प्रक्षाल पाठ
( दोहा )
भक्तिभाव से हम करें जिन प्रतिमा प्रक्षाल।
अरे विकारी भाव का हो जावे प्रक्षाल ।। १ ।।
दिन का शुभ आरंभ हो चित्त रहे निर्भ्रान्त१।
प्रतिमा के प्रक्षाल से मन हो जावे शान्त।। २ ।।
( हरिगीतिका )
यद्यपि इस काल में अरहंत जिन उपलब्ध ना।
किन्तु हमारे भाग्य से जिनबिंब तो उपलब्ध हैं।।
जिनबिंब का प्रक्षाल पूजन और दर्शन भाव से।
जो भाग्यशाली करें प्रतिदिन भाव से अति चाव से।। ३ ।।
वे भाग्यशाली भव्य निज हित कार्य में नित रत रहें।
आपके गुणगान वे नित निरन्तर करते रहें।।
निज आतमा को जानकर वे शीघ्र ही भव पार हों।
निज आतमा का ध्यान धर वे भवजलधि से पार हों ।। ४ ।।
जिसतरह समव-शरण में अरहंत जिन विद्यमान हैं।
और उनका इस जगत् में उच्चतम स्थान है।।
व्यवहार होता जिसतरह का अरे उनके सामने।
बस उसतरह की विनय हो जिनमूर्तियों के सामने ।। ५ ।।
१. जिसमें कोई सन्देह या भ्रम न हो।
यदि मूर्तियाँ हों प्रतिष्ठित स्थापना निक्षेप से।
अरहंत सम ही पूज्य हैं जिनमार्ग में व्यवहार से।।
अरे कृत्रिम-अकृत्रिम जिनबिंब जितने लोक में।
वे पूज्य हैं शत इन्द्र कर जिनशास्त्र के आलोक में ।। ६ ।।
अति विनयपूर्वक बिंब का प्रक्षाल होना चाहिये।
अर दिवस में प्रत्येक दिन इकबार होना चाहिये ।।
स्वस्थ तन-मन स्वच्छ पट अर सावधानी पूर्वक।
सद्भाव से ही पुरुष को प्रक्षाल करना चाहिये ।। ७ ।।
प्रत्येक नर-नारी अरे पूजन करे प्रत्येक दिन ।
प्रक्षाल तो बस एक जन इकबार ही दिन में करे।।
प्रक्षाल पूजन अंग ना प्रत्येक को अनिवार्य ना।
प्रक्षाल तो इक बिंब का इक बार होना चाहिये ।। ८ ।।
छवि वीतरागी शान्त मुद्रा कही है जिनदेव की।
जिनमूर्ति की भी शान्त मुद्रा वीतरागी छवि कही।।
‘जिनमूर्तियाँ हों मुस्कुराती’ - कभी हो सकता नहीं।
और हँसना वीतरागी भाव हो सकता नहीं।। ९ ।।
जब वीतरागी जिनवरों का न्हवन हो सकता नहीं।
एवं दिगम्बर मुनिवरों का न्हवन हो सकता नहीं।।
जब मुनिवरों के मूलगुण में एक गुण अस्नान है।
तब प्रतिष्ठित मूर्तियों का न्हवन होवे किस तरह ? ।। १० ।।
प्रक्षाल पाठ
बस इसलिये जिनमूर्तियों को स्वच्छ रखने के लिये।
और अपनी भावना को व्यक्त करने के लिये।।
अरे प्रासुक नीर से प्रक्षाल करना चाहिये।
न्हवन ना अभिषेक ना प्रक्षाल होना चाहिये ।। ११ ।।
जिनबिंब का स्पर्श महिला वर्ग कर सकता नहीं।
जिनबिंब का प्रक्षाल महिला वर्ग कर सकता नहीं।।
दिगम्बर जिनबिंब से सम्पूर्ण महिला वर्ग को।
एक सीमा तक सुनिश्चित दूर रहना चाहिये ।। १२ ।।
क्योंकि ये जिनबिंब जिनवरदेव के प्रतिबिंब हैं।
वीतरागी सर्वज्ञानी देव के ही बिंब हैं।।
उन बिंब का जिनबिंब का अति हर्ष से उल्लास से।
प्रक्षाल सब जन कर रहे अत्यन्त निर्मल भाव से।। १३ ।।
जिनबिंब का प्रक्षाल जो जन करें निर्मलभाव से।
और पूजन करें प्रतिदिन भाव से अति चाव से।।
जिन शास्त्र का स्वाध्याय एवं रहें संयमभाव से।
वे भव्यजन भवपार होंगे स्वयं के आधार से ।। १४ ।।
(दोहा)
महाभाग्य हमने किया जिन प्रतिमा प्रक्षाल।
चरणों में जिनबिंब के सदा नवावें भाल।। १५ ।।
भक्तिभाव से जो करें जिन प्रतिमा प्रक्षाल ।
निज आतम का ध्यान धर वे होवें भव पार।। १६ ।।
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विनय पाठ
( दोहा )
अरहंतों को नमन कर नमूँ सिद्ध भगवान् ।
आचारज उवझाय अर सर्व साधु गुणखान।। १ ।।
मोक्ष मोक्ष के मार्ग में विद्यमान जो जीव।
यथायोग्य नम कर प्रभो वन्दन करूँ सदीव ।। २ ।।
चौबीसों जिनराज की दिव्यध्वनि अनुसार।
ज्ञानिजनों ने जो लिखी वाणी विविधप्रकार।। ३ ।।
नय-प्रमाण से विविधविध कही तत्त्व की बात।
भविकजनों के लिये जो एकमात्र आधार।। ४ ।।
सब द्रव्यों के सभी गुण अर सामान्य-विशेष।
आज सभी को सहज ही हैं उपलब्ध अशेष ।। ५ ।।
जिनवाणी उपलब्ध है उसे बतावनहार ।
बहुत अधिक दुर्लभ नहीं उसके जाननहार ।। ६ ।।
मोहनींद में जो पड़े नहीं कोई आधार।
साधर्मीजन कम नहीं उन्हें जगावनहार।। ७ ।।
सारा जग बेचेत है मोहनींद के द्वार।
किन्तु हमें उपलब्ध हैं मार्ग बतावनहार ।। ८ ।।
महाभाग्य से प्राप्त हो देव-गुरु संयोग।
पर जिनवाणी मात की शरण सहज संयोग ।। ९ ।।
विनय पाठ
उसके अध्ययन मनन से चिन्तन से निजतत्व ।
जाना जाता सहज ही होता है सम्यक्त्व।। १० ।।
जिनवाणी के मर्म को अरे जानने योग्य।
ज्ञान प्रगट पर्याय में होवे सहज संयोग¹।। ११ ।।
और कषायें मन्द हों भाव रहें निष्काम।
एक आतमा में लगे छोड़ हजारों काम²।। १२ ।।
देव-गुरु संयोग या जिनवाणी के योग।
तत्व श्रवण में मन लगे और न मन में रोग³।। १३ ।।
अरे क्षयोपशम विशुद्धि और देशना लब्धि।
जिसके ये तीनों बने उसे तत्त्व उपलब्धि।। १४ ।।
आतम में अति अधिक रुचि जब होवे सर्वांग।
विशेष तरह की योग्यता वह लब्धि प्रायोग्य।। १५ ।।
आतम का उपयोग जब आतम में रमजाय।
करणलब्धि है आतमा आतम माँहि समाय।। १६ ।।
करणलब्धि के अन्त में आतम अनुभव होय।
सम्यग्दर्शन प्राप्त हो मन रोमांचित होय।। १७ ।।
तीर्थंकर चौबीस ही हमें जगावनहार।
जागें आतम में लगें हो जावें भव पार।। १८ ।।
देव-शास्त्र-गुरु की कृपा से कटता संसार।
नमन करूँ इन सभी को भगवन् बारंबार।। १९ ।।
अरे हमारा आतमा आतम में रम जाय।
अन्य न कोई चाह मन आतम माहि समाय।। २० ।।
१. क्षयोपशम लब्धि २. विशुद्धि लब्धि ३. देशना लब्धि
पूजा पीठिका
ॐ जय जय जय ! नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु ।
(वीर)
अरहंतों को सब सिद्धों को आचार्यों को करूँ प्रणाम।
उपाध्याय एवं त्रिलोक के सर्व साधुओं को अभिराम ।। १ ।।
ॐ ह्रीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः पुष्पांजलि क्षिपामि।
अरे चार मंगल हैं जग में अर्हत सिद्ध साहु मंगल।
और केवली कथित जगत् में होता परम धरम मंगल ।। २ ।।
और चार ही लोकोत्तम अर्हत सिद्ध साहु उत्तम।
और केवली कथित जगत् में होता परम धरम उत्तम।। ३ ।।
अरे चार की शरणा जाऊँ अर्हत सिद्ध साहु शरणा।
और केवली कथित लोक में जाऊँ परम धरम शरणा ।। ४ ।।
( हरिगीत )
परमेष्ठी सम शुद्धात्मा भी शरण है इस लोक में।
है परम मंगल परम उत्तम शरण भी इस लोक में ।।
व्यवहार से परमेष्ठी परमार्थ से शुद्धात्मा ।
की शरण में नित हम रहें जिनमार्ग के आलोक में ।। ५ ।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा पुष्पांजलि क्षिपामि।
मंगल विधान
(वीर)
हो अपवित्र-पवित्र और सुस्थित हो अथवा दुःस्थित हो।
सब पापों से छूट जाय वह नमोकार को ध्यावे जो।। १ ।।
हो अपवित्र-पवित्र अधिक क्या किसी अवस्था में भी हो।
अन्दर-बाहर से पवित्र निज परमातम को ध्यावे जो।। २ ।।
अपराजित यह मंत्र सभी विघ्नों का परमविनाशक है।
सभी मंगलों में मंगल यह पावन पहला मंगल है।। ३ ।।
सब पापों का नाशक है यह महामंत्र मंगलमय है।
सभी मंगलों में यह अद्भुत पावन पहला मंगल है।। ४ ।।
‘अर्ह’ ये अक्षर परमेष्ठी परमब्रह्म के वाचक हैं।
सिद्धचक्र के बीज मनोहर नमस्कार हम करते हैं।। ५ ।।
अष्टकर्म से रहित मोक्षलक्ष्मी के सुखद निकेतन हैं।
सम्यक्त्वादि अष्टगुणों से सहित सिद्ध को नमते हैं।। ६ ।।
जिनवर की स्तुति करने से विघ्न विलय हो जाते हैं।
भूत डाकिनी एवं विषभय सभी विघ्न टर जाते हैं।। ७ ।।
(पुष्पांजलि क्षिपेत् )
जिनसहस्रनाम अर्घ्य
(वीर)
जल चन्दन अक्षत सुमन चरु, अर दीप धूप फल द्रव्यमयी।
अर्घ्य समर्पण करता हूँ मैं श्रीजिनवर आनन्दमयी ।।
ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिनसहस्रनामेभ्योर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।
पूजा प्रतिज्ञा पाठ
(वीर)
अनन्तचतुष्टय पद के धारी स्याद्वाद के नायक की।
पूजन करता नमस्कार कर तीन लोक परमेश्वर की।।
मूलसंघ के सम्यग्दृष्टि उनके सत्कर्मों के हेतु ।
मेरे द्वारा कही जा रही यह जैनेन्द्रयज्ञविधि सेतु ।। १ ।।
जिनपुंगव त्रैलोक्य गुरु की स्वस्ति हो कल्याणमयी।
जिनका रे सुस्थित स्वभाव महिमामय है कल्याणमयी ।।
सहज प्रकाशमयी दृगज्योति मंगल मंगलदाता है।
स्वस्ति मंगल अद्भुत वैभव अति आनन्द प्रदाता है।। २ ।।
रे स्वभाव-परभाव सभी को करे प्रकाशित निर्मल ज्ञान ।
अमृतमय वह ज्ञान मनोहर उछले अन्तर महिमावान।।
तीन लोक अर तीनकाल में विस्तृत है अति व्यापक है।
तीन लोक एवं त्रिकाल की पर्यायों का ज्ञायक है।। ३ ।।
यथायोग्य है द्रव्य शुद्धि पर भावशुद्धि पूरी चाहूँ।
अरे विविध आलंबन लेकर शुद्धभाव को अपनाऊँ।।
जो सचमुच भूतार्थ पुरुष हैं पावन हैं अतिपावन हैं।
उनकी पूजा करूँ ध्यान से जो अति ही मनभावन हैं।। ४ ।।
जिनकी केवलज्ञान ज्योति में सभी भाव भासित होते।
वे अर्हन् पुराण पुरुषोत्तम परम भाव भावित होते।।
उनकी केवलज्ञान बह्नि में मैं अपने पूरे मन से।
सभी पुण्य अर्पित करता हूँ निकला चाहूँ भव वन से।। ५ ।।
ॐ ह्रीं यज्ञप्रतिज्ञायै प्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
स्वस्ति मंगल पाठ
(चौपाई )
स्वस्ति श्री श्री ऋषभ जिनेश, स्वस्ति करें जिनवर अजितेश ।
संभव करें असंभव द्वेष, अभिनन्दन दुख हरें अशेष ।। १ ।।
सुमति प्रदाता सुमति जिनेश, पद्मप्रभ जिनवर पद्येश।
जय सुपार्श्व पारस सम जान, चन्द्रप्रभ जिन चन्द्र समान।। २ ।।
परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ
सुविधिनाथ विधिनाशनहार, शीतल शीतलता दातार।
जय श्रेयांश श्रेय करतार, वासुपूज्य शिवसुख दातार।। ३ ।।
विमल विमल जीवन दातार, श्री अनन्त आनन्द अपार।
धर्म कहें संसार असार, शान्ति अनन्त शान्ति दातार ।। ४ ।।
कुन्थु कुन्थु के रक्षणहार, अरजिन आनन्द के अवतार।
जीता है मन मल्लि जिनेश, मुनिसुव्रत व्रत धरें अशेष ।। ५ ।।
नमि चरणों में नमें नरेश, जीता मन्मथ नेमि जिनेश।
पारस पारस से दातार, वीर अहिंसा के अवतार ।। ६ ।।
(दोहा)
चौबीसों जिनराज ही मंगल मंगल हेतु ।
स्वस्ति स्वरूप विराजहीं सबको मंगल देतु ।। ७ ।।
(पुष्पांजलि क्षिपेत् )
परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ
( हरिगीत )
ज्ञानी तपस्वी मुनिवरों को ऋद्धियाँ उपलब्ध हों।
पर ऋद्धियों की सिद्धियों पर रंच न वे मुग्ध हों।।
वे तो निरन्तर लीन रहते आतमा के ज्ञान में।
आतमा के चिन्तवन निज आतमा के ध्यान में ।। १ ।।
अरे चौंसठ ऋद्धियों में प्रथम केवलज्ञान है।
दूसरी है मनःपर्यय तृतीय अवधीज्ञान है।।
इत्यादि चौंसठ ऋद्धियाँ सब ज्ञान का विस्तार है।
रे ज्ञान के विस्तार का न आर है न पार है।। २ ।।
अन्य लौकिक सिद्धियाँ भी ऋद्धियों से प्राप्त हो।
पर मुनिवरों को उन सभी से नहीं कोई राग हो।।
वे तो स्वयं में जम गये वे तो स्वयं में रम गये।
सारे जगत् से विमुख हो सद्ज्ञान में परिणम गये।। ३ ।।
आतमा के चिन्तवन में आतमा के ज्ञान में।
वे तो निरन्तर लगे रहते आतमा के ध्यान में।।
कैसे कहें उन मुनिवरों से तुम बताओ हे प्रभो।
निज आतमा को छोड़कर हे प्रभो हम पर ध्यान दो।। ४ ।।
नहीं कोई किसी का कुछ भी करे इस लोक में।
यह जानते हैं सभी आगम ज्ञान के आलोक में।।
