
एक एव सदा सेव्यो, मोक्षमार्गो मुमुक्षुणा ।। २३९ ।।

जो अन्य को न छुएँ अर, निज में विहार करें सतत ।
वे पुरुष तो अतिशीघ्र ही, समयसार पावें उदित ।। २४० ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसार-प्राप्त्युपायप्ररूपक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा।। १६२।।
अब, ‘समय के सार को कौन नहीं प्राप्त कर सकते हैं?’- यह तीन
कलशों द्वारा कहते हैं

( हरिगीत )

जो पुरुष तज पूर्वोक्त पथ, व्यवहार में वर्तन करें।
तर जायेंगे यह मानकर, द्रव्यलिंग में ममता धरें ।।
वे नहीं देखें आत्मा, निज अमल एक उद्योतमय ।
अर अखण्ड अभेद चिन्मय, अज अतुल आलोकमय ।। २४१ ।।
तुष माँहि मोहित जगज्जन ज्यों, एक तुष ही जानते।
वे मूढ तुष-संग्रह करें, तन्दुल नहीं पहिचानते ।।
व्यवहार-मोहित मूढ़ त्यों, व्यवहार को ही जानते।
आनन्दमय सद्ज्ञानमय, परमार्थ नहीं पहिचानते ।। २४२ ।।
यद्यपी परद्रव्य है द्रवलिंग, फिर भी अज्ञजन ।
बस! उसी में ममता धरें, द्रवलिंग मोहित अन्धजन ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

एको मोक्षपथो य एष नियतो दृग्ज्ञप्तिवृत्त्यात्मकः ;
तत्रैव स्थितिमेति यस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति ।
तस्मिन्नेव निरन्तरं विहरति द्रव्यान्तराण्यस्पृशन्;
सोऽवश्यं समयस्य सारमचिरान्नित्योदयं विन्दति ।। २४० ।।
ये त्वेनं परिहृत्य संवृतिपथप्रस्थापितेनात्मना
लिंगे द्रव्यमये वहन्ति ममतां तत्त्वावबोधच्युताः ।
नित्योद्योतमखंडमेकमतुलालोकं स्वभावप्रभा-
प्राग्भारं समयस्य सारममलं नाद्यापि पश्यंति ते ।। २४१ ।।
( वियोगिनी )
व्यवहारविमूढदृष्टयः, परमार्थं कलयन्ति नो जनाः ।
तुषबोधविमुग्धबुद्धयः, कलयन्तीह तुषं न तण्डुलम् ।। २४२ ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार
देखें नहीं, जाने नहीं, सुखमय समय के सार को।
बस ! इसलिए ही अज्ञजन, पाते नहीं भवपार को ।। २४३।।
ॐ ह्रीं व्यवहारविमूढाणां समयसारप्राप्त्यभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १६३।।
अब, आचार्य अमृतचन्द्रदेव, दो कलशों में ‘समयसार के अनुभव की
महिमा का स्मरण’ करते हैं - (हरिगीत )
क्या लाभ है ऐसे अनल्प, विकल्पों के जाल से ?।
बस ! एक ही है बात यह, परमार्थ का अनुभव करो ।।
क्योंकि निज-रस-भरित परमानन्द के आधार से।
कुछ भी नहीं है अधिक सुन लो, इस समय के सार से ।। २४४।।

( दोहा )

ज्ञानानन्दस्वभाव को, करता हुआ प्रत्यक्ष ।
अरे ! पूर्ण अब हो रहा, यह अक्षय जग-चक्षु ।। २४५ ।।
ॐ ह्रीं समयसारमहिमाप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १६४।।
आचार्य अमृतचन्द्रदेव कहते हैं कि ‘इसप्रकार यह आत्मा, ज्ञानमात्र
सिद्ध हुआ’ - (दोहा)
इसप्रकार यह आतमा, अचल अबाधित एक ।
ज्ञानमात्र निश्चित हुआ, जो अखण्ड स्वसंवेद्य ।। २४६ ।।
ॐ ह्रीं आत्मानं ज्ञानमात्रसाधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।१६५।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( स्वागता )
द्रव्यलिंग-ममकार-मीलितैः, दृश्यते समयसार एव न ।
द्रव्यलिंगमिह यत्किलान्यतो, ज्ञानमेकमिदमेव हि स्वतः ।। २४३ ।।

( मालिनी )

अलमलमतिजल्पैर्दुर्विकल्पैरनल्पैरयमिह परमार्थश्चेत्यतां नित्यमेकः।
स्वरसविसरपूर्णज्ञानविस्फूर्तिमात्रात्, न खलु समयसारादुत्तरं किंचिदस्ति ।। २४४ ।।

( अनुष्टुभ् )

इदमेकं जगच्चक्षुरक्षयं याति पूर्णताम् ।
विज्ञानघनमानंदमयमध्यक्षतां नयत् ।।२४५ ।।
इतीदमात्मनस्तत्त्वं ज्ञानमात्रमवस्थितम् ।
अखंडमेकमचलं स्वसंवेद्यमबाधितम् ।। २४६ ।।

जयमाला

( दोहा )

सर्वविशुद्धज्ञान की, महिमा अपरंपार ।
उसके आश्रय से प्रभो, खुले मुक्ति का द्वार ।। १।।

(वीर)

ज्ञानपुंज यह शुद्धातम ही सर्वविशुद्धज्ञानमय है।
यह टंकोत्कीर्ण परमातम अद्भुत अचल ध्यानमय है।।
न कर्त्ता है न भोक्ता है न अन्यरूप से संबंधित ।
यह एक शुद्ध दृग ज्ञानमयी परिपूर्ण रूप में है अर्पित ।। २ ।।
परमशुद्धनिश्चयनय से यह बात पूर्णतः सच्ची है।
इसमें न संशय रंचमात्र यह बात पूर्णतः पक्की है।।
साक्षात् शुद्धनिश्चयनय से नय कथन इस तरह आता है।
अपने निर्मल परिणामों का कर्त्ता धर्त्ता यह आतम है।। ३ ।।
राग-द्वेष परिणामों का कर्त्ता-भोक्ता भी आतम है।
ऐसा अशुद्धनिश्चय कहता रागी-द्वेषी यह आतम है।।
यह बातें सब निश्चयनय की जैनागम में ही आई हैं।
इन स्याद्वादमय कथनों में ना कोई व्यर्थ बताई है।। ४ ।।
असद्भूत व्यवहार कहे इस ही आतम के बारे में।
घट पट परद्रव्यों का कर्त्ता भी कहते हैं परमागम में ।।
परमागम में अध्यात्मनयों की चर्चा पूरी आती है।
निश्चय-व्यवहार भेद उनके उनकी भी बातें आती हैं।। ५ ।।
सब उपयोगी आवश्यक हैं वस्तुस्वरूप बतलाते हैं।
भूले भटके भवि जीवों को वे मुक्तिमार्ग दिखलाते हैं ।।
अर्ध्यावली : सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार (जयमाला)
शिवपथ में बढ़नेवालों को वे सभी काम में आते हैं।
शोधी-खोजी भवि जीवों को शुद्धातम तक पहुँचाते हैं।। ६ ।।
यद्यपि ये सभी सत्य ही हैं पर परमसत्य एक ही है।
जिसके आश्रय से मुक्ति मिले वह परम सत्य एक ही है।।
वह तो है केवल परमशुद्धनिश्चयनय जिसका नाम कहा।
शुद्धातम को जो सदा अकर्त्ता ही कहता है रहा सदा ।। ७।।
है अनन्तगुणमय शुद्धातम आनन्द का स्थान भी है।
शुद्धातम शुद्धज्ञान ही है अर सर्वविशुद्धज्ञान भी है।।
उसमें ही अपनापन हो तो समझो तुम सम्यग्ज्ञानी हो।
जो रमे जमे उसमें उनको मुक्तीमारग मिलता ही है।। ८ ।।

