श्री समवशरण पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Samavasharan Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री समवशरण पूजन

तीर्थंकर प्रभु मोह क्षीणकर जब प्रगटाते केवलज्ञान ।
इन्द्र आज्ञा से कुबेर रचना करता स्वर्गों से आन ।।
बारह सभा जहाँ जुडती है होता है प्रभु का उपदेश ।
ओंकारमय दिव्य ध्वनि से पाते सभी जीव संदेश ।।
पर कर्तृत्व विकल्प त्याग कर, संकल्पों को दे तू त्याग ।
सागर की चंचल तरंग सम तुझे डुबो देगी तू भाग ।।
पुण्योदय से समवशरण अरु जिन मंदिर मैंने पाया ।
अष्ट द्रव्य ले विनय भाव से पूजन करने को आया ।।
श्री जिनवर के समवशरण को भाव सहित मैं करूँ प्रणाम ।
वीतराग पावन मुद्रा दर्शनकर ध्याऊँ आठों याम ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्यविराजमान जिनेन्द्रदेव अत्र अवतर अवतर संवौषट । ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्यविराजमान जिनेन्द्रदेव अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्यविराजमान जिनेन्द्रदेव अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

अष्टादश दोषों से विरहित अरहंतों को नमन करूँ ।
अनुभव रस अमृत जल पीकर त्रिविधताप को शमन करूँ ।।
जिन तीर्थंकर समवशरण को भाव सहित मैं नमन करूँ ।
पूर्ण शुद्ध ज्ञायक स्वरूप मैं मोक्षमार्ग अनुसरण करूँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरणमध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।

छयालीस गुण मंडित प्रभुवर अर्हंतों को नमन करूँ ।
अनुभव रस चंदन शीतल पा भवआतप का हरण करूँ ।।जिन।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरणमध्यविराजमान जिनेन्द्रदेवाय संसारतापविनाशनाय चंदन नि ।

चार अनंत चतुष्टय धारी अर्हंतों को नमन करूँ ।
अनुभव रस मय अक्षत पाकर भवसमुद्र हरण करूँ ।।जिन।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि

जन्म समयदश ज्ञानसमय दश अतिशययुत प्रभु नमन करूँ ।
अनुभव रस के पुष्प प्राप्तकर कामबाण का हनन करूँ ।।निज।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

देवोपम चौदह अतिशय संयुक्त देव को नमन करूँ ।
अनुभव रस नैवेद्य प्राप्तकर क्षुधारोग का हरण करूँ ।।जिन।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।

अष्ट प्रातिहार्यों से शोभित अर्हंतों को नमन करूँ ।
अनुभव रसमय दीपज्योति पा मोहतिमिर को हननकरूं ।।जिन।।६ ।।

जो अकषय भाव के द्वारा सर्व कषायें लेगा तू जीत ।
मुक्ति वधू उसका वरने आएगी उर में घर कर प्रीत ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय मोहांधकार विनाशनाय दीप नि ।

नव क्षायिक लब्धियाँ प्राप्तजिनवर देवों को नमन करूँ ।
अनुभव रसकी धूप बनाकर अष्टकर्म को हरण करूँ ।।जिन।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।

वसु मंगल द्रव्यों से शोभित गंध कुटी को नमन करूँ ।
अनुभव रस के फल मैं पाऊँमोक्षस्वपद का वरण करूँ ।।जिन।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय मोक्षफल प्राप्ताय फलं नि ।

परमौदारिक देह प्राप्त श्री अर्हंतों को नमन करूँ ।
अनुभव रस के अर्घ बनाऊँ मैं अनर्घ पदवरण करूँ ।।जिन।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्य विराजमान जिनेन्द्रदेवाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

समवशरण जिनराज का महापूज्य द्युतिवान ।
भव्य जीव उपदेश सुन करते निज कल्याण ।।१।।

ऋषभ देव के समवशरण का बारह योजन का विस्तार ।
अर्द्ध अर्द्ध घटते सन्मति तक रहा एक योजन विस्तार ।।२।।

शत इन्द्रों से वंदित श्री जिनवर का समवशरण सुन्दर ।
तीन लोक का सारा वैभव प्रभुचरणों में न्यौछावर ।।३।।

सौ योजन तक नहीं कहीं दुर्भिक्ष दृष्टि में आता ।
भूमि स्वच्छ दर्पणवत होती गंधोदक बरसाता ।।४।।

गोलाकार समवसृत रचना होती है उन्नत आकाश ।
चारों दिशि में बीस सहस्त्र सीढियाँ होतीं भू आकाश ।।५।।

चार कोट अरु पाँच वेदि के बीच भूमि होती है आठ ।
चारों ओर वीथियाँ होती गंधकुटी तक अनुपम ठाठ ।।६।।

पार्श्व पीथियों में दो दो वेदी होती है रत्नमयी ।
सभी भूमियों के पथ होते सुन्दर तोरण द्वार मयी ।।७।।

अंतरंग बहिरंग परिग्रह तजने का ही कर अभ्यास ।
इसके बिना नहीं तू होगा साधु कभी भी कर विश्वास ।।
द्वारों पर नवनिधि व धूप घट मंगल द्रव्य सजे होते ।
साढे बारह कोटि वाद्य देवों द्वारा बजते होते ।।८।।