सब जानते हैं समझते व्यवहार में यों बह रहे।
उन ऋद्धिधारी ऋषिवरों से प्रभो फिर भी कह रहे।। ५ ।।
रे ऋद्धिधारी मुनिवरो! कल्याण सब जग का करो।
अज्ञान मोहित जगत् की दुर्गति मुनिवर परिहरो।।
यह जगत् मिथ्यामार्ग तज सन्मार्ग में वर्तन करे।
जिनशास्त्र का स्वाध्याय कर निजज्ञान का मार्जन करे।। ६ ।।
अन्याय और अनीति छोड़े अभक्ष्य भक्षण न करे।
न्याय एवं नीति से सन्मार्ग पर आगे बढ़े।।
होवे अहिंसक आचरण आहार और विहार में।
सावधानी रखें हम व्यवहार में व्यापार में।। ७ ।।
( दोहा )
सभी संत मंगलमयी मंगल के आधार।
मल गाले मंगल करें करें मंगलाचार।। ८ ।।
सभी ऋद्धियों के धनी सभी दिगम्बर संत।
और कछु नहिं चाहिये चाहे भव का अंत।। ९ ।।
(इति परमर्षि स्वस्ति मंगल विधानं पुष्पांजलि क्षिपेत् )
-●-
देव-शास्त्र-गुरु-पूजन
( दोहा )
शुद्धब्रह्म परमात्मा, शब्दब्रह्म जिनवाणि।
शुद्धातम साधकदशा, नमौं जोड़ जुगपाणि।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
आशा की प्यास बुझाने को, अबतक मृगतृष्णा में भटका।
जल समझ विषय-विष भोगों को, उनकी ममता में था अटका।।
लख सौम्यदृष्टि तेरी प्रभुवर, समता-रस पीने आया हूँ।
इस जल ने प्यास बुझाई ना, इसको लौटाने लाया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
क्रोधानल से जब जला हृदय, चन्दन ने कोई न काम किया।
तन को तो शान्त किया इसने, मन को न मगर आराम दिया।।
संसार-ताप से तप्त हृदय, सन्ताप मिटाने आया हूँ।
चरणों में चन्दन अर्पण कर, शीतलता पाने आया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अभिमान किया अबतक जड़ पर, अक्षयनिधि को ना पहचाना।
मैं जड़ का हूँ जड़ मेरा है, यह सोच बना था मस्ताना।।
क्षत में विश्वास किया अबतक, अक्षत को प्रभुवर ना जाना।
अभिमान की आन मिटाने को, अक्षयनिधि तुम को पहिचाना।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
दिन-रात वासना में रहकर, मेरे मन ने प्रभु सुख माना।
पुरुषत्व गँवाया पर प्रभुवर, उसके छल को ना पहिचाना ।।
माया ने डाला जाल प्रथम, कामुकता ने फिर बाँध लिया।
उसका प्रमाण यह पुष्प-बाण, लाकर के प्रभुवर भेंट किया ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
पर पुद्गल का भक्षण करके, यह भूख मिटानी चाही थी।
इस नागिन से बचने को प्रभु, हर चीज बनाकर खाई थी।।
मिष्टान्न अनेक बनाये थे, दिन-रात भखे न मिटी प्रभुवर ।
अब संयम-भाव जगाने को, लाया हूँ ये सब थाली भर।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पहले अज्ञान मिटाने को, दीपक था जग में उजियाला।
उससे न हुआ कुछ तब युग ने, बिजली का बल्ब जला डाला।।
प्रभु भेद-ज्ञान की आँख न थी, क्या कर सकती थी यह ज्वाला।
यह ज्ञान है कि अज्ञान कहो, तुमको भी दीप दिखा डाला ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ-कर्म कमाऊँ सुख होगा, अबतक मैंने यह माना था।
पाप कर्म को त्याग पुण्य को, चाह रहा अपनाना था।।
किन्तु समझ कर शत्रु कर्म को, आज जलाने आया हूँ।
लेकर दशांग यह धूप, कर्म की धूम उड़ाने आया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्योः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
भोगों को अमृतफल जाना, विषयों में निश-दिन मस्त रहा।
उनके संग्रह में हे प्रभुवर ! मैं व्यस्त-त्रस्त-अभ्यस्त रहा ।।
शुद्धात्मप्रभा जो अनुपम फल, मैं उसे खोजने आया हूँ।
प्रभु सरस सुवासित ये जड़फल, मैं तुम्हें चढ़ाने लाया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
बहुमूल्य जगत् का वैभव यह, क्या हमको सुखी बना सकता।
अरे पूर्णता पाने में, इसकी क्या है आवश्यकता ।।
मैं स्वयं पूर्ण हूँ अपने में, प्रभु है अनर्घ्य मेरी माया।
बहुमूल्य द्रव्यमय अर्घ्य लिये, अर्पण के हेतु चला आया ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
समयसार जिनदेव हैं, जिन-प्रवचन जिनवाणि।
नियमसार निर्ग्रन्थ गुरु, करें कर्म की हानि ।।
(वीरछन्द)
हे वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, तुमको ना अबतक पहिचाना।
अतएव पड़ रहे हैं प्रभुवर, चौरासी के चक्कर खाना ।।
करुणानिधि तुमको समझ नाथ, भगवान् भरोसे पड़ा रहा।
भरपूर सुखी कर दोगे तुम, यह सोचे सन्मुख खड़ा रहा।।
तुम वीतराग हो लीन स्वयं में, कभी न मैंने यह जाना।
तुम हो निरीह जग से कृत-कृत, इतना ना मैंने पहिचाना ।।
प्रभु वीतराग की वाणी में, जैसा जो तत्त्व दिखाया है।
जो होना है सो निश्चित है, केवलज्ञानी ने गाया है।।
उस पर तो श्रद्धा ला न सका, परिवर्तन का अभिमान किया।
बनकर पर का कर्त्ता अब तक, सत् का न प्रभो सम्मान किया ।।
भगवान् तुम्हारी वाणी में, जैसा जो तत्त्व दिखाया है।
स्याद्वाद-नय, अनेकान्त-मय, समयसार समझाया है।।
उस पर तो ध्यान दिया न प्रभो, विकथा में समय गँवाया है।
शुद्धात्म-रुचि न हुई मन में, ना मन को उधर लगाया है।।
मैं समझ न पाया था अबतक, जिनवाणी किसको कहते हैं।
प्रभु वीतराग की वाणी में, कैसे क्या तत्त्व निकलते हैं।।
राग धर्ममय धर्म रागमय, अबतक ऐसा जाना था।
शुभ-कर्म कमाते सुख होगा, बस अबतक ऐसा माना था।।
पर आज समझ में आया है, कि वीतरागता धर्म अहा।
राग-भाव में धर्म मानना, जिनमत में मिथ्यात्व कहा।।
वीतरागता की पोषक ही, जिनवाणी कहलाती है।
यह है मुक्ति का मार्ग निरन्तर, हम को जो दिखलाती है।।
उस वाणी के अन्तर्तम को, जिन गुरुओं ने पहिचाना है।
उन गुरुवर्यों के चरणों में, मस्तक बस हमें झुकाना है।।
दिन-रात आत्मा का चिन्तन, मृदु सम्भाषण में वही कथन।
निर्वस्त्र दिगम्बर काया से भी, प्रकट हो रहा अन्तर्मन ।।
निर्ग्रन्थ दिगम्बर सद्ज्ञानी, स्वातम में सदा विचरते जो।
ज्ञानी-ध्यानी-समरससानी, द्वादश विधि तप नित करते जो।।
चलते-फिरते सिद्धों-से गुरु-चरणों में शीश झुकाते हैं।
हम चलें आपके कदमों पर, नित यही भावना भाते हैं।।
हो नमस्कार शुद्धातम को, हो नमस्कार जिनवर वाणी।
हो नमस्कार उन गुरुओं को, जिनकी चर्या समरससानी।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा
(दोहा)
दर्शन दाता देव हैं, आगम सम्यग्ज्ञान ।
गुरु चारित्र की खानि हैं, मैं वंदौं धरि ध्यान ।।
(इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
●
ॐ
मंगलाचरण
( अडिल्ल )
समयसार का एकमात्र प्रतिपाद्य जो ।
आत्मख्याति का एकमात्र आराध्य जो।।
अज अनादि अनिधन अविचल सद्भाव जो ।
त्रैकालिक ध्रुव सुखमय ज्ञायकभाव जो ।। १ ।।
परमशुद्धनिश्चयनय का है ज्ञेय जो।
सत्श्रद्धा का एकमात्र श्रद्धेय जो।।
परमध्यान का ध्येय उसे ही ध्याऊँ मैं।
उसे प्राप्त कर उसमें ही रम जाऊँ मैं ।। २ ।।
१. अपूर्व अवसर ऐसा किस दिन आएगा ? … की धुन पर गायें।
अपनापन हो निज आतम में नित्य ही।
अपना जानूँ निज आतम को नित्य ही ।।
रहे निरन्तर निज आतम में ही रमन ।
रहूँ निरन्तर निज आतम में ही मगन ।। ५ ॥
अन्य न कोई हो विकल्प हे आत्मन् ! ।
निज आतम का ज्ञान-ध्यान-चिन्तन-मनन ।।
गहराई से होय निरन्तर अध्ययन ।
निश-दिन ही बस रहे निरन्तर एक धुन ।। ६ ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
समयसार कलश अद्भुत और अजोड़
आचार्य अमृतचन्द्र ने समयसार की विषयवस्तु को लेकर
अध्यात्मरस से सरावोर २७८ छन्द लिखे हैं, जो ‘आत्मख्याति’ नामक
संस्कृत टीका के ही अभिन्न अंग हैं। आत्मख्याति टीकारूपी स्वर्णहार
में वे मुक्तामणियों की भाँति यथास्थान जड़े हुए हैं। इसप्रकार इस
आत्मख्याति टीका में विविधवर्णी छन्दों और प्रांजल गद्य का मणिकांचन
संयोग हो रहा है।
विषयवस्तु के अनुसार विविधवर्णी छन्दों में रचित और विभिन्न
अलंकारों से अलंकृत ये छन्द ‘कलश’ नाम से जाने जाते हैं। आत्मख्याति
से सुसज्जित समयसाररूपी मन्दिर के गगनचुम्बी शिखर पर आरोहित ये
कलश अपने आप में अद्भुत हैं, अजोड़ हैं।
– समयसार अनुशीलन भाग-१, पृष्ठ-१२८
समयसार कलश पूजन
स्थापना
(रोला )
समयसार की आत्मख्याति नामक टीका में।
आये हैं जो छन्द विविध अत्यन्त मनोरम ।।
वे मनमोहक छन्द हृदय को हर लेते हैं।
आत्मतत्त्व का प्रतिपादन उनमें अति मनहर ।। १।।
समयसार के कलश उन्हीं को कहते हैं सब।
उन कलशों में मानों अमृत भरा हुआ है।।
आतम रस से भरे हुये उन कलशों का ही।
आज कर रहे हैं हम सब वन्दन-अभिनन्दन।। २।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम !! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ, ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागम!!! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( अवतार )
जल
निर्मल जल शुद्ध स्वरूप, अपने अन्तर में।
पावन कर लूँ निजरूप, अपने इस भव में ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय जन्म-जरा-मत्यु-विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन
शीतल चन्दन-सा शान्त, अपना आतम है।
निज नित्य निरंजन जान, परम परमातम है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं
निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
अक्षत जो आतमराम, उसमें अपनापन ।
करके हम अपने आप, करें सम्यग्दर्शन ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
निर्गन्ध आतमाराम, सुख का सागर है।
पुष्पों का है क्या काम, अगन्ध अपना घर है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमाय काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।
नैवेद्य
अत्यन्त मधुर शुद्धात्म-रूपी चरु लेकर ।
हे समयसार जिनराज ! तुमको अर्पित कर ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।
दीप
यह समयसार-सा दीप, आतम परकाशक ।
महिमा है अगम अनूप, अद्भुत सुखदायक ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय मोहान्धकार-विनाशयनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
निज समयसारमय धूप, कर्मेन्धन दाहे।
निर्मल शुद्धात्मस्वरूप, अनुपम अपना है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं नि. स्वाहा।
फल
निज समयसार के ध्यान, का है अनुपम फल ।
जो करे ध्यान से ध्यान, वही हो जाय सफल ।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।
अर्घ्य
यह समयसार बहुमूल्य, अद्भुत अनुपम है।
मिट जावे सब अज्ञान, हमारा अनुभव है।।
अत्यन्त मधुर ये छन्द, आगम की निधि हैं।
इनमें अत्यन्त सुबोध, शिवमग की विधि है।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय अनर्घ्य-पद-प्राप्तयेऽर्घ्यं नि. स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
समयसार को साधकर, बने सिद्ध भगवान् ।
अनन्त चतुष्टय के धनी, श्री अरिहन्त महान् ।। १।।
आचारज पाठक मुनी, प्रमत्त और अप्रमत्त ।
गुण में नित विचरण करें, नमन करूँ मैं नित्य ।। २।।
(रोला)
संस्कृत भाषा में निर्मित अत्यन्त मनोरम ।
अरे विविध-विध छन्दों और अलंकारों से ।।
सज्जित इनको सभी लोग कलशा कहते हैं।
आतम रस से भरे कलश मन को हरते हैं।।३।।