( दोहा )

सर्वविशुद्धज्ञान में जमें रमें जो कोय ।
उसे सहजश्रद्धान में तुरत परमपद होय ।। ९।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वविशुद्धज्ञानप्ररूपकसर्वविशुद्धज्ञानाधिकाराय जयमाला पूर्णार्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
टीका लिखते समय आचार्य अमृतचन्द्र का बुद्धिपक्ष सजग
रहता है और कलशों में उनका हृदय हिलोरें लेने लगता है। बुद्धि
को तर्क-वितर्क के माध्यम से वस्तु की गहराई में जाने की टेब
होती है और हृदय में भावना का बेग उमड़ता है। यही कारण है
कि उनकी गद्यात्मक टीका में तत्त्व की गहराई से मीमांसा होती
है और कलशों से हृदय को छू लेनेवाली पावन प्रेरणा प्राप्त
होती है। - समयसार अनुशीलन भाग-१, पृष्ठ-१८८

स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट पूजन
स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव¹ गर्भित

परिशिष्ट पूजन

स्थापना

(रोला)

अनेकान्तमय² आतम को इस समयसार में।
ज्ञानमात्र कहकर समझाया है गुरुवर ने ।।
यह तो है एकान्त कथन - कुछ ऐसा कहते।
समझाया है उन्हें अरे इस परिशिष्ट में ।।
स्याद्वाद शैली में साधक-साध्य भाव को।
विविध नयों से समझाते हैं करुणा सागर ।।
अनेकान्तमय इस अखण्ड निज परमातम को।
खण्ड-खण्ड करके समझाते स्याद्वाद से ।।
साध्यभाव को मोक्ष और साधक भावों को।
मोक्षमार्ग कहते हैं जिनवर दिव्यध्वनि में ।।
और मोक्षमग निश्चय रत्नत्रय को कहते।
रत्नत्रय की पूरणता परमार्थ मोक्ष है ।।

(दोहा)

महिमा आतमराम की अद्भुत अपरंपार ।
जो जाने वे भव्यजन होवें भव से पार ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्ट! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्ट! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ, ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्ट! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट्।
१. उपाय-उपेयभाव को साधक-साध्यभाव भी कहते हैं।
२. अनन्तगुणों वाले, अनन्तधर्मों वाले

(रोला)

जल
जैसे जग में जल को जीवन कहती दुनियाँ ।
वैसे ही है ज्ञानभाव आतम का जीवन ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय जन्मजरामत्यु विनाशनाय जलं..।
चन्दन
है स्वभाव से शीतल चन्दन सब जग जाने।
आतम भी है परम शान्त शीतल समतामय ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं..।
अक्षत
हैं अखण्ड अक्षत अविनाशी धवल निरंजन ।
आतम भी अविनाशी एवं धवल निरंजन ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं…।
पुष्प
सुमन सुगंधित सब जग को आकर्षित करते।
गंध रहित यह आतम जग को जाने-देखे ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं…।

नैवेद्य
यह चरु सुन्दर सरस आत्म अनुभव के सम्मुख ।
हो जाता है विरस अरस आतम के सम्मुख ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं … ।

दीप
स्व-पर प्रकाशक दीपक तमहर होता जग में।
निज आतम भी स्व-परप्रकाशक होता निज में।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय मोहान्धकारविनाशयनाय दीपं …।

धूप
परम सुगन्धित धूप अग्नि में स्वाहा होती ।
यह परमातम कर्म पुंज को स्वाहा करता ।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय अष्टकर्मदहनाय धूपं … ।

फल
सरस सुगंधित फल तो अबतक अफल रहे हैं।
एकमात्र आतम का अनुभव सफल रहा है।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय मोक्षफलप्राप्तये फलं…।

अर्घ्य

अर्घ्य चढ़ाया पर अनर्घ्य पद प्राप्त हुआ ना।
इसीलिये तो निज आतम का ध्यान लगाया।।
है अनन्त गुणमय यह ज्ञानमयी परमातम ।
जाने स्व-पर सभी को यह ज्ञानी परमातम ।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भित-परिशिष्टाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य … ।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट

अर्ध्यावली
।। परिशिष्ट : स्याद्वाद अधिकार ।।

( दोहा )

वस्तु व्यवस्था तत्त्व की, भाव उपाय-उपेय।
स्याद्वाद की सिद्धि को, थोड़ा-बहुत प्रमेय ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
टीका पूर्ण करने के उपरान्त अब आचार्य अमृतचन्द्रदेव, ग्रन्थ की जो
विशेष विषय-वस्तु परिशिष्ट में स्पष्ट करना चाहते हैं, उसकी सूचना कलश
द्वारा देते हैं -

( कुण्डलिया )

यद्यपि सब कुछ आ गया, कुछ भी रहा न शेष।
फिर भी इस परिशिष्ट में, सहज प्रमेय-विशेष ।।
सहज प्रमेय-विशेष, उपायोपेय भावमय ।
ज्ञानमात्र आतम, समझाते स्याद्वाद से ।।
परमव्यवस्था वस्तु-तत्त्व की प्रस्तुत करके ।
परमज्ञानमय परमातम का चिन्तन करते ।। २४७ ।।
ॐ ह्रीं श्रीस्याद्वादान्तर्गत-उपाय-उपेयभावप्रकाशक -श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १६६।।

अब, आत्मख्याति के परिशिष्ट के रूप में स्याद्वादाधिकार में ‘आत्मवस्तु
को ज्ञानमात्र कहने पर भी स्वयमेव अनेकान्तात्मकत्व है - यह तत्-अतत्,
एक-अनेक, सत्-असत्, नित्य-अनित्य आदि भंगों से सिद्ध करते हैं; इनमें
सर्वप्रथम तत्-अतत् सम्बन्धी अनेकान्त के सूचक दो कलश कहते हैं’ -

(अनुष्टुभ्)