द्वार द्वार के दोनों बाजू एक एक नाटक शाला ।
जहाँ देव कन्याएँ करती नृत्य हृदय हरने वाला ।।९।।

प्रथम कोट की चारों दिशि में धर्म चक्र होते है चार ।
धूलि शाल है नाम मनोहर मानस्तंभ बने है चार ।।१०।।

प्रथम भूमि चैत्यालय की हैं मन्दिर चारों ओर बने ।
फिर वापिका बनी शुभ सुन्दर जो जल से परिपूर्ण घने ।।११।।

द्वितिय कोट फिर पुष्प वाटिकाओं की पंक्ति महान् विशाल ।
फिर वन भूमि अशोक आम्र चंपक अरु सप्त पर्ण तरु माल ।।१२।।

तृतिय कोटि में कल्पभूमि वेदी अरु बनी नृत्यशाला ।
भवन भूमि स्तूप मनोहर ध्वजा पंक्तियों की माला ।।१३।।

यही महोदय मंडप अनुपम श्रुत केवलि करते व्याख्यान ।
केवलज्ञानलब्धि के धारी भी देते उपदेश महान् ।।१४।।

चौथा कोटि शाल अतिसुन्दर कल्पवासि द्वारा रक्षित ।
आगे चलकर श्री मंडप है महाविभूतियों में भूषित ।।१५।।

भूमि आठवीं गंधकुटी है तीन पीठ पर सिंहासन ।
तरु अशोक शिर तीन छत्र है भामंडल द्युतिमय दर्पण ।।१६।।

चारों दिशि में जिनप्रभु के मुख दिखते मानो मुख हो चार ।
अंतरीक्ष जिनदेव विराजे खिरे दिव्य ध्वनि मंगलकार ।।१७।।

तीन लोक की सकल संपदा चरणों में करती वदन ।
इन्द्रादिक सुर नर मुनि पशु भी चरणों में होते अर्पण ।।१८।।

द्वादश सभा महान् बनी हैं दिव्य ध्वनि का मोद अपार ।
नभ से पुष्प वृष्टि सुर करते होना जय ध्वनि का उच्चार ।।१९।।

द्वादश कोठे है पहिले मे गणधर ऋषिमुनि रहे विराज ।
दूजे कल्पवासि देवियाँ तीजे रही आर्यिका साज ।।२०।।

सर्व चेष्टा रहित पूर्णा निष्क्रिम हो तू कर निज का ध्यान ।
दृश्य जगत् के भ्रम को तज दें पाऐगा उत्तम निर्वाण ।।
चौथे में ज्योतिषी देवियाँ पंचम व्यंतर देवि अमेव ।
षष्टम भवनवासि की देवी सप्तम भवनवासि के देव ।।२१।।

अष्टम व्यंतर देव बैठते नवम ज्योतिषी देव प्रसिद्ध ।
दसवें कल्पवासि सुर होते ग्याग्हवें में मनुज प्रसिद्ध ।।२२।।

बारहवें कोठे में बैठे हैं तिर्यंच जीव चुपचाप ।
तीर्थंकर की ध्वनि सुन सब हर लेते है मन का संताप ।।२३।।

प्रभु महात्म्य से रोग मरण आपत्ति बेर तृष्णा न कहीं ।
काम क्षुधा मय पीडा दुख आतंक यहाँ पर कहीं नहीं ।।२४।।

पंचमेरु के क्षेत्र विदेहों में है समवशरण प्रख्यात ।
विद्यमान तीर्थंकर बीस विराजित है शाश्वत विख्यात ।।२५।।

प्रभु की अमृत वाणी सुनकर कर्ण तृप्त हो जाते है ।
जन्म जन्म के पातक क्षण में शीघ्र विलय हो जाते है ।।२६।।

जब विहार होता है प्रभु का सुर ग्चते है स्वर्ण कमल ।
जहाँ जहाँ प्रभु जाते होती समवशरण रचना अविकल ।।२७।।

समवशरण रचना का वर्णन करने की प्रभु शक्ति नहीं ।
सोलहकारण भव्यभावना भाए बिन प्रभु भक्ति नहीं ।।२८।।

ऐसी निर्मल बुद्धि मुझे दो निज आतम का ज्ञान करूँ ।
समवशरण की पूजन करके शुद्धातम का ध्यान करूँ ।।२९।।

पाप पुण्य आश्रव विनाशकर रागद्वेष पर जय पाऊँ ।
कर्म प्रकृतियों पर जयपाकर सिद्धलोक में आजाऊँ ।।३०।।

ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्यविराजमान जिनेन्द्रदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तयेअर्घ्य

समवशरण दर्शन करूँगाऊँमंगल चार ।
भेदज्ञान की शक्ति से हो जाऊँभवपार । ।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमन्त्र - ॐ ह्रीं श्री समवशरण मध्यविराजमान अर्हन्तदेवाय नम ।
धौव्य तत्त्व का निर्विकल्प बहुमान हो गया उसी समय ।
भव वन में रहते रहते भी मुक्त हो गया उसी समय ।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ७५ से ८०