अध्यात्म रसामृत कूट-कूट कर खूब भरा है।
अमृतचन्द्राचार्यदेव ने इन कलशों में ।।
समयसार का सार आ गया इन कलशों में।
अमृतसागर समा गया है इन कलशों में ।।४।।
परम विशुद्धि आतम की हो यद्यपि उनने।
इसी भावना से सब अमृत कलश लिखे थे।।
फिर भी इनमें जो अनुपम अमृत बरसा है।
उसकी महिमा अद्भुत है एवं अपार है।।५।।
इतने अनुपम कलश लिखे फिर भी कहते हैं।
मैंने नहीं लिखे ये पुद्गल की रचना है।।
इन सबका कर्त्ता मैं हूँ – ऐसा तुम कहकर ।
अधिक कहें क्या व्यर्थ मोह में नाच रहे हो।।६।।
यद्यपि आये आत्मख्याति टीका के भीतर।
पर स्वतंत्र ग्रन्थों जैसा गौरव पाया है।।
कई स्वतंत्र टीकायें इन पर लिखीं गई हैं।
अधिक कहें क्या ये अपने में स्वयं पूर्ण हैं।।७।।
परमागम के कई रहस्य इनमें आये हैं।
ये हजार वर्षों से निरन्तर पढ़े जा रहे।।
सबसे पहले हिन्दी गद्य में राजमल्ल ने।
इनकी टीका लिखी मनोहर बालबोधनी ।।८।।
उसको पढ़कर रीझ गये कविवर बनारसी।
उनने उनपर छन्द लिखे अत्यन्त मनोहर ।।
समयसार नाटक के नाम से जाने जाते ।
सभी मुमुक्षु उन्हें प्रेम से गाते रहते ।। ९ ।।
मैंने भी तो अरे किया है इन छन्दों का।
अक्षरशः पद्यानुवाद हिन्दी भाषा में।।
आगे चलकर इस विधान की अर्ध्यावलि में ।।
आप स्वयं ही उसका आस्वादन कर लेंगे ।।१०।।
(दोहा)
अरे ध्यान से पढ़े सब, कलशों का अनुवाद।
आ जावेगा ध्यान में, जिन आगम का सार ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री समयसारकलशपरमागमाय जयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा )
महिमा शुद्धस्वभाव की, जिसका आर न पार ।
ये कलशा गाते रहें, अद्भुत और अपार ।। १२।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
पूर्वरंग-समन्वित जीव-अजीव अधिकार पूजन
( अवतार )
जल
पूर्वरंग-समन्वित
जीव-अजीव अधिकार पूजन
स्थापना
( हरिगीत )
जगत् के चेतन-अचेतन, तत्त्व की यह बात है।
जीव और अजीव के, अधिकार की यह बात है ।।
आतमा की बात है, परमातमा की बात है।
परम अनुपम शुद्ध ज्ञायकभाव की यह बात है ।।
( दोहा)
देहादिक से भिन्न जो, पर्यायों से पार ।
ज्ञानस्वभावी आतमा, दे आनन्द अपार ।।
वर्णादि - रागादि से, है यह आतम भिन्न।
शुद्ध बुद्ध चैतन्यमय, और अखण्ड अनन्य ।।
जीव-अजीव अधिकार की, पूजन परमानन्द ।
भक्तिभाव से करें तो, कटें करम के फन्द ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-समन्वित-
श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ, ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकार ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् ।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
यह जल मलनाशक वस्तु, अनुपम निर्मल है।
रे! तृषा-वेदनाशान्त-करन को शीतल है ।।
रे ! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान’-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय जन्म-जरा-मत्यु-विनाशनाय जलं नि. स्वाहा।
चन्दन
भव-तप-हर चन्दन-गन्ध, शशि-समशीतल है।
इसका आराधक आज, सभी भूमण्डल है।।
रे ! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय संसार-ताप-विनाशनाय चन्दनं निर्व. स्वाहा।
अक्षत
अक्षत आतम अभिराम, अमर अविनाशी है।
इस आतम का गुणगान, सभी करते ही है ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
सुर-तरु के पुष्प अनेक, सुर-गण लावत हैं।
१. लोकालोक के
है समयसार गुण-खान, गणधर गावत हैं।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय काम-बाण-विध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।
नैवेद्य
नैवेद्य मधुर गुणखान, षट्रस के लाया।
ना तृप्त हुआ भगवान्, भक्ती से लाया ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।
दीप
तमहर दीपक ना देव, मोहतम नाश करे।
शरणा मैं आया नाथ, मोहतम नाश करो ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय मोहान्धकार-विनाशयनाय दीपं नि. स्वाहा।
धूप
यह धूप दशांगी नाथ!, न कर्म की नाशक है।
यह आतम है सुखधाम, स्व-परप्रकाशक है।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अष्ट-कर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
फल
ताजे प्रासुक फल आज, लेकर आया हूँ।
हो सफल भावना आज, शरण में आया हूँ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान-, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय मोक्ष-फल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्घ्य
यह अर्घ्य अनर्घ्य महान्, लेकर मैं आया ।
चरणों में अर्पित नाथ, करने को आया ।।
रे! यह अधिकार महान्, वस्तु का प्रतिपादक ।
आतम अभिराम जहान, ज्ञेयों का ज्ञायक ।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंग-
समन्वित-श्रीजीवा-ऽजीवाधिकाराय अनर्घ्य-पद-प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली
।। पूर्वरंग ।।
( दोहा)
देहादिक से भिन्न जो, पर्यायों से पार।
ज्ञानस्वभावी आतमा, दे आनन्द अपार ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
१. नोट – इस विधान में अर्ध्यावली के अन्तर्गत समयसार की टीका आत्मख्याति में समागत
कलशों के डॉ. भारिल्लकृत पद्यानुवादों का प्रयोग किया गया है; उनके क्रमांक भी
मूलानुगामी रखे गये हैं। पाठकगण, इनकी विस्तृत व्याख्या हेतु ज्ञायकभाव-प्रबोधिनी
टीका का अच्छी तरह अध्ययन करें।
सर्वप्रथम आचार्य अमृतचन्द्रदेव आत्मख्याति टीका के मंगलाचरण में
तीन कलशों के माध्यम से ‘भगवान् आत्मा व अनेकान्तमयी जिनवाणी माता’
को नमस्कार करके, टीका लिखने का प्रयोजन’ प्रगट करते हैं -
( दोहा )
निज अनुभूति से प्रगट, चित्स्वभाव चिद्रूप ।
सकलज्ञेय-ज्ञायक नमौं, समयसार सद्रूप ।।१।।
ॐ ह्रीं आत्मख्याति-मंगलाचरणयुक्त-श्रीसमयसाराय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा ।। १ ।।
( सोरठा )
देखे पर से भिन्न, अगणित गुणमय आतमा ।
अनेकान्तमय-मूर्ति, सदा प्रकाशित ही रहे ।।२।।
ॐ ह्रीं अनेकान्तमूर्तये श्रीसरस्वतीदेव्यै नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।२।।
( रोला )
यद्यपि मैं तो शुद्ध मात्र चैतन्यमूर्ति हूँ,
फिर भी परिणति मलिन हुई है मोहोदय से।
परम विशुद्धि को पावे वह परिणति मेरी,
समयसार की आत्मख्याति नामक व्याख्या से ।।३।।
ॐ ह्रीं परमविशुद्धिप्रदायक-श्रीआत्मख्यातये नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।। ३ ।।
( अनुष्टुभ् )
नमः समयसाराय, स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय, सर्वभावान्तरच्छिदे ।। १ ।।
अनन्तधर्मणस्तत्त्वं, पश्यन्ती प्रत्यगात्मनः ।
अनेकान्तमयी मूर्तिः, नित्यमेव प्रकाशताम् ।। २ ।।
( मालिनी )
परपरिणतिहेतोर्मोहनाम्नोऽनुभावादविरतमनुभाव्यव्याप्तिकल्माषितायाः ।
मम परमविशुद्धिः शुद्धचिन्मात्रमूर्तेः, भवतु समयसारव्याख्ययैवानुभूतेः ।। ३ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब दो कलशों में ‘स्याद्वाद एवं निश्चय-व्यवहारनयों का महत्त्व
बताते हैं’ -
( रोला )
उभयनयों में जो विरोध है, उसके नाशक।
स्याद्वादमय जिनवचनों में जो रमते हैं।
मोह-वमन कर अनय-अखण्डित परमज्योतिमय ।
स्वयं शीघ्र ही समयसार में वे रमते हैं।।४।।
ॐ ह्रीं श्री स्याद्वादमयी-जिनवाणीभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४।।
ज्यों दुर्बल को लाठी है हस्तावलम्ब त्यों।
उपयोगी व्यवहार सभी को अपरमपद में।
पर उपयोगी नहीं रंच भी उन लोगों को।
जो रमते हैं परम-अर्थ चिन्मय चिद्घन में ।।५।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्य भूतार्थ-अभूतार्थत्वप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५।।
आगामी कलशों में निश्चय सम्यग्दर्शन का स्वरूप कहते हैं -
( हरिगीत )
नियत है जो स्वयं के, एकत्व में नय शुद्ध से।
वह ज्ञान का घनपिण्ड पूरण, पृथक् है परद्रव्य से ।।
नव तत्त्व की सन्तति तज बस ! एक यह अपनाइए।
इस आतमा का दर्श दर्शन, आतमा ही ध्याइए ।।६।।
ॐ ह्रीं निश्चयसम्यग्दर्शनस्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।६।।
( मालिनी )
उभयनयविरोधध्वंसिनिस्यात्पदांके, जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः ।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चैरनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव ।। ४ ।।
व्यवहरणनयःस्याद्यद्यपि प्राक्पदव्यामिह निहितपदानां हन्त हस्तावलम्बः।
तदपि परममर्थं चिच्चमत्कारमात्रं, परविरहितमन्तः पश्यतां नैष किंचित्।। ५ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
एकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो, व्याप्तुर्यदस्यात्मनः;
पूर्णज्ञानघनस्य दर्शनमिह, द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक् ।
सम्यग्दर्शनमेतदेव नियमादात्मा च तावानयं;
तन्मुक्त्वा नवतत्त्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः ।। ६ ।।
अब, दो कलशों में नवतत्त्वों में छिपी हुई आत्मज्योति को जानने की
प्रेरणा देते हैं -
( दोहा )
शुद्धनयाश्रित आतमा, प्रगटे ज्योतिस्वरूप ।
नव तत्त्वों में व्याप्त पर, तजे न एक स्वरूप ।। ७ ।।
( रोला )
शुद्ध कनक ज्यों छिपा हुआ है बानभेद में।
नव तत्त्वों में छिपी हुई त्यों आत्मज्योति है।।
एकरूप उद्योतमान पर से विविक्त वह।
अरे भव्यजन ! पद-पद पर तुम उसको जानो ।।८।।
ॐ ह्रीं विविक्ताऽऽत्मज्योतिप्रकाशक-श्रीसमयसाकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।८।।
यहाँ, ‘आत्मानुभूति की दशा का वर्णन’ करते हैं
( रोला )
निक्षेपों के चक्र विलय, नय नहीं जनमते ।
अर प्रमाण के भाव अस्त हो जाते भाई ! ।।
अधिक कहें क्या, द्वैतभाव भी भासित ना हो।
शुद्ध आतमा का अनुभव होने पर भाई ! ।।९।।
ॐ ह्रीं अद्वैतात्मानुभूतिप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।९।।
( अनुष्टुभ् )
अतः शुद्धनयायत्तं, प्रत्यग्ज्योतिश्चकास्ति तत् ।
नवतत्त्वगतत्वेऽपि, यदेकत्वं न मुंचति ।। ७ ।।
( मालिनी )
चिरमिति नवतत्त्वच्छन्नमुन्नीयमानं, कनकमिव निमग्नं वर्णमालाकलापे ।
अथ सततविविक्तं दृश्यतामेकरूपं, प्रतिपदमिदमात्मज्योतिरुद्योतमानम्।। ८ ।।
( मालिनी )
उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं, क्वचिदपि च न विद्मो याति निक्षेपचक्रम् ।
किमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वकषेऽस्मिन्ननुभवमुपयाते भाति न द्वैतमेव ।। ९ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब, शुद्धनय का स्वरूप बताते हैं
( हरिगीत )
परभाव से जो भिन्न है अर, आदि-अन्त विमुक्त है।
संकल्प और विकल्प के, जंजाल से भी मुक्त है।।
जो एक है परिपूर्ण है - ऐसे निजात्मस्वभाव को।
करके प्रकाशित प्रगट होता, है यहाँ यह शुद्धनय ।।१०।।
ॐ ह्रीं शुद्धनयस्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं नि.