अत्र स्याद्वादशुद्धयर्थं, वस्तुतत्त्वव्यवस्थितिः ।
उपायोपेयभावश्च, मनाग्भूयोऽपि चिन्त्यते ।। २४७ ।।

( हरिगीत )

बाह्यार्थ ने ही पी लिया, निज-व्यक्तता से रिक्त जो।
वह ज्ञान तो सम्पूर्णतः, पररूप में विश्रान्त है।।
पर से विमुख हो स्वोन्मुख, सद्ज्ञानियों का ज्ञान तो।
‘स्वरूप से ही ज्ञान है’ - इस मान्यता से पुष्ट है ।। २४८।।
इस ज्ञान में जो झलकता, वह विश्व ही बस ज्ञान है।
अबुध ऐसा मानकर, स्वच्छन्द हो वर्तन करें ।।
अर विश्व को जो जानकर भी, विश्वमय होते नहीं।
वे स्याद्वादी जगत् में, निजतत्त्व का अनुभव करें ।। २४९।।
ॐ ह्रीं ज्ञान-ज्ञेययोः तत्-अतत्सम्बन्धि-स्याद्वादप्रकाशक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१६७।।
अब, ‘आत्मवस्तु में अनेकान्तस्वरूप के अन्तर्गत एक-अनेक सम्बन्धी
स्याद्वाद’ को दो कलशों में स्पष्ट करते हैं -

( हरिगीत )

छिन-भिन्न हो चहुँ ओर से, बाह्यार्थ के परिग्रहण से।
खण्ड-खण्ड होकर नष्ट होता, स्वयं अज्ञानी पशु ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

बाह्यार्थैः परिपीतमुज्झित-निज-प्रव्यक्तिरिक्ती-भवद्;
विश्रान्तं पररूप एव परितो, ज्ञानं पशोः सीदति ।
यत्तत्तत्तदिह स्वरूपत इति, स्याद्वादिनस्तत्पुन-;
र्दूरोन्मग्नघनस्वभावभरतः पूर्णं समुन्मज्जति ।। २४८ ।।
विश्वं ज्ञानमिति प्रतर्व्य सकलं, दृष्टवा स्वतत्त्वाशया;
भूत्वा विश्वमयः पशुः पशुरिव, स्वच्छन्दमाचेष्टते ।
यत्तत्तत्पररूपतो न तदिति, स्याद्वाददर्शी पुन-;
र्विश्वाद्भिन्नमविश्वविश्वघटितं तस्य स्वतत्त्वं स्पृशेत् ।। २४९ ।।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट
एकत्व के परिज्ञान से, भ्रम-भेद जो परित्याग दें।
वे स्याद्वादी जगत् में, एकत्व का अनुभव करें ।। २५०।।
जो मैल ज्ञेयाकार का, धो डालने के भाव से।
स्वीकृत करें एकत्व को, एकान्त से वे नष्ट हों ।।
अनेकत्व को जो जानकर भी, एकता छोड़े नहीं।
वे स्याद्वादी स्वतःक्षालित, तत्त्व का अनुभव करें ।। २५१।।
ॐ ह्रीं ज्ञान-ज्ञेययोः एक-अनेकसम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १६८।।
अब, ‘अनेकान्तस्वरूप के अन्तर्गत सत्-असत् के स्वद्रव्य-परद्रव्य
सम्बन्धी स्याद्वाद’ को दो कलशों में कहते हैं -

( हरिगीत )

इन्द्रियों से जो दिखे, ऐसे तनादि पदार्थ में।
एकत्व कर हों नष्ट जन, निजद्रव्य को देखें नहीं ।।
निजद्रव्य को जो देखकर, निजद्रव्य में ही रत रहें।
वे स्याद्वादी ज्ञान से, परिपूर्ण हो जीवित रहें ।। २५२।।

( शार्दूलविक्रीडित )

बाह्यार्थग्रहणस्वभावभरतो विष्वग्विचित्रोल्लसत्;
ज्ञेयाकार-विशीर्ण-शक्तिरभितस्स्रुट्यन्पशुर्नश्यति ।
एकद्रव्यतया सदाप्युदितया भेदभ्रमं ध्वंसयन्;
न्नेकं ज्ञानमबाधितानुभवनं पश्यत्यनेकांतवित् ।। २५० ।।
ज्ञेयाकारकलंकमेचकमिति, प्रक्षालनं कल्पयन् ;
नेकाकारचिकीर्षया स्फुटमपि ज्ञानं पशुर्नेच्छति ।
वैचित्र्येऽप्यविचित्रतामुपगतं ज्ञानं स्वतः क्षालितं;
पर्यायैस्तदनेकतां परिमृशन् पश्यत्यनेकांतवित्।। २५१ ।।
प्रत्यक्षालिखितस्फुट स्थिरपरद्रव्यास्तितावंचितः
स्वद्रव्यानवलोकनेन परितः शून्यः पशुर्नश्यति ।
स्वद्रव्यास्तितया निरूप्य निपुणं सद्यः समुन्मज्जता
स्याद्वादी तु विशुद्धबोधमहसा पूर्णो भवन् जीवति ।। २५२ ।।

सब द्रव्यमय निज आतमा, यह जगत् की दुर्वासना ।
बस ! रत रहें परद्रव्य में, स्वद्रव्य के भ्रम-बोध से ।।
परद्रव्य के नास्तित्व को, स्वीकार कर सब द्रव्य में।
निजज्ञान बल से स्याद्वादी, रत रहें निजद्रव्य में ।। २५३।।
ॐ ह्रीं स्वद्रव्येणाऽस्तित्व-परद्रव्येण नास्तित्व-सम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१६९।।
अब, ‘सत्-असत् के स्वक्षेत्र-परक्षेत्र सम्बन्धी स्याद्वाद’ को आगे दो
कलशों में बताते हैं -

( हरिगीत )

परक्षेत्रव्यापी ज्ञेय-ज्ञायक, आतमा परक्षेत्रमय ।
– यह मानकर निजक्षेत्र का, अपलाप करते अज्ञजन ।।
जो जानकर परक्षेत्र को, परक्षेत्रमय होते नहीं।
वे स्याद्वादी निजरसी, निजक्षेत्र में जीवित रहें ।। २५४।।
मैं ही रहूँ निजक्षेत्र में, इस भाव से परक्षेत्रगत ।
जो ज्ञेय उनके साथ, ज्ञायकभाव भी परित्याग कर।।

( शार्दूलविक्रीडित )