स्वाहा ।।१०।।
अब, ‘बद्ध-स्पृष्टादि भावों की अभूतार्थता बताकर आत्मानुभव की
प्रेरणा’ देते हैं -
पावें न जिसमें प्रतिष्ठा, बस ! तैरते हैं बाह्य में।
ये बद्ध-स्पृष्टादि सब, जिसके न अन्तरभाव में ।।
जो है प्रकाशित चतुर्दिक, उस एक आत्मस्वभाव का।
हे जगज्जन ! तुम नित्य ही, निर्मोह हो अनुभव करो ।।११।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।११।।
अब, ‘आत्मा को देव संज्ञा से सम्बोधित करते हैं’ -
(रोला)
अपने बल से मोह नाशकर भूत-भविष्यत्-0
वर्तमान के कर्म-बन्ध से भिन्न लखे बुध ! ।।
तो निज अनुभवगम्य आतमा सदा विराजित ।
विरहित कर्मकलंकपंक से ‘देव’ शाश्वत ।। १२ ।।
ॐ ह्रीं कारणपरमात्मस्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१२।।
( मालिनी )
न हि विदधति बद्धस्पृष्टभावादयोऽमी स्फुटमुपरितरंतोऽप्येत्य यत्र प्रतिष्ठाम्।
अनुभवतु तमेव द्योतमानं समंतात् जगदपगतमोहीभूय सम्यक्स्वभावम् ।। ११ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
भूतं भान्तमभूतमेव रभसान्निर्भिद्य बन्धं सुधी-
र्यद्यन्तः किल कोऽप्यहो कलयति, व्याहत्य मोहं हठात् ।
आत्मात्मानुभवैकगम्यमहिमा, व्यक्तोऽयमास्ते ध्रुवं;
नित्यं कर्मकलंकपंकविकलो, देवः स्वयं शाश्वतः ।। १२ ।।
अब, आत्मानुभूति को ही ज्ञानानुभूति बताते हैं -
( रोला )
शुद्धनयातम आतम की अनुभूति कही जो ।
वह ही है ज्ञानानुभूति तुम यही जानकर ।
आतम में आतम को निश्चल थापित करके ।
सर्व ओर से एक ज्ञानघन आतम निरखो ।।१३।।
ॐ ह्रीं ज्ञानानुभूतिप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।१३।।
अब, ‘अभेद अखण्ड चैतन्यस्वरूप आत्मा ही हमें प्राप्त हो’, ऐसी
भावना एक कलश में प्रगट करते हैं -
( रोला )
खारेपन से भरी हुई ज्यों नमक डली है।
ज्ञानभाव से भरा हुआ त्यों निज आतम है।।
अन्तर-बाहर प्रगट तेजमय सहज अनाकुल ।
जो अखण्ड चिन्मय चिद्घन वह हमें प्राप्त हो ।।१४।।
ॐ ह्रीं अखण्डचैतन्याऽऽत्म-स्वरूपप्रकाशक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।१४।।
अब, प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि ‘परमात्मपद की प्राप्ति हेतु एक आत्मा
ही साधने योग्य है’ -
( वसन्ततिलका )
आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या, ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुद्ध्वा ।
आत्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकम्पमेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समन्तात् ।। १३ ।।
(पृथ्वी)
अखण्डितमनाकुलं, ज्वलदनन्तमन्तर्बहिः,
महः परममस्तु नः, सहजमुद्विलासं सदा ।
चिदुच्छलननिर्भरं, सकलकालमालम्बते,
यदेकरसमुल्लसल्लवणखिल्यलीलायितम् ।। १४ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
(हरिगीत)
है कामना यदि सिद्धि की, ना चित्त को भरमाइये।
यह ज्ञान का घनपिण्ड चिन्मय, आतमा अपनाइये।।
बस ! साध्य-साधक भाव से, इस एक को ही ध्याइये।
अर आप भी पर्याय में, परमातमा बन जाइये ।।१५।।
ॐ ह्रीं परमात्मपदप्रापक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।। १६ ।।
अब, आगामी कलशों में यह बताते हैं कि ‘दर्शन-ज्ञान-चारित्र और
प्रमाण-नय से आत्मा की क्या स्थिति है और हमें क्या करना चाहिए?’ -
मेचक कहा है आतमा, दृग-ज्ञान अर आचरण से।
यह एक निज परमातमा, बस ! है अमेचक स्वयं से।।
परमाण से मेचक-अमेचक, एक ही क्षण में अहा !।
यह अलौकिक मर्मभेदी, वाक्य जिनवर ने कहा ।।१६।।
आतमा है एक यद्यपि, किन्तु नय-व्यवहार से।
त्रैरूपता धारण करे, सद्-ज्ञान-दर्शन-चरण से।।
बस ! इसलिए मेचक कहा है, आतमा जिनमार्ग में।
अर इसे जाने बिन जगत् जन, ना लगें सन्मार्ग में ।।१७।।
( अनुष्टुभ् )
एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः ।
साध्यसाधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम् ।। १५ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रित्वादेकत्वतः स्वयम् ।
मेचकोऽमेचकश्चापि सममात्मा प्रमाणतः ।। १६ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रिभिः
परिणतत्वतः ।
एकोऽपि त्रिस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचकः ।। १७ ।।
आतमा मेचक कहा है, यद्यपि व्यवहार से।
किन्तु वह मेचक नहीं है, अमेचक परमार्थ से।।
है प्रगट ज्ञायक ज्योतिमय, वह एक है भूतार्थ से।
है शुद्ध एकाकार, पर से भिन्न है, परमार्थ से।।१८।।
मेचक-अमेचक आतमा के, चिन्तवन से लाभ क्या?।
बस करो अब तो इन विकल्पों से तुम्हें है साध्य क्या?।।
हो साध्य-सिद्धि एक बस ! सद्-ज्ञान-दर्शन-चरण से।
पथ अन्य कोई है नहीं, जिससे बचे संसरण से।।१९।।
ॐ ह्रीं दर्शनज्ञानचारित्र-भेदाऽभेदप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।
अब, ‘रत्नत्रय में भी एकता स्थापित करते हुए कलश’ कहते हैं -
त्रैरूपता को प्राप्त है पर, ना तजे एकत्व को।
यह शुद्ध निर्मल आत्म-ज्योति, प्राप्त है जो स्वयं को।।
अनुभव करें हम सतत ही, चैतन्यमय उस ज्योति का।
क्योंकि उसके बिना जग में, साध्य की हो सिद्धि ना।।२०।।
ॐ ह्रीं अभेदात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामाति स्वाहा।।१८।।
( अनुष्टुभ् )
परमार्थेन तु व्यक्तज्ञातृत्वज्योतिषैककः ।
सर्वभावान्तरध्वंसिस्वभावत्वादमेचकः
।। १८ ।।
आत्मनश्चिन्तयैवालं मेचकामेचकत्वयोः ।
दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा ।। १९ ।।
( मालिनी )
कथमपि समुपात्तत्रित्वमप्येकताया, अपतितमिदमात्मज्योतिरुद्गच्छदच्छम् ।
सततमनुभवामोऽनन्तचैतन्यचिह्नं, न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः।। २० ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
अब, ‘भेदज्ञानमूलक आत्मानुभूति को किसी भी प्रकार से प्राप्त करने
की प्रेरणा’ देते हैं -
(रोला)
जैसे भी हो स्वतः अन्य के उपदेशों से।
भेदज्ञानमूलक अविचल अनुभूति हुई हो।।
ज्ञेयों के अगणित प्रतिबिम्बों से वे ज्ञानी।
अरे निरन्तर दर्पणवत् रहते अविकारी ।।२१।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानमूलकात्मानुभूतिप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।
अब, ‘अनादिकालीन मोह को तत्काल छोड़ने की प्रेरणा’ देते हैं -
( हरिगीत )
आजन्म के इस मोह को हे जगत् जन ! तुम छोड़ दो।
अर रसिकजन को जो रुचे, उस ज्ञान के रस को चखो।।
तादात्म्य पर के साथ जिनका, कभी भी होता नहीं।
अर स्वयं का ही स्वयं से, अन्यत्व भी होता नहीं।।२२।।
ॐ ह्रीं मोहनाशप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।२०।।
अब, ‘किसी भी प्रकार से निजात्मतत्त्व का कौतूहली बनने हेतु शरीर
के साथ पडौसी जैसा व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं’ -
( मालिनी )
कथमपि हि लभन्ते भेदविज्ञानमूला मचलितमनुभूतिं ये स्वतो वान्यतो वा ।
प्रतिफलननिमग्नानन्तभावस्वभावै र्मुकुरवदविकाराः सन्ततं स्युस्त एव ।। २१ ।।
त्यजतु जगदिदानीं मोहमाजन्मलीनं, रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत् ।
इह कथमपि नात्मा नात्मना साकमेकः, किल किलयति काले क्वापि तादात्म्यवृत्तिम्।। २२ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
(हरिगीत)
निजतत्त्व का कौतूहली अर, पड़ौसी बन देह का।
हे आत्मन् ! जैसे बने, अनुभव करो निजतत्त्व का।।
जब भिन्न पर से सुशोभित लख, स्वयं को तब शीघ्र ही।
तुम छोड़ दोगे देह से, एकत्व के इस मोह को ।।२३।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति
स्वाहा ।।२१।।
अब यहाँ 'अप्रतिबुद्ध, व्यवहार-स्तुति के माध्यम से अपना पक्ष रखता
है और टीकाकार उसे समझाने हेतु उदाहरण प्रस्तुत करते हैं –
(हरिगीत)
लोक-मानस रूप से, रवि-तेज अपने तेज से।
जो हरें निर्मल करें दश-दिश, कान्तिमय तन-तेज से ।।
जो दिव्यध्वनि से भव्यजन, के कान में अमृत भरें।
उन सहस अठ लक्षण सहित, जिन-सूरि को वन्दन करें ।। २४।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्तुतिपोषक -पूर्वपक्षप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। २२।।
अब, ‘नगर-वर्णन एवं जिनेन्द्र-वर्णन के सम्बन्ध में उदाहरण-स्वरूप दो
कलश’ कहते हैं –
( मालिनी )
अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहली सन्, अनुभव भव मूर्तेः पार्श्ववर्ती मुहूर्तम् ।
पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन, त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहम् ।। २३ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
कांत्यैव स्नपयंति ये दशदिशो धाम्ना निरंधंति ये।
धामोद्दाममहस्विनां जनमनो मुष्णंति रूपेण ये।।
दिव्येन ध्वनिना सुखं श्रवणयोः साक्षात्क्षरंतोऽमृतं ।
वंद्यास्तेऽष्टसहस्रलक्षणधरास्तीर्थेश्वराः सूरयः ।। २४ ।।
(हरिगीत)
प्राकार से कवलित किया, जिस नगर ने आकाश को।
अर गोल गहरी खाई से है, पी लिया पाताल को।।
सब भूमितल को ग्रस लिया, उपवनों के सौन्दर्य से।
अद्भुत अनूपम अलग ही है, वह नगर संसार से ।।२५।।
गम्भीर सागर के समान, महान् मानस मंग हैं।
नित्य निर्मल निर्विकारी, सुव्यवस्थित अंग हैं।।
सहज ही अद्भुत अनूपम, अपूरव लावण्य है।
क्षोभ-विरहित अर अचल, जयवन्त जिनवर अंग है।।२६।।
ॐ ह्रीं व्यवहारस्तुतिसमर्थक-दृष्टान्तप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।।२३।।
अब, दो कलशों में ‘व्यवहार-निश्चय स्तुति’ के प्रकरण का उपसंहार
करते हैं –
(हरिगीत)
इस आतमा अर देह का, एकत्व बस ! व्यवहार से।
यह शरीराश्रित स्तवन भी, इसलिए व्यवहार से ।।
परमार्थ से स्तवन है, चिद्भाव का ही अनुभवन ।
परमार्थ से तो भिन्न ही हैं, देह अर चैतन्यघन ।। २७ ।।
( आर्या )
प्राकारकवलितांबरमुपवनराजीनिगीर्णभूमितलम् ।
पिबतीव हि नगरमिदं परिखावलयेन पातालम् ।। २५ ।।
नित्यमविकारसुस्थितसर्वांगमपूर्वसहजलावण्यम् ।
अक्षोभमिव समुद्रं जिनेन्द्ररूपं परं जयति ।। २६ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
एकत्वं व्यवहारतो न तु पुनः, कायाऽऽत्मनोर्निश्चयात्,
नुः स्तोत्रं व्यवहारतोऽस्ति वपुषः, स्तुत्या न तत्तत्त्वतः ।
स्तोत्रं निश्चयतश्चितो भवति चित्, स्तुत्यैव सैवं भवत्,
नातस्तीर्थकरस्तवोत्तरबलादेकत्वमात्माऽगयोः
।। २७ ।।
इस आतमा अर देह के, एकत्व को नय-युक्ति से।
निर्मूल ही जब कर दिया, तत्त्वज्ञ मुनिवरदेव ने।।
यदि भावना है भव्य तो फिर, क्यों नहीं सद्बोध हो।
भावोल्लसित आत्मार्थियों को, नियम से सद्बोध हो ।। २८ ।।
ॐ ह्रीं व्यवहार-निश्चयस्तुति-प्रकरणोपसंहारक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। २४।।
अब, एक कलश में आत्मानुभव शीघ्र करने की प्रेरणा देते हैं -
(हरिगीत)
परभाव के परित्याग की, दृष्टि पुरानी न पड़े।
अर जब तलक हे आत्मन् ! वृत्ति न हो अतिबलवती ।।
व्यतिरिक्त जो परभाव से, वह आतमा अतिशीघ्र ही ।
अनुभूति में उतरा अरे ! चैतन्यमय वह स्वयं ही ।। २९।।
ॐ ह्रीं शीघ्रात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।।२५।।
अब, एक कलश के द्वारा ‘पौद्गलिक मोहादि भावकभावरूप परभावों से
भेदज्ञान कराने की विधि का प्रयोग’ कराते हैं -
(हरिगीत)
सब ओर से चैतन्यमय, निजभाव से भरपूर हूँ।
मैं स्वयं ही इस लोक में, निजभाव का अनुभव करूँ ।।
( मालिनी )
इति परिचिततत्त्वैरात्मकायैकतायां, नयविभजनयुक्त्याऽत्यन्तमुच्छादितायाम्।
अवतरति न बोधो बोधमेवाद्य कस्य, स्वरसरभसकृष्टः प्रस्फुटन्नेक एव ।। २८ ।।
( मालिनी )
अवतरति न यावद् वृत्तिमत्यन्तवेगादनवमपरभावत्यागदृष्ट्यन्तदृष्टिः ।
झटिति सकलभावैरन्यदीयैर्विमुक्ता, स्वयमियमनुभूतिस्तावदाविर्बभूव ।। २९ ।।
अर्ध्यावली : पूर्वरंग
यह मोह मेरा कुछ नहीं, चैतन्य का घनपिण्ड हूँ।
हूँ शुद्ध चिद्घन महानिधि मैं, स्वयं एक अखण्ड हूँ।। ३०।।
ॐ ह्रीं भावकभावभेदज्ञानप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २६ ।।
अब यहाँ, ‘भेदज्ञान के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाली आत्मानुभूति की
प्रशंसा’ करते हैं -
(हरिगीत)
बस ! इस तरह सब अन्य भावों, से हुई जब भिन्नता ।
तब स्वयं को उपयोग ने, स्वयमेव ही धारण किया ।।
प्रकटित हुआ परमार्थ अर, दृग-ज्ञान-वृत परिणत हुआ।
तब आतमा के बाग में, आतम रमण करने लगा।।३१।।
ॐ ह्रीं भेदज्ञानफलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २७।।
यहाँ, ‘समस्त जगत् को भी ज्ञान-समुद्र भगवान् आत्मा में स्नान करने
की प्रेरणा देते हुए ‘पूर्वरंग’ का समापन’ करते हैं -
(हरिगीत)
सुख-शान्तरस से लबालब यह, ज्ञानसागर आतमा।
विभरम की चादर हटा, सर्वांग परगट आतमा ।।
हे भव्यजन ! इस लोक के, सब एक साथ नहाइये।
अर इसे ही अपनाइये, इसमें मगन हो जाइये ।।३२।।
ॐ ह्रीं स्वरूपसंचेतनप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २८।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( स्वागता )
सर्वतः स्वरसनिर्भरभावं, चेतये स्वयमहं स्वमिहैकम् ।
नास्ति नास्ति मम कश्चन मोहः, शुद्धचिद्घनमहोनिधिरस्मि ।। ३० ।।
( मालिनी )
इति सति सह सर्वैरन्यभावैर्विवेके, स्वयमयमुपयोगो बिभ्रदात्मानमेकम् ।
प्रकटितपरमार्थैर्दर्शनज्ञानवृत्तैः, कृतपरिणतिरात्माराम एव प्रवृत्तः ।। ३१ ।।
( वसन्ततिलका )
मज्जन्तु निर्भरममी सममेव लोका, आलोकमुच्छलति शान्तरसे समस्ताः ।
आप्लाव्य विभ्रमतिरस्करिणीं भरेण, प्रोन्मग्न एष भगवानवबोधसिन्धुः ।। ३२ ।।
।। जीव-अजीव अधिकार ।।
(दोहा)
वर्णादि रागादि से है यह आतम भिन्न।
शुद्ध-बुद्ध-चैतन्यमय और अखण्ड अनन्य ।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
इस अधिकार के प्रारम्भ में सर्वप्रथम आचार्य अमृतचन्द्रदेव, आत्मख्याति
टीका में ‘जीव और अजीव को रंगमंच पर एकरूप में प्रस्तुत करके उस ज्ञान
की महिमा करते हैं, जो जीव-अजीव का भेद जान लेता है’ -
( सवैया इकतीसा )
जीव और अजीव के विवेक से है पुष्ट जो,
ऐसी दृष्टि द्वारा इस नाटक को देखता।
अन्य जो सभासद हैं उन्हें भी दिखाता और,
दुष्ट अष्ट कर्मों के बन्धन को तोड़ता ।।
जाने लोकालोक को पै निज में मगन रहे,
विकसित शुद्ध नित्य निज अवलोकता।
ऐसो ज्ञानवीर धीर मंग भरे मन में,
स्वयं ही उदात्त और अनाकुल सुशोभता ।। ३३।।
ॐ ह्रीं जीवाऽजीवभेदज्ञापक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। २९ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
जीवाजीवविवेकपुष्कलदृशा, प्रत्याययत्पार्षदान्;
आसंसारनिबद्धबन्धनविधिध्वंसाद्विशुद्धं स्फुटत् ।
आत्माराममनन्तधाममहसाध्यक्षेण नित्योदितं;
धीरोदात्तमनाकुलं विलसति ज्ञानं मनो ह्लादयत् ।। ३३ ।।
अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार
यहाँ, आचार्यदेव ‘छह माह तक निरन्तर आत्मानुभव का अभ्यास करने
पर उसकी प्राप्ति होना सुनिश्चित करते हुए उसकी प्रेरणा’ करते हैं -
( हरिगीत )
हे भव्यजन ! क्या लाभ है, इस व्यर्थ के बकवाद से।
अब तो रुको निज को लखो, अध्यात्म के अभ्यास से ।।
यदि अनवरत छह मास हो, निज आतमा की साधना ।
तो आतमा की प्राप्ति हो, सन्देह इसमें रंच ना ।। ३४।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवाभ्यासप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३०।।
अब, ‘भगवान् आत्मा के अनुभव की प्रेरणा’ एक कलश में देते हैं -
( हरिगीत )
चैतन्यशक्ति से रहित, परभाव सब परिहार कर।
चैतन्यशक्ति से सहित, निजभाव नित अवगाह कर ।।
है श्रेष्ठतम जो विश्व में, सुन्दर सहज शुद्धात्मा ।
अब उसी का अनुभव करो तुम, स्वयं हे भव्यातमा ! ।। ३५ ।।
ॐ ह्रीं आत्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा ।। ३१ ।।
अब, ‘परमार्थ जीव से भिन्न, उनतीस भावों की पौद्गलिकता’ को दो
कलशों द्वारा बताते हैं -
( मालिनी)
विरम किमपरेणाऽकार्यकोलाहलेन, स्वयमपि निभृतः सन् पश्य षण्मासमेकम् ।
हृदयसरसि पुंसः पुद्गलाद्भिन्नधाम्नो, ननु किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धिः।। ३४ ।।
सकलमपि विहायाह्नाय चिच्छक्तिरिक्तं स्फुटतरमवगाह्य स्वं च चिच्छक्तिमात्रम् ।
इममुपरि चरंतं चारु विश्वस्य साक्षात् कलयतु परमात्मात्मानमात्मन्यनंतम् ।। ३५ ।।
( दोहा )
चित् शक्ति सर्वस्व जिन, केवल वह है जीव।
उसे छोड़कर और सब, पुद्गलमयी अजीव ।। ३६ ।।
वर्णादिक रागादि सब, हैं आतम से भिन्न।
अन्तर्दृष्टि देखिये, दिखे एक चैतन्य ।। ३७।।
ॐ ह्रीं वर्णादिगुणस्थानपर्यन्तभावान् पुद्गलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। ३२।।
अब, दो कलशों में जीव का वर्णादि से तादात्म्य नहीं है यह
दृष्टान्तपूर्वक स्पष्ट करते हैं
( दोहा )
जिस वस्तु से जो बने, वह हो वही न अन्य ।
स्वर्ण-म्यान तो स्वर्ण है, असि है उससे अन्य ।। ३८ ।।
वर्णादिक जो भाव हैं, वे सब पुद्गल जन्य ।
एक शुद्ध विज्ञानघन, आतम इनसे भिन्न ।। ३९।।
ॐ ह्रीं वर्णादितादात्म्यनिषेधक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।३३।।
( अनुष्टुभ् )
चिच्छक्ति-व्याप्त-सर्वस्व-सारो जीव इयानयम् ।
अतोऽतिरिक्ताः सर्वेऽपि, भावाः पौद्गलिका अमी ।। ३६ ।।
( शालिनी )
वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा, भिन्ना भावाः सर्व एवाऽस्य पुंसः ।
तेनैवाऽन्तस्तत्त्वतः पश्यतोऽमी, नो दृष्टाः स्युर्दृष्टमेकं परं स्यात् ।। ३७ ।।
( उपजाति )
निर्वर्त्यते येन यदत्र किंचित् तदेव तत्स्यान्न कथंचनान्यत् ।
रुक्मेण निर्वृत्तमिहासिकोशं पश्यंति रुक्मं न कथंचनासिम् ।। ३८ ।।
वर्णादिसामग्र्यमिदं विदन्तु, निर्माणमेकस्य हि पुद्गलस्य ।
ततोऽस्त्विदं पुद्गल एव नात्मा, यतः स विज्ञानघनस्ततोऽन्यः ।। ३९ ।।
अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार
आगामी दो कलशों में व्यवहार-निश्चय जीव का स्वरूप बताते हैं
( दोहा )
कहने से घी का घड़ा, घड़ा न घीमय होय ।
कहने से वर्णादिमय, जीव न तन्मय होय ।।४०।।
स्वानुभूति में जो प्रगट, अचल अनादि अनन्त ।
स्वयं जीव चैतन्यमय, जगमगात अत्यन्त ।।४१।।
ॐ ह्रीं व्यवहारनिश्चयजीवप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३४।।
अब, आगामी चार कलशों में ‘जीव-अजीव को लक्षणों से जानकर
भेदज्ञान करने की प्रेरणा देते हुए इस अधिकार का उपसंहार’ करते हैं
( सवैया इकतीसा )
मूर्तिक-अमूर्तिक अजीव द्रव्य दो प्रकार,
इसलिए अमूर्तिक लक्षण न बन सके।
सोचकर विचारकर भलीभाँति ज्ञानियों ने,
कहा वह निर्दोष लक्षण जो बन सके।
अतिव्याप्ति-अव्याप्ति दोषों से विरहित,
चैतन्यमय उपयोग लक्षण है जीव का।
अतः अवलम्ब लो अविलम्ब इसका ही,
क्योंकि यह भाव ही है जीवन इस जीव का ।।४२।।
( अनुष्टुभ )
घृतकुम्भाभिधानेऽपि कुम्भो घृतमयो न चेत्।
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः ।। ४० ।।
अनाद्यनन्तमचलं, स्वसंवेद्यमिदं स्फुटम् ।
जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्चैश्चकचकायते ।। ४१ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
वर्णाद्यैः सहितस्तथा विरहितो द्वेधास्त्यजीवो यतो ।
नामूर्तत्वमुपास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्वं ततः ।।
इत्यालोच्य विवेचकैः समुचितं नाव्याप्यतिव्यापि वा।
व्यक्तं व्यंजितजीवतत्त्वमचलं चैतन्यमालंब्यताम् ।। ४२ ।।
अर्ध्यावली : जीव-अजीव अधिकार (जयमाला)
( हरिगीत )
निज लक्षणों की भिन्नता से, जीव और अजीव को।
जब स्वयं से ही ज्ञानिजन, भिन्न-भिन्न ही हैं जानते।।
जग में पड़े अज्ञानियों का, अमर्यादित मोह यह।
अरे! तब भी नाचता क्यों? खेद है आश्चर्य है ।।४३।।
अरे ! काल अनादि से, अविवेक के इस नृत्य में।
बस ! एक पुद्गल नाचता, चेतन नहीं इस कृत्य में ।।
यह जीव तो पुद्गलमयी, रागादि से भी भिन्न है।
आनन्दमय चिद्भाव तो, दृग-ज्ञानमय चैतन्य है।।४४।।
जब इस तरह धारा-प्रवाही, ज्ञान का आरा चला।
तब जीव और अजीव में, अतिविकट विघटन हो चला।।
अब जब तलक हों भिन्न, जीव-अजीव उसके पूर्व ही।
यह ज्ञान का घनपिण्ड निज, ज्ञायक प्रकाशित हो उठा ।। ४५ ।।
ॐ ह्रीं जीवाजीवभेदज्ञानप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३५।। ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( वसन्ततिलका )
जीवादजीवमिति लक्षणतो विभिन्नं, ज्ञानी जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसंतम् ।
अज्ञानिनो निरवधिप्रविजृम्भितोऽयं, मोहस्तु तत्कथमहो बत नानटीति ।। ४३ ।।
( वसन्ततिलका )
अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकनाट्ये, वर्णादिमान्नटति पुद्गल एव नान्यः ।
रागादिपुद्गलविकारविरुद्धशुद्ध, चैतन्यधातुमयमूर्तिरयं च जीवः ।। ४४ ।।
( मन्दाक्रान्ता )
इत्थं ज्ञानक्रकचकलनापाटनं नाटयित्वा,
जीवाजीवौ स्फुटविघटनं नैव यावत्प्रयातः ।
विश्वं व्याप्य प्रसभविकसद्व्यक्तचिन्मात्रशक्त्या,
ज्ञातृद्रव्यं स्वयमतिरसात्तावदुच्चैश्चकाशे ।। ४५ ।।
जयमाला
( दोहा)
सुनो भव्य ! अधिकार की, महिमा अपरम्पार ।
इसमें सब कुछ आ गया, जिनवाणी का सार ।।१।।
जीवाजीव-अधिकार की, पूजन की सानन्द ।
जयमाला में जान लो, विषय-वस्तु आनन्द ।। २।।
( हरिगीत )
वर्णादि अर रागादि जड़ से, आतमा की भिन्नता।
का विशद वर्णन किया है रे ! इस प्रथम अधिकार में ।।
वर्णादि अर रागादि से, एकत्व और ममत्व को।
छोड़ने को कहा है रे ! युक्ति से विस्तार से ।।३।।
वर्णादि अर रागादि में, एकत्व रे ! जब तक रहे।