सर्वद्रव्यमयं प्रपद्य पुरुषं दुर्वासनावासितः
स्वद्रव्यभ्रमतः पशुः किल परद्रव्येषु विश्राम्यति ।
स्याद्वादी तु समस्तवस्तुषु परद्रव्यात्मना नास्तितां
जानन्निर्मलशुद्धबोधमहिमा स्वद्रव्यमेवाश्रयेत् ।। २५३ ।।
भिन्न क्षेत्रनिषण्णबोध्यनियतव्यापारनिष्ठः सदा
सीदत्येव बहिः पतंतमभितः पश्यन्पुमांसं पशुः ।
स्वक्षेत्रास्तितया निरुद्धरभसः स्याद्वादवेदी पुन-
स्तिष्ठत्यात्मनिखातबोध्यनियतव्यापारशक्तिर्भवन् ।।२५४।।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट
हों तुच्छता को प्राप्त शठ, पर ज्ञानिजन परक्षेत्रगत ।
रे! छोड़कर सब ज्ञेय वे, निजक्षेत्र को छोड़े नहीं ।। २५५।।
ॐ ह्रीं स्वक्षेत्रेणास्तित्व-परक्षेत्रेणनास्तित्सम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१७०।।
अब, ‘सत्-असत् के स्वकाल-परकाल सम्बन्धी स्याद्वाद’ को आगे दो
कलशों में स्पष्ट करते हैं -

( हरिगीत )

निजज्ञान के अज्ञान से, गतकाल में जाने गये।
जो ज्ञेय उनके नाश से, निज नाश माने अज्ञजन ।।
नष्ट हों परज्ञेय पर, ज्ञायक सदा कायम रहे।
निजकाल से अस्तित्व है - यह जानते हैं विज्ञजन ।। २५६ ।।
अर्थालम्बनकाल में ही, ज्ञान का अस्तित्व है।
यह मानकर परज्ञेयलोभी, लोक में आकुल रहें।।
परकाल से नास्तित्व लखकर, स्याद्वादी विज्ञजन ।
ज्ञानमय आनन्दमय, निज आतमा में दृढ़ रहें ।। २५७।।
ॐ ह्रीं स्वकालेनास्तित्व-परकालेन नास्तित्व-सम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १७१।।
स्वक्षेत्रस्थितये पृथग्विधपरक्षेत्रस्थितार्थोज्झनात्
तुच्छीभूय पशुः प्रणश्यति चिदाकारान् सहार्थैर्वमन् ।
स्याद्वादी तु वसन् स्वधामनि परक्षेत्रे विदन्नास्तितां
त्यक्तार्थोऽपि न तुच्छतामनुभवत्याकारकर्षी परान् ।। २५५।।
पूर्वालंबितबोध्यनाशसमये ज्ञानस्य नाशं विदन्
सीदत्येव न किंचनापि कलयन्नत्यंततुच्छः पशुः।
अस्तित्वं निजकालतोऽस्य कलयन् स्याद्वादवेदी पुनः
पूर्णस्तिष्ठति बाह्यवस्तुषु मुहुर्भूत्वा विनश्यत्स्वपि ।। २५६।।
अर्थालंबनकाल एव कलयन् ज्ञानस्य सत्त्वं बहि-
ज्ञेयालंबनलालसेन मनसा भ्राम्यन् पशुर्नश्यति ।
नास्तित्वं परकालतोऽस्य कलयन् स्याद्वादवेदी पुन-
स्तिष्ठत्यात्मनिखातनित्यसहजज्ञानैकपुञ्जीभवन् ।। २५७ ।।

अब, ‘सत्-असत् के स्वभाव-परभाव सम्बन्धी स्याद्वाद’ का निरूपण
आगे दो कलशों में करते हैं -

( हरिगीत )

परभाव से निजभाव का, अस्तित्व माने अज्ञजन ।
पर में रमें जग में भ्रमे, निज आतमा को भूलकर ।।
पर भिन्न हो परभाव से, ज्ञानी रमे निजभाव में।
बस ! इसलिए इस लोक में, वे सदा ही जीवित रहें ।। २५८।।
सब ज्ञेय ही है आतमा, यह मानकर स्वच्छन्द हो।
परभाव में ही नित रमें, बस ! इसलिए ही नष्ट हों ।।
पर स्याद्वादी तो सदा, आरूढ़ हैं निजभाव में।
विरहित सदा परभाव से, विलसें सदा निष्कम्प हो ।। २५९।।
ॐ ह्रीं स्वभावेनाऽस्तित्व-परभावेन नास्तित्वसम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१७२।।
अब, अन्त में ‘नित्य-अनित्य सम्बन्धी स्याद्वाद’ के दो कलश कहते हैं -

( हरिगीत )

उत्पाद-व्यय के रूप में, बहते हुए परिणाम लख।
क्षणभंग के पड़ संग निज का, नाश करते अज्ञजन ।।

( शार्दूलविक्रीडित )

विश्रान्तः परभावभावकलनान्नित्यं बहिर्वस्तुषु
नश्यत्येव पशुः स्वभावमहिमन्येकांतनिश्चेतनः ।
सर्वस्मान्नियतस्वभावभवनज्ञानाद्विभक्तो
भवन्
स्याद्वादी तु न नाशमेति सहजस्पष्टीकृतप्रत्ययः ।। २५८ ।।
अध्यास्यात्मनि सर्वभावभवनं शुद्धस्वभावच्युतः
सर्वत्राप्यनिवारितो गतभयः स्वैरं पशुः क्रीडति ।
स्याद्वादी तु विशुद्ध एव लसति स्वस्य स्वभावं भरा-
दारूढः
परभावभावविरहव्यालोकनिष्कंपितः ।। २५९ ।।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट
चैतन्यमय निज आतमा, क्षणभंग है पर नित्य भी -
यह जानकर जीवित रहें, नित स्याद्वादी विज्ञजन ।। २६०।।
है बोध जो टंकोत्कीर्ण, विशुद्ध उसकी आश से।
चिद्धरिणति निर्मल उछलती, से सतत इन्कार कर ।।
अज्ञजन हों नष्ट किन्तु, स्याद्वादी विज्ञजन ।
अनित्यता में व्याप्त होकर, नित्य का अनुभव करें ।। २६१।।
ॐ ह्रीं श्री आत्मनः नित्याऽनित्यत्वसम्बन्धि-स्याद्वादप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१७३।।
स्याद्वाद-प्रकरण के अन्त में आचार्यदेव, दो कलश लिखते हैं -

( दोहा )

मूढ़जनों को इसतरह ज्ञानमात्र समझाय ।
अनेकान्त अनुभूति में उतरा आतमराय ।। २६२।।
अनेकान्त जिनदेव का शासन रहा अलंघ्य ।
वस्तुव्यवस्था थापकर थापित स्वयं प्रसिद्ध ।। २६३।।
ॐ ह्रीं श्रीज्ञानमात्रात्मनः अनेकान्तात्मकत्वप्रकाशक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १७४।।
प्रादुर्भाव-विराम-मुद्रित-वहज्ज्ञानांश-नानात्मना
निर्ज्ञानात्क्षणभङ्गसङ्गपतितः प्रायः पशुर्नश्यति ।
स्याद्वादी तु चिदात्मना परिमृशंश्चिद्वस्तु नित्योदितं
टंकोत्कीर्णघनस्वभावमहिम ज्ञानं भवन् जीवति ।। २६० ।।
टंकोत्कीर्णविशुद्धबोधविसराकारात्मतत्त्वाशया
दाञ्छत्युच्छलदच्छचित्परिणतेर्भिन्नं पशुः किंचन् ।
ज्ञानं नित्यमनित्यतापरिगमेऽप्यासादयत्युज्ज्वलं
स्याद्वादी तदनित्यतां परिमृशंश्चिस्तुवृत्तिक्रमात् ।। २६१ ।।