अज्ञानी मिथ्यादृष्टि यह जिय, नियम से तब तक रहे ।।
स्वयं में एकत्व, पर से भिन्नता, की बात को।
युक्ति से समझा रहे हैं, आतमा की बात को ।।४।।
न प्रमत्त है नाऽप्रमत्त है, न ज्ञान-दर्शन-चरित है।
न बँधा है न छुआ है, अविशेष और अनन्य है।।
संयोग विरहित एक ज्ञायकभाव आतम जानिये ।
भूतार्थ है परमार्थ उसकी शुद्धता पहिचानिये ।।५।।
धर्मादि ज्ञेयों से तथा, रागादि भावक-भाव से।
निज आतमा की भिन्नता को जानिये निजभाव से ।।
जीव के रस-गन्ध ना, ना रूप है ना शब्द है।
चेतना गुणवान आतम, अरे ! पूर्ण पवित्र है ।।६।।
वर्णादि से गुणथान तक, कोई नहीं इस जीव के।
ज्ञान-दर्शन जीव के, वर्णादि सभी अजीव के।।
यदि चाहते हो आतमा, तो स्वयं को पहिचानिये ।
स्वयं में रम जाइये अर, स्वयं में जम जाइये ।।७।।
(दोहा)
भविजन ! जीवाजीव में, करो भेद-विज्ञान ।
फिर गहराई से करो, आतम की पहिचान ।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीसमयसारकलशपरमागमे जीवाऽजीवतत्त्वप्रतिपादक-पूर्वरंगसमन्वित-
जीवाजीवाधिकाराय जयमाला पूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
जीवाजीवाधिकार में, है आतम की बात।
एक आतमा जानिये, छोड़ जगत् की आश ।।९।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
आत्मा की उपासना का तात्पर्य
यहाँ आत्मा की उपासना करने का तात्पर्य निज आत्मा की पूजा-
भक्ति करने से नहीं है, स्तुति-वंदना करने से भी नहीं है, नमस्कारादि
करने से भी नहीं है; अपितु उसे सही रूप में जानने से है, पहिचानने से
है, उसका अनुभव करने से है; उसी में समा जाने से है, उसी का नित्य
ध्यान करने से है, ध्यान रखने से है; उसको ही सर्वस्व मानने से है;
उसी में पूर्णतः समर्पित हो जाने से है। यही निज भगवान् आत्मा की
उपासना की विधि है, आराधना की विधि है, साधना की विधि है।
तात्पर्य यह है कि निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की प्राप्ति ही
निज भगवान् आत्मा की उपासना है, निज भगवान् आत्मा की आराधना
है, निज भगवान् आत्मा की साधना है, निज भगवान् आत्मा की शरण
में जाना है। – समयसार अनुशीलन भाग-१, पृष्ठ २०६-२०७-२०८
कर्ता-कर्म अधिकार पूजन
स्थापना
( हरिगीत )
वर्णादि अर रागादि का, कर्ता नहीं है आतमा ।
वर्णादि अर रागादि का, भोक्ता नहीं है आतमा ।।
कर्ता नहीं भोक्ता नहीं, स्वामी नहीं यह आतमा।
किसी से लेता नहीं, देता नहीं कुछ आतमा ।।१।।
( दोहा)
आतम आतमभाव का, कर्ता-भोक्ता होय ।
स्व-स्वामी सम्बन्ध भी, अपने में ही होय ।। २।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार! अत्र अवतर-अवतर
संवौषट् ।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकार! अत्र मम सन्निहितो
भव-भव वषट् । (इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( अवतार )
जल
उज्ज्वल जल परम पवित्र, मल परिहारक है।
निज के निर्मल परिणाम, आत्म-उद्धारक हैं।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय जन्म-जरा-मत्यु-
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन
चन्दन-सम शीतल शान्त, आतम है मेरा।
रे अचल अनादि-अनन्त, आतम है मेरा ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ता-कर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय संसार-ताप-
विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत
निज अक्षत अमल अखण्ड, न पर से खण्डित हैं।
अपनी महिमा से आप, पूर्णतः मण्डित हैं।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अक्षय-पद-प्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प
सुमन सुमन से आज, मन मोहित करते।
निर्मल आतम गुणगान, मृदु मन को हरते ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय काम-बाण-विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नैवेद्य
मन-मोहक मृदु मिष्ठान्न, मधुर महिमा मण्डित ।
सर्वांग सरस मिष्ठान्न, करते आकर्षित ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय क्षुधारोगविनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीप
मनहर तमहर परकाश, स्व-पर प्रकाशक है।
सज्ञान प्रतीक प्रदीप, विभरमतम नाशक है।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप
यह आतम अलख अनूप, धूम दश धर्मों की ।
रे! धर्मध्यान की धूप, दाहक कर्मों की ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अष्ट-कर्म-दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल
माया ममता को छोड़, अरे ! मन को हर लो।
कर फल से पूजा आज, जनम सफल कर लो।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं ।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय मोक्ष-फल-प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्घ्य
जल से फल तक सब अर्घ्य, चढ़ाओ बलिहारी ।
अन-अर्घ्य परमपद प्राप्त, करने की बारी ।।
कर्ता-भोक्ता की बात, निज की निज में है।
पर से न कोई सम्बन्ध, अपन अपने में हैं।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-श्रीकर्ताकर्माधिकाराय अनर्घ्य-पद-
प्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । ( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अर्ध्यावली
(दोहा)
मैं कर्ता हूँ कर्म का, कर्म है मेरा कर्म।
ऐसी मिथ्या मान्यता, है मिथ्यात्व अधर्म ।।
निज आतम तल्लीनता, सुखमय आतमधर्म ।
श्री जिन जिनवरदेव ने, यह समझाया मर्म ।।
( पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
यहाँ आचार्य अमृतचन्द्रदेव कहते हैं कि अब, ‘जीव-अजीव ही कर्ता-
कर्म के वेश में रंगभूमि में प्रवेश करते हैं’ और वहाँ ‘जीव (अज्ञानी) कहता है
कि मैं (जीव) कर्ता हूँ और क्रोधादि (अजीव) मेरे कर्म हैं।’ ज्ञानियों को इस
‘कर्ता-कर्म सम्बन्धी अज्ञान का शमन करनेवाली ज्ञान-ज्योति’ प्रगट होती है,
अतः उस ज्ञान-ज्योति की महिमा करते हुए आचार्य अमृतचन्द्रदेव, इस
अधिकार का मंगलाचरण करते हैं; जिसका पद्यानुवाद इसप्रकार है -
( हरिगीत )
मैं एक कर्ता आत्मा, क्रोधादि मेरे कर्म सब ।
है यही कर्ता-कर्म की, है प्रवृत्ति अज्ञानमय ।।
शमन करती इसे प्रगटी, सर्व विश्व-विकाशनी ।
अतिधीर परमोदात्त पावन, ज्ञानज्योति-प्रकाशनी ।। ४६ ।।
ॐ ह्रीं कर्तृकर्माऽज्ञाननिवारक-श्रीज्ञानज्योतिषे नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा ।। ३६।।
अब, एक कलश के द्वारा ‘आत्मा और आस्रवों के बीच होनेवाले
भेदज्ञान को बन्ध के निरोध का कारण’ बताते हैं -
( मन्दाक्रान्ता )
एकः कर्ता चिदहमिह मे, कर्म कोपादयोऽमी,
इत्यज्ञानां शमयदभितः, कर्तृकर्मप्रवृत्तिम् ।
ज्ञानज्योतिः स्फुरति परमोदात्तमत्यंतधीरं,
साक्षात्कुर्वन्निरुपधिपृथग्द्रव्यनिर्भासि विश्वम् ।।४६ ।।
( हरिगीत )
पर-परिणति को छोड़ती अर, तोड़ती सब भेद-भ्रम।
यह अखण्ड प्रचण्ड प्रगटित, हुई पावन-ज्योति जब ।।
अज्ञानमय इस प्रवृत्ति को, है कहाँ अवकाश तब ?।
अर किसतरह हो कर्मबन्धन ? जगी जगमग ज्योति जब ।।४७।।
ॐ ह्रीं बन्धनिरोधोपायप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३७।।
‘आत्मा और आस्रव में भिन्नता जानने से कर्तृत्व का अज्ञान नष्ट होकर
यह आत्मा ज्ञानी हो गया’ ऐसा भाव आगामी कलश में व्यक्त करते हैं -
( सवैया इकतीसा )
इस प्रकार जान भिन्नता विभाव भाव की,
कर्तृत्व का अहं विलायमान हो रहा।
निज विज्ञानघन भाव गजारूढ़ हो,
निज भगवान् शोभायमान हो रहा ।।
जगत् का साक्षी है पुरुष पुराण यह,
अपने स्वभाव में विकासमान हो रहा।
अहो ! सद्ज्ञानवन्त दृष्टिवन्त यह पुमान,
जग-मग ज्योतिमय प्रकाशमान हो रहा ।। ४८।।
ॐ ह्रीं कर्तृत्वनाशकज्ञानीप्ररूपक - श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।। ३८।।
( मालिनी )
परपरिणतिमुज्झत् खण्डयद्भेदवादानिदमुदितमखण्डं ज्ञानमुच्चण्डमुच्चैः ।
ननु कथमवकाशः कर्तृकर्मप्रवृत्ते रिह भवति कथं वा पौद्रलः कर्मबन्धः।। ४७ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
इत्येवं विरचय्य संप्रति परद्रव्यान्निवृत्तिं परां
स्वं विज्ञानघनस्वभावमभयादास्तिघ्नुवानः परम् ।
अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनात् क्लेशान्निवृत्तः स्वयं
ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगतः साक्षी पुराणः पुमान् ।। ४८ ।।
अब, 'जहाँ व्याप्य-व्यापक भाव होता है, वहीं कर्ता-कर्मभाव होता है
- यह कलश के माध्यम से कहते हैं -
( सवैया इकतीसा )
तत्स्वरूप भाव में ही व्याप्य-व्यापक बने,
बने न कदापि वह अतत्स्वरूप भाव में।
कर्ता-कर्म भाव का बनना असम्भव है,
व्याप्य-व्यापकभाव सम्बन्ध के अभाव में ।।
इस भाँति प्रबल विवेक दिनकर से ही,
भेद-अन्धकार लीन निज ज्ञान भाव में।
कर्तृत्व भार से शून्य शोभायमान,
पूर्ण निर्धार मगन आनन्द स्वभाव में ।।४९।।
ॐ ह्रीं व्याप्य-व्यापकत्वैव कर्तृ-कर्मभावप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।३९।।
‘स्व-पर को जाननेवाले जीव व न जाननेवाले अजीव में अत्यन्त भिन्नता
होने से कर्त्ता-कर्मभाव नहीं बन सकता’-यह भाव इस कलश में व्यक्त करते हैं-
( सवैया इकतीसा )
निज-पर-परिणति जानकार जीव यह,
पर-परिणति को करता कभी नहीं।
निज-पर-परिणति अजानकार पुद्गल,
पर-परिणति को करता कभी नहीं।।
( शार्दूलविक्रीडित )
व्याप्य-व्यापकता तदात्मनि भवेत्, नैवातदात्मन्यपि,
व्याप्य-व्यापकभावसम्भवमृते, का कर्तृकर्मस्थितिः।
इत्युद्दाम-विवेक-घस्मरमहो, भारेण भिन्दंस्तमो,
ज्ञानीभूय तदा स एष लसितः, कर्तृत्वशून्यः पुमान् ।। ४९ ।।
नित्य अत्यन्त भेद जीव-पुद्गल में,
करता-करम भाव उनमें बने नहीं।
ऐसो भेदज्ञान जब तक प्रगटे नहीं,
करता-करम की प्रवृत्ति मिटे नहीं ।।५०।।
ॐ ह्रीं स्व-परप्रकाशकजीव-अप्रकाशकाजीवयोर्कर्तृकर्मभावनिषेधक -
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४०।।
अब, चार कलशों में ‘निश्चय कर्ता-कर्म-क्रिया का स्वरूप’ बताते हैं-
( हरिगीत )
कर्ता वही जो परिणमे, परिणाम ही बस कर्म है।
है परिणति ही क्रिया बस ! तीनों अभिन्न अखण्ड हैं।।५१।।
अनेक होकर एक है, हो परिणमित बस ! एक ही।
परिणाम हो बस ! एक का, हो परिणति बस ! एक की।।५२।।
परिणाम दो का एक ना, मिलकर नहीं दो परिणमे।
परिणति दो की एक ना, बस ! क्योंकि दोनों भिन्न हैं।।५३।।
( स्रग्धरा )
ज्ञानी जानन्नपीमां स्वपरपरिणतिं पुद्गलश्चाप्यजानन्
व्याप्तृव्याप्यत्वमंतः कलयितुमसहो नित्यमत्यंतभेदात्।
अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत्
विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवददयं भेदमुत्पाद्य सद्यः।। ५० ।।