( अनुष्टुभ् )

इत्यज्ञानविमूढानां, ज्ञानमात्रं प्रसाधयन् ।
आत्मतत्त्वमनेकान्तः, स्वयमेवानुभूयते ।। २६२ ।।
एवं तत्त्वव्यवस्थित्या, स्वं व्यवस्थापयन् स्वयम् ।
अलंघयं शासनं जैन-मनेकान्तो व्यवस्थितः ।। २६३ ।।

इसके बाद परिशिष्ट में सैंतालीस शक्तियों की चर्चा की गई है, उसके
उपरान्त उपसंहार में लिखे दो कलश इसप्रकार हैं -

( रोला )

इत्यादिक अनेक शक्ति से भरी हुई है।
फिर भी ज्ञानमात्रमयता को नहीं छोड़ती ।।
और क्रमाक्रमभावों से जो मेचक होकर ।
द्रव्य और पर्यायमयी चिद्वस्तु लोक में ।। २६४।।
अनेकान्त की दिव्यदृष्टि से स्वयं देखते ।
वस्तुतत्त्व की उक्त व्यवस्था अरे सन्तजन ।।
स्याद्वाद की अधिकाधिक शुद्धि को लख अर।
नहीं लांघकर जिननीति को ज्ञानी होते ।। २६५ ।।
ॐ ह्रीं स्याद्वादमयी-जिननीतिप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। १७५ ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
।। उपाय-उपेय अधिकार ।।

(दोहा)

परम शान्त सुखमय दशा, कही जिनागम मोक्ष ।
रत्नत्रय की साधना, ही उपाय है मोक्ष ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( वसन्ततिलका )

इत्याद्यनेकनिजशक्तिसुनिर्भरोऽपि, यो ज्ञानमात्रमयतां न जहाति भावः ।
एवं क्रमाक्रमविवर्तिविवर्तचित्रं, तद्रव्यपर्ययमयं चिदिहास्ति वस्तु ।। २६४ ।।
नैकान्तसंगतदृशा स्वयमेव वस्तुतत्त्वव्यवस्थितिमिति प्रविलोकयन्तः ।
स्याद्वादशुद्धिमधिकामधिगम्य संतो, ज्ञानी भवंति जिननीतिमलंघयन्तः।। २६५ ।।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट
‘ज्ञानात्मक आत्मा में ही उपायभाव अर्थात् साधकभाव तथा उपेयभाव
अर्थात् साध्यभाव घटित होते हैं’, यह तीन कलशों में कहते हैं -

( वसन्ततिलका )

रे! ज्ञानमात्र निज भाव अकम्पभूमि ।
को प्राप्त करते जो अपनीतमोही ।।
साधकपने को पा वे सिद्ध होते।
अर अज्ञ इसके बिना परिभ्रमण करते ।। २६६।।
स्याद्वादकौशल तथा संयम सुनिश्चिल ।
से ही सदा जो निज में जमे हैं।।
वे ज्ञान एवं क्रिया की मित्रता से।
सुपात्र हो पाते भूमिका को ।। २६७।।
उदितप्रभा से जो सुप्रभात करता।
चित्पिण्ड जो है खिला निज रमणता से ।।
जो अस्खलित है आनन्दमय वह।
होता उदित अद्भुत अचल आतम ।। २६८।।
ॐ ह्रीं ज्ञानमात्राऽऽत्मनः साध्य-साधकभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। १७६ ।।
इसप्रकार ‘स्याद्वाद के माध्यम से शुद्धस्वभाव की महिमा उदित होने पर,
अन्य भावों से कोई प्रयोजन नहीं रहता है, अतः मैं चिन्मात्र एक अखण्ड
स्वरूप ही हूँ’, यह बात दो कलशों में कहते हैं –
ये ज्ञानमात्रनिजभावमयीमकम्पां, भूमिं श्रयंति कथमप्यपनीतमोहाः।
ते साधकत्वमधिगम्य भवंति सिद्धा, मूढास्त्वमूमनुपलभ्य परिभ्रमंति ।। २६६ ।।
स्याद्वादकौशलसुनिश्चलसंयमाभ्यां, यो भावयत्यहरहः स्वमिहोपयुक्तः ।
ज्ञानक्रियानयपरस्परतीव्रमैत्री, पात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः।। २६७ ।।
चित्पिंडचंडिमविलासिविकासहासः शुद्ध-प्रकाश-भर-निर्भर-सुप्रभातः ।
आनंद-सुस्थित-सदास्खलितैक-रूप-स्तस्यैव चायमुदयत्यचलार्चिरात्मा ।। २६८ ।।

अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट

( वसन्ततिलका )

अब, तीन कलशों में ‘आत्मा का अद्भुत अनेकान्तात्मक वैभव’
प्रदर्शित करते हैं -

(रोला )

अरे ! ‘अमेचक’ कभी कभी यह ‘मेचक’ दिखता।
कभी ‘मेचकामेचक’ यह दिखलाई देता ।।
अनन्त शक्तियों का समूह यह आतम फिर भी।
महिमा उदित शुद्धस्वभाव की नित।
स्याद्वाददीपित लसत् सद्ज्ञान में जब ।।
तब बन्ध-मोक्ष मग में आपतित भावों।
से क्या प्रयोजन है तुम ही बताओ ।। २६९।।
निज शक्तियों का समुदाय आतम ।
विनष्ट होता नयदृष्टियों से ।।
खण्ड-खण्ड होकर खण्डित नहीं मैं।
एकान्त शान्त चिन्मात्र अखण्ड हूँ मैं ।। २७०।।
ॐ ह्रीं स्याद्वादमहिमोदितचिन्मात्र-अखण्डाऽऽत्मस्वरूपप्रकाशक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१७७।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘आत्मा, परज्ञेयों का ज्ञान करने
वाला मात्र ही नहीं है; वह ज्ञान भी है, ज्ञेय भी है और ज्ञाता भी है’ -

(रोला)

परज्ञेयों के ज्ञानमात्र मैं नहीं जिनेश्वर ।
मैं तो केवल ज्ञानमात्र हूँ निश्चित जानो ।।
ज्ञेयों के आकार ज्ञान की कल्लोलों से।
परिणत ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयमय वस्तुमात्र हूँ ।। २७१।।
ॐ ह्रीं आत्मनः ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयस्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। १७८।।

( वसन्ततिलका )