( आर्या )
यः परिणमति स कर्ता, यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म।
या परिणतिः क्रिया सा, त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ।। ५१ ।।
एकः परिणमति सदा, परिणामो जायते सदैकस्य।
एकस्य परिणतिः स्यादनेकमप्येकमेव यतः।। ५२ ।।
नोभौ परिणमतः खलु, परिणामो नोभयोः प्रजायेत।
उभयो र्न परिणतिः स्यादनेकमनेकमेव सदा।। ५३ ।।
कर्ता नहीं दो एक के, हों एक के दो कर्म ना।
ना दो क्रियायें एक की हों, क्योंकि एक अनेक ना ।। ५४।।
ॐ ह्रीं निश्चयकर्तृ-कर्म-क्रियास्वरूपप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।४१।।
अब, आगामी कलश में कहते हैं कि ‘यदि यह कर्ता-कर्मसम्बन्धी
अनादिकालीन अज्ञान, एक बार नष्ट हो तो फिर इसका उदय ही न हो’ –
( हरिगीत )
‘पर को करूँ मैं’ – यह अहं, अत्यन्त ही दुर्वार है।
यह है अखण्ड अनादि से, जीवन हुआ दुःस्वार है।।
भूतार्थनय के ग्रहण से यदि, प्रलय को यह प्राप्त हो।
तो ज्ञान के घनपिण्ड आतम, को कभी ना बन्ध हो ।।५५।।
( दोहा )
परभावों को पर करे, आतम आतमभाव ।
आप आपके भाव हैं, पर के हैं परभाव ।।५६।।
ॐ ह्रीं कर्तृ-कर्माऽज्ञाननिषेधक-भूतार्थग्रहणप्रेरक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४२।।
( आर्या)
नैकस्य हि कर्तारौ द्वौ, स्तो द्वे कर्मणी न चैकस्य ।
नैकस्य च क्रिये द्वे, एकमनेकं यतो न स्यात् ।। ५४ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै-
दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तमः।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्
तत्किं ज्ञानघनस्य बंधनमहो भूयो भवेदात्मनः ।। ५५ ।।
( अनुष्टुभ् )
आत्मभावान्करोत्यात्मा, परभावान्सदा परः ।
आत्मैव ह्यात्मनो भावाः, परस्य पर एव ते ।। ५६ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अब, छह कलशों के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि ‘अज्ञान व ज्ञान
से क्या-क्या होता है?’ -
( कुण्डलिया )
नाज सम्मिलित घास को, ज्यों खावे गजराज।
भिन्न स्वाद जाने नहीं, समझे मीठी घास ।।
समझे मीठी घास नाज को न पहिचाने ।
त्यों अज्ञानी जीव निजातम स्वाद न जाने ।।
पुण्य-पाप में धार एकता-शून्य हिया है।
अरे ! शिखरणी पी मानो गो-दूध पिया है।।५७।।
( हरिगीत )
अज्ञान से ही भागते मृग, रेत को जल मानकर ।
अज्ञान से ही डरें तम में, रस्सी विषधर मानकर ।।
ज्ञानमय है जीव पर, अज्ञान के कारण अहो !।
वातोद्वेलित उदधिवत्, कर्ता बने आकुलित हो ।।५८।।
दूध-जल में भेद जाने, ज्ञान से बस ! हंस ज्यों।
सद्ज्ञान से अपना-पराया, भेद जाने जीव त्यों ।।
जानता तो है सभी, करता नहीं कुछ आतमा ।
चैतन्य में आरूढ़ नित ही, यह अचल परमातमा ।।५९।।
( वसन्ततिलका )
अज्ञानतस्तु सतृणाभ्यवहारकारी ज्ञानं स्वयं किल भवन्नपि रज्यते यः ।
पीत्वा दधीक्षुमधुराम्लरसातिगृद्धया गां दोग्धि दुग्धमिव नूनमसौ रसालम् ।। ५७ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
अज्ञानान्मृगतृष्णिकां जलधिया धावंति पातुं मृगा
अज्ञानात्तमसि द्रवंति भुजगाध्यासेन रज्जौ जनाः ।
अज्ञानाच्च विकल्पचक्र करणाद्वातोत्तरंगाब्धिवत्
शुद्धज्ञानमया अपि स्वयममी कर्त्रीभवंत्याकुलाः ।। ५८ ।।
( वसन्ततिलका )
ज्ञानाद्विवेचकतया तु परात्मनोर्यो जानाति हंस इव वाःपयसोर्विशेषम् ।
चैतन्यधातुमचलं स सदाधिरूढो जानीत एव हि करोति न किंचनापि ।। ५९ ।।
( आडिल्ल )
उष्णोदक में उष्णता है अग्नि की।
और शीतलता सहज ही नीर की।।
व्यंजनों में है नमक का क्षारपन।
ज्ञान ही यह जानता है विज्ञजन।।
क्रोधादिक के कर्तापन को छेदता।
अहंबुद्धि के मिथ्यातम को भेदता।।
इसी ज्ञान में प्रगटे निज शुद्धात्मा।
अपने रस से भरा हुआ यह आतमा।।६०।।
( सोरठा )
करे निजातम भाव, ज्ञान और अज्ञानमय।
करे न पर के भाव, ज्ञानस्वभावी आतमा।।६१।।
ज्ञानस्वभावी जीव, करे ज्ञान से भिन्न क्या?।
कर्ता पर का जीव, जगज्जनों का मोह यह।।६२।।
ॐ ह्रीं कर्तृ-कर्मविषये ज्ञानाऽज्ञानयोः फलप्ररूपक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४३।।
( मन्दाक्रान्ता )
ज्ञानादेव ज्वलनपयसोरौष्ण्यशैत्यव्यवस्था
ज्ञानादेवोल्लसति लवणस्वादभेदव्युदासः।
ज्ञानादेव स्वरसविकसन्नित्यचैतन्यधातोः
क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिंदती कर्तृभावम्।।६०।।
( अनुष्टुभ् )
अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वन्नात्मानमंजसा।
स्यात्कर्तात्मात्मभावस्य परभावस्य न क्वचित्।।६१।।
आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम्।
परभावस्य कर्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम्।।६२।।
अब, ‘मिथ्यात्वादि चार प्रत्यय अथवा तेरह गुणस्थान, पुद्गल कर्म के
कर्ता हैं’ - यह बताते हैं -
( दोहा )
यदि पुद्गलमय कर्म को, करे न चेतनराय।
कौन करे? अब यह कहें, सुनो! भरम नश जाय।।६३।।
ॐ ह्रीं पुद्गलकर्म-कर्तृत्वनिरूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।।४४।।
अब, आगामी दो कलशों में ‘पुद्गल व जीव द्रव्य का परिणमन-
स्वभाव’ सयुक्तिक सिद्ध करते हैं -
( हरिगीत )
सब पुद्गलों में है स्वभाविक, परिणमन की शक्ति जब।
और उनके परिणमन में, है न कोई विघ्न जब।।
क्यों न हो तब स्वयं कर्ता, स्वयं के परिणमन का?।
अर सहज यह नियम जानो, वस्तु के परिणमन का।।६४।।
आत्मा में है स्वभाविक, परिणमन की शक्ति जब।
और उसके परिणमन में, है न कोई विघ्न जब।।
क्यों न हो तब स्वयं कर्ता, स्वयं के परिणमन का?।
अर सहज यह नियम जानो, वस्तु के परिणमन का।।६५।।
ॐ ह्रीं पुद्गलजीवद्रव्ययोः परिणमनस्वभावसाधक-श्रीसमयसारकलश-
परमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४५।।
( वसन्ततिलका )
जीवः करोति यदि पुद्गलकर्म नैव, कस्तर्हि तत्कुरुत इत्यभिशंकयैव।
एतर्हि तीव्ररयमोहनिवर्हणाय, संकीर्त्यते शृणुत पुद्गलकर्मकर्तृ।।६३।।
( उपजाति )
स्थितेत्यविघ्ना खलु पुद्गलस्य, स्वभावभूता परिणामशक्तिः।
तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यमात्मनस्तस्य स एव कर्ता।।६४।।
स्थितेति जीवस्य निरन्तराया, स्वभावभूता परिणामशक्तिः।
तस्यां स्थितायां स करोति भावं, यं स्वस्य तस्यैव भवेत्स कर्ता।।६५।।
अब, ‘ज्ञानी के ज्ञानमय और अज्ञानी के अज्ञानमय भाव ही क्यों होते
हैं ?’- यह दो कलशों में दृष्टान्त सहित स्पष्ट कहते हैं -
( रोला )
ज्ञानी के सब भाव शुभाशुभ ज्ञानमयी हैं।
अज्ञानी के वही भाव अज्ञानमयी हैं ।।
ज्ञानी और अज्ञानी में यह अन्तर क्यों है?।
तथा शुभाशुभभावों में भी अन्तर क्यों है ।। ६६ ।।
ज्ञानी के सब भाव ज्ञान से बने हुए हैं।
अज्ञानी के सभी भाव अज्ञानमयी हैं।।
उपादान के ही समान कारज होते हैं।
जौ बौने पर जौ ही तो पैदा होते हैं ।। ६७।।
ॐ ह्रीं ज्ञानी-अज्ञानिनोः ज्ञानाऽज्ञानभावयोः कर्तृत्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।४६।।
अब, ‘अज्ञानी के अज्ञानमय भाव ही कर्म-बन्धन के निमित्त-कारणरूप
हेतु हैं’ – यह एक कलश से स्पष्ट करते हैं -
(दोहा)
अज्ञानी अज्ञानमय, भावभूमि में व्याप्त ।
इस कारण द्रव्य-बन्ध के, हेतुपने को प्राप्त ।। ६८।।
ॐ ह्रीं अज्ञानिनः अज्ञानमयभावानां कर्मबन्धननिमितत्त्वप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४७।।
( आर्या )
ज्ञानमय एव भावः, कुतो भवेत् ज्ञानिनो न पुनरन्यः ।
अज्ञानमयः सर्वः, कुतोऽयमज्ञानिनो नाऽन्यः ।। ६६ ।।
( अनुष्टुभ् )
ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः, सर्वे भावा भवन्ति हि ।
सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता, भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते ।। ६७ ।।
अज्ञानमयभावानामज्ञानी व्याप्यभूमिकाम् ।
द्रव्यकर्मनिमित्तानां, भावानामेति हेतुताम् ।। ६८ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
अब, ‘जो समस्त नयपक्ष के विकल्पों का अतिक्रम करता है, वही
समयसार को प्राप्त करता है’; अतः आचार्य अमृतचन्द्रदेव, नयपक्ष के त्याग
की भावना वाले २३ कलशरूप काव्य लिखते हैं, जिनका पद्यानुवाद
इसप्रकार है -
( सोरठा )
जो निवसे निज माहि, छोड़ सभी नयपक्ष को।
करे सुधारस पान, निर्विकल्प चित शान्त हो ।। ६९।।
( रोला )
एक कहे ना बँधा, दूसरा कहे बँधा है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७०।।
एक कहे ना मूढ़, दूसरा कहे मूढ़ है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७१।।
एक कहे ना रक्त, दूसरा कहे रक्त है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७२।।
( उपेन्द्रवज्रा )
य एव मुक्त्वा नयपक्षपातं, स्वरूपगुप्ता निवसन्ति नित्यम् ।
विकल्पजालच्युतशान्तचित्ताः, त एव साक्षादमृतं पिबन्ति ।। ६९ ।।
( उपजाति )
एकस्य बद्धो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७० ।।
एकस्य मूढो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७१ ।।
एकस्य रक्तो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७२ ।।
एक कहे ना दुष्ट, दूसरा कहे दुष्ट है।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है।।७३।।
एक अकर्ता कहे, दूसरा कर्ता कहता।
किन्तु यह तो उभय नयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव, सदा चैतन्यरूप है ।। ७४।।
एक अभोक्ता कहे, दूसरा भोक्ता कहता।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७५।।
एक कहे ना जीव, दूसरा कहे जीव है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।। ७६।।
( उपजाति )
एकस्य दुष्टो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७३ ।।
एकस्य कर्ता न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७४ ।।
एकस्य भोक्ता न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७५ ।।
एकस्य जीवो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७६ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
एक कहे ना सूक्ष्म, दूसरा कहे सूक्ष्म है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।। ७७।।
एक कहे ना हेतु, दूसरा कहे हेतु है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७८।।
एक कहे ना कार्य, दूसरा कहे कार्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।७९।।
एक कहे ना भाव, दूसरा कहे भाव है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८०।।
( उपजाति)
एकस्य सूक्ष्मो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७७ ।।
एकस्य हेतुर्न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७८ ।।