स्याद्वाददीपितलसन्महसि प्रकाशे शुद्धस्वभावमहिमन्युदिते मयीति ।
किं बंधमोक्षपथपातिभिरन्यभावैर्नित्योदयः परमयं स्फुरतु स्वभावः ।। २६९ ।।
चित्रात्मशक्तिसमुदायमयोऽयमात्मा, सद्यः प्रणश्यति नयेक्षणखंड्यमानः ।
तस्मादखण्डमनिराकृतखण्डमेकमेकान्तशान्तमचलं चिदहं महोऽस्मि ।। २७० ।।
( शालिनी )
योऽयं भावो ज्ञानमात्रोऽहमस्मि, ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानमात्रः स नैव ।
ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानकल्लोलवल्गन्, ज्ञानज्ञेयज्ञातृमद्वस्तुमात्रः ।। २७१ ।।
दृष्टिवन्त को भ्रमित नहीं होने देता है ।। २७२ ।।
एक ओर से ‘एक’ स्वयं में ‘सीमित’ अर ‘ध्रुव’।
अन्य ओर से ‘नेक "क्षणिक "विस्तारमयी’ है।।
अहो ! आतमा का अद्भुत यह वैभव देखो।
जिसे देखकर चकित जगज्जन ज्ञानी होते।।२७३।।
एक ओर से ‘शान्त "मुक्त’ ‘चिन्मात्र’ दीखता।
अन्य ओर से ‘भव-भव पीड़ित’ ‘राग-द्वेषमय’ ।।
‘तीन लोकमय’ भासित होता विविध नयों से।
अहो ! आतमा का अद्भुत यह वैभव देखो ।। २७४।।
ॐ ह्रीं आत्मनः अद्भुत-अनेकान्तात्मक-वैभवप्रकाशक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१७९।।
(पृथ्वी)
क्वचिल्लसति मेचकं क्वचिन्मेचकामेचकं;
क्वचित्पुनरमेचकं सहजमेव तत्त्वं मम।
तथापि न विमोहयत्यमलमेधसां तन्मनः;
परस्परसुसंहतप्रकटशक्तिचक्रं स्फुरत् ।। २७२ ।।
इतो गतमनेकतां दधदितः सदाप्येकता-
मितः क्षणविभंगुरं ध्रुवमितः सदैवोदयात् ।
इतः परमविस्तृतं धृतमितः प्रदेशैर्निजै-
रहो सहजमात्मनस्तदिदमद्भुतं वैभवम् ।। २७३ ।।
कषायकलिरेकतः स्खलति शान्तिरस्त्येकतो;
भवोपहतिरेकतः स्पृशति मुक्तिरप्येकतः ।
जगत्त्रियमेकतः स्फुरति चिच्चकास्त्येकतः;
स्वभावमहिमात्मनो विजयतेऽद्भुतादद्भुतः ।। २७४ ।।

अन्त में, आचार्य आशीर्वादात्मक दो कलशों के माध्यम से ‘आत्म-
ज्योति के जयवन्त वर्तने की मंगल कामना’ करते हैं -

( सोरठा )

झलकें तीनो लोक, सहज तेज के पुंज में।
यद्यपि एकस्वरूप, तदपि भेद दिखाई दें।।
सहज तत्त्व उपलब्धि, निजरस के विस्तार से।
नियत ज्योति चैतन्य-चमत्कार जयवन्त है।।२७५।।

( दोहा )

मोह रहित निर्मल सदा, अप्रतिपक्षी एक।
अचल चेतनारूप में, मग्न रहे स्वयमेव।।
परिपूर्ण आनन्दमय, अर अद्भुत उद्योत।
सदा उदित चहुँ ओर से, अमृतचन्द्र-ज्योति।।२७६।।

ॐ ह्रीं श्रीचैतन्यचमत्कार-अमृतचन्द्रज्योतिस्वरूपप्रमाप्रकाशक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमयाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१८०।।

‘जीव, अनादि से कैसा था और आत्मानुभूति होने पर कैसा हो जाता
है?’ यह आगामी कलश में कहते हैं -

( मालिनी )

जयति सहजतेजःपुंजमज्जत्त्रिलोकी-
स्खलदखिलविकल्पोऽप्येक एव स्वरूपः।
स्वरस-विसर-पूर्णाच्छिन्न-तत्त्वोलभः
प्रसभनियमिताचिंश्चिच्चमत्कार एषः।। २७५ ।।

अविचलितचिदात्मन्यात्मनात्मानमात्म-
न्यनवरतनिमग्नं धारयद् ध्वस्तमोहम्।
उदितममृतचंद्रं ज्योतिरेतत्समंता-
ज्ज्वलतु विमलपूर्णं निःसपत्त्नस्वभावम्।। २७६ ।।

अध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट

( हरिगीत )

गतकाल में अज्ञान से, एकत्व पर से जब हुआ।
फलरूप में रस-राग अर, कर्तृत्व पर में तब हुआ।।
उस क्रियाफल को भोगती, अनुभूति मैली हो गई।
किन्तु अब सद्ज्ञान से सब, मलिनता लय हो गई।।२७७।।

ॐ ह्रीं अज्ञान-आत्मज्ञानयोः द्वयोः फलरूपरूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमयाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१८१।।

अब, अधिकार के अन्त में ‘आचार्य अमृतचन्द्र टीका के कर्तृत्व के
सम्बन्ध में वस्तु-स्थिति स्पष्ट करते हुए अपना अकर्तृत्व प्रकाशित करते हैं’ -

( हरिगीत )

ज्यों शब्द अपनी शक्ति से ही, तत्त्व प्रतिपादन करें।
त्यों समय की यह व्याख्या भी, उन्हीं शब्दों ने करी।।
निजरूप में ही गुस अमृतचन्द्र श्री आचार्य का।
इस आत्मख्याति में अरे! कुछ भी नहीं कर्तृत्व है।।२७८।।

ॐ ह्रीं व्याख्यायाः अकर्तृत्वप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमयाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१८२।।

( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )

( शार्दूलविक्रीडित )

यस्माद् द्वैतमभूतपुरा स्वपरयोर्भूतं यतोऽङ्गान्तरं
रागद्वेषपरिग्रहे सति यतो जातं क्रियाकारकैः।
भुंजाना च यतोऽनुभूतिरखिलं खिन्ना क्रियायाः फलं
तद्विज्ञानघनौघमग्नमधुना किंचिन्न किंचित्किल।। २७७ ।।

( उपजाति )
स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वव्याख्या कृतेयं समयस्य शब्देः।
स्वरूपगुप्तस्य न किंचिदस्ति कर्तव्यमेवामृतचंद्रसूरेः।। २७८ ।।

जयमाला

(दोहा)

यह परिशिष्ट विशिष्ट है, स्याद्वाद के द्वार।
वस्तुव्यवस्था तत्त्व की, प्रगट दिखावन हार।।१।।

(रोला)

सबसे पहले स्याद्वाद को गद्य-पद्य में।
चौदह भंगों द्वारा ही स्पष्ट किया है।।
फिर इन चौदह भंगों का भी अति सुन्दरतम।
एवं अनुपम विशद विवेचन किया गया है।।२।।
अनन्त गुणों के गोडाउन इस आत्मतत्त्व को।
ज्ञानमात्र कहकर समझाया विविध नयों से।।
अनन्त शक्तियों के संग्रहालय इस आतम की।
सैंतालीस शक्तियों का स्वरूप समझाया।।३।।
सभी जीव जीते हैं बस ‘जीवत्व शक्ति’ से।
वे सब चेतन होते हैं बस ‘चितिशक्ति’ से।।
‘दृशि-ज्ञान शक्ति’ से वे सब देखें-जानें।
और सुखी होवें ‘सुख शक्ति’ के प्रभाव से।।४।।
‘वीर्यशक्ति’ से होते हैं वे शक्तिमान सब।
‘प्रभु शक्ति’ से सब प्रभावशाली होते हैं।।
‘विभु शक्ति’ से सभी गुणों में व्यापक होते।
इसप्रकार वे सब वैभवशाली होते हैं।।५।।

अध्ययवली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट (जयमाला)
‘सर्वदर्शी-सर्वज्ञ शक्ति’ से सब द्रव्यों को।
देखें-जानें सब झलकें ‘स्वच्छत्व शक्ति’ में।।
अपना आतम झलके अपने ही आतम में।
यह प्रभाव होता है रे ! ‘प्रकाश शक्ति’ का।।६।।
निज विकास में कोई भी संकोच नहीं हो।
यह प्रभाव है ‘असंङ्कुचित विकास शक्ति’ का।।
नहीं किसी का कारण हो न कार्य किसी का।
यह ‘अकार्य कारण शक्ति’ का ही कमाल है।।७।।
पर को जाने, जाना जाता पर के द्वारा।
स्व को जानें, स्व के द्वारा जाना जाता।।
जिस शक्ति के कारण ऐसा होता रहता।
उसे ‘परिणाम्य-परिणामकत्व’ शक्ति कहते हैं।।८।।
नहीं किसी का ग्रहण-त्याग कर सकता आतम।
इस शक्ति को ‘त्यागोपादानशून्य’ कहते हैं।।
जिस शक्ति के कारण षट्गुणी हानि-वृद्धि हो।
उस शक्ति को ‘अगुरुलघुत्व शक्ति’ कहते हैं।।९।।
उत्पाद-ध्रौव्य-व्यय टिके रहें नित जिसके कारण।
वह ‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमयी’ आतम शक्ति है।।
विरुद्ध और अविरुद्धभाव नित टिके रहे सब।
वह ‘परिणाम शक्ति’ कहलाती है आगम में।।१०।।
जिसके कारण यह आतम अमूर्त रहता है।
वह ‘अमूर्त शक्ति’ कहलाती परमागम में।।
जिसके कारण रागभाव का कर्त्ता न हो।
उस शक्ति को ‘अकर्तृत्व शक्ति’ कहते हैं।।११।।

जिस शक्ति के कारण राग का भोक्ता न हो।
उस शक्ति को ‘अभोक्तृत्व शक्ति’ कहते हैं ।।
आतमप्रदेश में कंपन न हो जिसके कारण।
उस शक्ति को ‘निष्क्रियत्व शक्ति’ कहते हैं ।। १२ ।।
जिसके कारण नियत प्रदेशों में रहता है।
उसको ‘नियतप्रदेशत्व शक्ति’ कहते हैं ।।
जिसके कारण अपने गुण-धर्मों में व्यापे ।
उसको ‘स्वधर्मव्यापकत्व शक्ति’ कहते हैं ।। १३ ।।
जिस शक्ति के कारण रे ! सामान्यगुण सभी ।
अर विशेषगुण भी होते हैं सभी निरापद ।।
अर सामान्य-विशेष सभी पाये जाते हैं।
वह ‘साधारण-असाधारण उभयरूप’ है’ ।। १४ ।।
अनन्तधर्म इकसाथ रहे बस जिसके कारण।
वह ‘अनन्त धर्मत्व शक्ति’ बस कहलाती है।।
और परस्पर विरुद्ध धर्म जिस कारण रहते।
रे! ‘विरुद्धधर्मत्व शक्ति’ बस उसको कहते ।। १५ ।।
जिस शक्ति से हो स्वयं अनन्त शक्तिमय ।
उस शक्ति को अरे ‘तत्त्व शक्ति’ कहते हैं।।
जिस शक्ति के कारण यह पर रूप नहीं हो।
उस शक्ति को अरे ‘अतत्त्व शक्ति’ कहते हैं ।। १६ ।।
१. साधारण अर्थात् अस्तित्व आदि सामान्यगुण, असाधारण अर्थात् ज्ञानादि विशेष गुण
और जो पाँच अजीव द्रव्यों में रहने से सामान्य और सभी छह द्रव्यों में न रहने से विशेष
धर्म कहलाते हैं, ऐसे अमूर्त्तत्व आदि उभयरूप गुण साधारण-असाधारण कहे जाते हैं।
अर्ध्यावली : स्याद्वाद और उपाय-उपेयभाव गर्भित परिशिष्ट (जयमाला)
जिस शक्ति के कारण अनेक निज पर्यायों में।
व्यापक होकर भी एकत्व नहीं छोड़ता ।।
वह ‘एकत्वशक्ति’ कहलाती है इस जग में।
इसके कारण जिय की एकता कायम रहती ।। १७ ।।
एक द्रव्यमय होने पर भी यह परमातम ।
अरे बदलता रहता है निज पर्यायों में ।।
यह होता है इसमें ‘अनेकत्व शक्ति’ से।
इस परमातम का ऐसा अद्भुत स्वभाव है।। १८ ।।
जिसके कारण एक अवस्था वर्तमान में।
होती ही है उसे ‘भाव शक्ति’ कहते हैं ।।
उसे छोड़कर अन्य न कोई होय अवस्था ।
जिसके कारण उसे ‘अभाव शक्ति’ कहते हैं ।। १९ ।।
जो पर्याय अभी है उसका अगले क्षण में।
‘भावाभाव शक्ति’ से ही तो व्यय होता है।।
विद्यमान जो अभी नहीं है उसका होना।
जिससे होता वह ‘अभावभाव शक्ति’ है।। २० ।।
होने योग्य के होनेरूप से जो होती है।
उसको कहते ‘भावभाव शक्ति’ आगम में।।
नहीं होने के योग्य नहीं होगी जो पर्यय ।
वह ‘अभाव-अभाव शक्ति’ का ही कमाल है।। २१ ।।
कारक से निरपेक्ष मात्र जो भवन रूप है।
‘भावशक्ति’ अद्भुत अनुपम ध्रुव परमधर्म है।।
कारक के अनुसार परिणमन करने वाली ।
‘क्रिया शक्ति’ भी निज आतम का ही स्वभाव है।। २२ ।।