एकस्य कार्यं न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ७९ ।।
एकस्य भावो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८० ।।
एक कहे ना एक, दूसरा कहे एक है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८१।।
एक कहे ना सान्त, दूसरा कहे सान्त है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८२।।
एक कहे ना नित्य, दूसरा कहे नित्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८३।।
एक कहे ना वाच्य, दूसरा कहे वाच्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है ।।८४।।
( उपजाति )
एकस्य चैको न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८१ ।।
एकस्य सांतो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८२ ।।
एकस्य नित्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८३ ।।
एकस्य वाच्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८४ ।।
नाना कहता एक, दूसरा कहे अनाना।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८५।।
एक कहे ना चेत्य, दूसरा कहे चेत्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८६।।
एक कहे ना दृश्य, दूसरा कहे दृश्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८७।।
एक कहे ना वेद्य, दूसरा कहे वेद्य है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८८।।
( उपजाति )
एकस्य नाना न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८५ ।।
एकस्य चेत्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८६ ।।
एकस्य दृश्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८७ ।।
एकस्य वेद्यो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८८ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार
( रोला )
एक कहे ना भात, दूसरा कहे भात है।
किन्तु यह तो उभयनयों का पक्षपात है।।
पक्षपात से रहित, तत्त्व-वेदी जो जन हैं।
उनको तो यह जीव सदा चैतन्यरूप है।।८९।।
( हरिगीत )
उठ रहा जिसमें है अनन्ते, विकल्पों का जाल है।
वह वृहद् नय-पक्ष-कक्षा, विकट है विकराल है।।
उल्लंघन कर उसे बुध, अनुभूतिमय निजभाव को।
हो प्राप्त अन्तर्बाह्य से, समरसी एक स्वभाव को ।।९०।।
( दोहा )
इन्द्रजाल से स्फुरें, सब विकल्प के पुंज ।
जो क्षणभर में लय करे, मैं हूँ वह चित्युंज ।। ९१।।
ॐ ह्रीं सकलनयपक्षसंन्यासभावनानर्तक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। ४८ ।।
अब, आगामी कलश में ‘समयसार-स्वरूप भगवान् आत्मा के अनुभव
की प्रेरणा’ देते हैं -
( उपजाति )
एकस्य भातो न तथा परस्य चिति द्वयोर्दाविति पक्षपातौ ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। ८९ ।।
( वसन्ततिलका )
स्वेच्छासमुच्छलदनल्पविकल्पजालामेवं व्यतीत्य महतीं नयपक्षकक्षाम्।
अन्तर्बहिः समरसैकरसस्वभावं, स्वं भावमेकमुपयात्यनुभूतिमात्रम् ।। ९० ।।
( रथोद्धता )
इन्द्रजालमिदमेवमुच्छलत् पुष्कलोच्चलविकल्पवीचिभिः ।
यस्य विस्फुरणमेव तत्क्षणं कृत्स्नमस्यति तदस्मि चिन्महः ।। ९१ ।।
मैं हूँ वह चित्पुंज कि भावाभाव भावमय ।
परमारथ से एक सदा अविचल स्वभावमय ।।
कर्मजनित यह बन्धपद्धति करूँ पार मैं।
नित अनुभव यह करूँ कि चिन्मय समयसार मैं ।। ९२।।
ॐ ह्रीं पक्षातिक्रान्त-समयसारस्वरूप-परमात्मानुभवप्रेरक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।४९।।
अब, एक कलश के माध्यम से कहते हैं कि ‘पक्षातिक्रान्त - स्वरूप
समयसार ही सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान है’ -
( हरिगीत )
यह पुण्य-पुरुष-पुराण सब, नयपक्ष बिन भगवान् है।
यह अचल है अविकल्प है, बस यही दर्शन-ज्ञान है।।
निभृतजनों का स्वाद्य है, अर जो समय का सार है।
जो भी हो वह बस ! एक ही, अनुभूति का आधार है।। ९३।।
ॐ ह्रीं ‘पक्षातिक्रान्त-समयसार एव सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानम्’ इतिप्ररूपक-
श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५०।।
अब, आगामी कलश में ‘आत्मानुभव कैसे होता है ?’ यह दृष्टान्तपूर्वक
बताते हैं -
( स्वागता )
चित्स्वभावभरभावितभावाभावभावपरमार्थतयैकम् ।
बंधपद्धतिमपास्य समस्तां चेतये समयसारमपारम् ।। ९२ ।।
( शार्दूलविक्रीडित )
आक्रामन्नविकल्पभावमचलं, पक्षैर्नयानां विना;
सारो यः समयस्य भाति निभृतैरास्वाद्यमानः स्वयम् ।
विज्ञानैकरसः स एष भगवान्पुण्यः पुराणः पुमान्;
ज्ञानं दर्शनमप्ययं किमथवा यत्किंचनैकोऽप्ययम् ।। ९३ ।।
( हरिगीत )
निज औघ से च्युत जिस तरह जल, ढालवाले मार्ग से ।
बलपूर्वक यदि मोड़ दें तो, आ मिले निज औघ से ।।
उस ही तरह यदि मोड़ दें, बलपूर्वक निजभाव को।
निजभाव से च्युत आत्मा, निजभाव में ही आ मिले ।।९४।।
ॐ ह्रीं दृष्टान्तपुरस्सर-स्वानुभवप्रेरक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५१।।
अब, कहते हैं कि विकल्प करनेवाला कर्ता है और मात्र विकल्प ही
उसका कर्म है -
( रोला )
है विकल्प ही कर्म विकल्पक कर्ता होवे।
जो विकल्प को करे वही तो कर्ता होवे ।।
नित अज्ञानी जीव विकल्पों में ही होवे ।
इस विधि कर्ता-कर्मभाव का नाश न होवे ।।९५।।
ॐ ह्रीं ‘विकल्प एव कर्म - विकल्पक एव कर्तृ’ इतिप्ररूपक-श्रीसमयसार-
कलशपरमागमाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।५२।।
( शार्दूलविक्रीडित )
दूरं भूरिविकल्पजालगहने, भ्राम्यन्निजौघाच्च्युतो;
दूरादेव विवेकनिम्नगमनान्नीतो निजौघंबलात् ।
विज्ञानैकरसस्तदेकरसिनामात्मानमात्मा हरन् ;
आत्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत् ।। ९४ ।।
( अनुष्टुभ् )
विकल्पकः परं कर्ता, विकल्पः कर्म केवलम् ।
न जातु कर्तृकर्मत्वं, सविकल्पस्य नश्यति ।। ९५ ।।
अब, इस अधिकार का उपसंहार करते हुए अन्तिम चार कलशों में
कहते हैं कि ‘जो कर्ता है, वह ज्ञाता नहीं होता और जो ज्ञाता है, वह कर्ता
नहीं होता’ करने रूप क्रिया में जानना भासित नहीं होता तथा जाननेरूप
क्रिया में करना भासित नहीं होता। कर्म में कर्त्ता नहीं तथा कर्त्ता में कर्म
नहीं; कर्म कर्म में है और ज्ञाता ज्ञाता में है। ऐसा निर्णय होने से कर्त्ता कर्त्ता
नहीं रहा, कर्म कर्म नहीं रहा; मात्र ज्ञानरूप परिणमन से अपार आनन्द
हुआ।’ -
( रोला )
जो करता है वह केवल कर्ता ही होवे।
जो जाने बस ! वह केवल ज्ञाता ही होवे ।।
जो करता वह नहीं जानता कुछ भी भाई ! ।
जो जाने वह करे नहीं कुछ भी हे भाई ! ।।९६।।
( रोला )
करने रूप क्रिया में जानन भासित ना हो।
जानन रूप क्रिया में करना भासित ना हो।।
इसीलिए तो जानन-करना भिन्न-भिन्न हैं।
इसीलिए तो ज्ञाता-कर्ता भिन्न-भिन्न है ।।९७।।
( रथोद्धता )
यः करोति स करोति केवलं, यस्तु वेत्ति स तु वेत्ति केवलम् ।
यः करोति न हि वेत्ति स क्वचित्, यस्तु वेत्ति न करोति स क्वचित् ।। ९६ ।।
( इन्द्रवज्रा )
ज्ञप्तिः करोतौ न हि भासतेऽन्तः, ज्ञप्तौ करोतिश्च न भासतेऽन्तः।
ज्ञप्तिः करोतिश्च ततो विभिन्ने, ज्ञाता न कर्तेति ततः स्थितं च ।। ९७ ।।
( हरिगीत )
कर्म में कर्ता नहीं अर, कर्म कर्ता में नहीं।
इसलिए कर्ता-कर्म की थिति, भी कभी बनती नहीं ।।
कर्म में है कर्म, ज्ञाता में रहा ज्ञाता सदा।
यदि साफ है यह बात तो फिर, मोह है क्यों नाचता ? ।। ९८ ।।
( सवैया इकतीसा )
जगमग जगमग जली ज्ञान-ज्योति जब,
अति गम्भीर चित् शक्तियों के भार से ।।
अद्भुत अनुपम अचल अभेद ज्योति,
व्यक्त धीर-वीर निर्मल आर-पार से।।
तब कर्म कर्म अर कर्ता कर्ता न रहा।
ज्ञान ज्ञानरूप हुआ आनन्द अपार से ।।
और पुद्गलमयी कर्म कर्मरूप हुआ,
ज्ञानी पार हुए भव-सागर अपार से ।।९९।।
ॐ ह्रीं ज्ञातृत्व-कर्तृत्वयोः भेदज्ञानप्ररूपक-श्रीसमयसारकलशपरमागमाय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।५३।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
( शार्दूलविक्रीडित )
कर्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्तरि
द्वंद्वं विप्रतिषिध्यते यदि तदा का कर्तृकर्मस्थितिः ।
ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थिति-
र्नेपथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथात्येष किम् ।। ९८ ।।
( मन्द्राक्रान्ता )
कर्ता कर्ता भवति न यथा कर्म कर्मापि नैव
ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा पुद्गलः पुद्गलोऽपि ।
ज्ञानज्योतिज्वलितमचलं व्यक्तमंतस्तथोच्चै –
श्चिच्छक्तीनां निकरभरतोऽत्यंतगंभीरमेतत् ।। ९९ ।।
अर्ध्यावली : कर्ता-कर्म अधिकार (जयमाला)
जयमाला
( दोहा )
अरे ! विगत अधिकार में, परद्रव्यों के साथ।
रे एकत्व-ममत्व को, छुड़वाया हे नाथ! ।।१।।
अब इस अधिकार में, कर्ता-भोक्ता भाव ।
को छुड़वाते भव्यजन ! इनका करो अभाव ।।२।।
वर्णादि रागादि को, करे न भोगे जीव ।
ज्ञाता-दृष्टा ही रहे, निज में रमे सदीव ।।३।।
( रोला )
रे! एकत्व-ममत्व और कर्ता-भोक्तापन ।
यदि होवे पर में तो मिथ्यादर्श कहा है।।
अरे ! नहीं है कोई भी परद्रव्य किसी का।
और नहीं है कोई किसी का कर्ता-भोक्ता ।।४।।
सब अपने-अपने में ही परिपूर्ण तत्त्व हैं।
कर्ता-भोक्ता भी सब अपने-अपने ही हैं।।
दो द्रव्यों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है।
सब अपने-अपने में ही शोभित होते हैं।।५।।
इस जग का कर्ता कोई भगवान् नहीं है।
सुनो भव्य ! यह बात मात्र इतनी ही नहीं है।।
एक द्रव्य है नहीं अन्य का कर्ता-धर्ता ।
मूल बात तो यह है इसे ध्यान से जानों ।।६।।
इसे भूलकर जो पर के कर्ता बनते हैं।
वे अज्ञानी जीव चतुर्गति भ्रमण करेंगे ।।
उनके भव का अन्त नहीं है दूर-दूर तक ।
वे चौरासी लाख योनियों में घूमेंगे ।।७।।
है विकल्प ही कर्म विकल्पक कर्ता होवे।
जो विकल्प को करे वही तो कर्ता होवे।।
नित अज्ञानी जीव विकल्पों में ही होवे।
इस विधि कर्ता-कर्मभाव का नाश न होवे ।।८।।
जो करता है वह केवल कर्ता ही होवे।
जो जाने बस ! वह केवल ज्ञाता ही होवे ।।
जो करता वह नहीं जानता कुछ भी भाई !।
जो जाने वह करे नहीं कुछ भी हे भाई ! ।।९।।
करने रूप क्रिया में जानन भासित ना हो।
जानन रूप क्रिया में करना भासित ना हो।।
इसीलिए तो जानन करना भिन्न-भिन्न है।
इसीलिए तो ज्ञाता-कर्ता भिन्न-भिन्न हैं।।१०।।
(दोहा)
ज्ञाता बनना इष्ट है, कर्ता-भाव अनिष्ट ।
कर्ता-भाव विनाश कर, ज्ञाताभाव-प्रविष्ट ।।११।।
ॐ ह्रीं कर्ताकर्मस्वरूपप्रतिपादक-कर्ताकर्माधिकाराय जयमाला पूर्णार्थ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।
कर्ता-कर्म विभाव की, चर्चा हुई समाप्त।
अब होगी रे भव्यजन ! पुण्य-पाप की बात ।।१२।।
( इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् )
प्रूफरीडिंग बाकी है