‘कर्म शक्ति’ के कारण निर्मल परिणामों को।
प्राप्त करें यह स्वयं स्वयं में तन्मय होकर।।
‘कर्तृत्व शक्ति’ के कारण निर्मल परिणामों का।
कर्त्ता होवे स्वयं सदा स्वाधीन भाव से।। २३।।
‘करण शक्ति’ के कारण निर्मल परिणामों का।
साधकतम कारण है इसलिये स्वयं करण है।।
‘सम्प्रदान शक्ति’ से आतम स्वयं स्वयं को।
सम्यग्दर्शन आदि शुद्धभावों को देता।। २४।।
‘अपादान शक्ति’ के कारण वह रत्नत्रय।
अरे निरन्तर स्वयं स्वयं में से आता है।।
और ‘अधिकरण शक्ति’ से ही यह निज आतम।
बनता है आधार मुक्तिमारग का भाई।। २५।।
‘सम्बन्ध शक्ति’ यह बतलाती है कोई किसी का।
कोई नहीं है सब अपने-अपने स्वामी हैं।।
नहीं आतमा का कोई है इस जगती में।
और आतमा भी तो नहीं है और किसी का।। २६।।
सभी आतमा हैं अनन्त शक्ति के स्वामी।
हैं स्वभाव से परिपूरण भगवान् आतमा।।
साधक और साध्यभाव सब हैं अपने में।
अपने में ही समा जाँय बस यही भावना।। २७।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद-उपायोपेयगर्भितपरिशिष्टाय जयमाला पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा।

(दोहा)

अनन्त शक्ति सम्पन्न यह, ज्ञानमात्र जो भाव।
वही एक आराध्य है, अनुभव का आधार।। २८।।
सब कुछ इसमें आ गया, रहा न कुछ भी शेष।
निर्विकल्प अनुभव करो, हो आनन्द विशेष।। २९।।
(इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
।। इति ‘समयसार कलश महामण्डल विधान’ सम्पूर्णम् ।।

महाऽर्घ्य

(अडिल्ल)

पंच परम परमेष्ठी पूजूँ भाव से।
उनकी वाणी पूजूँ अधिक उछाह से।।
रतनत्रयमय परम शुद्ध उपयोग है।
दश धर्मों से मंडित पावन योग है।। १।।
गिरि कैलाश महान् और पावापुरी।
सम्मेदाचल गिरनारी चम्पापुरी।।
आदि अनेकों सिद्धक्षेत्र मन भावने।
और अनेकों अतिशय क्षेत्र सुहावने।। २।।
तीन लोक में थान-थान अति ही घने।
कृत्रिम और अकृत्रिम चैत्यालय बने।।
इन सबकी पूजन करता हूँ चाव से।
और भावना भाता अति उत्साह से।। ३।।
इन सबकी वंदना करूँ अति चाव से।
और भावना बारह भाऊँ भाव से।।
धर्मध्यान शुद्धोपयोग का योग है।
और परम तप स्वाध्याय संयोग है।। ४।।
इन सबकी भक्ति पूजन आराधना।
और आतमा में तन्मय हो साधना।।
यह सब चाहूँ और न कोई चाह है।
इन सबमें ही मेरा अति उत्साह है।। ५।।

(दोहा)

एकमात्र आराध्य है अपना ज्ञायकभाव।
उसमें तन्मय होय तो होय विभाव अभाव।। ६।।
ॐ ह्रीं श्री अरहंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधुपंचपरमेष्ठिभ्यो नमः
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रेभ्यो नमः उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नमः श्री सम्मेद
शिखर-गिरनारगिरि-कैलाशगिरि-चम्पापुर-पावापुर-आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः
अतिशयक्षेत्रेभ्यो नमः त्रिलोकसम्बन्धी कृत्रिमाकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो नमः
सर्वपूज्यपदेभ्यो नमः महार्घ्यं …
१. अपूर्व अवसर ऐसा किस दिन आएगा? … की धुन पर गायें।

शान्ति पाठ

( हरिगीत )

हे शान्ति के सागर जिनेश्वर ! शान्ति के ही रूप हो।
नाशाग्रदृष्टि शान्त मुद्रा स्वयं शान्तिस्वरूप हो।।
सारे जगत् में शान्ति हो सारा जगत् यह चाहता।
किन्तु सारे जगत् को अपना बनाना चाहता।। १ ।।
जबकि इक अणुमात्र भी तो जगत् में इसका नहीं।
अधिक क्या अणुमात्र को अपना बना सकता नहीं।।
यह बात शाश्वत सत्य है कोई किसी का रंच भी।
अच्छा-बुरा या अन्य कुछ भी कभी कर सकता नहीं।। २ ।।
मारना अर बचाना या दुःख-सुख का दान भी।
कोई किसी का ना करे आदान और प्रदान भी।।
यह बात केवलि ने कही जिनशास्त्र में उल्लेख है।
जैन शासन में समझ लो यह छठी का लेख है।। ३ ।।
शान्ति और अशान्ति ये तो आतमा के भाव हैं।
कोई किसी के क्यों करे ये तो स्वयं के भाव हैं।।
रे स्वयं मिथ्या मान्यता को बुद्धिपूर्वक छोड़ दें।
एवं स्वयं ही स्वयं में निज आतमा को जोड़ दें।। ४ ।।

शान्ति होती प्राप्त केवल आतमा के ज्ञान से।
आतमा के ज्ञान से अर आतमा के ध्यान से ।।
यह ही परमसत्यार्थ है यह ही परम भूतार्थ है।
और सब व्यवहार है बस एक यह परमार्थ है।। ५ ।।
व्यवहार से हम भावना भाते सुखी संसार हो।
सुख-शान्ति चारों ओर हो ना समृद्धि का पार हो।।
अनुकूलता हो सब तरफ न आर हो न पार हो।
अधिक क्या अब हम कहें बस सब सुखी संसार हो ।। ६ ।।

(दोहा)

सभी जीव इस लोक के सुखी रहें सर्वत्र ।
मौसम की अनुकूलता बनी रहे सर्वत्र ।। ७ ।।

विसर्जन पाठ

(दोहा)

जो कुछ जैसी बन पड़ी अपनी शक्ति प्रमाण।
हमने पूजन की प्रभो अपनी भक्ति प्रमाण।। १ ।।
हमने जाना जो प्रभो जिनवाणी का मर्म।
उसके ही अनुसार सब यह व्यवहारिक धर्म ।। २ ।।
इसमें जो कुछ रहीं हों कमियाँ विविध प्रकार।
विधि के जाननहार जन इसमें करें सुधार।। ३ ।।
–●–


Artist: डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
स्रोत: समयसार कलश महामण्डल विधान

प्रूफरीडिंग बाकी है